तो अच्छे दिन आने वाले हैं!

-सुनील कुमार
सुनील कुमार

"…सवाल यह है कि अच्छे दिन किसके लिए आने वाले हैं? क्या उन किसानों के लिए भी अच्छे दिन आने वाले हैं जो सरकारी नीतियों के कारण आत्महत्या करने और आधे पेट खाने को मजबूर हैं? क्या फैक्ट्रियों में हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले मजदूरों, जो 10-12 घंटे काम कर के कबूतरखाने जैसे बने कमरों में रहते हैं और तमाम तरह की बीमारियों से ग्रसित हो कर गांव वापस चले जाते हैं, के लिए भी अच्छे दिन आने वाले हैं?…"


16 वीं लोकसभा के चुनाव परिणाम मीडिया, सभी पार्टियों एवं चुनावी विश्लेषकों के अनुमान के विपरीत रहे हैं। खुद बीजेपी के लिए ये परिणाम आश्चर्यजनक रहे हैं। इस जीत से आर.एस.एस. को संजीवनी मिल गई है। यह ऐसा चुनाव था जहां पहले से ही हार-जीत का फैसला हो चुका था। सट्टेबाजों ने कांग्रेस पर दांव लगना बंद कर दिया था। अदानी, टाटा, रिलायंस जैसे उद्योगपति के साथ-साथ पूरे उद्योगजगत के मुख्य चहेते नरेन्द्र मोदी थे। यह चुनाव पार्टियों की विचारधारा पर नहीं, व्यक्ति विशेष के आधार पर लड़ा गया। इसमें नरेन्द्र मोदी ने बाजी मारी और भाजपा को अब तक की सबसे बड़ी जीत दिलाई।


नरेन्द्र मोदी के चुनाव में इलेक्ट्रानिक व प्रिंट मीडिया एवं सोशल साईटों पर करोड़ों रूपये खर्च किये गये। अभी तक चुनाव में सबसे ज्यादा सभा एवं हवाई यात्रा (3 लाख कि.मी.) नरेन्द्र मोदी ने की। एक प्रधानमंत्री के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने इतिहास से सम्बन्धित इतनी ज्यादा गलत जानकारियां दी, लेकिन कभी भी इसके लिए खेद प्रकट नहीं किया। जिस तरह हिटलर ने जर्मनी को विश्व का अग्रणी देश बनाने का सपना देखा था उसी तरह मोदी भारत को ‘विश्वगुरू’ बनाना चाहते हैं। हिटलर का प्रचार मंत्री गोयबल्स कहता था कि एक बात को इतनी बार बोलो कि उसको लोग सही मानने लगें। उसी तर्ज पर गुजरात के विकास माॅडल का प्रचार किया गया और नारे दिये गये-‘अच्छे दिन आने वाले हैं’।

अच्छे दिन

सवाल यह है कि अच्छे दिन किसके लिए आने वाले हैं? क्या उन किसानों के लिए भी अच्छे दिन आने वाले हैं जो सरकारी नीतियों के कारण आत्महत्या करने और आधे पेट खाने को मजबूर हैं? क्या फैक्ट्रियों में हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले मजदूरों, जो 10-12 घंटे काम कर के कबूतरखाने जैसे बने कमरों में रहते हैं और तमाम तरह की बीमारियों से ग्रसित हो कर गांव वापस चले जाते हैं, के लिए भी अच्छे दिन आने वाले हैं? क्या उन महिलााओं के लिए अच्छे दिन आने वाले हैं जो पेट की आग बुझाने के लिए अपने शरीर को  बेचती हैं या चंद पैसे के लिए सरगोसी (किराये की कोख) का काम करती हैं? अहमदाबाद के जुहूपुरा में रहने वाली 65 साल की नियाज बीबी के दो मंजिला मकान को दंगे में जला दिया गया था, अब वो किराये के एक कमरे में 5 लोगों के साथ गुजारा करती हैं। वो बताती हैं कि उनको किराये पर दुकान इसलिए नहीं मिलती है क्योंकि लोगों को डर है कि इनकी दुकान जलाई जायेगी तो पास में दूसरे हिन्दु दुकानें भी जल सकती हैं। इसी तरह एसोसिएट प्रोफेसर हुमा बताती हैं कि उनके इलाके में सप्लाई का पानी कई-कई दिन नहीं आता है, जबकि जुहुपूरा के दूसरी तरफ पानी आता है। क्या निजाज बीबी और हुमा के भी अच्छे दिन आने वाले हैं?

क्या हरियाणा के उन दलित परिवारों के अच्छे दिन आने वाले हैं जो अपनी बच्चियों के साथ हुए बलात्कार के मामले में इंसाफ मांगने के लिए 1 माह से अंधिक समय से जंतर-मंतर पर बैठे हैं? क्या निप्पॅोन, गर्जियानो, मारूती के मजूदरों, जो सालों से जेल में बंद हैं और जिनकी परिवारिक हालत खराब होती जा रही है, के भी अच्छे दिन आयेंगे? या अच्छे दिन उन पूंजीपतियों के आने वाले हैं जिनके शेयर के दाम 12 मई के एक्जीट पोल दिखाने के बाद लगातार बढ़ते गये? 13 सितम्बर, 2013 को नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार घोषित होने के बाद से ही अरविंद लिमिटेड, कैडिला, पीपावाव, अदानी जैसी गुजरात स्थित कंपनियों के शेयर लगातार बढ़ने लगे। मोदी इफेक्ट ही था कि अदानी की पूंजी में मध्य फरवरी से 9 मार्च तक 25 दिनों में 20000 करोड़ रु. की बढ़ोतरी हो गई। 

अदानी ने 16 मई को चुनाव रिजल्ट के ही दिन 5500 करोड़ रु. के धमारा पोर्ट का अधिग्रहण करने के लिए टाटा के साथ समझौता की। निश्चित ही अच्छे दिन इन पूंजीपतियों के आने वाले हैं। अच्छे दिन रामदेव जैसे बाबाओं के आने वाले हैंै जिन्हांेने कुछ ही वर्षों में 1500 करोड़ रु. का साम्राज्य खड़ा कर लिया है। और अरूण जेटली अब उनकी तुलना गांधी और जयप्रकाश नारायण से कर रहे हैं।

उद्योग जगत की आशाएं

गौतम अदानी ने कहा कि ‘‘देश को ऐसी सरकार की जरूरत है, जो राजनीतिक रूप से व्यावहारिक और आर्थिक समझदारी वाले फैसले कर सके और इन पर रूख साफ रख सके। अपने प्रचार अभियान के दौरान नरेन्द्र मोदी ने ऐसी सरकार पर जोर दिया जो फैसले करने वाली हो और मजबूत प्रशासन मुहैय्या कराने पर केंद्रित हो। इसका नीति निर्माण और उन्हें लागू करने पर सकारात्मक असर पड़ेगा और नीतियों को लागू करने में पारदर्शिता आएगी। इससे परियोजनाओं को लागू करने में तेजी आएगी और साथ ही इससे निवेश में भी तेजी आएगी।’’ 

डाॅयचे बैंक के सह सीईओ गुनीत चड्ढ़ा का कहना है कि ‘‘नई सरकार का सबसे बड़ा काम भारत के काॅरपोरेट जगत का विश्वास बहाल करना है। इसके लिए बेहतरीन तरीका पुरानी परियोजनाओं की राह में आ रही बाधा दूर करने के लिए निश्चित कार्रवाई करना होगा। सरकार और नौकरशाही के बीच तालमेल से फैसले किए जाने की जरूरत है। ऐसे फैसलों से विश्वास बहाल किया जा सकता है।’’

एडलवाइस ग्रुप के चेयरमैन रशेष शाह का कहना है कि ‘‘नई सरकार के आने से देश में निवेश का माहौल सुधरने की उम्मीद है। इसमें पूंजी बाजर महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। पिछले दो दशकों से भारतीय पूंजी बाजार का नाटकीय तरीके से विकास हुआ है लेकिन इसे अभी लम्बा सफर तय करना है.......। निवेशक और उद्योग पूंजी बाजार के अहम घटक हैं। अगर इनसे जुड़े मुद्दों का हल होगा तो इससे एक मजबूत पूंजी बाजार के निर्माण में मदद मिलेगी।’’ 

पीरामल समूह के चेयरमैन अजय पीरामल भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव चाहते हैं-‘‘हमें तत्काल ही खान और ढांचागत क्षेत्र में सुधार लाना चाहिए और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को और उदार बनाया जाना चाहिए। केन्द्र सरकार को निश्चित तौर पर इसके लिए जल्द से जल्द प्रयास करना चाहिए। दूसरी तरफ बैंकों को भी पूंजी देने की जरूरत है, ताकि उन्हें कारोबार आगे बढ़ाने और उधार देने में कोई दिक्कत नहीं आए और यह भी तत्काल किए जाने की जरूरत है। विनिर्माण और ढांचागत क्षेत्र को भी मजबूती देने की जरूरत है जिसके लिए पिछले साल पारित भूमि अधिग्रहण विधेयक को पलटना होगा।’’ (स्रोत: बिजनेस स्टैंडर्ड, 17 मई, 2014)

इस बात को बल भाजपा के वरष्ठि नेता रविशंकर प्रसाद के टीवी चैनल के वार्तालाप से मिल जाता है कि 200-250 कम्पनियों की फाइलें पर्यावरण विभाग के क्लियरेंस के लिए आॅफिसों में पड़ी हैं, उनका क्लियरेंस नहीं दिया गया है। इसका यह मतलब है कि मोदी सरकार आते ही जनता के संघर्षों को कुचलते हुए इन फाइलों का क्लियरेंस कर दिया जायेगा। वे मान रहे हैं कि जनता के लगातार संघर्ष के कारण जनदबाव में जो क्लियरेंस नहीं मिला है, वह अब मिल जायेगा। इसी बात से पूजीपतियों के समूह काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं।

विकास का जन आन्दोलन

मोदी ने अपनी विक्टरी रैली में बोलते हुए कहा कि वे विकास को एक जन आन्दोलन बनाना चाहते हैं, जैसा कि गांधीजी ने आजादी की लड़ाई को जन आन्दोलन बना दिया था। कोई पढ़ता था, कोई चरखा काटता था, वह भी आजादी की लड़ाई थी। उसी तरह हम विकास को जन आन्दोलन बनना चाहते हैं। उन्होंने जिस तरह से गुजरात में विकास का आन्दोलन बना कर नर्मदा बचाओ आन्दोलन की नेत्री मेधा पाटेकर पर हमला करवाया, क्या उसी तरह से कारपोरेट जगत के विकास की खिलाफत कर रहे लोगों पर हमला करवाना चाहते हैं? विकास के जन आन्दोलन का काम आर.एस.एस. के हाथों में सौंप दिया जायेगा?

मोदी के आने से साफ हो गया है कि उदारीकरण की नीतियों को तेजी से लागू किया जायेगा, जिसके  लिए एक फासीवादी व्यक्ति की जरूरत है, जो लोगों की आवाज को कुचल सके और उद्योगपतियों के लिए हर सुविधा दे सके। प्रत्यक्ष करों में छूट दी जायेगी और देश की जनता पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ बढ़ा दिया जाएगा। लोगों की जीविका के साधन जल-जंगल-जमीन और अन्य प्राकृतिक संसाधनों को पूंजीपतियों के हवाले कर दिया जाए ताकि वे दिन चैगुनी-रात आठ गुनी तरक्की कर सकें। आम जनता को उसी तरह का सपना दिखाते रहो, जैसे धर्म में दिखाया जाता है कि इस जन्म में अच्छे कर्म करो, अगले जन्म में इसका फल मिलेगा। इसी तर्ज पर अच्छे दिन का सपना दिखाया जाता रहेगा।

सुनील कुमार सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. 
इनसे संपर्क का पता sunilkumar102@gmail.com है.