नए भ्रम का युग, मगर पुरानी आशंकाएं!

सत्येंद्र रंजन
-सत्येंद्र रंजन  

"...नरेंद्रभाई के गुजरात के विकास मॉडल की हकीकत चाहे जो हो, लाखों लोग उससे आकर्षित हुए हैं। भाजपा के बुनियादी समर्थक समूहों के साथ इन्हीं लोगों के मेल से वह जनादेश तैयार हुआ, जिससे भारत में नए राजनीतिक युग की शुरुआत हो रही है। नरेंद्र मोदी के सामने यह चुनौती जरूर है कि वे अपने इन दोनों समर्थक वर्गों को खुश रखें। मगर दिक्कत यह है कि इन दोनों के बीच गहरा अंतर्विरोध है। विकास और सामाजिक अशांति साथ-साथ नहीं चल सकते। अशांति से बचने की बुनियादी शर्त यह है कि समाज के सभी तबके खौफ और अंदेशों से आजाद रहें।..."

रेंद्र मोदी जब विजय संबोधन के लिए वडोदरा के मंच पर आए तो वे एक नए युग के नेता के रूप में खड़े थे। ध्यान इस पर था कि क्या वे अपनी नई हैसियत और उसके साथ उनके कंधों पर आई नई जिम्मेदारी के मुताबिक अपना एक नया रूप पेश करेंगे। वे ऐसा कर सकते थे, अगर उन समुदायों की आशंकाओं को वे संबोधित करते जिनका जिक्र उन्होंने किसी अन्य संदर्भ में अपने “विरोधी” के रूप में किया। वे अपने भाषण का समापन वंदे मातरम के बजाय जय हिंद बोल कर करते तो उसमें एक राजनीतिक संदेश देखा जाता। 

और वे चुनावी विजय को “एक खास विचारधारा” पर आधारित पार्टी की जीत के बजाय करोड़ों लोगों की विकास एवं सुशासन संबंधी आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करते, तो उससे उन लोगों में उम्मीद जगती जो उनके नाम पर हुए राजनीतिक ध्रुवीकरण में दूसरी धुरी पर मौजूद हैं। इसके विपरीत उन्होंने यह तो कहा कि वे सवा अरब लोगों को साथ लेकर सबके विकास के एजेंडे पर चलेंगे और सरकार के लिए कोई अपना-पराया नहीं होता, परंतु इसमें आश्वस्ति का पहलू इसलिए नहीं है क्योंकि पिछले 12 वर्षों में पांच करोड़ गुजरातियों की नुमाइंदगी की बात करते हुए भी उन्होंने गुजरात में शासन का जो मॉडल तैयार किया, वह बहुसंख्यक वर्चस्ववाद की सोच पर खड़ा दिखा है।    

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की जीत के साथ निर्विवाद रूप से भारत में नए राजनीतिक दौर की शुरुआत हुई है। इसका कारण सिर्फ यह नहीं है कि 25 वर्ष बाद किसी पार्टी ने अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल किया, अथवा भाजपा ऐसा करने वाली पहला गैर-कांग्रेस दल बनी है। इसकी वजह वही विचारधारा है जिसका उल्लेख मोदी ने किया। उन्होंने कहा कि इस विचारधारा से प्रेरित ये पार्टी 1952 (वास्तव में 1951) से कांग्रेस की विचारधारा से लड़ती आई थी। अब यह सफल हुई है। 

अब तक हमने जो भारत देखा है, वह उसी विचाराधारा के साथ आगे बढ़ा है, जिसे मोदी ने कांग्रेस की विचारधारा कहा। परंतु असल में यह राष्ट्रीय आंदोलन से उपजी विचारधारा है, जिसका मुख्य बिंदु यह है कि जो भी भारत में जन्मा है, वह यहां का समान नागरिक है- चाहे उसकी धार्मिक आस्था कुछ भी हो। इस विचारधारा में पुरातन समाज की जातिगत एवं लैंगिक दमन की बेड़ियों से मुक्ति का संकल्प निहित है। और विकास का वो एजेंडा इसका अभिन्न अंग है, जिसका मकसद है हर व्यक्ति की स्वतंत्रता का विस्तार करना। 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के बाद से अपनी वैचारिक पहचान सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हुए बनाई, जिसका व्यावहारिक अर्थ हिंदू राष्ट्र का निर्माण है। ऐसा कोई राष्ट्र- जिसका वैचारिक आधार कोई खास धर्म हो- वह उस महजब में आस्था ना रखने वाले लोगों को समानता के अधिकार से वंचित रखते हुए ही कायम हो सकता है। इसीलिए मोदी ने इस विचारधारा का विजयघोष कर उन अंदेशों को अगर बल नहीं, तो कम से कम आधार जरूर प्रदान किया जो भाजपा को लेकर बहुत से लोगों, समूहों और समुदायों में बने रहे हैं। 

मुमकिन है कि कुछ आशंकाएं अतिशयोक्तिपूर्ण हों। लेकिन ये काल्पनिक नहीं हैं। इसलिए कि भाजपा एक सामान्य राजनीतिक पार्टी नहीं है। उसके नेता खुद गर्व से कहते हैं कि ये दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार का हिस्सा है। यह परिवार अपने पूरे इतिहास में धार्मिक अल्पसंख्यकों, आधुनिक ख्याल और उदार सोच वाले लोगों के प्रति विरोध भाव लिए रहा है। वह जो जैसा है, उसे उसी रूप में स्वीकार करने के बजाय यह शर्त लगाता रहा है कि भारत में रहना है तो क्या-क्या करना होगा और कैसे रहना होगा। अगर यह अतीत ना होता, तो वंदे मातरम का नारा लगाने में कोई आपत्तिजनक बात नहीं हो सकती थी। 

अगर मोदी यह कहते कि उनकी सरकार हर तरह की विभिन्नता और बहुलता का सम्मान करेगी, तब भी वे जिस सांगठनिक परिवार के सदस्य हैं, उसका वैचारिक साया मद्धम नहीं पड़ता मगर तब यह आशा उत्पन्न होती कि वे शासन चलाते हुए उस न्यूनतम मर्यादा का पालन करेंगे, जिसे अटल बिहारी वाजपेयी ने “राज धर्म” कहा था। अगर 2002 में ऐसे हालात पैदा नहीं होते जिसमें वाजपेयी को “राज धर्म” की याद मोदी को दिलानी पड़ती, तो ना नरेंद्र मोदी की तीव्र ध्रुवीकरण करने वाली छवि बनती और ना उनसे अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय तथा उदार ख्याल लोगों में इतने गहरे अंदेशे पैदा होते। 

धार्मिक स्पर्श लिए दक्षिणपंथी रुझान वाली पार्टियां (मसलन, जर्मनी में क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन) अनेक देशों में सत्ता में आती हैं। वे सामाजिक मामलों में रूढ़िवादी, आर्थिक क्षेत्र में दक्षिणपंथी और सांस्कृतिक मसलों में अनुदार रुख रखती हैं। उनकी नीतियां अल्पसंख्यकों के लिए कल्याणकारी नहीं होतीं। फिर भी ये समुदाय उनसे भयभीत नहीं रहते। अब भारत में नेहरुवादी उदारवाद के दौर पर विराम लग गया है और पुरातन मान्यताओं में (जिन्हें अनेक जातियां, महिलाएं और कई समुदाय अपने लिए दमनकारी मानते हैं) स्वर्णिम अतीत देखने वाली विचारधारा का सत्तारोहण होने जा रहा है। 

ऐसे मौके पर इस विचारधारा के दायरे से बाहर के विभिन्न वर्गों का अनेक प्रकार की चिंताओं से घिरना अस्वाभाविक नहीं है। आशंकाएं शिक्षा तथा सुरक्षा एवं खुफिया एजेंसियों को एक खास रंग में रंगे जाने को लेकर हैं। भय कुछ संगठनों की संभावित उग्रता का है। और सबसे ऊपर यह सवाल है कि क्या भाजपा अब अपने ठंडे बस्ते से उन मुद्दों को निकालेगी, जिन्हें वह अपना “मुख्य एजेंडा” बताती है? यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसा करना सामाजिक अशांति और तनाव को न्योता देना होगा। 

नरेंद्रभाई के गुजरात के विकास मॉडल की हकीकत चाहे जो हो, लाखों लोग उससे आकर्षित हुए हैं। भाजपा के बुनियादी समर्थक समूहों के साथ इन्हीं लोगों के मेल से वह जनादेश तैयार हुआ, जिससे भारत में नए राजनीतिक युग की शुरुआत हो रही है। नरेंद्र मोदी के सामने यह चुनौती जरूर है कि वे अपने इन दोनों समर्थक वर्गों को खुश रखें। मगर दिक्कत यह है कि इन दोनों के बीच गहरा अंतर्विरोध है। विकास और सामाजिक अशांति साथ-साथ नहीं चल सकते। अशांति से बचने की बुनियादी शर्त यह है कि समाज के सभी तबके खौफ और अंदेशों से आजाद रहें। मोदी कम से कम पांच वर्ष के लिए प्रधानमंत्री बन रहे हैं, तो उन्हें यह तय करना है कि वे किस प्रकार के भारत का नेतृत्व करना चाहते हैं? ‘सबका साथ-सबका विकास’ उनका अच्छा नारा है। मगर आशंकाओं में जी रहे लोग आखिर मनोयोग से कैसे साथ आ सकते हैं? इस मनोभावना को संबोधित करने का पहला मौका मोदी ने गवां दिया। क्या आगे उनसे ये अपेक्षा की जा सकती है?