इस तहजीब के नुकसान की भरपाई कौन करेगा ?

जयशंकर बैरागी
-जयशंकर बैरागी

"…और हां सामने जो भैंस बंधी है उसी के दूध ईद पर आसपास के मुसलमान भाईयों के घर बंटता है जिससे इबाबत के लिए सैवई तैयार होती है। यहां ना 'मोदी के गुजरात का दूध' आता है न मुलायम की बिरादरी वाले यदुवंशी भाइयों का, यहां हमारी भैंस के दूध में ईद की सैवइयां कढ़ती हैं।…" 


'कौन कहवे गंगा-जमुनी तहजीब काशी, इलाहाबाद या लखनऊ की है। झूठे पंडे, पत्रकार अर नेता कहवे ऐसा। भाई एक झूठ सौ बार कह दो तो सच हो जावे। अर ये पंडे पत्रकार औऱ नेता इस बार कू बढ़िया तरीके से जानै। गंगा-जमुनी तहजीब को म्हारे मुजफ्फरनगर- शामली अर बागपत की है।' 80 साल से ज्यादा उम्र के रामफल सिंह ने जब यह बात कही तो बेहद अटपटी लगी। 

शामली की जमीन पर बैठा मैं उनकी बात बड़ी गौर से सुन रहा था। मैं जानता था कि यहां का आदमी कड़वा मगर सपाट बोलता है, लिहाजा उम्मीद थी कि कोई खास बात जरूर सामने आएगी। मुजफ्फरनगर दंगों पर अपनी बात रख रहे रामफल का कहना है कि दंगे देश में कोई नई बात नहीं है लेकिन कहां हो रहे हैं ये बड़ी बात है। जिस मुजफ्फरनगर -शामली में पिछले दिन दंगों हुआ। आजादी के बाद आज तक पहले कभी ऐसी स्थिति की नौबत नहीं आई।

बूढ़े बाबा कहते हैं, 'सियासत ने इस इलाके को जो सांस्कृतिक नुकसान पहुंचाया है उसकी भरपाई शायद अगले बीस-तीस सालों में भी ना हो पाए।' बूढ़े बाबा की बात में दर्शन भी था और गहरी सामाजिक समझ भी लेकिन मैं नहीं समझ पा रहा था कि आखिर वह किस सांस्कृतिक नुकसान की बात कर रहे हैं। आखिरकार मैंने उन्हें टोकते हुए पूछ ही लिया कि किस सांस्कृतिक नुकसान की बात रहे हैं आप। एक वाक्य में बिना किसी देर के उनका जवाब आया, 'दो महजबी भाइयों की गंगा-जमुनी तहजीब के खात्मे का'.

बूढ़े बाबा ने एक तीन चार साल के छोटे से बच्चे की ओर इशारे करते हुए, नितिन को जब भी नजर लग जाती है तो जानते हो इसकी मां क्या करती है? मैं ने कहा, काला टीका लगाती होगी। नहीं, तपाक से बूढ़े आदमी ने कहा, इसकी मां गांव के बीचो बीच बनी मस्जिद के मौलवी रफीकुद्दीन के पास जाती है। वह झूठ ही बच्चों को देखते हुए अपने होठों को कुछ देर तक हिला देता है और बच्चे की मां वापस आ जाती है। और हां यह भी भी जानते हैं कि तंत्र-मंत्र से बच्चा ठीक नहीं होता लेकिन ये एक रिवाज से ज्यादा कुछ नहीं। आप ही देखो एक हिंदू मां को वेद-उपनिषद से ज्यादा भरोसा उस मुस्लिम मौलवी की दुआ पर है जो केवल उसके रिवाद को जिंदा रखते हुए कुछ शब्द उर्दू में कह देता है।

और हां सामने जो भैंस बंधी है उसी के दूध ईद पर आसपास के मुसलमान भाईयों के घर बंटता है जिससे इबाबत के लिए सैवई तैयार होती है। यहां ना 'मोदी के गुजरात का दूध' आता है न मुलायम की बिरादरी वाले यदुवंशी भाइयों का, यहां हमारी भैंस के दूध में ईद की सैवइयां कढ़ती हैं। जब किसी बीमारी में यह भैंस कम दूध देती है तो यहां के लोगों को लगता है कि इसे नजर लग गई है। नजर से बचाने के लिए देश की माएं अपने लाड़ले को काला टीका लगाती हैं लेकिन यहां काली भैंस को नजर लग जाती है। जब काली भैंस को ही नजर लग जाती है तो लोग गांव के मंदिर पुजारी के पास नहीं जाते। वे फिर अपने सांस्कृतिक रिवाजों की शरण में जाते हैं। लोग गांव के मुस्लिम लौहार के पास जाते हैं जिस पत्थर के जिस छोटे से कुंड में लौहार किसानों के औजारों को धार देता है, उसके पानी के लाकर भैंस के ऊपर झिड़क दिया जाता है। आपको सुनने में बड़ा अजीब लगेगा बेंगलुरु में रहने ईशान के लिए उसकी नानी ने एक धागा भी रफीकुद्दीन से बनबाया ताकि बुरी ताकतें उसके लाड़ले नाती से दूर रहे।

खेती-किसानी से लेकर रिवाजों तक जो लोग हमारी जीवन शैली को हिस्सा हैं। वे ही आज हमारे सबसे बड़े दुश्मन है। ना अब नितिन की मां मौलवी से उसकी नजर उतरवाती है, भैंस को अब नजर नहीं लगती! एक नानी को अब उसके नाती की फिक्र नहीं रही ! खेती बाड़ी के इलाके की तहजीब का जो नुकसान हुआ है, अब बताओं उसकी भरपाई कौन करेगा ?


जयशंकर युवा पत्रकार हैं. दिल्ली में एक दैनिक अखबार में  काम.
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