रिवाल्वर रानी फूलन देवी नहीं है...

अतुल आनंद
-अतुल आनंद

"...अगर रिवाल्वर रानी फूलन देवी नहीं है तो फिर क्या है? जवाब भी शायद फिल्म में ही मिल जाता है। क्लाइमेक्स में जिस गेस्ट हाउस की छत पर अल्का सिंह एक निर्णायक लड़ाई लड़ रही होती है, फिल्म में उस गेस्ट हाउस का नाम रानी लक्ष्मीबाई अकारण नहीं बताया जाता है। अल्का सिंह भी लक्ष्मीबाई ही है जो सत्ता के लिए लड़ रही होती है, किसी सामाजिक परिवर्तन के लिए नहीं!..."


फिल्म रिवाल्वर रानी में अल्का सिंह (कंगना रानाउत) को चंबल की डाकू के रूप में दिखाया गया है जो अपने बाप की हत्या का बदला लेने के लिए डाकू बन जाती है। अल्का के पहनावे का ढंग फूलन देवी और माइकल जैक्सन का मिलाजुला रूप लगता है। लेकिन अल्का सिंह उर्फ़ रिवाल्वर रानी फूलन देवी नहीं है। रिवाल्वर रानी अपनी जाति की वजह से हिंसा की शिकार हो डाकू नहीं बनी। रिवाल्वर रानी उन फिल्मों की फेहरिस्त में शामिल हो गयी है जो यथार्थवादी और समाज के वंचित तबकों की कहानी कहने का भ्रम पैदा करती है।

फिल्म में एक जगह अल्का सिंह अपने प्रतिद्वंदी पर पैसे लेकर गरीब आदिवासियों के जमीन हड़पने का आरोप लगाती दिखती है। अल्का सिंह का ‘आदिवासी-आदिवासी’ और ‘सिद्धांता’ चिल्लाना खोखला लगता है। पूरी फिल्म में कहीं कोई आदिवासी या उनके मुद्दे नज़र नहीं आते। यह बिलकुल वैसा ही जैसा कि रॉकस्टार फिल्म में अचानक एक गाने में तिब्बत मुक्ति के नारे वाले बैनर ठूंस दिये जाते है और हम खोजते रह जाते कि फिल्म की कहानी में तिब्बत का मुद्दा कहां है या फिर ‘साड्डा हक़’ चिल्लाता हुआ नायक आखिर इतना ‘क्रांतिकारी’ किस चीज को लेकर हो रहा है!

रिवाल्वर रानी फिल्म के शुरू के क्रेडिट बिलकुल जेम्स बांड शैली में बनाये गए है जिसमें मार-धाड़ और एक्शन के बीच एक जगह अल्का सिंह को एक मार्क्सवादी प्रतीक के आगे खड़ा कर दिया जाता है। पूरे फिल्म में मुख्य किरदार अलका सिंह ऐशोआराम और विलासिता में डूबी हुयी है। अल्का बीच-बीच में रजनीकांत की तरह गोलियां भी चलाती है। कुछ लोग फिल्म को ‘ब्लैक कॉमेडी’ कह कर इसका बचाव करते नज़र आ सकते हैं लेकिन फिल्म ब्राह्मणवादी आदर्शों को स्थापित करने वाले एक भद्दे मजाक से ज्यादा कुछ नहीं है। अपने जाति के दबंगों के खिलाफ बंदूक उठाने वाली अल्का पतिव्रता भाव से हिन्दू पितृसत्तात्मक समाज के सभी कायदे-कानून निभाती है। रिवाल्वर रानी का प्रेमी भले ही बेवफा हो लेकिन उसके लिए करवाचौथ का व्रत करना वह नहीं भूलती।


अगर रिवाल्वर रानी फूलन देवी नहीं है तो फिर क्या है? जवाब भी शायद फिल्म में ही मिल जाता है। क्लाइमेक्स में जिस गेस्ट हाउस की छत पर अल्का सिंह एक निर्णायक लड़ाई लड़ रही होती है, फिल्म में उस गेस्ट हाउस का नाम रानी लक्ष्मीबाई अकारण नहीं बताया जाता है। अल्का सिंह भी लक्ष्मीबाई ही है जो सत्ता के लिए लड़ रही होती है, किसी सामाजिक परिवर्तन के लिए नहीं! फिल्म के अंतिम शॉट में नायिका को गोली खा कर बुरी तरह घायल होने के बाद एक ‘आदिवासी’ कैंप में दिखाया जाता है जहां वह शायद एक ‘मार्क्सवादी’ देवी और आदिवासियों के मसीहा के रूप में पुनर्जन्म लेने के लिए तैयार बैठी है। दिलचस्प बात यह है कि रील लाइफ की इस ‘मार्क्सवादी देवी’ की एक रियल लाइफ समकक्ष का उदाहरण हमें हाल ही में देखने को मिला। एक लेखिका, जिसका दलितों के मुद्दों और अंबेडकर के लेखन से जुड़ने का कोई इतिहास न था, उसे अचानक ही अंबेडकर को दुनिया के सामने लाने का जिम्मा देकर दलितों के मसीहा के रूप में स्थापित करने की कोशिश की जाती है। दलितों की प्रतिक्रिया पर लेखिका यह कहकर अपनी जिम्मदारियों से मुक्त हो जाती है कि दलित अगर चाहे तो अंबेडकर की किताब की और भी भूमिकाएं लिख सकते हैं (जैसे कि दलितों को भी उसके ही तरह अवसर दिये जाएंगे)। शायद ‘क्रांति’ इन ‘डीकास्ट’ हो चुके ‘मार्क्सवादियों’ के नेतृत्व में ही हासिल की जा सकती है...


अतुल 'टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान' (TISS), मुंबई से
मीडिया में स्नातकोत्तर कर रहे है.
इनसे संपर्क का पता है- thinker.atul@gmail.com