क्या कोई नरेन्द्र मोदी को रोक सकता है ?

अभिषेक पुनेठा

"...दंगों की जांच के अनिर्णायक होने का कारण है सबूतों का खो जाना या अनुपलब्ध होना या उन्हें जानबूझ कर नष्ट कर देना. और अगर २००२ के तथ्य धुंधले हैं तो श्री मोदी के वर्तमान में विचार भी. वह जो हुआ उसे स्पष्ट करके और उसके लिए माफ़ी मांग कर के  इस नरसंहार को पीछे छोड़ सकते हैं. लेकिन अभी भी वो इन सवालों के जवाब देने से इनकार कर देते है. एक दुर्लभ टिपण्णी में पिछले साल उन्होंने मुसलमानों की पीड़ा पर यह कह कर अफ़सोस जताया की उन्हें दुःख तो तब भी होता है जब कोई पिल्ला कार के नीचे आ जाये..."

अभिषेक ने The Economist की कवर स्‍टोरी को Praxis के लिए अनुवाद कर भेजा है. पढ़ें...
-सं.

वह शायद भारत के अगले प्रधानमंत्री बन जायें लेकिन वो इस योग्य नहीं.

   

साभार- http://whatthafact.com/
कौन भारत में होने वाले चुनावों के परिणामों में चमत्कार की सम्भावना पर नहीं सोच रहा है ? अप्रैल से शुरू हो रहे चुनावों में सरकार चुनने के मामले में अनपढ़ ग्रामीणों, बेसहारा झुग्गी बस्ती में रहने वाले लोग और मुंबई के करोड़पति सबको एक सामान अवसर मिलेगा. लगभग 81.5 करोड़ नागरिक नौ चरणों में होने वाले और पांच सप्ताह तक चलने वाले इस लोकतंत्र के महापर्व में वोट डालने के अधिकारी होंगे. 

लेकिन भारत के राजनेताओं की अयोग्यता और बिकाऊपन की कौन निंदा नहीं करता है? देश में इस समय समस्याओं की भरमार है. लेकिन कांग्रेस के दस वर्ष की गठबंधन सरकार ने इसे नियंत्रणहीन बना दिया है. विकास दर गिर कर आधी हो गई है करीब ५ प्रतिशत जो भारत के लाखों युवाओं को रोज़गार दिलाने के लिए काफी कम है .सुधारों के रास्ते बंद हैं . रोड और बिजली अभी भी अनुपलब्ध है. बच्चे अभी भी शिक्षा से वंचित हैं. अनुमान के मुताबिक इसी समय में राजनेताओं और अधिकारीयों ने कांग्रेस के कार्यकाल में ४ अरब डॉलर से १२ अरब डॉलर तक की रिश्वत ली है. राजनीति का अर्थ भारतवासियों के लिए भ्रष्टाचार हो गया है .

कोई आश्चर्य की बात नहीं की भारतीय जनता पार्टी के नरेन्द्र मोदी इन्ही कारणों के चलते प्रधानमंत्री पद के लिए पसंदीदा हैं. कांग्रेस के उनके प्रतिद्वंदी राहुल गाँधी से वह बहुत अलग नहीं हो सकते हैं. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के प्रपौत्र राहुल गाँधी प्रधानमंत्री बनना अपना दैवी अधिकार मानकर चले हैं. श्री मोदी एक चाय बेचने वाले हैं जो अपनी क्षमता से शीर्ष पर पहुचे हैं. श्री गाँधी सत्ता चाहते भी है या नहीं ये वो खुद भी नहीं जानते. श्री मोदी की गुजरात के सी.एम. के तौर पर प्रदर्शन को देखते हुए ये कहा जा सकता है की उन्होंने आर्थिक रूप से विकास किया है और कर सकते हैं. श्री गाँधी के गठबंधन पर भ्रष्टाचार के दाग है. तुलनात्मक रूप से मोदी का दामन साफ़ है.

सराहना करने के लिए और भी बहुत कुछ है. पर इस सब के बावजूद ये अखबार भारत के सर्वोच्च पद के लिए मोदी जी को समर्थन नहीं दे सकता.

इसकी वजह है की गुजरात में २००२ में मुसलमानों के खिलाफ हिन्दू उपद्रव में १००० लोग मारे गए. अहमदाबाद और उसके आस पास के शहरों और गाँवों मैं मचा हत्या और बलात्कार का ये तांडव मुसलमानों द्वारा एक ट्रेन पर 59 हिंदू तीर्थयात्रियों के मारे जाने का बदला था.

श्री मोदी ने 1990 में अयोध्या में एक पवित्र स्थल पर एक मार्च आयोजित करने में मदद की थी. दो साल बाद जो हिन्दू मुस्लिम संघर्ष में होने वाली 2,000 मौतों के लिए जिम्मेदार बना. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, एक हिन्दू राष्ट्रवादी संघ के आजीवन सदस्य के रूप में उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य की कसम खाई है. उन्होंने अपने शुरुवाती दौर में बढ़ी बेशर्मी से हिन्दुओं को मुसलमानों के खिलाफ भड़काने वाले भाषण दिए. २००२ में श्री मोदी मुख्यमंत्री थे और उन पर दंगाइयों को  इजाजत देने और बर्बादी यानि तबाही के लिए उकसाने तक के आरोप लगे थे.

श्री मोदी के बचाव करने वाले जिनकी संख्या बहुत है खासकर अभिजात्य व्यापारी वर्ग के लोग जिसमें शामिल हैं. वे दो तर्क देते हैं – पहला की  बार बार होने वाली जांचों में जिसमें सुप्रीम कोर्ट भी शामिल है जो की स्वतंत्र है द्वारा ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया जिसके आधार पर उनके ऊपर अभियोग लगाया जा सके. और दूसरा ये की श्री मोदी बदल गए हैं. उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों के व्यापर को फायदा पहुचने के उद्देश्य से निवेश को आकर्षित करने के लिए अथक काम किया है. सोचने की बात है की वो कहते हैं की पूरे भारत में गरीब मुसलमानों को स्वस्थ अर्थव्यवस्था से  बेहद लाभ हुआ है .

दोनों ही मामलो में ये कारण देना बहुत अधिक उदारता दिखाना है. दंगों की जांच के अनिर्णायक होने का कारण है सबूतों का खो जाना या अनुपलब्ध होना या उन्हें जानबूझ कर नष्ट कर देना. और अगर २००२ के तथ्य धुंधले हैं तो श्री मोदी के वर्तमान में विचार भी. वह जो हुआ उसे स्पष्ट करके और उसके लिए माफ़ी मांग कर के  इस नरसंहार को पीछे छोड़ सकते हैं. लेकिन अभी भी वो इन सवालों के जवाब देने से इनकार कर देते है. एक दुर्लभ टिपण्णी में पिछले साल उन्होंने मुसलमानों की पीड़ा पर यह कह कर अफ़सोस जताया की उन्हें दुःख तो तब भी होता है जब कोई पिल्ला कार के नीचे आ जाये. इस बयान पर हो रहे हंगामे के बीच उन्होंने कहा की मेरा मतलब था की हिन्दुओं को सबके जीवन की परवाह है. मुस्लिमों और अंध राष्ट्रवादी हिन्दुओं को इससे एक अलग सन्देश मिला. बी.जे.पी. के अन्य नेताओं से इतर मोदी ने मुस्लिम टोपी पहनने से इंकार कर दिया और २०१३ में हुए मुजफ्फ्फर नगर दंगों की निंदा भी नहीं की जिसमें अधिकतर पीड़ित मुसलमान ही थे.

किसी एक समुदाय विशेष के खिलाफ घृणा फ़ैलाने वाली राजनीति करना किसी भी देश में निंदनीय है. भारत में तो हिन्दू मुस्लिम संघर्षों और हिंसा का लम्बा इतिहास रहा है. विभाजन के वक्त भी १२० लाख लोगों को विस्थापित होना पढ़ा था और हजारों मारे गए थे. २००२ के बाद से सांप्रदायिक हिंसा कम हुई है पर फिर भी हर साल सैकड़ों सांप्रदायिक घटनाएँ होती है और उसमें सैकड़ों की संख्या में लोग मारे जाते हैं. उत्तर प्रदेश में तो कभी कभी हिंसा खतरनाक स्तर पर पहुच जाती है. चिंगारी बाहर से भी आ सकती है. मुंबई में २००८ में भारत को आतंकवादयों के भीषण हमले का सामना करना पढ़ा था जो मुस्लिम देश पाकिस्तान के थे और पाकिस्तान हमारा पडोसी परमाणु हथियारों से लैस है.

मोदी ने मुसलमानों की चिंता को कम करने के बजाय बढ़ा दिया है. वह ऐसा कर के एंटी-मुस्लिम वोट पाना चाहते हैं. अपनी चरमसीमा पर भारत विभिन्न धर्मों लोगों, विश्वासों, पवित्र पुरुषों और विद्रोहियों का एक खुशियों भरा कोलाहल है. स्वर्गीय खुशवंत सिंह जी जैसे लोग सांप्रदायिक घृणा के दर्द को अच्छी तरह से समझते थे.

हो सकता है श्री मोदी दिल्ली में अच्छी शुरुवात कर लें लेकिन जल्द ही या हो सकता है बाद में उन्हें सांप्रदायिक हिंसा का सामना करना पड़ेगा या पाकिस्तान के साथ किसी तकरार का तो वे क्या करेंगे ये कोई नहीं जानता. वे भी नहीं जो उनकी प्रशंसा कर रहे हैं और न ही ये जानते है की ऐसे विभाजनकारी मनुष्य के प्रति मुसलमानों की क्या प्रतिक्रिया होगी?

अगर श्री मोदी दंगों में अपनी भूमिका को स्पष्ट कर देते और उन पर वास्तव में पश्चाताप जताते तो हम उनका समर्थन करने के बारे में सोच भी सकते थे पर उन्होंने ऐसा कभी किया नहीं. ऐसे विभाजनकारी मनुष्य का जो अपनी विभाजन की राजनीति से संपन्न हुआ है का भारत जैसे विखंडनीय और संवेदनशील राष्ट्र का प्रधानमंत्री बनना उचित नहीं होगा. हमें श्री गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार भी दमदार और प्रेरक नहीं लगाती है. पर हम भारतवासियों से एक कम परेशानी वाला विकल्प चुनने की उम्मीद रखते हैं.

अगर कांग्रेस जीतती है जिसकी संभावना कम ही है तो इसने खुद को नवीनीकृत करने का और देश में सुधार करने का प्रयास करना चाहिए. श्री गाँधी को अपने नैतिक गुण का परिचय देते हुए और अपने संशय को दूर करते हुए पीछे हट जाना चाहिए और किसी नए चेहरे को आगे बढ़ाना चाहिए. अगर बी.जे.पी. सत्ता में आती है जिसकी संभावना ज्यादा है तो इसके गठबंधन सहयोगियों को मोदी के अलावा किसी और को चुनना चाहिए.

अगर फिर भी वे मोदी को ही चुनते हैं तो उन्हें शुभकामनाएं. हमें ख़ुशी होगी अगर श्री मोदी ईमानदार और निष्पक्ष ढंग से भारत को चलाते हुए हमें गलत साबित कर दें. पर अभी उनका आकलन उनके रिकॉर्ड के आधार पर ही किया जायेगा जो अभी भी साम्प्रादायिक घृणा के साथ जुड़ा हुआ है. वहां निष्पक्ष, ईमानदार और आधुनिकता जैसी कोई चीज़ नहीं है. भारत बेहतर का हकदार है.

अभिषेक स्नातक के छात्र हैं.
पिथौरागढ़ (उत्तराखंड) में रहते हैं.
लिखने पढ़ने में गहरी रूचि.
संपर्क का पता 
abhishekpunethaa@gmail.com