“कोदा-झंगोरा खायेंगे,भ्रष्टाचारी-दुराचारी-दंगाईयों को सिर-माथे पर बैठाएंगे”

-इन्द्रेश मैखुरी
Indresh Maikhuri
इन्द्रेश मैखुरी

"...उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान 02 अक्टूबर 1994 को मुजफ्फरनगर काण्ड हुआ,जिसमें दिल्ली जाते हुए आन्दोलनकारी पुरुषों पर पुलिस ने गोलियां चलायी और महिलाओं के साथ बलात्कार किया.उत्तराखंड राज्य के आन्दोलन में और राज्य बनने के बाद भी आन्दोलनकारी 02 अक्टूबर 1994 को हुए मुजफ्फरनगर काण्ड के दोषियों को सजा दिलवाने की मांग करते रहे हैं.मुजफ्फरनगर काण्ड में महिलाओं के साथ दुराचार करने वालों को तो सजाएं नहीं हो सकी हैं,लेकिन इधर उत्तराखंड के सचिवालय में बैठे अफसरों से लेकर मंत्रीगणों तक सब अपने छोटे-छोटे मुजफ्फरनगर काण्ड रच रहे हैं..."

त्तराखंड आन्दोलन के दौरान यह नारा खूब लगाया जाता था कि “कोदा-झंगोरा खायेंगे,उत्तराखंड बनायेंगे”.तेरह साल बाद जैसा उत्तराखंड सामने है,उसमें कोदा-झंगोरा उगाने वालों की हालत खराब है और राज्य भी दुर्दशा की ही स्थिति में है.राज्य की कामयाबी की कोई मिसाल हो ना हो पर बिगडती दशा-दिशा के मिसालें आये दिन सामने आती रहती हैं.बीते एक हफ्ते को ही देख लें तो राज्य के भाग्यविधाताओं के हाथों राज्य की दुर्दशा की कुछ नयी कहानियाँ सामने आई हैं.

शुरुआत हुई धर्म के कारोबार के जरिये राजनीति में प्रवेश करने वाले सतपाल महाराज एंड फैमिली के सब्सिडी हडपने के खुलासे से. एक आर.टी.आई. के जरिये खुलासा हुआ कि उद्यान महकमे की मंत्री रहने के दौरान गढ़वाल सांसद सतपाल महाराज की पत्नी अमृता रावत ने अपने पति और बेटे सुयश रावत को औद्यानिकी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से पौली हॉउस लगाने के लिए मिलने सब्सिडी दिलवा दी. इस योजना के अंतर्गत मैदानी क्षेत्रों में औद्यानिकी कार्यों के लिए लिए गए ऋण पर 50 प्रतिशत तथा पहाड़ी क्षेत्रों में 80 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है. अमृता रावत के सांसद पति सतपाल महाराज और बेटे ने 14.2 लाख रुपये का ऋण लिया और उन्हें 7.1 लाख रुपये की सब्सिडी मिली. 

अमृता रावत का बयान था कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है.उनका परिवार किसान है,इसलिए उन्होंने इस योजना का लाभ लिया.लेकिन प्रश्न यह है कि जब कुछ गलत नहीं है तो सालों से सतपाल महाराज के नाम से पहचाने जाने वाले उनके सांसद पति को सब्सिडी लेने के लिए अपने लगभग भुलाए जा चुके नाम सतपाल सिंह रावत का इस्तेमाल करने की जरुरत क्यूँ पड़ी?प्रश्न तो यह भी उठता है कि धर्म के कारोबार में अथाह संपदा के मालिक सतपाल महाराज जब सांसद के रूप में एक रूपया वेतन लेते हैं तो कुछ लाख रुपये की सब्सिडी लेने की जरुरत उन्हें क्यूँ पड़ी?परिजनों को सब्सिडी दिए जाने को सही ठहराने वाली मंत्री अमृता रावत का दावा है कि उनका परिवार 60 वर्षों से इस जमीन पर नर्सरी चला रहा है. 

औद्यानिकी के प्रोत्साहन के लिए मिलने वाली सब्सिडी का लाभ 60 वर्षों से खेती करने वाले धन-संपन्न परिवार कैसे दिया जा सकता? लेकिन इस पूरे प्रकरण ने राज्य में सरकारी योजनाओं की बंदरबांट की पोल खोल दी. अपने को घिरता देख स्वयं अमृता रावत ने यह खुलासा किया कि सब्सिडी की लूट में वे अकेली नहीं हैं,बल्कि अलग चाल,चरित्र और चेहरे का दम भरने वाली भाजपा भी इस लूट में शामिल है. काशीपुर से भाजपा के विधायक हरभजन सिंह चीमा के बेटे त्रिलोक सिंह चीमा की फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट को दस करोड़ रुपये की सब्सिडी मिली.इसी तरह किच्छा से भाजपा विधायक राजेश शुक्ला के भाई दिनेश शुक्ला को 3.09 करोड़ रुपये की सब्सिडी मिली.स्वयं के परिजनों के सब्सिडी हडपने के आरोपों से घिरी कांग्रेसी मंत्री अमृता रावत के द्वारा भाजपा नेताओं के परिजनों को मिली करोड़ों की सब्सिडी के खुलासे से स्पष्ट है कि आम जनता को मिलने वाले लाभों को हडपने के मामले में कांग्रेस-भाजपा का एका है.अपने खुलासे से मंत्री ने भाजपा को यह चेतावनी देने की कोशिश की है कि भाजपा चुपचाप अपने हडपने का कारोबार जारी रखे,अगर उसने कांग्रेसी हड़प अभियान के बारे में ज्यादा मुंह खोलने की कोशिश की तो भाजपा का हड़प अभियान भी नहीं चल पायेगा.

दूसरा वाकया जो उत्तराखंड के राजनीतिक पतन का है,वो भाजपा से जुड़ा है.भाजपा के रुद्रपुर के विधायक राजकुमार ठुकराल पिछले कई महीनों से पुलिस से भागे-भागे फिर रहे थे.दरअसल उनपर रुद्रपुर में अक्टूबर 2011 के दंगों में सांप्रदायिक वैमनस्य भड़काने का मुकदमा दर्ज है. उस दंगों की लहरों पर सवार होकर ही ठुकराल 2012 के विधानसभा चुनावों में विधानसभा पहुँच पाए.बताते हैं विधानसभा चुनाव के दौर में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तीखा करने के लिए वे अपनी सभाओं में खुलेआम ऐलान करते थे कि उन्हें मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए.उनपर मुकदमा दर्ज था. लेकिन राज्य की पुलिस उनके प्रति काफी उदार बनी रही.वे गिरफ्तार नहीं किये गए. जैसे कि भाजपा का चाल,चरित्र,चेहरा ऐसे ही दंगाई महारथियों से बनता है,सो भाजपा ठुकराल को बचाने के लिए खुल कर मैदान में आ गयी. 21 फरवरी 2014 को समाप्त हुए विधान सभा के बजट सत्र में भी भाजपा ने ठुकराल के मामले में खूब हंगामा काटा और उन्हें राजनीतिक साजिश का शिकार बताया. 

वास्तव में अगर राजनीतिक लहर ठुकराल के विपरीत होती तो 2012 में दर्ज ऍफ़.आई.आर.में वे 2 साल तक खुले नहीं घूम सकते थे. इस दौरान उनके खिलाफ गैरजमानती वारंट हुए,अदालत ने उनकी संपत्ति कुर्क करने के आदेश दे दिए. पर कांग्रेस की सरकार की पुलिस भाजपा के इस दंगा आरोपी विधायक पर ना तो गैर जमानती वारंट तामील करा सकी और ना ही “माननीय” विधायक जी की संपत्ति कुर्क हुई. गिरफ्तारी कर पाने में नाकाम पुलिस ने ठुकराल को भगौड़ा घोषित कर उनपर दो हज़ार रुँपये के इनाम का ऐलान कर दिया. कोढ़ में खाज ये कि इस “भगौड़ा” अवस्था में ही ठुकराल वेश बदल कर विधान सभा के बजट सत्र में गये और वहां उपस्थिति रजिस्टर पर दस्तखत कर चलते बने. अखबार के फोटोग्राफरों को अपने बदले वेश में फोटो खिंचवाने के लिए ठुकराल सुलभ थे, पर पुलिस की पकड़ से बाहर थे. हाईकोर्ट,सुप्रीम कोर्ट सब जगह राहत के लिए अर्जी लगाने के बाद दो दिन पहले(26 फरवरी को) ठुकराल ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. 

कुशल मुस्तैद पुलिस उन्हें फिर भी गिरफ्तार ना कर सकी. इन पंक्तियों के लिखे जाते समय ठुकराल को जमानत मिलने की खबर आ रही है. 302 जैसी दर्जनभर संगीन धाराओं में दो साल पहले दर्ज इस मुकदमें में जब जमानत मिलना इतना आसान था कि दो दिन में ही जमानत हो गयी तो ठुकराल 6 महीने से भगौड़े क्यूँ बने हुए थे?बहरहाल एक चुने हुए विधायक का इस तरह दंगे भड़काने के मामले में वांछित और भगौड़ा घोषित हो जाना तो कम से कम इस राज्य के निर्माण का मकसद नहीं था.

तीसरा मामला नित नए विवाद खड़े करने में माहिर मंत्री हरक सिंह रावत का है. उनपर दिल्ली में एक युवती ने सरकारी वकील बनाने का झांसा देकर छेडछाड करने का मुकदमा दर्ज करवाया है. 2002 में भी एक महिला के साथ संबंधों के आरोपों से रावत घिरे और उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था. साल भर पहले भी एक टी.वी.एंकर व गायिका के साथ हरक सिंह के अवैध संबंधों की चर्चा थी. इसके अलावा भी अल्पसंख्यक व्यक्ति की जमीन पर जबरन कब्जे से लेकर उनके ओ.एस.डी. रहे युद्धवीर रावत हत्याकांड की मुख्य अभियुक्त महिला के इस दावे ने भी खूब विवाद पैदा किया कि उसकी गिरफ्तारी मंत्री के सरकारी आवास से हुई. बहरहाल दिल्ली में युवती द्वारा छेडछाड का मुकदमा दर्ज कराने की बात सामने आते ही हरक सिंह रावत ने युवती पर ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया. इससे यह बात तो पुष्ट हुई कि हरक सिंह रावत उक्ति युवती को जानते तो हैं.पर उनके ब्लैकमेलिंग वाली बात से यह सवाल तो खड़ा होता ही है कि हरक सिंह रावत का ऐसा क्या राज उस युवती के पास है कि वह हरक सिंह जैसे दबंग व्यक्तित्व वाले मंत्री को ब्लैकमेल कर पा रही थी.

इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान ही यह खबर आ रही है कि उक्त युवती ने कुछ टी.वी.चैनलों पर बयान दिया कि उसने आवेश में शिकायत दर्ज करवा दी थी. हरक सिंह के समर्थक इसे मंत्री जी के बेदाग़ होने के सबूत के तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं. लेकिन सामन्य समझ से भी क्या यह तर्क गले उतरने लायक है कि एक राज्य के भारी-भरकम मंत्री पर एक लड़की सिर्फ आवेश में आकर ही मुकदमा दर्ज करवा सकती है? हमारे समाज में जहां वास्तविक छेडछाड तो छोडिये  रेप जैसे जघन्य अपराधों की रिपोर्ट दर्ज करवाने में महिलाएं घबराती हैं,वहां एक महिला के लिए एक कद्दावर मंत्री पर सिर्फ आवेश में आकर छेड़छाड़ का मुकदमा दर्जा करवाना क्या हंसी ठठा है?जाहिर सी बात है कि यह शिकायत दर्ज होने के बाद हुए हरक सिंह रावत के दिल्ली दौरे का कमाल है.और हरक सिंह के युवती पर ब्लैकमेलिंग के आरोप का क्या हुआ?क्या मंत्री जी ने भी आवेश में आकर ब्लैकमेलिंग का आरोप लगा दिया था?

उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान 02 अक्टूबर 1994 को मुजफ्फरनगर काण्ड हुआ,जिसमें दिल्ली जाते हुए आन्दोलनकारी पुरुषों पर पुलिस ने गोलियां चलायी और महिलाओं के साथ बलात्कार किया.उत्तराखंड राज्य के आन्दोलन में और राज्य बनने के बाद भी आन्दोलनकारी 02 अक्टूबर 1994 को हुए मुजफ्फरनगर काण्ड के दोषियों को सजा दिलवाने की मांग करते रहे हैं.मुजफ्फरनगर काण्ड में महिलाओं के साथ दुराचार करने वालों को तो सजाएं नहीं हो सकी हैं,लेकिन इधर उत्तराखंड के सचिवालय में बैठे अफसरों से लेकर मंत्रीगणों तक सब अपने छोटे-छोटे मुजफ्फरनगर काण्ड रच रहे हैं.

कुर्बानियों,शहादतों से बने इस राज्य को अभी न जाने और क्या-क्या देखना है?

इन्द्रेश 'आइसा' के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं 
और अब भाकपा-माले के नेता हैं. 
indresh.aisa@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.