निदो की मौत से उभरे सवाल

अभिनव श्रीवास्तव
-अभिनव श्रीवास्तव

"...क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि पूर्वोत्तर राज्यों के समुचित प्रतिनिधित्व का प्रश्न अक्सर असहज स्थितियां पैदा करता है? क्या ये सच नहीं है कि वर्गीय और नस्लीय हिंसा की जो बू निदो तनियम  के मामले में सामने आ रही है, उसकी मौजूदगी और स्वीकार्यता समाज के एक बड़े हिस्से में मौजूद है और इसी कारण ऐसे समुदायों के अधिकारों की रक्षा करने वाली एजेंसी के रूप में भारतीय राज्य नेतृत्व की एक ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी है।..."

राजधानी दिल्ली में बीते निदो तनियम पर की गयी नस्लीय टिप्पणी और उसके बाद हुयी मौत की घटना ने एकाएक बराबर प्रतिनिधित्व और सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर कायम भेदभाव जैसे परंपरागत राजनीतिक सवालों की वापसी करवा दी है और ऐसे पूरे माहौल पर एक ब्रेक सा लगा दिया है जिनमें ऐसे मुद्दों और सवालों की ओर इशारा करना लगातार मुश्किल होता जा रहा था। संयोग से यह घटना उसी राजधानी दिल्ली में ही घटी है जिसने हाल के दिनों में आम आदमी पार्टी की सरकार के कथित राजनीतिक प्रयोगों की वजह से सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं और राष्ट्रीय राजनीति के एक बड़े फलक को प्रभावित किया है। इसलिये यह उचित ही है कि निदो तनियम  की मौत से उठने वाले सवालों का जायजा बीते दिनों घटी इन घटनाओं के सन्दर्भ में किया जाये। 

इससे पहले कि बात को आगे बढ़ाया जाय, थोड़ा पीछे लौटते हैं। खिड़की एक्सटेंशन में दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती की भूमिका पर जब एक निजी टेलीविजन चैनल में बतौर आप प्रतिनिधि शामिल प्रवीण सिंह से नस्लवाद और महिला सुरक्षा जैसे खतरों की ओर इशारा करते हुये कुछ असहज सवाल पूछे गये तो कार्यक्रम के अंत में उन्होंने कहा कि नस्लवाद आदि के सवाल इस बहस को भटकाने के लिये पूछे जा रहे हैं। यह ध्यान दिलाने के बावजूद कि सोमनाथ भारती के मनमाने व्यवहार से महिलाओं में असुरक्षा और डर का भाव ज्यादा बढ़ा है, प्रवीण सिंह अपनी बात पर अड़े रहे। जब उनसे कहा गया कि सोमनाथ भारती की सोच में बतौर कानून मंत्री अफ्रीकी महिलाओं और नागरिकों के प्रति वही नस्लवादी पूर्वाग्रह जाहिर हुये जिसका एक ऐतिहासिक सन्दर्भ है, तब भी प्रवीण ने सोमनाथ भारती की भूमिका को सही ठहराया। उनका जवाब था कि कानून मंत्री का उद्देश्य सही था, लेकिन तरीका गलत, हालांकि तब चर्चा में शामिल वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र रंजन ने उनकी इस बात का तार्किक जवाब देते हुये कहा कि आपका कोई भी उद्देश्य समाज सापेक्ष होता है और सामान्यतः आपकी वर्गीय पृष्ठभूमि उसे निर्धारित करती है। 

खिड़की एक्टेंशन प्रकरण में सोमनाथ भारती की भूमिका को लेकर आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता लगभग इसी अंदाज और सोच के सहारे सार्वजानिक मंचों पर उनका बचाव करते नजर आये। हालांकि जिन सवालों को वे गैर जरूरी बता रहे थे और आंख चुरा रहे थे, वह कितने जायज थे, यह निदो तनियम की मौत से जाहिर हुआ है। आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिये कि हर छोटी बड़ी घटना पर आगे बढ़कर बयान देने वाले माननीय अरविंद केजरीवाल इस घटना पर शुरुआती समय में खामोश रहे। वैसी ऐसी घटनाओं के प्रति वह क्या दृष्टि रखते हैं इसकी एक नजीर स्वयं उन्होंने कुछ समय पहले यह कहते हुये प्रस्तुत की थी कि बलात्कार ड्रग्स लेने से होते हैं। सोमनाथ भारती की आपत्तिजनक भूमिका पर आम आदमी पार्टी की संस्थापक सदस्या रही मधु भादुरी के साथ पार्टी का बर्ताव और फिर भादुरी के इस्तीफे से भी पार्टी की इन महिला सुरक्षा और नस्लवाद जैसे मुद्दों पर संवेदनशीलता को समझा जा सकता है।

दरअसल बीते समय में एक ऐसी राजनीति की सूरत उभरती दिख रही है और स्वभाविक तौर पर जिसके केन्द्र में आम आदमी पार्टी के हालिया अभियान ही हैं, जिसने संस्थागत सुधारों और प्रशासनिक पारदर्शिता की बहस को इतने आक्रामक, अवसरवादी और बहुत हद तक फासीवादी अंदाज में आगे बढ़ाया है कि उसके आगे ये सभी चिंतायें और मुद्दे पीछे छूटते हुये मालूम होने लगते हैं। इन चिंताओं को प्रकट करने वाले हर व्यक्ति या समूह को जवाब में प्रचलित तर्क यही दिया जा रहा है कि ये भागीदारी आधारित लोकतंत्र की स्थापना में किये जाने वाले प्रयास हैं। इन्हें लोकतंत्र के सशक्तिकरण की दिशा में अगला कदम माना जाना चाहिये। दरअसल ऐसे दावों और तर्कों के मद्देनज़र ही इस आक्रामक माहौल में ये सवाल उठाया जाना सबसे ज्यादा जरूरी है कि हमारे दौर में राजनीति और नेतृत्व की क्या भूमिका है? जिसे हम ‘भागीदारी’ या ‘पार्टिसिपेशन’ कह रहे हैं, वह किसकी भागीदारी है और उसका नतीजा क्या है? 

भारतीय समाज को जानने-समझने वाले अनेक जानकारों ने गहरे अध्ययन के बाद ये निष्कर्ष दिये हैं कि भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में विभिन्न समुदायों और वर्गों का समुचित और बराबर प्रतिनिधित्व निर्धारित करना ही राजनीति की केन्द्रीय भूमिका होनी चाहिये। इसी क्रम में उसे प्राधिकार के परंपरागत आधारों और प्रभुता के ढांचों को तोड़ने की भूमिका का भी निर्वाह करना चाहिये। भारत जैसे समाजों के सन्दर्भ में यही वह भूमिका है जो राजनीति निभाती है और यही वह यथार्थ भी है कि जिसके इर्द-गिर्द भारतीय राजनीति और लोकतंत्र की रचना हुयी है। 

ऐसा कहने का अर्थ यह बिलकुल नहीं है कि प्रशासनिक पारदर्शिता और संस्थागत सुधार राजनीति और नेतृत्व के लक्ष्य नहीं होते। नागरिकों के सामाजिक, आर्थिक विकास और सशक्तिकरण के लिये विकास कार्यों और नीतियों का लाभ समाज के हर तबके तक पहुंचे, इस लक्ष्य को कोई भी नेतृत्व अपनी नजरों से ओझल नहीं कर सकता। लेकिन अगर राजनीति और नेतृत्व की भूमिका को एक आक्रामक अभियान के जरिये सिर्फ प्रशासनिक और संस्थागत सुधारों तक ही सीमित किया जाने लगे तो ऐसे नेतृत्व पर सवाल अवश्य खड़े किये जाने चाहिये। अक्सर ऐसे नेतृत्व समाज के एक खास दायरे और प्रभु वर्ग के आर्थिक हितों को विस्तार देने के उद्देश्य से काम करते हैं।
   
गौरतलब है कि भारतीय लोकतंत्र आज भी उस अवस्था में नहीं पहुंचा है जहां राजनीति और राजनीतिक नेतृत्व अपनी केन्द्रीय भूमिका की उपेक्षा कर आगे बढ़ सकें। यह नहीं कहा जा सकता है कि हमने विभिन्न संप्रदायों और समूहों का बराबर और समुचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर लिया गया है। फिर हाशिये पर पड़ी अस्मिताओं और वर्गों के हितों और प्रतिनिधित्व के रक्षा के मामले में भारतीय लोकतंत्र का रिकार्ड अब भी बहुत अच्छा नहीं है। क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि पूर्वोत्तर राज्यों के समुचित प्रतिनिधित्व का प्रश्न अक्सर असहज स्थितियां पैदा करता है? क्या ये सच नहीं है कि वर्गीय और नस्लीय हिंसा की जो बू निदो तनियम के मामले में सामने आ रही है, उसकी मौजूदगी और स्वीकार्यता समाज के एक बड़े हिस्से में मौजूद है और इसी कारण ऐसे समुदायों के अधिकारों की रक्षा करने वाली एजेंसी के रूप में भारतीय राज्य नेतृत्व की एक ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी है। प्रश्न यही है कि क्या इस जिम्मेदारी को कोई ऐसी राजनीति और नेतृत्व निभा सकता है, जिसके विमर्श और अभियानों में सामुदायिक विशिष्टताओं, विविधताओं को समझने की कोई दृष्टि ही नहीं हो और जो सामजिक भेदभाव के सबसे बर्बर रूपों में से एक नस्लवाद को कोई समस्या मानने से ही इंकार करे? 

जाहिर तौर पर ये सवाल सिर्फ भारतीय राजनीति में एक उम्मीद के तौर पर पेश की जा रही आम आदमी पार्टी से ही नहीं हैं, बल्कि उन सभी राजनीतिक दलों से हैं, जो हाल के दिनों में राजनीति की भूमिका को संकुचित करने वाले अभियान के प्रभाव में आये हैं। बीते दिनों में इस ओर ध्यान दिलाने पर आम आदमी पार्टी की ओर से अक्सर बचाव में लोगों की भागीदारी बढ़ाने जैसे तर्क सामने रखे गये हैं। खिड़की एक्सटेंशन में हुयी घटना के बाद आप के कई नेताओं का तर्क था कि सोमनाथ भारती की इस बात के लिये तारीफ की जानी चाहिये कि वह रात के वक्त स्थानीय लोगों की शिकायत सुनने के लिये घटनास्थल पर मौजूद थे, हालांकि बाद में अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं के हवाले से ये बात सामने आयी कि घटना के वक्त कानून मंत्री को घेरे हुये लोग उनके ‘अपने’ लोग थे। स्थानीय लोगों ने खुद को अनसुना किये जाने की शिकायत भी की। क्या ये वाकया बता नहीं देता कि आप के भागीदारी बढ़ाने के दावे में सुराख हैं? असल में भागीदारी अपने आप में एक बेहद अस्पष्ट शब्द है- इससे लोकतंत्र भी निकल सकता है, कारपोरेट राज्य भी और किसी तरह की फासीवादी-तानाशाही व्यवस्था भी। आप ने भागीदारी बढ़ाने के लिये अब तक जितने प्रयास किये हैं, वे लोकप्रिय सशक्तिकरण करने के प्रयास ही हैं। 

तमाम शोधकर्ताओं (जिनमें रोबिन जेफ्री और अरविंद राजगोपाल प्रमुख हैं) ने यह माना है कि टेलीविजन मीडिया सर्वेक्षणों और मोबाइल फोन के जरिये राजनीतिक और सामाजिक  मुद्दों का समाधान करने की कोशिश में लोकप्रिय भावनायें ही अभिव्यक्त होती हैं। आप के अभियानों पर हावी आक्रामक और बहुत हद तक दक्षिणपंथी कलेवर भी इस बात की पुष्टि कर देता है।

निदो की मौत ऐसी आक्रामक होती राजनीति और उसकी सिकुड़ती भूमिका की ही अभिव्यक्ति है। निदो तनियम पर की गयी नस्लीय टिप्पणी और फिर मौत की घटना के सन्दर्भ में आज इन सभी चिन्ताओं पर अपना रुख स्पष्ट करना हर प्रगतिशील तबके की जिम्मेदारी है। ऐसा करते हुये ये संभव है कि राजनीति और लोकतंत्र का ‘अंतिम सच’ पता होने का दावा करने  वाले वर्गों की ओर से विरोध का सामना करना पड़े, लेकिन अब उपरोक्त चिन्ताओं को नजरअंदाज करना और उन पर मौन रहना ऐसी ताकतों को मजबूत होने का अवसर देने जैसा होगा।

अभिनव पत्रकार हैं. पत्रकारिता की शिक्षा आईआईएमसी से. राजस्थान पत्रिका (जयपुर) में कुछ समय काम. अभी स्वतंत्र लेखन. इन्टरनेट में इनका पता  abhinavas30@gmail.com है.