पढ़ने-पढ़ाने के लोकतंत्र पर प्रहार

-अभिनव श्रीवास्तव

"...क्या डोनिगर मामले का पटाक्षेप जिस रूप में हुआ, उसको देश के जनतांत्रिक हलकों, खासकर बाजार के प्रतिनिधियों के बीच भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता की पृष्ठभूमि और सन्दर्भ में देखा जा सकता है? जाहिर है कि ये संबंध थोड़ा पेचीदा है, लेकिन अगर हाल के वर्षों में भाजपा के प्रचार अभियान पर गौर करें तो पेचीदा लगने वाले इस संबंध की कई परतें खुलती हुयी लगती हैं।..."


मेरिकी लेखिका वेंडी डोनिगर की किताब ‘दि हिंदूज, एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री’ को जब प्रकाशक पेंगुइन इंडिया ने वापस लेने और किताब की बाकी प्रतियों को नष्ट करने की सहमति दी तो कुछ खास वर्गों और लेखकों की निराशा और क्षोभ यह कहते हुये अभिव्यक्त हुआ कि प्रकाशन ने इस मामले में आवश्यक प्रतिबद्धता का परिचय नहीं दिया। एक अंग्रेजी दैनिक ने अपनी संपादकीय टिप्पणी में ये तक लिखा कि प्रकाशन अगर चाहता तो किताब को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित करने से पहले अपनी कानूनी लड़ाई को जारी रख सकता था। 

जाहिर था कि पेंगुइन इंडिया से इन शिकायतों और उम्मीदों का आधार उसका अपना अतीत था। सालों पहले सलमान रश्दी की किताब ‘दि सटाईनिक वर्सेज’ पर हुये विवाद पर जैसा अडिग रुख प्रकाशन ने अपनाया था, उसके दोहराये जाने की उम्मीद कई वर्गों और समूहों को आज भी थी। लेकिन अक्सर अतीत के ऐसे विवाद पेंगुइन जैसे प्रकाशकों के लिये जो सबक छोड़ जाते हैं, उनका प्रभाव डोनिगर मामले से स्पष्ट हो गया। पेंगुइन ने आगे आकर कहा कि अपने कर्मचारियों की ‘सुरक्षा’ करना भी उसकी चिंता है। नतीजा, बतौर प्रकाशक पेंगुइन के आत्मसमर्पण में निकला और उन वर्गों-समूहों को निराश कर गया, जो पेंगुइन के अतीत पर जरुरत से ज्यादा रीझे हुये थे। 

हालांकि इसके बावजूद इस घटना की अनदेखी नहीं की जा सकती, तो उसके कई अन्य महत्वपूर्ण कारण भी हैं।  डोनिगर की किताब पर मचे विवाद के केन्द्र में दीनानाथ बत्रा और उनकी शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति का वही जाना-पहचाना ‘सांस्कृतिक’ अभियान है, जो भारतीय राष्ट्रवाद के सांस्कृतिक आधार को तैयार करने में जुटा रहता है। 


निश्चित ही यह कोई नयी परिघटना नहीं है और इसके अनेक पक्ष हैं, लेकिन हाल के वर्षों में इन अभियानों ने पुस्तकों, पाठ्यक्रमों और सार्वजनिक उपभोग के लोकतंत्र को नियंत्रित करने में जैसी मनचाही सफलता हासिल की है, वह अवश्य विचलित करने वाली बात बनती जा रही है। बत्रा की ही अगुआई में शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति एनसीईआरटी पाठ्य पुस्तकों में शामिल महावीर और जैन धर्म के अनुयायियों के कुछ हिस्सों को हटाने की मांग लेकर अदालत जा चुकी है। 

दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास स्नातक पाठ्यक्रम में ए के रामानुजन के बहुचर्चित निबंध ‘थ्री हंड्रेड रामायणज’ को पाठ्यक्रम से हटवा लेने में भी उसने सफलता हासिल की थी। शैक्षिक पाठ्यक्रमों में यौन शिक्षा को शामिल करने के निर्णय का भी समिति विरोध करती रही है। दो साल पहले एनसीईरटी पाठ्य पुस्तकों में शामिल आंबेडकर कार्टून पर कुछ दलित समूहों ने आपत्ति दर्ज की और उसके बाद सुखदेव थोराट समिति ने इन कार्टूनों को हटाने की सिफारिश की।

इन सभी अभियानों के पीछे अलग-अलग समूहों (जिनमें हिंदू सांस्कृतिक संगठनों के अभियान विशेष उल्लेखनीय हैं) की निहित आस्थाओं की दलील काम करती है। बीते सालों में ये अभियान इतने आक्रामक हुये हैं कि वर्तमान में ये पूरी परिघटना का रूप लिये हुये लगते हैं। 

स्वभाविक तौर पर, ऐसी किसी भी परिघटना के नतीजे सार्वजनिक दायरे को मनचाहे प्रतीकों, छवियों, कट्टरपंथी मूल्यों से पाट देने और एक संकुचित राजनीति की दावेदारी में निकलते हैं। ‘पब्लिक स्फीयर’ यानि जन क्षेत्र की राजनीति को समझने वाले जानकार ऐसी किसी भी दावेदारी के खतरनाक नतीजों को जानते हैं।

लेकिन वर्तमान राजनीतिक माहौल में यह एक ज्यादा दिलचस्प प्रश्न हो सकता है कि इस दावेदारी की हिंदुत्व की राजनीति के लिये क्या कोई अल्पकालिक या दीर्घकालिक प्रासंगिकता है? क्या डोनिगर मामले का पटाक्षेप जिस रूप में हुआ, उसको देश के जनतांत्रिक हलकों, खासकर बाजार के प्रतिनिधियों के बीच भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की स्वीकार्यता की पृष्ठभूमि और सन्दर्भ में देखा जा सकता है? जाहिर है कि ये संबंध थोड़ा पेचीदा है, लेकिन अगर हाल के वर्षों में भाजपा के प्रचार अभियान पर गौर करें तो पेचीदा लगने वाले इस संबंध की कई परतें खुलती हुयी लगती हैं।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा आम चुनाव से पहले जो सियासी मोहरें बिछा रही है, उसमें विकास के जुमले के साथ अपनी वैचारिकी के अनुसार विकृत कर दिये गये कुछ खास तरह के प्रतीकों और छवियों की केंद्रीय भूमिका है। इनमें सबसे आक्रामक प्रचार बल्लभ भाई पटेल के प्रतीक और चाय बेचने वाले एक व्यक्ति के रूप में नरेंद्र मोदी की छवि का हुआ है। योजना वास्तव में मोदी को एक प्रतिबद्ध और जमीनी नेता की छवि देने भर की नहीं है, बल्कि इन छवियों के उपभोग पर ‘सर्व साधारण’ के अधिकार के तर्क को स्वीकृति देने की भी है। ये पूरा तर्क छवियों के उपभोग की एक ‘लोकतांत्रिक’ दावेदारी का निर्माण करता है। भाजपा को अपेक्षाकृत ‘उदार’ चेहरा यहीं से मिलता है और यहीं से वह सियासी समीकरण तैयार होता है जिस पर इस बार भाजपा का दांव लगा है।

देखा जाये तो हाल के वर्षों में भाजपा के चुनावी अभियान की यही रणनीतिक चालाकी रही है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि हिंदुत्व की राजनीति के सहारे सीधे गोलबंदी करने के बजाय छवियों और सार्वजनिक उपभोग के लोकतंत्र को नियंत्रित करना उसकी रणनीति का हिस्सा बनता चला गया है। संभवतः जिस दौर में नरेंद्र मोदी जनतांत्रिक हलकों और बाजार की ताकतों के बीच विकास पुरुष के तौर प्रस्तुत किये जा रहे थे उसी दौर में भाजपा ने राम मंदिर की राजनीति के उफान के दौर में उभरे सियासी समीकरण की सीमाओं को भांप लिया था।

डोनिगर मामले में पेंगुइन का आत्मसमर्पण सार्वजनिक उपभोग के लोकतंत्र को लगातार नियंत्रित कर रही धाराओं और ताकतों की सफलता की कहानी है। आज ये कहने का जोखिम शायद ही कोई ले सकता हो कि ये कहानी यहीं खत्म हो जायेगी। इस कहानी के नायक दीनानाथ बत्रा ने स्पष्ट कहा है कि आने वाले दिनों में डोनिगर के खिलाफ वह अपने अभियान को तेजी देने वाले हैं। वह बेलाग बताते हैं कि अब डोनिगर की एक अन्य किताब ‘आन हिन्दुज्म’ उनके निशाने पर है। इसके अलावा बत्रा की योजना शिक्षा के एक ‘घोषणा पत्र’ को तैयार उसे लागू करवाने की है। इन सबका सन्देश यही है कि शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति और ऐसी अन्य ताकतों के लक्ष्य केवल कुछ किताबों या साहित्य को प्रतिबंधित करवाने तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि दूरगामी तौर पर अपने आक्रामक अभियानों को संस्थागत रूप प्रदान करने के भी हैं।

दरअसल इस घटना के सन्दर्भ में अभिव्यक्ति की आजादी जैसे मुद्दों के साथ-साथ कुछ और भी दांव पर लगा है। बीते समय में देश के जनतांत्रिक दायरे में अनेक कट्टरपंथी धाराओं की मौजूदगी ने इतिहास की पुर्नव्याख्या और उसके सम्प्रेषण पर एक घोषित/अघोषित प्रतिबन्ध जैसी स्थिति बना दी है। डोनिगर मामले में भी ये आग्रह दिखायी दे रहा है। प्रश्न यही है कि क्या इतिहास की पुर्नव्याख्या पर नियंत्रण किसी भी सभ्यता, समाज और संस्कृति के व्यापक हित में हो सकता है ? ऐसे तमाम अनुभव मौजूद हैं जो ये बताते हैं कि समाज के प्रभु वर्ग और वर्चस्ववादी समूहों ने इतिहास की व्याख्या अपने निहित उद्देश्यों की पूर्ति के लिये की। अगर ऐसी व्याख्या को चुनौती नहीं मिली होती, तो कई छूटे हुये समूहों, भुला दी गई संस्कृतियों और उनके बारे में दिये गये भ्रामक निष्कर्षों और प्रचलित मिथकों को तोड़ना बहुत मुश्किल होता। इतिहास निर्माण की प्रक्रिया में उसकी पुर्नव्याख्या और वर्तमान के अतीत से द्वंद का बड़ा योगदान रहा है, ये अब सर्वमान्य बात है। ऐसी किसी भी प्रक्रिया को अवरुद्ध करना, प्रकारांतर में समाज के हित में नहीं होता। जो ताकतें इस प्रक्रिया को नियंत्रित करना चाहती हैं आज उन पर प्रश्न उठाये जाने की जरुरत है।

अभिनव पत्रकार और शोधार्थी हैं. पत्रकारिता की शिक्षा आईआईएमसी से.  
राजस्थान पत्रिका (जयपुर) में कुछ समय काम. अभी स्वतंत्र लेखन.  
इन्टरनेट में इनका पता  abhinavas30@gmail.com है.