सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में परिवेशीय भाषा की भूमिका

महेश चंद्र पुनेठा

महेश चंद्र पुनेठा

"...यह माना जाता है कि बच्चे उसी वातावरण में सबसे अधिक सीखते हैं जहाँ उन्हें लगे कि वे महत्वपूर्ण समझे जा रहे हैं। बच्चे को महत्वपूर्ण समझे जाने की शुरूआत उसकी भाषा और अनुभवों को महत्वपूर्ण समझे जाने से होती है। उसकी भाषा से परहेज करने का मतलब है उसके अनुभवों को नकारना क्योंकि बच्चा अपने अनुभवों को उसी भाषा में सबसे अच्छी तरह से व्यक्त कर सकता है जो उसने अपने परिवेश से सीखी है। यदि बच्चे को उसकी अपनी भाषा के प्रयोग से रोका जाता है तो वह अपने अनुभवों को व्यक्त नहीं कर पाता है। जो एक तरह की तनाव की स्थिति पैदा कर देता है और भय और तनाव सीखने में बाधक होता है। गैर परिवेशीय भाषा बच्चे के लिए बोझ बन जाती है और उसका आनंद जाता रहता है।..." 

शिक्षण का माध्यम कौनसी भाषा हो? इस पर विचार करते हुए हमें सीखने-सिखाने की प्रक्रिया पर भी साथ-साथ बात करनी होगी। यह माना जाता है कि सीखने की प्रक्रिया का अभिन्न अंग है आसपास के वातावरण, प्रकृति, चीजों व लोगों से कार्य व भाषा दोनों के माध्यम से संवाद स्थापित करना है। बच्चे सुनने, बोलने, पढ़ने, पूछने, उस पर सोचने, विमर्ष करने तथा लिखित रूप से अभिव्यक्त करने से सबसे अधिक सीखते हैं। अर्थ से पहले अवधारणा को ग्रहण करते हैं। ये सब क्रियाएं अपनी परिवेश की भाषा में ही सबसे अच्छी तरह संभव हैं।
स्कूल में प्रवेश करते समय बच्चे के पास बहुत सारी अवधारणाएं होती हैं जो उसकी अपनी परिवेश की भाषा में ही होती हैं। उसका स्कूल में प्रयोग तभी हो सकता है जबकि वहाँ उसकी परिवेश की भाषा को जगह मिलती है। आपने अनुभव किया होगा कि जब आप पढ़ाते हुए कभी-कभार बच्चों की बोली में उनसे बतियाने लगते हो या उनके घर-गाँव में बोले जाने वाले शब्दों का उच्चारण करते हो तो बच्चों के चेहरे एक अलग सी आभा से चमक उठते हैं। उनके होंठों में मुस्कान बिखर जाती है। ऐसा लगता है जैसे वे आपके एकदम करीब आ गए हैं। कक्षा में चुप्पा-चुप्पा रहने वाले बच्चे भी अपनी चुप्पी तोड़ बतियाने लगते हैं। उन्हें शिक्षक अपने ही बीच का लगने लगता है। विषयवस्तु को वे बहुत जल्दी भी समझ जाते हैं। इससे पता चलता है कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में भाषा की क्या भूमिका है?

जैसा कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 कहती है कि "बच्चों को इस तरह सक्षम बनाया जाना चाहिए कि वे अपना स्वर ढूँढ सकें, अपनी उत्सुकता विकसित करें, स्वयं सीखें, सवाल पूछें, चीजों की जाँच-परख करें और अपने अनुभवों को स्कूली जानकारी के साथ जोड़ सकें।" यह कब संभव है? जबकि बच्चे के पास अपनी भाषा हो। यदि उसके पास अपनी भाषा ही नहीं है अर्थात विद्यालय ऐसी भाषा को शिक्षण का माध्यम बनाता है जो बच्चे के परिवेष में मौजूद नहीं है बच्चा अपना स्वर कैसे ढूँढ पाएगा, कैसे अपनी उत्सुकता विकसित करेगा और सवाल पूछेगा, कैसे चिंतन-मनन करेगा?

यह माना जाता है कि बच्चे उसी वातावरण में सबसे अधिक सीखते हैं जहाँ उन्हें लगे कि वे महत्वपूर्ण समझे जा रहे हैं। बच्चे को महत्वपूर्ण समझे जाने की शुरूआत उसकी भाषा और अनुभवों को महत्वपूर्ण समझे जाने से होती है। उसकी भाषा से परहेज करने का मतलब है उसके अनुभवों को नकारना क्योंकि बच्चा अपने अनुभवों को उसी भाषा में सबसे अच्छी तरह से व्यक्त कर सकता है जो उसने अपने परिवेश से सीखी है। यदि बच्चे को उसकी अपनी भाषा के प्रयोग से रोका जाता है तो वह अपने अनुभवों को व्यक्त नहीं कर पाता है। जो एक तरह की तनाव की स्थिति पैदा कर देता है और भय और तनाव सीखने में बाधक होता है। गैर परिवेशीय भाषा बच्चे के लिए बोझ बन जाती है और उसका आनंद जाता रहता है।

आज कक्षा को एक ऐसा स्थान माना जाता है जहाँ विवादों को स्वीकार कर उन पर रचनात्मक प्रश्न उठाए जाते हैं तथा बच्चा अपने अनुभवों को अपने शिक्षकों और साथियों के साथ बाँट सकता है। कक्षा ऐसा स्थान तभी बन सकती है जब बच्चे के पास ऐसी भाषा हो जिसका वह सहज-स्वाभाविक रूप से इस्तेमाल कर सकता हो।  

जहाँ तक भाषा के विकास का सवाल है उसके लिए यह जरूरी माना जाता है कि बच्चे को सुनने-बोलने के पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। जैसा कि हम मातृभाषा सीखने के संदर्भ में भी देखते हैं कि परिवार में बच्चे को भाषा सुनने और बोलने के पर्याप्त अवसर दिये जाते हैं। उससे अधिक से अधिक बात की जाती है। उसे कुछ न कुछ (टूटा-फूटा या आधा-अधूरा ही सही) बोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इस तरह वह धीरे-धीरे भाषा सहजता से सीख लेता है। जब बच्चे को उसकी परिवेश की भाषा में बोलने से रोका जाता है तो इससे कहीं न कहीं उसकी चिंतन प्रक्रिया बाधित होती है जिसके बिना भाषा का विकास संभव नहीं है। ऐसे बच्चे अपने भावी जीवन में दब्बू और संकोची होते हैं। सीखने में भी चिंतन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है और यह एक परीक्षित तथ्य है कि मनुश्य हमेशा उसी भाषा में चिंतन करता है जिसे शैशवस्था में वह सर्वाधिक सुनता है,जिसको उसके परिवार और पास-पड़ोस में बोला जाता है, जिसे उसने अपने बड़ों से अनौपचारिक तौर से सीखा है।

यह अनुभवजनित सत्य है कि बच्चे की सीखने की गति अपने परिवेश की भाषा में ही सबसे अधिक होती है क्योंकि ऐसे में बच्चे का पूरा ध्यान विषयवस्तु पर होता है। उसे भाषा से नहीं जूझना पड़ता है। बच्चा सुनने और बोलने की भाषायी दक्षता अपने परिवेश से ग्रहण कर चुका होता है। यह भाषा किताबी ज्ञान को वास्तविक जीवन से जोड़ने में भी मददगार होती है। यदि किताबों की भाषा वह नहीं है जो बच्चे के घर व पास-पड़ोस में बोली जाती है तो बच्चे के स्कूली जीवन और बाहरी जीवन के बीच एक रिक्तता बनी रहती है। बच्चा अपने आसपास के अनुभवों को अपनी कक्षा-कक्ष तक नहीं ले जा पाता है। न किताबी ज्ञान से उसका संबंध जोड़ पाता है। उसे हमेशा यह लगता रहता है कि स्कूली जीवन और घरेलू जीवन एक दूसरे से अलग हैं,जबकि शिक्षा को जीवन से जोड़ने और रूचिकर बनाने के लिए जरूरी है कि इस अंतराल को समाप्त किया जाय।

परिवेश से दूर की भाषा शिक्षण का माध्यम होने पर उसका प्रभाव बच्चे के बौद्धिक व संज्ञानात्मक विकास पर पड़ता है। इसको नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यह भी माना जाता है कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में सबसे अधिक सहायता परिवेशीय भाषा से ही मिलती है। उसमें सोचने और महसूस करने की क्षमता का विकास जल्दी होता है। चिंतनात्मक और सृजनात्मक योग्यता अधिक विकसित होती है। इस संदर्भ में अपने समय के महत्वपूर्ण कवि नरेश सक्सेना को उद्धरित करना चाहूंगा। उनका यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या कारण है कि आजाद भारत में एक भी यानी पिछले 67 वर्षों में एक भी विश्वस्तरीय खोज या वैज्ञानिक आविष्कार हमारे देश में संभव नहीं हुआ? जिसका वे स्वयं तर्कपूर्ण उत्तर देते हैं- "हमारे दिमाग मुक्त नहीं हैं, वे गुलामी की भाषा में जकड़े हुए हैं। हम यह साबित कर चुके हैं कि भारत की कोई भी भाषा इस लायक नहीं है कि विज्ञान,तकनीकी,इंजीनियरिंग या किसी भी विषय की उच्च शिक्षा उसमें दी जा सके। हमारे बच्चे यानी मध्यवर्ग के सारे बच्चे इंग्लिश पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं। बचपन से ही रटना शुरू कर देते हैं। विशय को अपनी भाषा में पढ़ना, समझना, सोचना और प्रश्न पूछना.....ज्ञान प्राप्त करने की इस प्राकृतिक प्रक्रिया से वंचित रह जाते हैं।"

एक बात और, परिवेशीय भाषा पर बच्चे का अधिक अधिकार होता है। भाषा पर अधिकार होने का सीधा मतलब है ज्ञान के अन्य अनुशासनों में आसानी से प्रवेश कर पाना। पढ़ने में अधिक आनंद आना। सामान्यतः यह देखने में आता है जिस बच्चे का भाषा पर अधिकार होता है वह अन्य विषयों को भी जल्दी सीख-समझ जाता है। उसके लिए अवधारणाओं को समझना सरल होता है। फलस्वरूप उसके सीखने की गति अच्छी होती है। इतना ही नहीं ऐसा बच्चा अन्य भाषाओं को भी सरलता से सीख पाता है। गैर-परिवेशीय भाषाओं में इसके विपरीत होता है। परिवेश की भाषा के पक्ष में एक सकारात्मक पहलू यह है कि जब बच्चा स्कूल जाना प्रारम्भ करता है उस समय उसके पास अपने आसपास के वातावरण तथा प्रतिदिन के व्यावहारिक जीवन से अपने लिए जरूरी शब्दों का एक छोटा-मोटा भंडार होता है जिनका वह आवश्यकतानुसार प्रयोग करता है।स्कूल उसके इन शब्दों को आधार बनाकर उसके शब्द भंडार में उत्तरोत्तर वृद्धि करता है। बच्चों में संवेगों, मानवीय मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण व चारित्रिक गुणों का विकास भी परिवेशीय भाषा में बातचीत से अधिक संभव है। इसलिए जरूरी है कि शिक्षण का माध्यम बच्चे की परिवेश की भाषा ही होनी चाहिए। कम से कम प्रारम्भिक शिक्षा तो उसके परिवेश की भाषा में ही होनी चाहिए।

महेश पुनेठा अभी के चर्चित कवि और समी‍क्षक हैं. 
हिंदी की प्रतिनिधि पत्रिकाओं में लगातार कविताऐं और कविता समीक्षाएं प्रकाशित. 
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 भय अतल में' नाम से इनका एक कविता संग्रह काफी पसंद किया गया. 

इंटरनेट में इनसे punetha.mahesh@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है .