छद्म समाजवाद का मौजवाद

-सुनील कुमार
सुनील कुमार

"...मुजफ्फरनगर दंगे में कितने लोगों की मौत हुई, कितने घरों को जलाया गया, कितनी महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ व कितनी सम्पत्ति की नुकसान हुआ आज तक उसकी कोई सच्चाई समाने नहीं आ पाई है और न ही आयेगी। दंगों के बाद मुजफ्फरनगर, बागपत, शामली व गाजियाबाद में 50 हजार के करीब परिवार शिविरों में रहे। अभी अकेले शामली जिले में 19 शिविर चल रहे हैं जिसमें करीब 3000 परिवार रह रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुखिया मुलायम सिंह की नजरों में शिविरों में दंगा पीडि़त नहीं, कांग्रेस, बीजेपी के समर्थक व षड़यंत्रकारी रह रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने माना है कि शिविरों में 34 बच्चों की मृत्यु हुई है जबकि यह संख्या उससे कहीं अधिक है। सर्वोच्च न्यायालय में दायर हलफनामे में शिविरों में रहने वालों की संख्या 5024 बताई गई है जबकि केवल शामली जिले में 3 जनवरी 2014 तक करीब 15000 लोग शिविरों में रह रहे हैं।..."

Saiba Khatun, 13, inside
her waterlogged tent at a
Muzaffarnagar relief
camp
तस्वीर साभार- http://www.dailymail.co.uk
जकल उत्तर प्रदेश सरकार दो कारणों से चर्चा का केन्द्र बिन्दु बनी हुई है- पहला मुजफ्फरनगर दंगे के कारण, जिससे हजारों परिवार 4 माह बाद भी शिविरों में रहने को विवश हैं और दूसरा इन मजलूमों को छोड़कर यूपी सरकार मौज-मस्ती (सैफई में 14 दिन के नाच-गाने) तो दूसरी तरफ मंत्री और विधायकों का विदेश भ्रमण में लगी हुई है।

मुजफ्फरनगर दंगे में कितने लोगों की मौत हुई, कितने घरों को जलाया गया, कितनी महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ व कितनी सम्पत्ति की नुकसान हुआ आज तक उसकी कोई सच्चाई समाने नहीं आ पाई है और न ही आयेगी। दंगों के बाद मुजफ्फरनगर, बागपत, शामली व गाजियाबाद में 50 हजार के करीब परिवार शिविरों में रहे। अभी अकेले शामली जिले में 19 शिविर चल रहे हैं जिसमें करीब 3000 परिवार रह रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुखिया मुलायम सिंह की नजरों में शिविरों में दंगा पीडि़त नहीं, कांग्रेस, बीजेपी के समर्थक व षड़यंत्रकारी रह रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार ने माना है कि शिविरों में 34 बच्चों की मृत्यु हुई है जबकि यह संख्या उससे कहीं अधिक है। सर्वोच्च न्यायालय में दायर हलफनामे में शिविरों में रहने वालों की संख्या 5024 बताई गई है जबकि केवल शामली जिले में 3 जनवरी 2014 तक करीब 15000 लोग शिविरों में रह रहे हैं।

सैफई का आयोजन 

मुलायम सिंह अपने मृतक भतीजे रणबीर यादव की याद में सैफई में 14 दिनों (26 दिसम्बर से 8 जनवरी) का समारोह आयोजन कर करीब 300 करोड़ रु. (मीडिया में आ रही खबरों के अनुसार) लुटाये। खेड़ी खुर्द की राहत शिविर में रहने वाली रूकसाना अपने दो बच्चों की मौतों की किस तरह याद करेगी- जो कि अपनी और बच्चों की जान को बचाने के लिए गांव तिगड़ी से दो कमरों वाला घर को छोड़कर आई थी। ठंड ने रूकसाना के बच्चों को निगल लिया। उसे अब जिन्दगी चलाने के साथ-साथ डॉक्टर के 2000-2500 रु. दावा के दाम चुकाने की चिंता मारे जा रही है। 

सैफई के 50 लाख के शानदार टेंटों में गर्म कपड़े पहने मुलायम सिंह व उनके एक लाख सेवकों को ठंड से बचाने के लिए हीटर जलाये गये थे। लेकिन इन प्लास्टिक के टेंटों में रहने वालों के लिए ठंड से बचने के लिए अंगीठी तक नहीं है। टेंट के अन्दर पानी टपकता है और जब वो आग जलाते हैं वो भी बार-बार बुझ जाती है। अखिलेश यादव व उनके कुनबे के लिए गदे्दार सोफे हैं जिस पर सफेद कवर भी है और उनके पैरों के नीचे मुजफ्फरनगर दंगे को संभाल रहे आईजी अशुतोष बैठे बातें कर रहे थे। उसी मुजफ्फरनगर दंगे की पीडि़ता अकबरी अपने बच्चे सादीन को दफनाने के लिए सफेद कपड़े खोज रही थी। अकबरी के पास बच्चे को सुलाने के लिए तख्त तक नहीं था। वह नीचे सोई थी और उसके सर पर सांप बैठा था जिसने सादीन को मौत की नीन्द सुला दिया। 

सैफई समारोह में शिरकत कर रहे मेहमानों को पहुंचाने के लिए 9 चार्टड प्लेन लगाए गये थे। वहीं इन दंगा पीडि़तों के शिविरों में अस्पताल पहुंचाने के लिए एक एम्बुलेंस तक नहीं है। इस समारोह की सुरक्षा के लिए 2000 पुलिसकर्मी लगाये गये थे। यही पुलिसकर्मी दंगा पीडि़त दीन मुहम्मद के घरों की तलाशी लेते हैं और उनके जेवर और मोबाईल लेकर चले जाते हैं। जेवर और मोबाईल लेने के बाद भी एसडीएम साहब दीन मुहम्मद को फर्जी केस में जेल भेज देते हैं। दीन मुहम्मद दो माह बाद 35 हजार रु. लगाकर जमानत पर छुटकर आता है। अब उसे और उसके परिवार को कर्ज चुकाने और बेटी की शादी की चिंता सता रही है। वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव माधुरी व सैफ अली खान की फिल्म डेढ़ इश्किया और बुलेट राजा के लिए एक-एक करोड़ देने का वादा करते हैं। 1800 दंगा पीडि़त परिवारों को अब तक 5-5 लाख रु. दिये गये हैं- वो भी इस शर्त पर की वे दुबारा अपने जमीन पर नहीं जायेंगे, अगर गये तो उनको पैसा वापस करना पड़ेगा।

सपा सांसद धर्मेन्द्र यादव ने लोगों से वादा किया कि अगले वर्ष और बड़े लेवल पर समारोह का आयोजन किया जायेगा। पिछले वर्ष भी सैफई समारोह विवादों में रहा, जब बार डांसरों व विदेशी डांसरों पर लोगों ने छिंटाकस्सी की थी। अखिलेश यादव प्रेस कान्फ्रेस कर मीडिया पर ही तोहमत जड़ रहे हैं कि मीडिया से वो नहीं मिले इसलिए वो झूठा प्रचार कर रही है। समारोह में 300 करोड़ रू. नहीं, 7-8 करोड़ रु. खर्च हुए हैं। समारोह का इतना व्यापक आयोजन पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये किया गया था। फिल्म ऐक्टरों पर सवाल उठते ही वे चैरिटी में दान देने की बात कर रहे हैं, तो महेश भट्ट अपनी पुत्री आलिया भट्ट के लिये माफी मांग रहे हैं। कह रहे हैं कि वो तो 20 वर्ष की है, उसे नहीं मालूम था कि अक्टूबर के दंगे का घाव अभी तक भरा नहीं गया है। यही बात अखिलेश यादव कह रहे हैं कि मुजफफ्रनगर की बात उन सितारों से नहीं पूछी जाये जो मुजफ्फरनगर की घटना को जानते ही नहीं हैं। मुजफ्फरनगर के पीडि़तों की इतनी सहायता की गई है जिसकी दूसरी मिसाल नहीं है। 

अखिलेश भूल रहे हैं कि उनके राज्य में दंगा पीडि़त इतने खौफजादा हैं कि पुलिस के डर से रात में पहरा देना पड़ रहा है। 3 जनवरी की रात को 3.50 बजे भोर में पुलिस की गाडि़यां देखते ही शिविर के लोग बाहर निकल कर गाडि़यों की तरफ दौड़ पड़े। बरवानी कैम्प में 100 परिवारों पर 30 कम्बल पटवारी ने जाकर दिया। शायद अखिलेश सरकार के लिए यही बड़ी राहत होगी। 

भ्रमण पर मंत्री, विधायक

संसदीय प्रणाली के अध्ययन के नाम पर शहरी विकास मंत्री आजम खान के नेतृत्व में 17 सदस्यीय (8 मंत्री और 9 विधायक) दल पांच देशों (तुर्की, हालैंड, ब्रिटेन, ग्रीस व संयुक्त अरब अमीरात) की 18 दिन की यात्रा पर निकला हुआ है। इस दल में सपा, कांग्रेस, भाजपा, लोकदल के मंत्री व विधायक शामिल हैं। इस भ्रमण पर कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप माथुर भी जाने वाले थे, लेकिन नहीं गये। प्रदीप माथुर का कहना है कि ‘‘इसमें कुछ नया नहीं है। बहुजन समाज पार्टी के शासन काल को छोड़कर लगभग हर वर्ष विधायकों का एक दल ऐसे भ्रमण पर जाता रहा है। मैंने खुद ऐसे दौरों से संसदीय प्रणाली के बारे में बहत कुछ सीखा है।’’ समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेन्द्र चैधरी इसे सामान्य प्रक्रिया मानते हैं। वे कहते हैं कि ‘‘इन दौरों में दूसरे देशों की संसदीय प्रणाली को समझने का मौका मिलता है और कई अन्य राज्यों से भी ऐसे संसदीय दल जाते रहे हैं।’’ सभी जानते हैं कि संयुक्त अरब अमीरात में कोई संसदीय प्रणाली नहीं है। क्या यह भ्रमण जनता के पैसे से मौज-मस्ती करने के लिए है?
इस भ्रमण में राजा भैया और मनोज कुमार पारस जैसे लोग भी शामिल हैं। राजा भैया को तो सभी जानते हैं कि वे किस तरह के भैया हैं। मनोज कुमार पारस, नगिना (बिजनौर) से सपा के विधायक हैं, अभी  स्टाम्प और रजिस्ट्रेशन मंत्री हैं। मनोज कुमार पारस पर एक दलित महिला के साथ दुष्कर्म करने का केस वर्ष 2007 से चल रहा है। उत्तर प्रदेश की उत्तम सरकार ने उन पर से केस वापस ले लिया है जिस की 17 जनवरी को कोर्ट में तारीख है। 

निर्ममता व समाजवाद

निर्भया/दामिनी की घटना पर बड़े बड़े वक्तव्य देने वाला बॉलीवुड क्या इतना निर्मम हो गया है कि उसे मुजफ्फरनगर की इतनी बड़ी घटना दिखाई नहीं दे रही है? क्या बॉलीवुड प्रसिद्धि पाने वाली वक्तव्य देता है, लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करने के लिए? मुजफ्फरनगर दंगे में एक नहीं सैकड़ों/हजारों, निर्भया/दामिनी मिल जायेंगी, जो कि सिसकियां ले रही हैं, अपना मुंह नहीं खोल रही हैं। जिसने थोड़ खोला भी उनको भी न्याय नहीं मिला। क्या सपा का समाजवाद यही है? यही लोहिया का सपना था? जहां एक तरफ 4 माह से लोग घर छोड़कर शिविरों में रहने को मजबूर हैं, बच्चे मर रहे हैं, उनको सपा सरकार जमीन हड़पने वाले और षड़यंत्रकारी के रूप में चिन्हित कर रही है। जनता के पैसे पर बलात्कारी मंत्री सैर-सपाटे के लिए जाते हैं। मुलायम सिंह यादव के दिल में प्रधानमंत्री बनने की आग जल रही हैं। वहीं घर से बेघर हुए लोगों के दिलों में अपने से बिछुड़ने और सिर पर छत न होने की आह निकल रही है।  

मुलायम सिंह यादव एक भतीजे की याद में सैकड़ों करोड़ खर्च कर रहे हैं, वही दंगा पीडि़त कैम्पों में माता-पिता अपने आंखों के सामने बच्चों को तड़पते हुए देख रहे हैं। आज शिविर में मां-बहनें, बच्चे-बूढ़े पूछ रहे हैं कि उनको न्याय कब मिलेगा? क्या इस व्यवस्था में इस मेहनतकश जनता के लिए न्याय है? यह मेहनतकश जनता जानती है कि उसके पास हारने के लिए अब कुछ नहीं बचा है। इस छद्म समाजवाद का अंत यही जनता करेगी। जब रोम जल रहा था तो वहां का शासक निरो बंशी बजा रहा था। यही हाल सपा सरकार की हो गई है।