माध्यम भाषा के बहाने निजीकरण का एजेंडा

कंचन जोशी
-कंचन जोशी


"…शिक्षाशास्त्रीय दृष्टिकोण से यह एक स्पष्ट तथ्य है कि बच्चे को उसी भाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए जो उसके परिवेश की भाषा है| परिवेश की भाषा से इतर अन्य किसी भी भाषा में शिक्षण बच्चे पर एक अनावश्यक मानसिक दबाव  डालने के साथ ही उसकी रचनात्मकता को कुंद कर लेता है| परिवेश की भाषा से इतर शिक्षा प्राप्त करने में बच्चे को एक अनावश्यक ऊर्जा उस भाषा के साठ झूझने में कर्च करनी पड़ती है, जिससे मूल विषय से ध्यान भटकने का निरंतर खतरा रहता है|…"

साभार- http://www.indiawaterportal.org/
कुछ समय पूर्व उत्तराखंड सरकार द्वारा सरकारी विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बनाए जाने सम्बन्धी घोषणाएँ की हैं| फिलहाल यह एक ऐच्छिक व्यवस्था है, किन्तु सरकार की मंशा और लागू करवाने की हड़बड़ी से यह स्पष्ट है कि जल्द ही इस व्यवस्था को सभी सरकारी विद्यालयों पर थोप दिया जाएगा| सरकार इस व्यवस्था के पीछे सरकारी विद्यालयों में घटती छात्र संख्या को कारण बता रही है| सरकार का यह मानना है कि अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा दिए जाने पर सरकारी विद्यालयों में छात्र संख्या न केवल बढ़ेगी बल्कि इससे शिक्षा में गुणवत्ता का स्तर भी सुधर जाएगा| 

सरकार का यह निर्णय एक ऐसे समय में आया है जब शिक्षकों और जरूरी संसाधनों की कमी से जूझता हुआ शिक्षा विभाग लगातार आलोचनाओं का केंद्र बना हुआ है और प्रदेश में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर जनभागीदारी के नाम पर शिक्षा के निजीकरण और एन.जी.ओ.करण के प्रयासों में तीव्रता आय है| प्राथमिक शिक्षा को पी.पी.पी. माध्यम के बहाने ठेके पर चलाने के प्रयासों में तेजी आई है| माध्यमिक विद्यालयों में भी रमसा के तहत भर्तियाँ ठेके पर की गयी हैं एवं राजीव गाँधी नवोदय विद्यालयों को तो पूर्णतः ठेके पर देने की कवायद को अमली जामा पहनाया जा चुका है| जबकि जनता के बीच निरंतर बहसों से यह बात निकलती है कि विद्यालयों में मूलभूत संसाधनों एवं शिक्षकों के आभाव में सरकारी विद्यालयों की ओर लोगों का झुकाव घटा है| आइये शिक्षा में माध्यम भाषा के सवाल के बहाने शिक्षा में बढ़ते निजीकरण, एनजीओकरण और एकसमान शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर बातचीत करें|

क्या परिवेश की भाषा ही शिक्षण की माध्यम भाषा नहीं होनी चाहिए?- 

शिक्षाशास्त्रीय दृष्टिकोण से यह एक स्पष्ट तथ्य है कि बच्चे को उसी भाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए जो उसके परिवेश की भाषा है| परिवेश की भाषा से इतर अन्य किसी भी भाषा में शिक्षण बच्चे पर एक अनावश्यक मानसिक दबाव  डालने के साथ ही उसकी रचनात्मकता को कुंद कर लेता है| परिवेश की भाषा से इतर शिक्षा प्राप्त करने में बच्चे को एक अनावश्यक ऊर्जा उस भाषा के साठ झूझने में कर्च करनी पड़ती है, जिससे मूल विषय से ध्यान भटकने का निरंतर खतरा रहता है|

अंग्रेजी आवश्यकता है अथवा बनाई गयी है?- 

भारत में किसी भी इलाके में अंग्रेजी एकमात्र भाषा नहीं है और परिवेश की भाषा तो कावल कुछ ही इलाकों में है| इसके बावजूद भी शिक्षा में माध्यम भाषा के रूप में अंग्रेजी का प्रयोग औपनिवेशिक काल से चला आ रहा है और शाशकों की औपनिवेशक मानसिकता ने अंग्रेजी भाषा और व्यवहार को निरंतर जनता पर लादा है| विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी को प्राथमिकता से स्थान देकर इस भाषा को जनता के बीच में स्थापित करने की यह औपनिवेशिक मानसिकता भारतीय भाषाओँ को निरंतर लील रही है| विश्व के जो भी देश कभी भी ब्रिटिश उपनिवेश रहे वहाँ की मूल भाषाओं और मूल निवासियों की संस्कृति को अंग्रेजी ने लील लिया| भारत में आज़ादी के बाद से एक सही सांस्कृतिक आंदोलन के आभाव में भाषा की यह समस्या निरंतर बनी रही| विभिन्न शिक्षा आयोगों के द्विभाषीय और त्रिभाषीय सुझावों को सही रूप में धरातल पर न उतारे जाने के कारण यह समस्या शिक्षा के क्षेत्र में भी बनी रही, किन्तु माध्यम भाषा के रूप में परिवेश की भाषा के प्रयोग पर सभी शिक्षाविद एकमत रहे हैं| किन्तु नब्बे के दशक के बाद नवउदारवादी विश्व व्यवस्था के साथ बाज़ार को फर्राटेदार अंग्रेजी बोल सकने वाले “सेल्समेनों” की आवश्यकता है, जिसकी पूर्ती के लिए अंग्रेजी बोल सकने वाले, किन्तु मौलिक चिंतन से रहित मजदूरों की आवश्यकता है| ऐसे मजदूर जिनकी चेतना बाज़ार की चमक में दबी रहे| उसी आवश्यकता की पूर्ती के लिए अंग्रेजी को सभी अन्य भारतीय भाषाओं के ऊपर स्थापित किया जा रहा है|

क्या सरकारी विध्यालय “हिंदी माध्यम” के कारण पिछड रहे हैं?- 

सरकारी विध्यालयों के पिछड़ने का कारण हिंदी माध्यम होना नहीं, बल्कि संसाधनों, प्रशासन एवं शिक्षकों का आभाव है| अधिकाँश सरकारी विध्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं| प्राथमिक स्तर पर पाँच कक्षाओं के लिए कहीं भी पाँच शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं| कई जगह तो एकमात्र शिक्षामित्र साथियों के भरोसे पूरा विध्यालय चल रहा है| शिक्षा सत्र का एक मत्वपूर्ण समय विभिन्न गैर शैक्षणिक राजकीय कार्यों , यथा बी.एल.ओ., जनगणना आदि कार्यों में निकल जाता है| अधिकाँश माध्यमिक विध्यालयो में लिपिक का कार्य शिक्षकों को ही करना पड़ता है| ऐसी स्थितियों में सरकारी विध्यालयों के पिछड़ने के कारण आप ही स्पष्ट हो जाते हैं| केवल शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बनाकर इतिश्री कर लेना विध्यालयों की असल स्थितियों से मुह मोड लेना है|

क्या है शिक्षा में माध्यम में परिवर्तन के बहाने निजीकरण और एनजीओकरण?- पिछले कुछ वर्षों में देश भर में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में एनजीओ का दखल बढ़ा है| दिल्ली नगर निगम के विध्यालयों में शिक्षा में गुणवत्ता बढ़ाने के नाम पर टेक महिंद्रा के एनजीओ ने अधिकाँश विध्यालयों में भौतिक संसाधनों पर अधिकार कर लिया है| उत्तराखण्ड में भी अज़ीम प्रेमजी फाउन्डेशन सरीखे एनजीओ शिक्षा व्यवस्था के व्यवस्थागत कमियों से ध्यान भटकाते हुए निरंतर शिक्षण माध्यमों में नवाचार को ही एकमात्र मुद्दा मानकर सरकारी शिक्षा व्यवस्था को नाकारा सिद्ध करने में लगे हैं| बड़े बड़े कॉर्पोरेट घरानों के ये एजेंट सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को अपने आकाओं के लिए बाज़ार में बदले को प्रयत्नशील हैं| असल सवाल सरकारी विध्यालयों में संसाधनों को जोड़ने और रिक्त शिक्षकों के पड़ भरे जाने का है, जिसको निरंतर अनदेखा किया जा रहा है| जबकि प्राथमिक शिक्षा को पीपीपी मोड पर दिए जाने के बाद अब माध्यमिक शिक्षा में भी रमसा के तहत निजीकरण की कवायद शुरू हो चुकी है|

यदि सरकारी विध्यालय नहीं बचे तो?- 

सरकारी विध्यालयों का पूर्णतः खत्म हो जाना अब एक कोरी कल्पना मात्र नहीं रही है|सरकारी शिक्षकों के पदों की रिक्तता, नयी भर्तियों में देरी, पीपीपी मोड पर विध्यालयों को चलाने की नीति, ठेकों पर भर्तियाँ ये सब नीतियाँ उस बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रही हैं जो सार्वजनिक शिक्षा को लील जाने पर आतुर है| यदि हम अभी नहीं चेते तो ना तो सरकारी विध्यालय बचेंगे और ना  ही सरकारी शिक्षक| और निजी शिक्षण संस्थानों के बाज़ार में कहाँ तक आम आदमी को शिक्षा दिला पाएँगे ये तथ्य किसी से भी छुपा नहीं है|
    
अतः माध्यम भाषा के रूप में अंग्रेजी को लागू करने के पीछे सरकार द्वारा निजीकरण को बढ़ावा देने की इस मंशा को समझें और इसका पुरजोर विरोध करें|

 कंचन उत्तराखंड के एक सुदूर गांव 'पोखरी' अध्यापक हैं.
इनसे संपर्क का पता - kanchan.joshi.54@facebook.com