कांग्रेस का उद्धार हो कैसे?

सत्येंद्र रंजन
-सत्येंद्र रंजन

"...कांग्रेस नेताओं की आज अग्निपरीक्षा है। अगर उन्होंने स्थिति को समझने की अंतर्दृष्टि नहीं दिखाई तो उपयुक्त समाधान नहीं ढूंढना संभव नहीं होगा। उसके सामने अपना पुनर्आविष्कार करने की चुनौती है। यह विशुद्ध राजनीतिक प्रयास से ही संभव है। 2004 में सत्ता में लौटने के बाद कांग्रेस ने एनजीओ कार्यकर्ताओं को राजकाज और राजनीति में प्रतिष्ठित कर अपनी आम आदमी समर्थक छवि बनाने की जो कोशिश की, उसकी सीमाएं अब स्पष्ट हो चुकी हैं।..." 

कार्टून साभार- मंजुल
इए, उम्मीद करें कि ये खबर नहीं सिर्फ गपशप है। इसके बावजूद उल्लेखनीय है, क्योंकि अगर यह चर्चा चलने लगे कि कांग्रेस अगले आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए नंदन निलेकणी के नाम पर विचार कर रही है तो उससे पता चलता है कि ये पार्टी किस हाल में पहुंच चुकी है (या कम से कम उसके बारे में कैसी आम धारणा बन गई है)। 2004 में जब मनमोहन सिंह को कांग्रेस ने प्रधानमंत्री बनाया तब भी वह गौरवमयी इतिहास वाली इस पार्टी की स्थिति पर कोई कम प्रतिकूल टिप्पणी नहीं थी, लेकिन तब एक विशेष परिस्थिति (सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर गरमाई राजनीति) के कारण पार्टी अपने समर्थक जमातों को उसका तर्क समझाने में सफल रही। लेकिन उसके दस साल बाद अगर पार्टी को कॉरपोरेट सेक्टर से आए प्रबंधक (या रघुराम राजन जैसे आईएमएफ से आए अर्थशास्त्री) के नाम पर सचमुच विचार करना पड़ा तो उसका यही निहितार्थ होगा कि इस पार्टी की राजनीतिक भूमिका खत्म हो रही है। अगर उसके नेताओं(?) की यह समझ बन गई हो कि राजनीतिक पार्टी का काम सामाजिक शक्तियों के द्वंद्व, समीकरण और गठबंधन के बीच किसी तरह अपनी जगह बना कर सत्ता में आना और प्रशासन संभालना है तो निश्चित रूप से राजनीति की व्यापक संदर्भ की उनकी समझ शून्य हो चुकी है।

कांग्रेस को अगर आज भी देश के बहुत से लोग एक विकल्प के रूप में देखते हैं तो इसलिए नहीं कि उन्हें प्रबंधन शैली में उससे बेहतर प्रशासन की उम्मीद है। बल्कि इसलिए कि स्वतंत्रता संग्राम से भारतीय राष्ट्र का जो विचार निकला और जिसकी भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति हुई, उसके वाहक के रूप में उससे अधिक व्यापक एवं मजबूत आधार वाली कोई और राजनीतिक पार्टी आज भी मौजूद नहीं है। अगर कांग्रेस उन विचारों को आधार बना कर समाज का नेतृत्व करने की क्षमता या इच्छाशक्ति खो दे तो फिर उसकी क्या प्रासंगिकता रह जाएगी? 

चार उत्तरी राज्यों के चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी में आत्म-मंथन की जरूरत बताई। अगर पार्टी नेतृत्व में सचमुच ऐसा करने का माद्दा है, तो उसे सबसे पहले अपनी  प्रासंगिकता के सवाल पर ही विचार करना चाहिए। इस क्रम में उसके लिए विचारणीय पहलू यह नहीं है कि उसे दिल्ली के चुनावों में अप्रत्याशित रूप से सफल हुई आम आदमी पार्टी से क्या सीखने की जरूरत है। बल्कि उसे यह सोचना चाहिए कि दक्षिणपंथी रुझान वाली, सामाजिक रूप से अनुदार, भ्रष्टाचार को भावनात्मक मुद्दा बना कर जनाक्रोश का लाभ उठाने वाली तथा राजनीतिक विमर्श को सतही तथा स्तरहीन बनाने वाली संपन्न पृष्ठभूमि से आए लोगों की एक पार्टी से सीखने की जरूरत अगर पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने महसूस की तो यह किस बात की झलक है? क्या यह इसका संकेत नहीं है कि कांग्रेस के बड़े नेताओं का गांधी-नेहरू के वैचारिक दायरे से नाता टूट चुका है? अगर यह सच है तो क्या उनसे साझा आर्थिक हित, सर्व-समावेशी स्वरूप, उदार एवं खुली संस्कृति, सामाजिक-आर्थिक न्याय और प्रगति की मूल धारणाओं पर आधारित भारत के विचार को आगे बढ़ाने में किसी भूमिका की अपेक्षा की जा सकती है?

ये प्रश्न बेशक दूरगामी महत्व के हैं। लेकिन इस मौके पर इनकी फ़ौरी अहमियत भी खासी बढ़ गई है। 2014 का चुनाव एक वैचारिक संग्राम के रूप में सामने है। बीते अक्टूबर में कोच्चि में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक हुई। उस मौके पर संघ के नेताओं से अनौपचारिक बातचीत के आधार पर जो रपटें अखबारों में छपीं उनमें बताया गया कि संघ अगले चुनाव को आर-पार की लड़ाई (मेक ऑर ब्रेक) मानता है। हाल में जिस रूप में संघ की ओर से इस चुनाव की कथा बुनी गई है, उससे इस धारणा की पुष्टि होती है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के बाद भाजपा संघ के मूल एजेंडे की तरफ लौटी है। 1967 (तब भारतीय जनसंघ) और 1991 और 1996 के आम चुनावों में जिस तरह पार्टी ने अपनी हिंदुत्व की पहचान को प्रमुखता से सामने रखते हुए जनादेश मांगा था, वैसा फिर करने को वह तैयार है। इस बारे में किसी को भ्रम नहीं रहना चाहिए कि जिस गुजरात मॉडल को देश के सामने संघ परिवार पेश कर रहा है, उसका सबसे अहम पहलू वह राजनीतिक विमर्श है, जिसे 2002 के दंगों के बाद राज्य में मोदी ने रखा था। यहां इस विमर्श या हिंदुत्व की राजनीति के ऐतिहासिक संदर्भ को याद कर लेना उचित होगा। संघ जिस हिंदू राष्ट्र (अथवा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद) के प्रति निष्ठावान रहा है, उसकी अनिवार्य रूप से राष्ट्रवाद की उस धारणा से प्रतिस्पर्धा है जिसकी अभिव्यक्ति हमारे संविधान में हुई है। इस धारणा के वाहक प्रगतिशील राजनीति से जुड़ी तमाम शक्तियां रही हैं, मगर इस धारा की सबसे प्रमुख शक्ति कांग्रेस रही। आज भी इस हकीकत में कोई बदलाव नहीं आया है।

इसीलिए कांग्रेस में क्या होता है और वह क्या दिशा लेती है, उससे उन सभी लोगों का वास्ता है जो उदार, सर्व-समावेशी राष्ट्रवाद में यकीन करते हैं। इस राष्ट्रवाद की लोकप्रियता के लिए यह आवश्यक है कि इसकी वाहक ताकतें आम जन में उनकी बेहतरी का भरोसा बंधाएं और आधुनिक अर्थों में विकास के एजेंडे पर चलती दिखें। कांग्रेस के सिकुड़ने की शुरुआत 1980 के दशक में तब हुई, जब उसने हर व्यावहारिक अर्थ में भारतीय राष्ट्रवाद की इस धारणा से किनारा करना शुरू कर दिया। यहां ये याद कर लेना अप्रासंगिक नहीं होगा कि 1990 के दशक के मध्य में बहुत से लोगों ने इस पार्टी की श्रद्धांजलि लिख दी थी। मगर 1996-2004 की अवधि में विपक्ष में रहते हुए जब उसकी वामपंथी दलों और सामाजिक न्याय की शक्तियों के साथ सियासी साझेदारी बनी तो उसकी वापसी का आधार बना। 2004 के बाद वामपंथी दलों के समर्थन से उसने सरकार बनाई तो भारतीय राजनीति में एक नई संभावना पैदा हुई। अगर कांग्रेस नेतृत्व इसकी कीमत समझता तो न सिर्फ कांग्रेस अपनी जड़ों को फिर से फैला सकती थी, बल्कि उससे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोकप्रिय हुए न्याय, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों की जड़ें भी मजबूत होतीं। लेकिन पार्टी ने मनमोहन सिंह को न सिर्फ प्रधानमंत्री बनाया, बल्कि उनकी नव-उदारवादी सोच को अपनी मूल विचारधारा के रूप में भी स्वीकार कर लिया। नतीजा वामपंथी दलों से संबंध बिच्छेद के रूप में सामने आया। उसके साथ ही पार्टी के गांधी-नेहरू के वैचारिक दायरे में लौटने की संभावनाएं भी क्षीण हो गईं। दूसरी तरफ नव-उदारवादी शासन अपनी तार्किक परिणति के रूप में क्रोनी पूंजीवाद की तरफ बढ़ा। आज भ्रष्टाचार और महंगाई के जो दो मुद्दे कांग्रेस के लिए घातक साबित हो रहे हैं, वे अनिवार्य रूप से इसी परिघटना की उपज हैं।

कांग्रेस अगर अपनी दुर्दशा पर आत्म-मंथन करती है तो क्या उसमें वह इस पहलू को शामिल करेगीसंभावना कम है। इसलिए कि 2009-13 के बीच अनेक मौकों पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने बेलाग घोषणा की कि पार्टी के आर्थिक विचार वही हैं, जो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हैं। यानी कांग्रेस ने नीतिगत रूप से बाजार समर्थक नीतियों को गले लगाने का एलान किया। इसके साथ-साथ पार्टी ने आम आदमी के भी साथ होने अपना हाथ होने का दावा जरूर बरकरार रखा। उसके आर्थिक सिद्धांतकारों ने कहा कि इन दोनों बातों में कोई अंतर्विरोध नहीं है। नव-उदारवाद से आर्थिक विकास दर तेज होती है, जिससे कर संग्रह बढ़ता है और उससे सरकार के लिए जन-कल्याण की योजनाओं को लागू करना संभव होता है। लेकिन उनके इस दावे की विभिन्न जन-समूहों के बीच कितनी स्वीकार्यता है, उसे मौजूदा राजनीतिक माहौल से साफ समझा जा सकता है। आज उद्योग एवं व्यापार जगत ने अपना पूरा दांव कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन कर उभरे नरेंद्र मोदी पर लगा रखा है। उद्योगपति, कारोबारी, कॉरपोरेट जगत के नामी लोग, रेटिंग एजेंसियां आदि सार्वजनिक रूप से मोदी के पक्ष में बोलते सुने जा रहे हैं। चार उत्तरी राज्यों के चुनाव में भाजपा के विजयी होने पर शेयर बाजार में अभूतपूर्व जोश आ गया। दूसरी तरफ आम आदमी कांग्रेस से कितना खफा है, उसकी बेहतरीन मिसाल हाल के चुनाव परिमाण हैं। कांग्रेस के लिए इससे बड़े सदमे की बात और क्या हो सकती है कि खासकर दिल्ली में कमजोर वर्गों के मतदाताओं ने उसे लगभग थोक भाव से ठुकरा दिया।

सचमुच पार्टी के लिए यह गहरे आत्म-निरीक्षण का विषय है कि आखिर उसने बाजार और आम आदमी दोनों का भरोसा क्यों खो दिया यह हकीकत है कि यूपीए के दोनों कार्यकाल में वंचित तबकों के विकास के लिए कानून बनाकर के उन्हें नए अधिकार देने का नजरिया अपनाया गया। राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार ने जन-कल्याण की कई सफल योजनाएं चलाईं। दिल्ली में ढांचागत विकास के साथ-साथ गरीब तबकों के लिए ऐसी चर्चित योजनाएं रही हैं। इसके बावजूद दोनों राज्यों में मतदाताओं ने कांग्रेस को ठुकरा दिया तो उसका संदेश साफ है। कांग्रेस वैचारिक एवं राजनीतिक नेतृत्व देने में आज सक्षम नहीं है। इसलिए वह आम जन की कल्पनाशीलता को प्रेरित करने में विफल है। विचारशून्यता के कारण वह दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक और अभिजात्यवादी आक्रमणों के आगे न सिर्फ लाचार नजर आई है, बल्कि कई बार उनसे समझौते करती दिखी है। दिल्ली में टेक्नोक्रेट-उच्च पेशेवर एवं उच्च मध्यवर्गीय लोगों की एक नई पार्टी की सफलता के बाद उन्हीं के जैसा कोई नेता ढूंढने की कोशिश (अगर ऐसी है तो) ऐसा ही एक और समझौता होगा, जो पार्टी की प्रासंगिकता को अधिक संदिग्ध बनाएगा। कांग्रेस को खुद से यह पूछना चाहिए कि अगर उसकी कोई विशिष्ट पहचान और प्रासंगिकता नहीं है तो लोग उसे क्यों समर्थन देंगे?

कांग्रेस नेताओं की आज अग्निपरीक्षा है। अगर उन्होंने स्थिति को समझने की अंतर्दृष्टि नहीं दिखाई तो उपयुक्त समाधान नहीं ढूंढना संभव नहीं होगा। उसके सामने अपना पुनर्आविष्कार करने की चुनौती है। यह विशुद्ध राजनीतिक प्रयास से ही संभव है। 2004 में सत्ता में लौटने के बाद कांग्रेस ने एनजीओ कार्यकर्ताओं को राजकाज और राजनीति में प्रतिष्ठित कर अपनी आम आदमी समर्थक छवि बनाने की जो कोशिश की, उसकी सीमाएं अब स्पष्ट हो चुकी हैं। तब कांग्रेस एक हद तक इसलिए सफल रही क्योंकि राजनीतिक तौर पर उसे ऐसी शक्तियों का समर्थन था जो सामाजिक न्याय एवं वामपंथी नीतियों की नुमाइंदगी करती थीं। 2009 के बाद यह सूरत बदल गई। अगर इस परिप्रेक्ष्य को पार्टी ऐतिहासिक संदर्भ में देख सकती है तो वह अभी भी अपना उद्धार कर सकती है। मुद्दा किसी एक चुनाव में जीत-हार का नहीं है। सवाल ऐसी ताकत के बने रहने का है, जो आधुनिक राष्ट्रवाद के मूल्यों की वाहक रहे। समाजवादी, तर्कवादी, सवर्ण संस्कृति विरोधी एवं क्षेत्रीय स्वायत्तता समर्थक पृष्ठभूमि से निकली पार्टियां ऐसा राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित कर पाई होतीं तो कांग्रेस को उसके हाल पर छोड़ कर हम आश्वस्त रह सकते थे। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसा नहीं हुआ। इसीलिए कांग्रेस के हाल पर हम सबका काफी कुछ दांव पर लगा है।
सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं. 
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.