कपास में लिपटी आत्महत्याएं : तेलंगाना डायरी

विनय सुल्तान
-विनय सुल्तान

"...मैं अच्छा किस्सागो नहीं हूँ और जो पाँच घटनाएँ मैं आपको बताने जा रहा हूँ वो भी कोई कहानी नहीं है। ये ऐसी त्रासदियों की ऐसी जंजीर है जिसमें एक-दूसरी से बड़ी त्रासदी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। साथ ही ये हमारे पैंसठ साला लोकतन्त्र में किसानों के बदतर हालात का लिटमस परीक्षण भी है।..."

मैं महबूबनगर गया था तेलंगाना के मसले पर लोगों का मिज़ाज जानने। हैदराबाद से रवाना होते वक़्त मुझे इस बात रत्ती भर भी इल्म नहीं था कि मैं इस लोकतंत्र कि सबसे भयावह त्रासदियों से रूबरू होने जा रहा हूँ।

इस देश में नकदी फ़सल उगाना बहुत महंगा सौदा है। इतना महंगा कि कई बार जान के रूप में किमत वसूल करता है। कपास भारत में सबसे ज्यादा बोई जाने वाली नकदी फसल है। ये फसल हर साल जितने लोगों की मौत का कारण बनती है उनकी संख्या फासीवाद के गुजरात तांडव में मारे गए लोगों से चार गुनी है। 1995 से 2012 तक इस देश में 2,84,694 किसानों ने अत्महत्या की। इसमें से 68 फीसदी आत्महत्या कपास उगाने वाले क्षेत्रो में हुई।  

कपास पैदा करने वाले क्षेत्रो में बड़े पैमाने पर हो रही आत्महत्या के कारण बहुत साफ हैं। जहां परंपरागत फसलों जैसे मक्का या ज्वार उगाने का खर्च आठ से दस हजार है वहीं कपास की लागत चालीस से पचास हजार है। जाहिर सी बात है किसान इसके लिए कर्ज लेता है। तेलंगाना में सरकारी बैंक से कर्ज महज 18 फीसदी किसानों के लिए मयस्सर है। 82 फीसदी किसान कर्जे के लिए महाजनी व्यवस्था पर निर्भर हैं। यहाँ ब्याज की दर 36 फीसदी है। ये दर आपके कर लोन, होम लोन या इस किसी भी किस्म के लोन से तीन से पाँच गुना ज्यादा है। महाजनी कर व्यवस्था का सबसे काला पहलू है सूद न चुकाने की स्थिति में सूद मूल में जुड़ना जाता है और उस पर सूद शुरू हो जाता है। फसल को बोने से समय जो कर्जा लिया जाता है फसल कटते-कटते वो डेढ़ से दो गुना तक बढ़ जाता है। ब्याज मुक्त ऋण का आवंटन यहाँ 15.24 फीसदी है। जबकि 40 फीसदी कृषि योग्य भूमि इस क्षेत्र में आती है।

गोदावरी कृष्णा और तुंगभद्रा जैसी नदियों का तीन चौथाई बहाव क्षेत्र तेलंगाना में है, लेकिन महज चार फीसदी जमीन को ही नहरों का पानी सिंचाई के लिए मिल पता है। महबूबनगर, खम्मम और रंगारेड्डी मे कृष्णा और तुंगभद्रा का बहाव क्षेत्र है। ये जिले पिछले चार साल से सूखे से त्रस्त थे। नागार्जुन सागर बांध नालगोंडा जिले में बना हुआ है। इसके द्वारा कुल 25 लाख एकड़ जमीन के लिए सिंचाई की व्यवस्था की गई। चौंकने वाला तथ्य यह है कि इसके जरिये सीमान्ध्र की 20 लाख एकड़ और तेलंगाना की महज 5 लाख एकड़ जमीन सींची जा रही है। इसी तरह जिस श्रीसैलम परियोजना के कारण तेलंगाना कुर्नूल जिले के 67 गाँव के एक लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा था उसकी एक बूंद भी तेलंगाना को नहीं मिलती। हालांकि तेलगु गंगा के नाम पर इसका एक हिस्सा चेन्नई की पेयजल आपूर्ति के लिए दिया जाता है. जिस सुपर साइक्लोन का त्रासदी उत्सव मानाने के लिए लिए हमारा हिंदी मिडिया बड़े पैमाने पर आंध्र और तमिलनाडु पहुंचा था उसकी असल त्रासदी का सिलसिला अब चालू हुआ है। लेकिन बड़ी त्रासदी ये भी है कि इसको कवर करने के लिए वहाँ अब कोई ओबी वेन नहीं है। इस सुपर साइक्लोन की वजह से खड़ी फसल बर्बाद हो गई। किसानों की आत्महत्या यहाँ कोई नयी बात नहीं है पर इस तबाही ने इनकी दर को तेज कर दिया है।  

मैं अच्छा किस्सागो नहीं हूँ और जो पाँच घटनाएँ मैं आपको बताने जा रहा हूँ वो भी कोई कहानी नहीं है। ये ऐसी त्रासदियों की ऐसी जंजीर है जिसमें एक-दूसरी से बड़ी त्रासदी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। साथ ही ये हमारे पैंसठ साला लोकतन्त्र में किसानों के बदतर हालात का लिटमस परीक्षण भी है।

1॰ अब बारी है जमीन की हत्या किए जाने की.....

महबूबनगर के बीजनापल्ली मण्डल का गाँव नंदी वड्डेमान। इस सफर मे मेरे साथ थे 'आंध्रा ज्योति' के पत्रकार महेश और उनके साथी महबूब खान। ये हमारे लिए अनुवादक, दोस्त गाइड और मेजबान की भूमिका एक साथ निभा रहे थे। नंदी वड्डेमान मे पिछले एक महीने मे दो किसान आत्महत्या की हैं। गाँव की सरपंच पी॰ ज्योति के अनुसार पिछले पाँच साल मे दस हजार की आबादी वाला ये गाँव 80 से ज्यादा आत्महत्याओं का गवाह बन चुका है।

सबसे पहले हम जी॰ अंजनैलू के घर पहुंचे। अंजनैलू सागर समुदाय के सदस्य थे जो की पिछड़े वर्ग मे आती है। अंजानैलू के पास चार एकड़ जमीन थी और इतनी ही जमीन उन्होने बटाई पर ली थी। छ बच्चियों के पिता अंजनैलू के ऊपर चार लाख का कर्जा था। लेकिन खेत की लहलहाती फसल अंजनैलू के हौसले के लिए रीढ़ की हड्डी का कम करती थी।

चार साल के अकाल के बाद धरती ने छाती फाड़ कर कुछ उगाया था। लेकिन बे मौसम की बरसात के कारण अंजनैलू के खेत तालाब बन गए। फसलों के साथ-साथ वो हौसला भी डूब मारा जिसने अंजनैलू को कर्ज के पहाड़ के सामने ज़िंदादिली से खड़ा कर रखा था। पिछले सितम्बर की 27वी तारीख को अंजनैलू ने फांसी पर लटक कर जान दे दी। 

आज अंजनैलू की बीवी इन्दिरा आवास योजना की सहायता से बने एक कमरे के लगभग घर जैसे ढांचे मे अपनी छ बेटियों के साथ एक ऐसी लड़ाई लड़ रही है जिसका नतीजा पहले से तय है। उनकी सबसे बड़ी बारह वर्षीय बेटी जयम्मा खेत मे मजदूरी करती है। उनकी दो बेटियाँ कंधों कर यूरिया खाद के कट्टो से बने स्कूल बैग लटकाए ऐसी नौकरी के लिए पढ़ रही हैं जो शायद ही उन्हे कभी मिल सके।

नंदी वड्डेमान का ये परिवार पहले अपने मुखिया को खो चुका है। अब इस परिवार की जमीन पर हत्यारे साये मंडरा रहे हैं। कर्जदाता अंजनैलू की पत्नी विजयम्मा पर जमीन बेच कर कर्जा उतारने के लिए दबाव बना रहे हैं। छोटी जोत वाले किसान किस प्रक्रिया के जरिये खेत मजदूर बनते आ रहे हैं इसे समझना कोई मुश्किल पहेली नहीं है।

2॰ ये किताबे तुम्हारी दोस्त नहीं रही.....

नंदी वड्डेमान मे जी॰ अंजनैलू के पड़ौसी वी॰ मलेश घर की की कहानी और अधिक त्रासदीपूर्ण है। मलेश एक भूमिहीन किसान थे। वो बटाई पर खेती किया करते थे। उन्होने पाँच एकड़ जमीन बटाई पर ली थी। पिछड़े सागर समुदाय के मलेश ने एक बेहतर कल की उम्मीद मे कपास बोया। इस बेहतर कल को और बेहतर बनाने के लिए खाद और कीटनाशको की जरूरत हुई। मलेश ने बेहतर कल के लिए आज से कुछ कर्ज लिया। बे-मौसम बरसात ने मलेश के बेहतर कल पर पानी फेर दिया। वो आज से लिए दो लाख के कर्ज के साथ इस दुनिया से चले गए। पिछली 6 अक्तूबर को मलेश ने कर्जे की वजह से फांसी पर लटक कर अपनी जान दे दी ऐसा पुलिस के दस्तावेज़ मे लिखा हुआ है।
     
मलेश अपनी 40 साल की जिंदगी मे ऐसा कोई ढांचा खड़ा करने में कामयाब नहीं हो पाये जिसे घर कहा जा सके। ना ही 510,072,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले इस ग्रह पृथ्वी पर ऐसी एक इंच जमीन है जिसे मलेश का परिवार अपना कह सके। आज उनकी पत्नी वी॰ अनीता अपनी दो बच्चियों के साथ एक कमरे वाले किराए के मकान मे रह रही हैं। इसके लिए वो हर महीने 500 रुपये अदा करती हैं। उनकी दोनों बिटिया रानी फिलहाल पढ़ रही हैं। उन्हे इस बात का थोड़ा भी गुमान नहीं है कि परिस्थियों के निर्मम हाथा उनकी किताबे छीन लेने वाले हैं। कितबे जो दुनिया मे इंसान कि सबसे अच्छी दोस्त काही जाती है, अब उनकी दोस्त नहीं रही हैं। 
    
जब मैंने अनीता से कर्ज के बाबत पूछा तो उनका जवाब था सरकार ने अगर सहायता नहीं की मेरे और मेरे बच्चों के पास जहर खाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। वो मेरी तरफ लगातार उम्मीद भरी नज़रों से ताक रही थी। उनकी आँखों मे विधान सभा के प्रतिबिम्ब को बनते-बिगड़ते देखा जा सकता था। 
    
नंदी वड्डेमान से वापस लौटते हुए हम रास्ते में मक्के की बर्बाद हुई फसल का के फोटोग्राफ लेने के लिए रुके। जैसे ही मेरे साथी पत्रकार फोटो ले कर खेत से लौटने लगे एक महिला उनके कदमों में लोट गई। इस महिला कि उम्र हमसे दो-गुनी रही होगी। इस अनुभव ने मेरे सामने दो बातों को बहुत साफ तरीके से रखा । पहली, दिल्ली आज भी गाँव के गरीब-गुरबा लोगों के लिए एक जादुई शब्द है। दूसरी, पैंसठ साल का लोकतन्त्र अपने लोगो को इस बात का एहसास दिलाने मे पूरी तरह से नकायब रहा है कि उनके पास इज्जत से जिंदगी जीने का हक़ है।( वैसे ये मुश्किल काम है भी, क्यो की उनके पास ऐसा कोई हक़ दर-असल है भी नहीं ) 

3. गणेश अब बॉय बन गया है....

महबूब नगर का जड्चर्ला मण्डल। यहाँ हमारी यात्राओं के के हमराह थे उदयमित्रा। उदयमित्रा साहब स्थानीय डिग्री कॉलेज मे अग्रेजी के प्राध्यापक रहे हैं। वो तेलगु मे कहानियाँ भी लिखते हैं। मैं उदयमित्रा साहब और उनका स्कूटर सबसे पहले गंगापुर गाँव कि तरफ निकल पड़े। ये गाँव स्थानीय मेले के लिए मशहूर है। 

गंगापुर के सी॰ कृष्णय्या मुद्दीराज समाज के सदस्य थे जो की पिछड़ी जाती मे आता है। कृष्णय्या के पास चार एकड़ जमीन थी। तीन लड़की और एक एक लड़के के पिता कृष्णय्या की सबसे बड़ी बेटी सयानी हो चुकी थी। अपनी चार एकड़ और बटाई की पाँच एकड़ जमीन के भरोसे कृष्णय्या ने अपनी बेटी के हाथ पीले कर दिये। दहेज भारतीय समाज की क्रूर सच्चाई है। कृष्णय्या ने कर्ज ले कर बेटी को दहेज दिया। कृष्णय्या को उम्मीद थी कि नौ एकड़ पर जब कपास कि फसल लहलहाएगी तो उनका सारा कर्ज रुई कि तरह उड़ जाएगा। पर बे-मौसम कि बरसात ने छ लाख के कर्ज को भीगी रुई कि मानिंद भारी बना दिया। 

कृष्णय्या ने अपनी की आखरी शाम के लिए वो जगह चुनी जो उनकी जिंदगी कि एक मात्र उम्मीद था, यानी उनके खेत। दस अक्तूबर कि शाम कृष्णय्या ने अपने जीवन के अपने खेतों को आखिरी अलविदा कहा और जहर पी कर हमेशा के लिए सो गए।
  
हम जब कृष्णय्या के घर घर पहुंचे उस समय उनकी पत्नी याद्दाम्मा दूसरों के खेत मे मजदूरी करने गई हुई थीं। उनकी चार एकड़ जमीन आज बटाई पर चढ़ चुकी है। कृष्णय्या का पंद्रह वर्षीय मेट्रिक पास बेटा जड्चर्ला मे एक निजी दफ्तर मे 3000 के वेतन पर चपड़ासी का काम करता है। वहाँ साब लोग उसे गणेश नहीं बॉय कह कर बुलाते हैं। 

4. हम सपने भी नहीं देख सकते.....

महबूबनगर के जड्चर्ला मण्डल का कोडगल गाँव। गंगापुर से कोडगल की दूरी महज 6 किलोमीटर थी। शाम के 4 बज रहे थे। गंगापुर से कोडगल की मेरी छोटी सी यात्रा कोडगल के सरकारी स्कूल के सामने जा कर ठिठक गई। ये समय स्कूल की छुट्टी का था। बच्चे बेतहाशा दौड़ रहे थे। चरो तरफ चिल्ल-पों मची हुई थी। हालाँ की मेरे पास इस बात के लिए कोई सरकारी तथ्य तो मौजूद नहीं है पर लगभग चालीस फीसदी बच्चे नंगे पाँव थे। स्कूल के बाहर एक लड़के और लड़की का चित्र बना हुआ था जो की पेंसिल पर बैठे हुए थे। इस चित्र पर लिखी इबादत तेलगु मे लिखे होने के बावजूद मुझे समझने मे कोई कठिनाई हुई कि ये दीवार सर्वशिक्षा अभियान के मूर्खतापूर्ण दावों से रंगी हुई है।

कोडगल के के॰ नरसिंहलू 40 वर्षीय किसान थे। उनके परिवार मे उनके बूढ़े पिता नगय्या(85), पत्नी भीमम्मा(36) और बेटा श्रीलू(13) और बिटिया स्वाति(15) हैं। नरसिंहलू के पास पहले चार एकड़ जमीन थी। उसमे से दो एकड़ बेंच कर इन्दिरा आवास योजना से मिली तीस हजार की सहायता के द्वारा डेढ़ लाख की लागत वाला दो कमरो का घर तैयार किया। अपने पास बची दो एकड़ जमीन और इतनी ही जमीन बटाई पर ले कर नरसिंहलू ने कपास और तरबूज बोये। घर बनाए और और फसल बोने के लिए गया कुल कर्ज लगभग दो लाख था। 

नरसिंहलू के पिता बूढ़े पिता नगय्या के जीवन की ये क्रूर त्रासदी है की उनका एक बेटा फेंफड़े की बीमारी कारण मर गया और दूसरा तरबूज की बीमारी के कारण। इस 25 अक्तूबत को नरसिंहलू को आत्महत्या किए हुए एक साल बीत चुका है। उनकी दो एकड़ जमीन पाँच हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से बटाई पर चढ़ चुकी है। उनकी पत्नी भीमम्मा के पास न तो खेत जोतने की ताकत बची है और न ही खाद-बीज के लिए पैसा। ऊपर से रोज-रोज होने वाला तकाजा मूल के साथ हर दिन जिल्लत को भी बढ़ा रहा है। 
 
नरसिंहलू की पंद्रह वर्षीय बिटिया इस साल 12वी मे आ गई है। मैंने उससे पूछा की वो बड़ी हो कर बनना चाहती है? उसका जवाब था कि कोई भी छोटी-मोटी नौकरी कर के माँ की मदद करना चाहती हूँ। मैंने जब उससे पूछा कि क्या उसके पास डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर या कलेक्टर बनने जैसा कोई सपना नहीं हैं। तो उसने बड़े ही सपाट स्वर मे कहा हम ऐसे सपने भी नहीं देख सकते। अपनी लाख कोशिशों और सभ्यता के तमाम तकाजों के बावजूद वो अपना गुस्सा छुपा नहीं पा रही थी ।

5.स्वयं सहायता समूह उसकी सहायता नहीं कर सका......  

जड्चर्ला मण्डल का गाँव लिंगमपेट। इस गाँव के तीन महीने मे 8 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इनमे से तीन महिलाएं हैं। पिछली तीन आत्महत्या 10 दिन के भीतर हुई थी। ये मेरे सफर का आखरी पड़ाव था। इसके बाद मुझे फिर दिल्ली लौट जाना था।
 
ढलती शाम को कंधे पर लटकाए हम वैंकटय्या के घर पहुंचे। वेंकटय्या मुदिका समुदाय के सदस्य है जो की अनुसूचित जाती मे आता है। उनकी पत्नी वेंकटम्मा ने 15 अक्तूबर को आत्महत्या कर ली। ये गाँव मे दस दिन के भीतर होने वाली तीसरी आत्महत्या थी।
    
वेंकटय्या के पास कुल जमा एक एकड़ जमीन है। जिस पर उन्होने मक्का बोया। बुवाई के दो दिन बाद ही तेज बारिश के चलते किए-कराये पर पानी फिर गया। वेंकटय्या के पास फिर से बुवाई करने के अलावा और कोई चारा नहीं रह गया था। उसके पास अब बुवाई लिए पैसे नहीं थे।
    
वेंकटम्मा गाँव मे स्वयं सहायता समूह चलाती थी। संकट मे फंसे पति की मदद के लिए उन्होने स्वयं सहायता समूह के खाते से किसी को बिना बताए चालीस हजार रुपये अपने पति को दे दिये। वेंकटम्मा ने सोचा था कि फसल कटने के बाद वो सारे पैसे वापस जमा करावा देंगी। वैसी भी अगर खेती ही नहीं रही तो वो खाएँगी क्या?
   
वेंकटम्मा को क्या पता था कि ये बारिश उनका इतनी जल्दी पीछा नहीं छोड़ने वाली। पहले बारिश ने बीजों को तबाह किया और दूसरी दफा खड़ी फसलों को तबाह किया। अपनी साथिनों द्वारा लगाए जा गबन और विश्वासघात के आरोप वेंकटम्मा कि जिंदगी को नरक बनाने के लिए काफी थे।

15 अक्तूबर कि शाम वेंकटम्मा ने जिस मट्टी और घास-फूस की संरचना को को इतने जतन से एक मुक्कमल घर की शक्ल दी थी, उसी घर के पिछवाड़े मे वो फांसी पर लटक कर मर गई। वेंकटम्मा के सात साल के बेटे अंजनैलू इस बात को शायद ही ठीक-ठीक समझ पा रहा है। कैमरे के सामने आते ही वो बरबस मुस्कुरा देता है। मेरे पास इस रिपोर्ट मे चस्पा करने के लिए वेंकटय्या के बयान कि जगह उनकी आँखों से गिरते आँसू है जो कि हमारे वापस लौटने के वक़्त तक बह रहे थे। मैं आज भी दावे के साथ नहीं कह सकता कि वेंकटय्या बोल सकते हैं।
     
हम जैसे ही वेंकटय्या के घर से निकलने को हुए वेंकट्य्या के पिता मेरे बहुत करीब आ कर तेलगु मे कुछ बोलने लगे। मैं कुछ समझ पता इससे पहले मेरे गाइड उदयमित्रा ने कुछ पैसे उनके हाथ मे रख दिये। लौटते-लौटते अंधेरा हो चुका था। सड़क किनारे एक आदमी धुत्त नशे मे बड़बड़ा रहा था। हम जड़चेर्ला के लिए सवारी टेम्पो मे सवार हुए। टैंपो का इंजन स्थायी भाव से भड़भड़ा रहा था। लेकिन इससे भी ज्यादा एक एक सवाल दिमाग को भड़भड़ा रहा था। इसे किसानो की आत्महत्या कहा जाए जैसा की पुलिस के दस्तावेजो मे दर्ज है या फिर हमारी राजनैतिक व्यवस्था द्वारा सुनियोजित तरीके से किया जा रहा नरसंहार। खैर आप इसे जो भी कहें ये इन परिवारों के नारकिय जीवन मे कोई खास फर्क नहीं पैदा करेगा।

विनय  स्वतंत्र पत्रकार हैं. 'पत्रकार praxis' से सक्रिय रूप में जुड़े हैं.
इनसे vinaysultan88@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.