यह सवाल बस समलैंगिकता का नहीं...

अतुल आनंद

-अतुल आनंद

"...समलैंगिकों के प्रति की जाने वाली नफ़रत, नस्लीय और अपने से अलग वर्ग, रंग, जाति, राष्ट्रीयता इत्यादि रखने वाले समुदायों के प्रति की जाने वाली नफ़रत से अलग नहीं है। विषमलिंगी होना ‘सामान्य’ कहलाता है और समलैंगिकता ‘बीमारी’ बन जाती है। ये भेदभाव गोर-काले, सवर्ण-दलित, अमीर-गरीब जैसा भेदभाव ही है। समलैंगिकता पर चल रही बहस को सिर्फ यौन विषय और यौन सहचर को चुनने की आजादी के सवाल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस बहस की बहुत सी परतें हैं जिन पर बात करने की जरुरत है।..."


पके समाज की अवधारणा में जो ‘सामान्य’ नहीं हैं, वे वर्जित हैं। उन्हें आप अपने समाज का हिस्सा बनने नहीं दे सकते। समलैंगिकता के खिलाफ सर्वोच्च न्यायलय का फैसला समाज के प्रभावशाली वर्ग के उस पूर्वाग्रह को दिखाता है जो अपने से अलग यौन रूचि रखने वाले वर्ग को बर्दाश्त नहीं कर पाता। इन दिनों एक मजाक चल पड़ा है कि अगर समलैंगिक संबंध बनाना अप्राकृतिक है तो सर्वोच्च न्यायालय कौन सी प्राकृतिक चीज है! देखा जाए तो परिवार नियोजन के सभी तरीके अप्राकृतिक है, तो क्या उन पर भी प्रतिबन्ध लगाए जाएँगे?

सर्वोच्च न्यायालय समलैंगिकों के मानवीय अधिकारों के प्रति कितना संवेदनशील है वह उसके आदेश से पता चलता है। न्यायमूर्ति संघवी और मुखोपाध्याय की बेंच ने अपने आदेश के पैरा 52 में समलैंगिकों और यौन अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए ‘तथाकथित’ शब्द का इस्तेमाल किया है। भारतीय दण्ड विधान (भादवि) की धारा 377 स्त्री-पुरुष के बीच जननांगीय यौन संबंध के अलावा और सभी यौन क्रियाओं को अप्राकृतिक और अपराधिक घोषित करती है। धारा 377 हमारे भारतीय संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है। यह समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14), भेदभाव के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 15), सम्मानपूर्वक जीने और गोपनीयता का अधिकार (अनुच्छेद 21) आदि मौलिक अधिकारों का हनन करती है। अदालतों की यह असंवेदनशीलता समाज के कमजोर और वंचित तबकों के मुद्दों पर फैसले सुनाने वक्त भी देखने को मिलती है।

समलैंगिकों के प्रति की जाने वाली नफ़रत, नस्लीय और अपने से अलग वर्ग, रंग, जाति, राष्ट्रीयता इत्यादि रखने वाले समुदायों के प्रति की जाने वाली नफ़रत से अलग नहीं है। विषमलिंगी होना ‘सामान्य’ कहलाता है और समलैंगिकता ‘बीमारी’ बन जाती है। ये भेदभाव गोर-काले, सवर्ण-दलित, अमीर-गरीब जैसा भेदभाव ही है। समलैंगिकता पर चल रही बहस को सिर्फ यौन विषय और यौन सहचर को चुनने की आजादी के सवाल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस बहस की बहुत सी परतें हैं जिन पर बात करने की जरुरत है।

समलैंगिकता के मुद्दे को लेकर पिछले दिनों देश और मीडिया में जिस तरह की बहसें होती रही हैं, उसमें से एक प्रमुख बहस समलैंगिकता और हिन्दू संस्कृति में इसकी स्वीकार्यता को लेकर है। एक तरफ बाबा रामदेव समलैंगिकता को बीमारी घोषित कर चुके है वहीं दूसरी तरफ श्री श्री रविशंकर इस मुद्दे को लेकर अधिक सहिष्णु नज़र आ रहे है। राजनितिक दलों का समलैंगिकता को लेकर जो विचार हैं उन्हें जानना भी जरुरी होगा। भाजपा को छोड़कर दूसरे लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल समलैंगिकों के साथ हैं। समलैंगिकता के मुद्दे पर प्रगतिशील पत्रकारों और बुद्धिजीवियों के जो लेख आए हैं वे खजुराहो से लेकर हिन्दू धर्म ग्रंथों में समलैंगिक पात्रों का उदहारण देते हुए समलैंगिकता को प्राचीन काल से ही ‘भारतीय’ संस्कृति में स्वीकार्य होने का दावा कर रहे हैं। वैसे भारतीयता, भारतीय संस्कृति आदि शब्दों की परिभाषा को लेकर विवाद है कि यह कथित भारतीयता सिर्फ हिन्दू संस्कृति का ही प्रतिनिधित्व करती है। अपूर्वानंद जनसत्ता में 15 दिसंबर को छपे अपने लेख ‘अप्रासंगिक : वैध अवैध’ में इस समस्या की ओर ईशारा करते है। अपूर्वानंद अपने इस लेख में कहते है,
“...समलैंगिक यौन आकर्षण को भारतीय बताने के लिए जो उदाहरण खोजे जा रहे हैंवे सब उस संसार के हैंजिन्हें हम ढीले-ढाले ढंग से हिंदू ही कहेंगे। लेकिन भारतीय और हिंदू तो समानार्थक नहीं।” 
हालांकि अपूर्वानंद खुद उस ढीले-ढाले परिभाषा से भ्रमित लगते है और भारतीय और हिन्दू को अपने लेख में समानार्थी की तरह इस्तेमाल करते है। वह इस लेख में आगे कहते है, “नारीवाद भारतीय परंपरा से समर्थित नहीं और न दलित अधिकार का आंदोलन और न श्रमिकों का अधिकारन सामान्य जन की स्वतंत्रता।” अपूर्वानंद यहाँ जिस ‘भारतीय’ परंपरा की बात कर रहे है वह असल में हिन्दू परंपरा है। इस ‘भारतीय’ परंपरा में आदिवासी परंपरा और देश की दूसरी परंपराओं के लिए जगह नहीं है। जनसत्ता में ही 13 दिसंबर को छपे लेख ‘संबंधों की सामाजिक बुनावट’ में प्रकाश के रे एक तरफ तो ‘मनुस्मृति’ और ‘नारद स्मृति’ के समलैंगिकता विरोधी होने की बात कहते हैं वहीं दूसरी तरफ कई दूसरे हिन्दू धर्म ग्रंथों में समलैंगिको की उपस्थति को समाज के उनके प्रति ‘सहिष्णु’ होने का प्रमाण मानते है। हिन्दू धर्म ग्रंथों के इस विरोधाभास पर वह यह तर्क देते है कि समलैंगिक विरोधी धर्म ग्रन्थ समाज में अधिक प्रचलित नहीं थे। हालांकि प्रकाश के रे जिन समलैंगिक समर्थक हिन्दू धर्म ग्रंथों और उनके समलैंगिक पात्रों के उदहारण देते हैं, उन ग्रंथों के अनुसार समलैंगिक/किन्नर पात्रों को बहुत सम्मान की नज़र से नहीं देखा जाता था। ऋषि-मुनि किन्नर और समलैंगिक हो जाने के ‘श्राप’ देते थे। इन ‘भारतीय’ बुद्धजीवियों की समस्या यह है कि हिन्दू संस्कृति से उदहारण देते वक्त वह इसके जटिल और विरोधाभासी समीकरणों के उद्देश्य को समझने की कोशिश नहीं करते। उनके इस समस्या पर व्यालोक ने अपने लेख ‘आप वामपंथी हैंतो समलैंगिक तो होंगे ही...!’ में चुटकी ली है:
“...ज़रा प्रकाश समेत तमाम वामपंथी बताएं कि वह सुविधा की कौन सी आड़ हैजिसके तहत तनिक भी मौका मिलते ही आप पुराण-रामायण-महाभारत को कालबाह्यगैर-ऐतिहासिक और अप्रासंगिक बताते हैंवहीं दूसरी ओर अपनी बात सिद्ध करने के लिए उनकी ही दुहाई देते हैं...”
हालांकि व्यालोक का यह लेख अपने शीर्षक में ही दुराग्रही है। जैसे नारीवादी आंदोलन का समर्थन करने वाले का नारी होना जरुरी नहीं है वैसे ही समलैंगिक आंदोलन का समर्थन करने वाले वामपंथियों का समलैंगिक होना जरूरी नहीं है। इस लेख में व्यालोक ने अधपके तथ्यों और तर्कों के सहारे हिन्दू दक्षिणपंथ और पितृसत्ता के गढ़ की हिफाजत करने की कोशिश की है। व्यालोक का यह सवाल हास्यास्पद है कि क्या वामपंथी होने के लिए घोषित तौर पर समलैंगिकता का समर्थन करना ज़रूरी है?व्यालोक शायद भूल गए है कि समानता  वामपंथ का मूल सिद्धांत है और भादवि की धारा 377 यौन अल्पसंख्यकों के समानता के अधिकार के खिलाफ है।

संघ परिवार, दक्षिणपंथी संगठन और दूसरे धार्मिक संगठन (चर्च, मुस्लिम संगठन, आदि), ये सभी समलैंगिकता के मुद्दे पर एकमत हो इसका विरोध कर रहे हैं। दक्षिणपंथी संगठनों के लिए तो यौनिकता पर चर्चा करना ही ‘भारतीय’ संस्कृति के खिलाफ है। यहाँ गौर करने वाली बात है कि जो लोग नारीवाद के खिलाफ हैं, वे ही लोग समलैंगिकता का भी विरोध कर रहे हैं। दरअसल पितृसत्ता को समलैंगिकता से खतरा है और सभी धर्म मुख्यतः पितृसत्तात्मक हैं। धर्म-संस्कृति के ‘रक्षक’ यह कभी नहीं चाहेंगे कि यौन विषयों पर लोग अपने मनमुताबिक फैसलें करे। गीताप्रेस, गोरखपुर की किताबें यह उपदेश देती है कि कैसे यौन संबंध की उपयोगिता केवल बच्चे पैदा करने तक ही सीमित है, इसका उपयोग आनंद पाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। दिलचस्प बात है कि जो मुस्लिम धार्मिक संगठन आज भारत में समलैंगिकता का विरोध कर रहे हैं वे शायद इस बात से अनजान हैं कि कैसे इजराइल, अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों में समलैंगिकता को मुस्लिमों के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इजराइल ने ‘गे प्रोपगंडा वार’ का इस्तेमाल समलैंगिकों को फलिस्तीनी मुस्लिमों के खिलाफ भड़काने के लिए किया जहाँ समलैंगिकों को सरकार की तरफ से विभिन्न तरह की रियायतें दी गयी और इस्लाम के समलैंगिकता विरोधी होने का जमकर प्रचार किया गया। यह एक पीड़ित वर्ग को दूसरे पीड़ित वर्ग के खिलाफ भड़काने का अभियान है। इसी साल अमेरिका में समलैंगिकों के एक कार्यक्रम में कुरान को समलैंगिक विरोधी बता कर जलाया गया था। इस घटना पर एक अमेरिकी पत्रकार की टिपण्णी थी कि समलैंगिकता विरोधी तो बाइबिल भी है लेकिन अमेरिका में बाइबिल को जलाने की हिम्मत कोई नहीं कर सकता। बहुत संभव है कि जो हिन्दू दक्षिणपंथी आज हमारे देश में समलैंगिकता का विरोध कर रहे हैं, वे भविष्य में समलैंगिकों के ‘हितचिन्तक’ बन जाए और उन्हें मुस्लिमों के खिलाफ भड़काएँ। आखिर इजराइल इनका आदर्श रहा है और ‘भारतीय’ या फिर हिन्दू संस्कृति भी ऐसे विरोधाभासों से भरी है जो जरुरत के हिसाब से समलैंगिकों के पक्ष और विपक्ष में जा सकती है। बुद्धिजीवी तारिक रमदान समलैंगिकता के मुद्दे पर कहते है कि समलैंगिकता पर इस्लाम में भले ही पाबंदी है लेकिन एक मुस्लिम को समलैंगिक होने की वजह से नैतिकता के नियमों का हवाला देकर इस्लाम से निकाला नहीं जा सकता। लगभग सभी धर्मों का प्रगतिशील और बुद्धिजीवी वर्ग समलैंगिकता के पक्ष में अपनी आवाज उठा रहा है।

पिछले डेढ़ सौ सालों में सिर्फ 6 मौकों पर ही भादवि की धारा 377 के अंतर्गत मामला दर्ज हुआ है और सजा भी हुई तो बस एक मामले में। हालांकि इस कानून का विरोध इसलिए करना जरुरी है ताकि इस कानून के दुरुपयोग को रोका जा सके और समलैंगिक आत्मसम्मान के साथ जी सके। लेकिन इसके साथ ही हमें समाज के उन वर्गों की लड़ाई के बारे में भी बात करने की जरुरत है जिन्हें सताने के लिए धारा 377 जैसे किसी कानून की जरुरत नहीं पड़ती। पुलिस हिरासत में दलित और आदिवासी महिलाओं के साथ किए जाने वाले बलात्कार के लिए किसी कानून का सहारा नहीं लेना पड़ता। किसी बम धमाके के बाद धर्म के आधार पर की जाने वाली गिरफ्तारी के लिए भी कोई कानून नहीं है। इन वर्गों के अपराधीकरण के लिए किसी कानून की जरुरत नहीं पड़ती। आज जरुरत यह है कि समाज के ये सभी वर्ग अपने प्रति हो रहे भेदभाव और अपराधीकरण के खिलाफ एकजुट हो कर लड़ें।

अतुल, रांची से जनसंचार में स्नातक करने के बाद 
अभी टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS), मुंबई 
से मीडिया में स्नातकोत्तर कर रहे है.
इनसे संपर्क का पता है- thinker.atul@gmail.com