तेजपाल के बहाने...

अतुल आनंद

-अतुल आनंद

"...प्रभात खबर और तहलका जैसे प्रकाशनों ने अपने संघर्ष के शुरूआती दौर में वंचित तबकों के मुद्दों की पत्रकारिता कर अपना एक ब्रांड स्थापित किया. संघर्ष का दौर निवेश था, ब्रांड स्थापित हो जाने के बाद अब लाभ कमाने की बारी आती है. ये अब धर्मनिरपेक्षता और जन मुद्दों की भी इस तरह पैकेजिंग कर सकते हैं जिससे कॉर्पोरेट और उनके उपभोक्ता वर्ग को कोई एतराज़ ना हो और साथ में आप ‘जनपक्षधर’ भी कहलाए जाएँ. हमें भूलना नहीं चाहिए कि मीडिया एक व्यापार है, जिसका उद्देश्य अपने उत्पाद बेचना है..."


हलका पत्रिका के विरोधियों के लिए बीता हफ्ता काफी अच्छा रहा. अपने संस्थान में काम करने वाली एक युवा महिला पत्रकार पर यौन हमले की घटना के प्रकाश में आने के बाद तरुण तेजपाल और तहलका के भविष्य को लेकर चर्चा का बाज़ार गर्म है. एक तरफ़ जहाँ भाजपा के कई वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता अचानक ‘नारीवादी’ बनकर अपने खिलाफ हुए स्टिंग ऑपरेशनों का बदला तहलका और तरुण तेजपाल पर हमला कर ले रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ पत्रकार मधु त्रेहान ने तहलका को बंद करने की मांग करते हुए एक नयी बहस छेड़ दी. हालांकि इस बहस को चलाने वाले लोग, मीडियाकर्मी और संस्थान खुद कितने दूध के धुले हैं, वह एक अलग बहस का विषय है.

साभार-http://pbs.twimg.com



तहलका के समर्थन में उतरे लोग तहलका और तरुण तेजपाल को अलग कर देखने की मांग कर रहे हैं. तहलका के हिंदी संस्करण के पत्रकार यह यकीन दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि हिंदी का तहलका तरुण तेजपाल से आगे की चीज है और वे बिलकुल भी तेजपाल के समर्थन में नहीं खड़े हैं. यह बहुत हद तक शोमा चौधरी का पीड़िता को उसके इस्तीफे के बाद इस मामले में अपनी भूमिका पर सफ़ाई देने जैसा है. यह बात तो तय है कि तहलका प्रबंधन आगे भी तेजपाल के साथ खड़ा रहेगा. 



तहलका के बचाव में इसकी खोजी पत्रकारिता और भारतीय पत्रकारिता में दिए गए इसके योगदान की दुहाई दी जा रही है. मीडिया के इस भेड़ियाधसान में एक ऐसा मुद्दा है जिसपर बहुत कम चर्चा हो रही है. यह मुद्दा पत्रकारिता के मूल्यों का है. अरुंधती रॉय ने तेजपाल प्रकरण पर अपनी प्रतिक्रिया में इस मुद्दे की ओर संकेत किया था. तहलका अपने मूल्यों ‘स्वतंत्र-निष्पक्ष-निर्भीक’ की हत्या कब का कर चुका है. तहलका में यौन शोषण से जुड़े छिटपुट मामले पहले भी हुए हैं जिनमें कुछ शिकायतें तो तेजपाल के खिलाफ भी थीं. तहलका प्रबंधन ने कभी इन मामलों को गंभीरता से नहीं लिया. यौन शोषण के मामलों पर विशाखा दिशा-निर्देशों के अनुसार संस्थान में इन मामलों से निपटने के लिए एक समिति पहले से ही होनी चाहिए थी. तहलका, जहाँ महिलाओं के मुद्दों पर लिखा जाता रहा है, वहाँ इस तरह की समिति का ना होना आश्चर्य की बात है. अभी हाल के यौन दुष्कर्म मामले में तरुण तेजपाल का पीड़िता के प्रति रवैया हमारे मीडिया में गहरी पैठ बनाए पितृसत्ता को दर्शाता है.



तहलका का पतन तेजपाल प्रकरण होने के बहुत पहले से ही शुरू हो गया था. कॉर्पोरेट और खनन कंपनी तहलका के प्रमुख विज्ञापनदाता और साल 2011 से शुरू हुए इसके सालाना कार्यक्रम ‘थिंकफेस्ट’ के प्रायोजक रहे हैं. इस साझेदारी का असर तहलका के खबरों पर भी पड़ा. खनन और रियल स्टेट की कंपनियाँ तहलका को ‘अनुग्रहित’ करती रही हैं और बदले में तहलका भी उनका ‘ख़याल’ रखता रहा है. इसका एक अच्छा उदाहरण गोवा का है जब तहलका ने अपने रिपोर्टर की गोवा खनन घोटाले और खनन माफियाओं पर की गई रपट को दबा दिया था. तहलका पर यह आरोप गोवा में पर्यावरण के मुद्दों पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने लगाया था. बाद में उस रिपोर्टर की खबर को फर्स्टपोस्ट वेबसाईट ने छापा. बाद में तहलका ने अपने बचाव में कहा है कि वह खबर उसके ‘मापदंडों’ के अनुरूप नहीं थी. गोवा में होने वाले तहलका के ‘थिंकफेस्ट’ आयोजन में कॉर्पोरेट यूँ ही पैसे नहीं लुटाते. 



एंडरसन और मेयेर (1975) ने अपनी किताब ‘फंक्शनलिज्म एंड दी मास मीडिया’ में मीडिया प्रकार्यवाद के सिद्धांत की चर्चा की थी. इस सिद्धांत के अनुसार कोई भी मीडिया तभी तक जन मुद्दों को जोर-शोर से उठा सकती है जब तक कि उसके पाठकों का आधार सीमित हो. पाठकों के आधार में वृद्धि के साथ ही उस मीडिया की जन मुद्दों की पत्रकारिता की धार कुंद पड़ने लगती है. रांची से शुरू हुआ हिंदी दैनिक ‘प्रभात खबर’ इस सिद्धांत का अच्छा नमूना है. बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद नब्बे के दशक में जहाँ रांची में पढ़े जाने वाले हिंदी के दूसरे अखबार हिन्दू दक्षिणपंथियों के समर्थन में थे, वहीं प्रभात खबर शायद अकेला ऐसा अखबार था जिसने मीडिया के इस सांप्रदायिक धुव्रीकरण से किनारा किया. दूसरी ओर जहाँ हिंदी के अखबार आदिवासियों के मुद्दों को महत्व नहीं देते थे और पृथक् झारखण्ड राज्य के आंदोलन को विदेशी षड्यंत्र बताते थे, प्रभात खबर ने आदिवासी मुद्दों पर ख़बरें की और झारखण्ड आंदोलन का समर्थन किया. बहुचर्चित चारा घोटाले काण्ड के पर्दाफ़ाश में प्रभात खबर की प्रमुख भूमिका थी. समाज के वंचित तबकों के मुद्दों को प्रमुखता से जगह देने की वजह से ही प्रभात खबर काफी कम समय में झारखण्ड में लोकप्रिय हो पाया. लेकिन बाद के दिनों में पाठकों के आधार के बढ़ने के साथ ही प्रभात खबर की प्राथमिकताओं में भी बदलाव आया. दक्षिणपंथियों से अब पहले जैसा दुराव नहीं रहा और ना ही आदिवासी मुद्दों को लेकर पहले जैसा उत्साह. प्रभात खबर के झारखण्ड राज्य संपादक अनुज सिन्हा के शब्दों में कहे तो उनका अखबार अब ‘युवाओं’ पर ज्यादा ध्यान देता है और पहले की तरह ‘बेवजह’ किसी को परेशान नहीं किया जाता. 



इंटरनेट संस्करण से शुरुआत करने वाले तहलका ने बाद में अपने प्रिंट संस्करणों, खोजी पत्रकारिता और क्षेत्रीय मुद्दों पर खबरों से एक अच्छा पाठक वर्ग बनाया. समय के साथ तहलका के पाठकों के आधार में भी वृद्धि हुई और कॉर्पोरेट का भी अच्छा साथ मिला. शायद तहलका उस संक्रमण काल से गुजर रहा है जिससे कभी प्रभात खबर गुजरा था. 



इस साल के शुरू में तहलका के हिंदी संस्करण के कार्यकारी संपादक संजय दुबे का आशीष नंदी के विवादस्पद बयान पर एक लेख आया था. तहलका के 31 जनवरी के अंक में छपे ‘नंदी शिंदे, वरुण और ओवैसी नहीं हैं’ शीर्षक वाले इस लेख की बाईलाइन थी “हमारे देश में कुछ लोगों को कुछ भी कहने-करने का विशेषाधिकार है. लेकिन नंदी उन लोगों में शामिल नहीं हैं”. कहने की जरुरत नहीं है कि उनका संकेत दलितों और कट्टरपंथियों की ओर था. संजय इस लेख में गृहमंत्री सुशील कुमार के एक विवादस्पद बयान पर कहते है कि चूँकि शिंदे सोनिया गाँधी के विश्वास पात्र है और दलित भी है, इसलिए मीडिया उनका कुछ नहीं बिगाड़ पायी. नंदी के विवादस्पद बयान पर सवाल खड़ा करने वाले लोगों को संजय नासमझ बताते है जो उस बयान में छिपे ‘व्यंग्य’ को समझ नहीं पाए. 



मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान तहलका, खासकर तहलका के हिंदी संस्करण के कवरेज पर गौर करने की जरुरत है. तहलका के 16 सितंबर के अंक में अतुल चौरसिया की रपट ‘आपराधिक गड़बड़ी के बारह दिन!’ को पढ़ने से ऐसा लगता है कि गलती मुख्यतः प्रशासन और मुस्लिमों की रही थी, हिन्दू जाट तो बस प्रतिक्रियावश दंगों में शामिल हुए थे. इस रपट में संघ और भाजपा को भी यह कहते हुए लगभग क्लीन चिट दे दी गयी है कि वे तो प्रशासन की ‘नाकामी’ का फायदा उठा रहे थे. जैसे कि दंगों में उनकी कोई ख़ास भूमिका ना रही हो. तहलका के किसी भी रपट में इस बात की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश नहीं की गयी कि दंगों की सबसे अधिक मार मुस्लिमों को झेलनी पड़ी. दंगों के कारण जो लोग विस्थापित हुए उनमें से नब्बे प्रतिशत से भी अधिक लोग मुस्लिम थे. संघ परिवार के ‘लव जिहाद’ जैसे फर्जी और मुस्लिम विरोधी अभियान पर भी कुछ नहीं कहा गया जो दंगे भड़काने में महत्वपूर्ण रहे थे. इन रपटों में 'बहू-बेटी बचाओ जाट महासभा' का जिक्र तो आता है लेकिन इसके पीछे ‘लव जिहाद’ जैसे दुष्प्रचार अभियान की भूमिका और समाज की पितृसत्तात्मक सोच का जिक्र बिलकुल भी नहीं आता. तहलका के ‘खोजी’ पत्रकारों ने अपने पाठकों को लव जिहाद जैसे दुष्प्रचार की वजह से हिन्दू जाटों में अपनी औरतों के धर्म परिवर्तन करा लिए जाने के भय और दंगों में इसकी भूमिका के बारे में बताना मुनासिब नहीं समझा. 



कॉर्पोरेट समर्थक और आय के लिए विज्ञापनों पर निर्भर मीडिया से ‘स्वतंत्र-निष्पक्ष-निर्भीक’ और ‘अखबार नहीं आंदोलन’ जैसे दावों की रक्षा करने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए. मीडिया में विज्ञापन पाने के लिए उस वर्ग का ख़ास ख़याल रखना पड़ता है जिसके पास क्रय-शक्ति होती है. इस क्रय-शक्ति वाले वर्ग और विज्ञापनदाताओं को समाज के कड़वे सच कुछ ख़ास पसंद नहीं होते. प्रभात खबर और तहलका जैसे प्रकाशनों ने अपने संघर्ष के शुरूआती दौर में वंचित तबकों के मुद्दों की पत्रकारिता कर अपना एक ब्रांड स्थापित किया. संघर्ष का दौर निवेश था, ब्रांड स्थापित हो जाने के बाद अब लाभ कमाने की बारी आती है. ये अब धर्मनिरपेक्षता और जन मुद्दों की भी इस तरह पैकेजिंग कर सकते हैं जिससे कॉर्पोरेट और उनके उपभोक्ता वर्ग को कोई एतराज़ ना हो और साथ में आप ‘जनपक्षधर’ भी कहलाए जाएँ. हमें भूलना नहीं चाहिए कि मीडिया एक व्यापार है, जिसका उद्देश्य अपने उत्पाद बेचना है. ‘जनपक्षधरता’ की पत्रकारिता उत्पाद बेचने की मार्केटिंग रणनीति है. जो वाकई जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहे हैं उन्हें कॉर्पोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपना जमीर बेचने की जरुरत नहीं पड़ती.



अतुल, रांची से जनसंचार में स्नातक करने के बाद 
अभी टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS), मुंबई 
से मीडिया में स्नातकोत्तर कर रहे है.
इनसे संपर्क का पता है- thinker.atul@gmail.com