‘भारत रत्न’ की जरूरत ही क्या है?

सत्येंद्र रंजन
-सत्येंद्र रंजन

"...क्या इस हाल में भी भारत रत्न और पद्म पुरस्कारों की वैसी गरिमा या प्रतिष्ठा कायम रह सकती है, जिसकी कल्पना के साथ इनकी शुरुआत की गई थी? ऐसे में क्या यह सुझाव उचित नहीं है कि इन पुरस्कारों को अविलंब खत्म कर दिया जाना चाहिए? वैसे भी राज्य ऐसे पुरस्कार दे, जिसे तय करने की कोई वस्तुगत कसौटी नहीं है, सामंती सोच का ही प्रतिफलन है। जो भी पुरस्कार मनोगत आधार पर तय होंगे, उसमें उस वक्त सत्ता में मौजूद दल या व्यक्तियों के आग्रह-दुराग्रह या उनके राजनीतिक स्वार्थ की  भूमिका रहेगी।..."

कार्टून साभार- सतीश आचार्य
चिन तेंदुलकर को भारत रत्न से सम्मानित करने पर कई हलकों से यह कहते हुए एतराज उठा कि खिलाड़ियों को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने के योग्य बनाने का प्रावधान किया गया, तो इसके पहले हकदार हॉकी जादूगर मेजर ध्यानचंद थे। अपने देश में मीडिया और मार्केट सभी खेलों को समान महत्त्व नहीं देते, वरना विश्वनाथन आनंद या अभिनव बिंद्रा की अतुलनीय उपलब्धियों से परिचित अनेक लोग यह जरूर पूछते कि उनकी उपेक्षा कर आखिर सचिन को क्यों सबसे पहले यह सम्मान दिया गया? चूंकि चार साल बाद भारत रत्न की चर्चा का सीजन लौटा तो बने माहौल में भारतीय जनता पार्टी ने यह सम्मान देने में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से कथित भेदभाव का मुद्दा उठाया। उधर नीतीश कुमार ने अफसोस जताया कि समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया को आज तक इस सम्मान के लायक नहीं समझा गया, तो तेलुगू देशम पार्टी ने एनटी रामराव के फिल्म और राजनीति में योगदान की तरफ ध्यान खींचा।

दरअसल, ये सूची काफी लंबी हो सकती है। जिन्हें ये सम्मान मिला है, उनमें से अधिकांश के बारे में एतराज रखने वाले लोग मौजूद हो सकते हैं। दूसरी तरफ ऐसे बहुतेरे लोग हो सकते हैं जो इसलिए खफा हों कि वे जिसे चाहते हैं उसे सरकार ने इसके योग्य नहीं माना। अगर इतने बड़े देश में अब तक सिर्फ 43 व्यक्ति भारत रत्न समझे गए हैं, तो ऐसी शिकायतों की काफी गुंजाइश मौजूद है।

यहां ये गौरतलब है कि भाजपा ने वाजपेयी की उपेक्षा का मुद्दा उठाया, तो कांग्रेस समर्थक प्रवक्ता टेलीविजन पर यह कहते सुने गए जिस व्यक्ति ने बाबरी चाहिए या बराबरी’ जैसे जुमले बोले हों, उसे एक धर्मनिरपेक्ष सरकार कैसे सम्मानित कर सकती है। इस विवाद में अंतर्निहित पहलू यह है कि भारत जैसे बहुलता वाले और विभिन्नतापूर्ण देश में ऐसी शख्सियतों का होना बहुत कठिन है, जो सभी वर्गों, समूहों और विचारधाराओं को मानने वाले लोगों के बीच समान सम्मान का भाव रखते हों। ऐसे लोग संभवतः कला, संस्कृति, विज्ञान, खेल आदि क्षेत्रों में ही हो सकते हैं। लेकिन सचिन का मामला मिसाल है कि ऐसा खेल के क्षेत्र में भी संभव नहीं है। विभाजित होते जनमत के साथ सार्वजनिक जीवन में ऐसे व्यक्तियों की उपस्थिति निरंतर दुर्लभ होती जा रही है। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में सहमति का दायरा अधिकतम होने की गुंजाइश थी, इसके बावजूद जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल को लेकर अब जैसी बहस छेड़ने की कोशिश की गई है, उससे साफ है कि उस दौर के नायकों के बारे में भी अब विचारों की खाई चौड़ी होती जा रही है। 

कल्पना करें कि अगर कभी भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई और उसने केशव बलिराम हेडगेवार या सदाशिव माधव गोलवरकर को भारत रत्न देने की कोशिश की तो उस पर कैसा वैचारिक संग्राम छिड़ेगा। दरअसल, जो लोग राजनीति से नहीं हैं उनके राजनीतिक विचार भी आज कड़वाहट पैदा कर देते हैं। इसकी मिसाल अमर्त्य सेन और लता मंगेशकर हैं। अमर्त्य सेन ने यह कह कर सिर्फ अपना विचार जताया कि वे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद पर नहीं देखना चाहेंगे। इसी तरह लता मंगेशकर ने राय जताई कि मोदी का प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा हो- वे ऐसी कामना करती हैं। राजनीतिक विभाजन-रेखा के दो परस्पर विरोधी छोरों पर खड़े लोगों ने इस पर सेन और लता से भारत रत्न छीनने की मांग कर दी। यह घटना बताती है कि ऐसे व्यक्तित्वों का होना अब कितना कठिन हो गया है, जिनका सारा देश सम्मान करता हो।

क्या इस हाल में भी भारत रत्न और पद्म पुरस्कारों की वैसी गरिमा या प्रतिष्ठा कायम रह सकती है, जिसकी कल्पना के साथ इनकी शुरुआत की गई थी? ऐसे में क्या यह सुझाव उचित नहीं है कि इन पुरस्कारों को अविलंब खत्म कर दिया जाना चाहिए? वैसे भी राज्य ऐसे पुरस्कार दे, जिसे तय करने की कोई वस्तुगत कसौटी नहीं है, सामंती सोच का ही प्रतिफलन है। जो भी पुरस्कार मनोगत आधार पर तय होंगे, उसमें उस वक्त सत्ता में मौजूद दल या व्यक्तियों के आग्रह-दुराग्रह या उनके राजनीतिक स्वार्थ की  भूमिका रहेगी। 

पुराने जमाने में इस पर एतराज नहीं होता था, क्योंकि राजा पूजनीय माने जाते थे औऱ वे अपनी पसंद-नापसंद से पुरस्कार देते थे या अपने दरबारी चुनते थे। अंग्रेजों के जमाने में साम्राज्य के स्वार्थ के अनुरूप खिताब बख्शे जाते थे। लेकिन एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी परंपराएं क्यों जारी रहनी चाहिए, जिसमें हर नागरिक की संवैधानिक और कानूनी हैसियत समान है? प्रधानमंत्री या मंत्रियों के पूर्व-आग्रह किसी नागरिक की पसंद-नापसंद से ऊपर क्यों होने चाहिए?

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद प्रदर्शन के आधार पर रेटिंग या वार्षिक पुरस्कार देती है, तो उस पर किसी विवाद की गुंजाइश नहीं रहती। इसी तरह वर्ष के सर्वश्रेष्ठ फीफा फुटबॉलर का चयन होता है। प्रतिष्ठित फिल्म जानकारों की व्यापक आधार वाली जूरी फिल्म पुरस्कार तय करे, तो उस पर भी बहस की गुंजाइश हो सकती है- मगर उसकी स्वीकार्यता पर वैसे सवाल नहीं उठेंगे, जैसे अक्सर भारत रत्न और पद्म पुरस्कारों पर उठ खड़े होते हैं। अर्थात संगीत, कला, या खिलाड़ियों के सर्वोच्च पुरस्कार स्थापित किए जा सकते हैं और उसी पेशे या विधा के लोगों को लेकर विश्वसनीय जूरी बनाई जा सकती है। यह एक तरह से अपने उद्योग या विधा द्वारा अपने क्षेत्र की उपलब्धियों के सम्मान जैसा होगा। लेकिन जब सरकार कोई पुरस्कार देती है- वह भी बिना किसी वस्तुगत कसौटी के- तो आज के लोकतांत्रिक दौर में उस पर विवाद खड़ा होना लाजिमी है। बल्कि इससे समाज का एक हिस्सा उल्लसित होता है, तो कई दूसरे हिस्सों में कड़वाहट भरती है।

1992 में जब जेआरडी टाटा को भारत रत्न दिया गया तो इस पर आश्चर्य जताते हुए उन्होंने कहा था- मैं तो यही जानता था कि ये सम्मान उनको दिया जाता है, जिन्होंने देश के लिए कुर्बानी दी हो। मैंने तो आज तक सब कुछ मुनाफे के लिए किया है। उस समय तक यही माना जाता था कि सार्वजनिक हित में त्याग या बलिदान करने वाले लोग इस सम्मान के योग्य हैं। बाद में संगीत या कला क्षेत्र में उपलब्धि प्राप्त करने वाली शख्सियतों को भी इससे सम्मानित किया गया। उससे सम्मान का दायरा असीमित हो गया। लेकिन कसौटी मनोगत ही रही। ताजा विवाद ने जाहिर किया है कि समाज में अब ऐसी कसौटी स्वीकार्य नहीं है। अतः अब सबसे सम्मानित रास्ता यही रह गया है कि सामंती अंदाज की सम्मान की ये परिपाटी समाप्त कर दी जाए।
सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं. 
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.