महिषासुर शहादत दिवस आयोजन और कुछ सवाल

-अतुल आनंद 
अतुल आनंद 
विगत वर्षों में देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जेएनयू में दलित और पिछड़े वर्गों के छात्रों के संगठन की तरफ से हुई एक चर्चित मुहीम ‘महिषासुर शहादत दिवस’, प्रसार पा कर देश के बहुत सारे इलाकों में फैली है. उसने समाज में व्याप्त ब्राह्मणवादी सोच और वर्चस्व के कारण कई जगह विरोध भी झेला. ब्राह्मणवाद के खिलाफ एक सांस्कृतिक प्रतिरोध के तौर पर शुरू हुई यह पहल, हिन्दू धर्म के भीतर व्याप्त अमानवीय ‘जाति व्यवस्था’ के खिलाफ एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो सकती है लेकिन यह ‘ब्राह्मणवादी संस्कृति’ पर कितनी चोट करेगी यह अभी संसय का विषय है. हिन्दू समाज मिथकीय इतिहास की जमीन पर खड़ा है. इसके भीतर पसरा ब्राह्मणवाद इन्हीं मिथकों से सिंचित होता है. संभवतः उक्त आन्दोलन की अपने नए मिथक गढ़ ब्राह्मणवाद को मात देने की समझदारी हो. लेकिन यह नए किस्म के मिथक नए किस्म के ब्राह्मणवाद का भी उभार करेंगे.  
अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि इतिहास की मिथकीय दृष्टि ने समूचे समाज को जितना नुक्सान पहुंचाया है अकेले इतना नुक्सान किसी और चीज ने नहीं पहुंचाया. इतिहास में ब्राह्मणवाद/हिन्दू धर्म को सबसे पहले और प्रभावी चुनौती ‘बुद्ध’ ने दी. ब्राह्मणवाद/हिन्दू धर्म के विकल्प के तौर पर उन्होंने जो दर्शन दिया वह पर्याप्त वैज्ञानिक और भौतिकवादी होने के बावजूद, अन्य धर्मों की तरह ही भ्रष्ट हुआ. उसकी वजह उनकी वह मजबूरी साबित हुई कि तत्कालीन समाज में जब धर्म के कोई विकल्प स्वीकार्य न होते उन्हें अपने दर्शन को धर्म की ही शक्ल में ही देने की मजबूरी थी. मूलतः यही बाद में ब्राह्मणवाद द्वारा इस धर्म को पतित करने का कारण बना. आज जब समाज में ब्राह्मणवाद को ज्यादा वैज्ञानिक और तार्किक ढंग से बेनकाब किये जाने के विचार मौजूद हैं और प्रगतिशील लोगों की एक बड़ी तादात इन विचारों से ब्राह्मणवाद के हजारों साल पुराने स्तम्भ को गिराने की कवायद में जुटी है. नए मिथकों को स्थापित कर दमित समाज को एक अँधेरे से निकाल दूसरे अँधेरे में धकेलने का क्या अर्थ होगा? बेशक उक्त आन्दोलन दलित और पिछड़े छात्रों/समाजों की स्वाभाविक गोलबंदी करने में सफल होगा. लेकिन इसका क्या हासिल? 
यहाँ हम अतुल आनंद का महिषासुर शहादत दिवस के इस तीन साला अनुभवों का विश्लेषण करता एक आलेख प्रस्तुत कर रहे हैं. अतुल मूलतः महिषासुर शहादत दिवस के आयोजन को, praxis की इस सम्पादकीय टिपण्णी के इतर एक जायज आन्दोलन मानते हैं, पर उन्होंने विगत वर्षों में इस आन्दोलन में आई कुछ प्रवृत्तियों को पकड़ने की कोशिश की है जो इस आन्दोलन को प्रतिगामी दिशा में धकेल सकता है. यह आलेख पढ़ना इस टिपण्णी से सहमत-असहमत दोनों किस्म के पाठकों के लिए जरूरी होगा... 
-संपादक

वाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय (जेएनयू), दिल्ली से शुरू हुए महिषासुर शहादत दिवसआयोजन की यह तीसरी सालगिरह है। जेएनयू में एक पिछड़े वर्ग के छात्र संगठन द्वारा साल 2011 में शुरू किए गए इस राजनीतिक-सांस्कृतिक आंदोलन का असर इस साल उत्तरप्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के भी कई हिस्सों में देखने को मिला जब इन जगहों पर पहली बार महिषासुर शहादत दिवस जैसे आयोजन किए गए। झारखण्ड और पश्चिम बंगाल में रहने वाले एक आदिवासी समुदाय का नाम असुर है जो महिषासुर को अपना पूर्वज मानते हैं और दुर्गा पूजा के दौरान शोक मनाया करते हैं। असुर आदिवासियों के अलावा भी दूसरे आदिवासी समुदायों के लोककथाओं के अनुसार महिषासुर एक आदिवासी सरदार था जिसे आर्यों ने दुर्गा को भेज छल से मरवा दिया था ताकि आर्य उस वन संपदा को लूट सके जिसकी रक्षा आदिवासी कर रहे थे। वहीं बिहार और उत्तरप्रदेश की पिछड़ी जातियों, खासकर यादव (ग्वाला, अहीर) जाति, द्वारा महिषासुर को गो-पालक यादवों के राजा के रूप में माना जा रहा है। उत्तरप्रदेश के यादव शक्तिपत्रिका में छपे एक लेख और फॉरवर्ड प्रेसमासिक पत्रिका के अक्टूबर 2011 अंक में प्रेमकुमार मणि के लेख किसकी पूजा कर रहे है बहुजन?” में भी महिषासुर को गोवंश पालक समुदाय का राजा बताया गया था। जेएनयू में शुरू हुए महिषासुर शहादत दिवस आयोजन के पीछे प्रेमकुमार मणि के लेख की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी।




ब्राह्मणवादी संस्कृति के प्रतिरोध के इस आंदोलन की धमक देश के दक्षिणी हिस्से में भी देखने को मिली जब इस साल के सितंबर माह में इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज यूनिवर्सिटी (ईएफएलयू), हैदराबाद के कुछ छात्रों द्वारा असुर सप्ताह’ (असुर वीक) का आयोजन किया गया। इस अवसर पर छात्रों ने भारतीय इतिहास की पुनर्विवेचना और विश्विद्यालयों में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषापर परिचर्चा और दूसरे रचनात्मक आयोजन किए थे। इस आयोजन में समाज के सभी वर्ग से आनेवाले छात्रों ने हिस्सा लिया था। उनके इस प्रयास को विश्वविद्यालय के सामंती और ब्राह्मणवादी प्रशासन के दंडात्मक कारवाई को झेलना पड़ा। ईएफएलयू छात्र संघर्ष समिति पहले भी समाज के कमजोर तबके से आए छात्रों के प्रति विश्विद्यालय प्रशासन के भेदभावपूर्ण रवैये के खिलाफ संघर्ष करती आई है। समिति ने यह आरोप लगाया है कि विश्विद्यालय प्रशासन ने इस आयोजन को लेकर पहले तो कोई आपत्ति जाहिर नहीं की लेकिन आयोजन हो जाने के बाद बिना किसी सूचना के सीधे कानूनी कारवाई का रास्ता अपनाया। ऐसे मामलों में विश्विद्यालय स्तर पर पालन किए जाने वाले तमाम प्रक्रियाओं को दरकिनार कर विश्विद्यालय प्रशासन ने उस्मानिया थाने में भादवि की धारा 153 (A)  के अंतर्गत विभिन्न समूहों के बीच धर्म, नस्ल, जन्मस्थान, निवास, भाषा इत्यादि के आधार पर वैमनस्य फैलानेका गंभीर आरोप लगा प्राथमिकी दर्ज कर दी। इस मामले में छ: विद्यार्थियों को आरोपी बनाया गया है जिनमें से चार छात्र समाज के वंचित तबके से आते हैं और बाकि दो लड़कियाँ हैं। ईएफएलयू के छात्र अभी भी इस मामले को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। वैसे विश्वविद्यालय प्रशासन इस मामले को लेकर अदालत जाता हुआ नहीं दिख रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने जिस तरह से इस मामले को लेकर प्रतिक्रिया की, उससे इसकी काफी किरकिरी भी हुई है। विश्वविद्यालय प्रशासन पर भारी दबाव है कि वह इस मामले को वापस ले।

कुछ इसी तरह का प्रशासनिक विरोध जेएनयू में महिषासुर शहादत दिवस आयोजन की शुरुआत करने वाले छात्रों को इस आयोजन के पहले साल में झेलना पड़ा था। हालांकि जल्द ही इस मामले को सुलझा लिया गया था। इस सांस्कृतिक आंदोलन से दक्षिणपंथी संगठनों के भवों पर भी बल पड़ा है जो कभी इस आंदोलन को हिन्दू धार्मिक भावना को आहत करने वाला प्रयास बता रहे हैं तो कभी इसे मूखर्तापूर्ण करार दे रहे हैं। जेएनयू में जब पहली बार महिषासुर शहादत दिवस आयोजन किया जाना था तब इस मुद्दे को लेकर एक दक्षिणपंथी छात्र संगठन ने तो आयोजन करने वाले छात्रों के साथ मार-पीट भी की थी।

लेकिन
 इस सांस्कृतिक आंदोलन के लिए सामंती एवं फासीवादी विरोध उतना बड़ा ख़तरा नहीं है जितना कि ब्राह्मणवाद के आदर्शों और कर्मकाण्डों द्वारा समाहित कर लिए जाने का ख़तरा। बुद्ध ने हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरोध में बौद्ध दर्शन की व्याख्या की थी। उन्होंने बौद्ध धर्म को हिन्दू कर्मकाण्डों से बचाने की पूरी कोशिश की थी। उन्होंने खुद को भगवान की उपाधि देने से भी दूर रखा। लेकिन जब ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने पाया कि वह बुद्ध और उसके दर्शन से जीत नहीं सकती तो बुद्ध को हिन्दू धर्म का अवतार घोषित कर भगवान बना दिया गया।

महिषासुर शहादत दिवस आयोजन जैसे सांस्कृतिक प्रतिरोध के आंदोलन का भी ब्राह्मणवादी व्यवस्था के जाल में फँस जाने का खतरा है। खासकर जब इस प्रतिरोध की संस्कृति को विकसित करने के लिए ब्राह्मणवादी प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा रहा हो। जेएनयू में महिषासुर शहादत दिवस आयोजन में महिषासुर के जिस चित्र का उपयोग किया जाता है वह चित्रकार लाल रत्नाकर द्वारा बनाया गया था। संभवत: अनजाने में ही इस चित्र को ब्राह्मणवाद के प्रतीकों से भर दिया गया है। इस चित्र में गोवंश पालक समुदाय के राजा महिषासुर को भगवान कृष्ण की तरह सिर पर मोरपंख लगाए दिखाया गया है। महिषासुर के पीछे किसी हिन्दू देवी-देवता की तरह आभामंडल भी बनाया गया है। हिन्दू मिथकों में वर्णित काले रंग वाले असुरों के विपरीत इस महिषासुर का रंग गोरा है और माथे पर तिलक है। हद तो यह है कि महिषासुर, जो की एक सामान्य मनुष्य रहा होगा, को किसी भगवान की तरह आशीर्वाद की मुद्रा में दाँया हाथ उठाए दिखाया गया है।

इन ब्राह्मणवादी प्रतीक चिन्हों के अलावा भी इस आंदोलन के वैचारिक स्तर पर कई ऐसी खामियाँ हैं जो इस प्रतिरोध के आंदोलन को असफल बना सकती है। टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई में इस साल 13 अक्टूबर को महिषासुर शहादत दिवस आयोजन के अवसर पर संस्थान के डेवलपमेंट स्टडीज विभाग में सहायक प्राध्यापक पार्थसारथी मंडल हिन्दू मिथकीय इतिहास और दलित-आदिवासी विमर्शविषय पर परिचर्चा में वक्ता थे। संयोग से मंडल जी जेएनयू के छात्र रह चुके हैं। इस विषय पर बोलते हुए मंडल जी ने कहा है कि यह दुर्भाग्य की बात है कि हम भारतीय खुद को आधुनिक और उत्तर-आधुनिक समझते हैं लेकिन खुद को और इस देश को समझने की हमारी क्षमता बस हिन्दू मिथकीय इतिहास तक ही सीमित है। हम इस मिथकीय इतिहास को परखने और इसके समानांतर चलने वाली दूसरी आदिवासी और क्षेत्रीय लोककथाओं को जानने की ज़हमत नहीं उठाते है। मंडल जी ने यह भी कहा कि देश में महिषासुर शहादत दिवस के रूप में ब्राह्मणवादी संस्कृति के विरोध के आंदोलन को समस्या के तत्क्षण इलाज के रूप में नहीं देखना चाहिए। हिन्दू धर्म की इन परम्पराओं की जड़ें काफी गहरी हैं। देश के बहुजन इन परम्पराओं से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। हिन्दू धर्म की तुलना इस्लाम या ईसाईयत जैसे धर्मों से नहीं बल्कि रोमन और ग्रीक सभ्यताओं से होनी चाहिए। हिन्दू धर्म की संस्थापक ब्राह्मणवादी शक्तियाँ बहुत ही दूरदर्शी रही थीं। उन्हें आने वाले समय में हिन्दू धर्म के समक्ष आने वाली समस्याओं का पहले से ही अनुमान था। इस वजह से हिन्दू धर्म को विरोधाभासों से भर दिया गया ताकि इसके खिलाफ़ होने वाले आन्दोलनों की लड़ाई मुश्किल हो जाए। एक तरफ़ तो हिन्दू धर्म वसुधैव कुटुम्बकमके जरिए समानता की बात करता है वहीं दूसरी तरफ़ इस धर्म की आत्मा जाति व्यवस्था के रूप में असमानता पर आधारित व्यवस्था है।

दुर्गा
 पूजा इस विरोधाभास का एक अच्छा उदाहरण है। जहाँ पुराणों के पहले वेद में नारी पूजा का कोई प्रावधान नहीं था, उलटे स्त्रियों को निकृष्ट समझा जाता था वहीं अचानक मार्कण्डेय पुराण ने पुरानी परम्पराओं के विपरीत शक्ति पूजा का प्रचलन शुरू किया। मंडल जी के अनुसार इस परिवर्तन के पीछे वजह यह रही थी कि चौथी से सातवीं सदी के दौरान, जिस वक्त मार्कण्डेय पुराण रचा गया, उस वक्त आर्यों का सामना उत्तर भारत की सभ्यताओं से हो रहा था जिनमें कई मातृ-सत्तात्मक थीं। आर्यों ने इन सभ्यताओं से मुकाबला करने के लिए मार्कण्डेय पुराण के माध्यम से दुर्गा के रूप में एक स्त्री की परिकल्पना की जो एक असुर पुरुष का वध करती है, लेकिन दुर्गा को स्त्रीवादी समझना भारी भूल होगी। मार्कण्डेय पुराण की कथा के अनुसार देवता असुरों के बल-पराक्रम से पराजित हो कर त्रिदेवों के पास मदद माँगने गए थे। त्रिदेव भी महिषासुर से लड़ने में अक्षम थे इस वजह से दुर्गा की रचना की गयी। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि जन्म देने का काम स्त्री का होता है, जबकि यहाँ तीन पुरुष देव मिलकर एक स्त्री का निर्माण करते हैं जो अंततः देवताओं के हाथ की कठपुतली साबित होती है। दुर्गा को नारी शक्ति समझना भूल है क्योंकि दुर्गा ने नारियों के हित के लिए कुछ नहीं किया। उसने हिन्दू धर्म की नारी विरोधी परम्पराओं के खिलाफ भी कुछ नहीं कहा। अगर हिन्दू धर्म स्त्रीवादी होता तो देवता त्रिदेवों की जगह पार्वती या किसी और देवी के पास मदद के लिए जाते। दुर्गा पूजा इस देश के निवासी असुरों के संहार को उचित ठहराने की एक साजिश है।

महिषासुर शहादत दिवस के रूप में ब्राह्मणवादी संस्कृति के प्रतिरोध के आंदोलन की एक वैचारिक समस्या यह भी है कि यह हिन्दू धर्मों के विरोधाभासों को समझने में बहुत हद तक नाकाम रही है। आन्दोलन में जिस ऊर्जा को ब्राह्मणवाद के विरोधाभासी तिकड़मों को समझने में लगाना चाहिए उस ऊर्जा को दुर्गा के चरित्र की जाँच-पड़ताल में खर्च किया जा रहा है। दुर्गा के बहाने स्त्री जाति को भी निशाना बनाया जा रहा है। दुर्गा पर हमला करने की आड़ में स्त्रियों के बारे में प्रचलित पूर्वाग्रहों को उद्धृत किया जा रहा है। जेएनयू में महिषासुर शहादत दिवस के अवसर पर आयोजित चर्चा में दुर्गा कुँवारी थी या नहीं? दुर्गा को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है? जैसी बहस को प्रमुखता दी गयी थी। ब्राह्मणवादी अपने प्रतिरोध के आंदोलन की इस स्तिथि को देखकर खुश हो रहे होंगे कि दुर्गा पूजा के रूप में नारीवादी विरोधाभास को जिस उद्देश्य से रचा गया था उससे बहुजन के हित की बात करने वाले आन्दोलनकारी गच्चा खा गए हैं। कहा जाता कि अक्सर पीड़ितों में भी पीड़ित जनों के मुद्दे को नकार देना एक आंदोलन को सीमित और कमजोर बनाता है। सांस्कृतिक प्रतिरोध का यह आन्दोलन तब तक अधूरा और कमजोर रहेगा जब तक कि बहुजन पितृसत्ता की बुराइयों और स्त्रियों के समानता के अधिकार को स्वीकार नहीं करते।

महिषासुर शहादत दिवस के सांस्कृतिक आंदोलन की एक और प्रमुख समस्या इस आंदोलन में एक ख़ास पिछड़ी जाति की प्रमुखता है। अम्बेडकर ने कहा है कि जाति व्यवस्था एक सीढ़ी की तरह है जहाँ विभिन्न जातियाँ इसके पाएदान हैं। हर जाति ने अपने नीचे की जाति पर उतने ही अत्याचार किए हैं जितना की उसे अपने ऊपर वाली जाति से सहना पड़ा। इस सांस्कृतिक आन्दोलन के हित के लिए यह जरूरी है कि इस आंदोलन में एक ख़ास जाति के वर्चस्व को रोका जाए। बिहार और उत्तरप्रदेश में हुए महिषासुर शहादत दिवस आयोजनों के आयोजक मुख्य रूप से एक ख़ास पिछड़ी जाति (यादव जाति) से है। इस जाति के बारे में यह तथ्य भी है कि यह जाति स्वयं को अन्य पिछड़ी जातियों और दलितों से श्रेष्ठ समझती आई है। यादवों के साथ उलझन की एक बात यह भी है कि कृष्ण को यादवों का भगवान मानने की जिस विचार को बढ़ावा दिया गया है उसको इस तरह के आंदोलन में किस रूप में लिया जाएगा। कृष्ण के साथ ही ब्राह्मणवादी गीता का भी सवाल आता है। इस आंदोलन में दलित और सभी पिछड़ी जातियों की सहभागिता के साथ ही आदिवासियों के सहभागिता का सवाल भी जरुरी है। बहुत संभव है की आगे चलकर इस आंदोलन में यादव जाति का ही वर्चस्व रहे और एक अभिजात्य संस्कृति विकसित हो जो ब्राह्मणवादी संस्कृति का ही प्रतिरूप बनी रहे।

ब्राह्मणवादी
 संस्कृति के प्रतिरोध के इस आंदोलन के भविष्य के लिए यह जरुरी है कि इस आंदोलन के अगुवाई कर रहे है लोग ब्राह्मणवादी संस्कृति में व्याप्त विरोधाभासों के साथ-साथ आंदोलन में स्त्रियों और सभी बहुजनों के सहभागिता के सवालों पर गंभीरता से मंथन करे। महिषासुर और दुर्गा के मिथक में उलझे बिना इस आंदोलन को एक मजबूत सांस्कृतिक आंदोलन का रूप दें।

अतुल, रांची से जनसंचार में स्नातक करने के बाद 
अभी टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS), मुंबई 
से मीडिया में स्नातकोत्तर कर रहे है.
इनसे संपर्क का पता है- thinker.atul@gmail.com