जलप्रलय, और फिर 'जलपुरुष'

Indresh Maikhuri
इन्द्रेश मैखुरी
-इन्द्रेश मैखुरी

"...हे परम चतुर,अतिसुजान, आप जलपुरुष हो सही मायनों में,पानी के गुण कितने रचे बसे हैं आप में.पानी के बारे में यह पुराना हिंदी गाना तो आपने सुना ही होगा-
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा,
जिसमें मिला दो लगे उस जैसा..."


क ख़ास मौसम में कुछ पक्षी प्रवास को एक क्षेत्र या देश से दूसरे देश को निकलते हैं.कुछ परम चतुर,अतिसुजान मनुष्य भी एक ख़ास मौसम में एक डाल से उछल कर दूसरी डाल पर बैठने की तैयारी करने लगते हैं. पक्षियों के प्रवास का कारण विपरीत मौसम की मार से बचना होता है. परम चतुर,अतिसुजान मनुष्य के उछल-कूद का कारण सुख-सुविधाएं,रौब-दाब बचाना  होता है. प्रवासी पक्षियों की तरह उछल-कूद करने वाले ये परम चतुर, अति सुजान मनुष्य गण समाज सेवक, पर्यावरणवादी आदि-आदि कहे जाते हैं. दो विरोधी सत्ताओं से अपनी सुविधाओं के लिए सामजस्य साधने का काम ये जिस कुशलता से करते हैं, उसके सामने तो रस्सी पर नट के चलने का करतब और तलवार की धार पर चलना जैसा मुहावरा भी मामूली जान पड़ता है. आखिर सत्ताओं के बदलने के झंझावत के बीच भी अपना सरकारी दाना-पानी कायम रखना और समाज हितैषी की छवि भी साथ-साथ बरकरार रखने से बड़ा करतब कुछ और हो सकता है भला ! इनके जिस करतब का जिक्र किया जा रहा है, वो है कि एक सरकार का बेडा गर्क होने का समय ये पहले ही भांप लेते हैं और फ़ौरन उससे अपना पिंडछुड़ा कर खुद को शहीद घोषित कर देते हैं. इस तरह हर पांच-दस साल में सत्ता बदलने से पहले ये शहीद होते रहते हैं और सरकारी रौब-दाब जैसी तुच्छ चीजें इनके पावन चरणों में लोटती रहती हैं.

पिछले दिनों एक ऐसे ही करतबी, परम चतुर, अतिसुजान मनुष्य को देखा. झक्क सफ़ेद करीने से इस्त्री किये कपडे, उतनी ही करीने से सजी सफ़ेद दाढ़ी के साथ उजली काया. लगता है कि धूल-मिटटी के कण भी इनकी उजली आभा के सामने सिर झुकाते हुए इनकी तरफ निगाह डालने का साहस ना कर सके. अपनी महिमा का बखान करते हुए इन्होने उवाचा कि ये किसी जमाने में पंद्रह घंटे फावड़ा चलाया करते थे. फावड़ा,हल आदि चलाने वालों को तो इस देश में उजलेपन के नाम पर सफ़ेद कफ़न भी नसीब नहीं हो रहा है. लाखों तो कर्ज में डूब कर ख़ुदकुशी कर चुके हैं. ऐसे में फावड़ा चला कर चमकता-दमकता आभामंडल पाने वाले ये सज्जन चमत्कारिक पुरुष ही जान पड़ते हैं. हाँ पुरुष का जिक्र आया है तो बताते चलें कि इन महापुरुष को जलपुरुष कहा जाता है. जलपुरुष कहने से तो एक ऐसे मनुष्य का अक्स दिमाग में बनता है जो आकार-प्रकार में पानी की बाल्टीनुमा हो, जिसमें से पानी छलछला रहा हो और फिर भी मनुष्य हो.

बहरहाल अपनी महानता का बखान करते हुए जल पुरुष ने बताया कि वे बड़े त्यागी-बलिदानी महापुरुष हैं. उनकी त्याग-बलिदान की महागाथा सुन कर लगा कि राक्षसों की नाश के लिए अपनी हड्डियां त्यागने का किस्सा भी उनके बलिदान के सामने फीका है. उन्होंने फरमाया कि वे ए.सी. कमरों में प्रधानमंत्री के साथ बैठते रहते हैं. लेकिन ए.सी.कमरों में प्रधानमन्त्री के साथ बैठने को वे अपना विकास नहीं विनाश समझते हैं. आप धन्य हैं ! जल से जलजले महापुरुष. प्रधानमन्त्री के साथ बैठने को तुच्छ-नीच-नराधम मनुष्य मरे जाते हैं और आप जैसी महान मूर्ति इसे अपना पतन समझती है. यह पतन है और पिछले चार वर्षों से लगातार आप अपना पतन करवा रहे थे. आखिर किसकी खातिर? इस मूरख-खल-कामी जनता की खातिर! बीच-बीच में जब प्रधानमन्त्री भूल जाता कि जनता के हित में आपका पतन करना यानी कि आपके साथ ए.सी.कमरे में बैठना बहुत जरूरी है, तो आप ही हैं जिहोने उस “साइलेंट” मोड में रहने वाले प्रधानमन्त्री में कुछ “वाइब्रेशन” पैदा की. पिछले वर्ष भी जब प्रधानमन्त्री आपके साथ कई महीनों तक नहीं बैठा यानी जनहित में वह  आपका पतन करने के कर्तव्य से विमुख हो गया तो आपने, दो अपने जैसे ही महान सखाओं के साथ इस्तीफे का ऐलान कर दिया. फिर वापस कैसे लिया होगा आपने अपना इस्तीफ़ा?

अरे,प्रधानमन्त्री और उसके कारिंदे गिडगिडाए होंगे जलपुरुष के सामने कि “हे जलपुरुष, हे जलप्रपात पुरुष, हे जलबाढ़ पुरुष, हमें क्षमा कर दो, हम से भूल हो गयी. हम अपने कर्तव्य से विमुख हो गए थे. हम भूल गए थे कि जो पद और गोपनीयता की शपथ हमने ली थी,उसमें आपका पतन करना भी निहित था. अब आपके पतन में कोई चूक ना होगी”. जलपुरुष पानी से लबरेज ठहरे,बह निकले इस अनुनय-विनय में. लेकिन इस बार तो हद हो गयी. पिछले अट्ठारह महीनों से जलपुरुष एंड कंपनी के पतन के अनिवार्य संवैधानिक कार्यक्रम से प्रधानमन्त्री फिर विमुख हो गए. बताइए, जनहित का कोई कार्य ये सरकार नहीं करना चाहती! जो प्रधानमन्त्री पूरे देश को पतन के रसातल में ले जा रहा है, उसी प्रधानमंत्री से कुछ महामानव गुहार कर रहे हैं कि जनहित में हमारा पतन आवश्यक है, पर प्रधानमंत्री ना बोलता है, ना सुनता है. देश को जो भी नुक्सान इस सरकार ने पहुंचाया है, उससे कई गुना बड़ा अपराध तो जनहित में अपने पतन के लिए सहर्ष प्रस्तुत इन महामानवों के त्याग-बलिदान की कोई कीमत ना समझना है.

इसलिए जलपुरुष ने ऐलान कर दिया कि अब वे ऐसी सरकार के साथ कतई नहीं रहेंगे जो जनता की भलाई के लिए उनका पतन करने को तैयार नहीं है. इस मामले में जलपुरुष, जनता भी आपके साथ है. बस फर्क सिर्फ इतना है कि जनता इसलिए इस सरकार के खिलाफ है क्यूंकि इसने देश को रसातल में पहुंचा दिया है और आप इसलिए कि इसने बीते अटठारह महीने से वह कार्य(आपके साथ बैठक) नहीं किया जिसे आप अपना पतन जानते हुए भी जरूरी समझते हो.

हे परम चतुर,अतिसुजान, आप जलपुरुष हो सही मायनों में,पानी के गुण कितने रचे बसे हैं आप में.पानी के बारे में यह पुराना हिंदी गाना तो आपने सुना ही होगा-
पानी रे पानी तेरा रंग कैसा,
जिसमें मिला दो लगे उस जैसा
आप के पोर-पोर में,बूँद-बूँद में पानी का ये गुण समाया हुआ है. आन्दोलनकारियों के बर्तन में आन्दोलनकारियों की तरह गरजते-दहाड़ते,सत्ता के बर्तन में सत्ता की तरह की मुलायमियत-नफासत. यही गुण है (जो आपके अनुसार पतन ही सही) ए.सी. कमरे में प्रधानमन्त्री के बगल की सीट पर पहुंचाता है.

ये भी आपने भला किया जलपुरुष कि इस सरकार से वक्त पर अलग होकर अपनी शहादत का ऐलान कर दिया.यह बुद्धिमानी ही आपको इस लायक बनाएगी कि अगली सरकार में जब जनता के हित के लिए अपना पतन करवाने के लिए उद्यत महापुरुषों की सूची बने तो आपका दावा सबसे मजबूत रह सके.बाकि पानी पुरुष तो आप हो ही.बर्तन चाहे कांग्रेस का,हो भाजपा को हो या तीसरे,चौथे,पांचवें,आठवें,दसवें मोर्चे का, आप के लिए उसके अनुरुप ढलना कौन सा मुश्किल है !

इन्द्रेश 'आइसा' के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं
और अब भाकपा-माले के नेता हैं.
 
indresh.aisa@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.