पृथक तेलंगाना : नए राज्यों की चुनौतियां

रोहित जोशी

-रोहित जोशी

"...लोकतंत्र में जनता की चेतना ही एक मात्र पैरामीटर हो सकती है कि वे लोकतांत्रिक संस्थाओं का कितना लाभ ले सके. चेतना के अभाव की स्थिति में चाहे कितने भी छोटे-छोटे राज्यों का निर्माण किया जाय, समाज में पूर्ववत मौजूद वर्चस्व की विभिन्न श्रेणियाँ/संस्थाएं ही असल लाभ पाएंगी. उदाहरण के लिए भाषा के आधार पर पृथक कर दिए जाने पर संभवतः नए राज्य में जातीय आधार पर एक नया वर्चस्व इसका लाभ उठाये. और माना जाति के आधार पर ही पृथक राज्य का गठन हुआ हो तो पूंजीवादी लोकतंत्र में तयशुदा तौर पर एक खास वर्ग ही वर्चस्व पर कब्ज़ा कर लेगा..."

पिछले दिनों कांग्रेस वर्किंग कमिटी के अलग तेलंगाना राज्‍य के गठन को मंजूरी देने से यह तकरीबन साफ़ हो ही गया था कि इस बार भारत के 29 वें राज्य के बतौर तेलंगाना अस्तित्व में आ ही आएगा. अपने भीतर ही भीषण घमासान के बावजूद कल कैबिनेट मीटिंग में भी इसे मंज़ूरी मिल जाना इस प्रक्रिया का अगला चरण रहा है। इस साल के अंत तक सरकार अलग तेलंगाना राज्य बना ही लेगी। इसका आगामी चुनावों के हिसाब से अपना अलग गणित है।

1956 में संसद द्वारा पास हुए राज्य पुनर्गठन विधेयक के अनुसार हैदराबाद रियासत के तेलंगाना क्षेत्र को भाषाई आधार पर, 1953 में मद्रास प्रेसीडेंसी से अलग कटकर बने आंध्रप्रदेश में मिला दिया गया. असंतुष्ट समूहों ने इसी समय पृथक तेलंगाना राज्य के गठन की मांग उठानी शुरू की. देश के शुरूआती केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा इसे लगातार नजरअंदाज करने से यह आंदोलन तीव्रतम होता गया और देश के प्रतिनिधि जनांदोलनों में शुमार हो गया. तेलंगाना के छात्रों और किसानों के राज्य आंदोलन के प्रति समर्पण और शहादतों ने इसे ऐसी ऊचाई दी कि ये देश भर के जनांदोलनों के लिए मिसाल बन गया. तेलंगाना और अन्य छोटे राज्यों की मांगों ने भारत में देश के विभाजन के बाद अलग-अलग राज्यों के पुनर्गठन की 1956 में हुई सबसे बड़ी कवायद ‘राज्य पुनर्गठन अधिनियम’ को कठघरे में ला खड़ा किया. इसके तहत राज्यों की सीमाएं भाषाई आधार पर तय की जानी थी. नतीजतन भौगोलिक बसावट, क्षेत्रफल, विकास और आबादी के अलावा दूसरी सामाजिक-सांस्कृतिक और एतिहासिक स्थिति जैसे महत्वपूर्ण मसलों को महत्व नहीं दिया गया. इसकी प्रतिक्रया में देशभर में, इन उपेक्षित आधारों पर छोटे-छोटे राज्य की मांग उभरी और उसने देश और संबंधित प्रदेश की राजनीति में एक गहरा असर डाला है.

देश के विभिन्न इलाकों में लंबे समय से भाषाई, भौगोलिक, जातिगत, क्षेत्रफल, आबादी और विकास आदि के आधार पर अलग राज्यों की मांग उठती रही है. इनमें से तकरीबन आधा दर्जन मांगें आज़ादी के तुरंत बाद से ही उठनी शुरू हो गई थी. आज़ादी से भी पहले 1907 में पश्चिम बंगाल में गोरखा लोगों के लिए अलग क्षेत्र की मांग सबसे पहले उठी थी. उसके बाद देश भर में एक दर्जन से अधिक राज्यों के निर्माण के आंदोलन अस्तित्व में हैं. गोरखालैंड, बोडोलैंड, विदर्भ, कार्बी आंगलांग, पूर्वांचल, पश्चिम प्रदेश, अवध प्रदेश, हरित प्रदेश और बुंदेलखंड आदि इसमें प्रमुख हैं.

यहाँ एक सवाल है कि पृथक राज्यों की मांग उठने का असल कारण क्या है? दरअसल, अलग-अलग जगहों से सांस्कृतिक, भाषाई, भौगोलिक और जातिगत आदि आधारों पर उठती दिख रही इन मांगों के पीछे इन आधारों पर हो रही इन तबकों की उपेक्षा ही मूल कारण है. अलग राज्य की मांग दरअसल इसी कारण से उभरती है कि वह विशेष समूह जो इस मांग को उठाता है, अपनी भाषा, संस्कृति, भूगोल या विकास के अवसरों आदि आधारों पर अपनी वर्तमान स्थिति में दमित है. उसे पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता या उसके पास सामान अवसर नहीं हैं.

भारतीय राज्य क्योंकि संवैधानिक तौर पर लोकतांत्रिक है. तो यह उसकी जिम्मेदारी का ही क्षेत्र है कि उपरोक्त आधार पर असमानता झेल रहे वर्गों के लिए वह ऐसी व्यवस्था करे कि उन्हें उनकी भाषा, सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषता, विशेष भौगोलिक स्थिति आदि विविध क्षेत्रों में विकास के समान अवसर मिल सके.
पृथक राज्य की मांग करने वाले समूहों का यह तर्क रहा है कि पृथक राज्य बन जाने से वह इसका स्वाभाविक हल पा लेंगे. राजनीतिक नेतृत्व में आ जाने से उन्हें इन क्षेत्रों में अवसरों की समानता के लिए किसी और का मोहताज नहीं रहना होगा. राज्यों के संबंध में भारतीय संवैधानिक स्थिति यह है कि राज्य केवल आपातकाल की स्थिति के इतर पर्याप्त सक्षम हैं. वाकई इन समूहों का तर्क इस आधार पर जायज है और नए राज्यों का अस्तिव हाशिए के इन समूहों का स्वाभाविक तौर पर सबलीकरण करेगा.  

उपरोक्त विभिन्न आधारों पर पृथक राज्यों की मांग के जायज होने के इस तर्क के बाद, 2000 में अस्तित्व में आये 3 नए राज्यों के हमारे अनुभव क्या हैं, इसकी पड़ताल भी जरूरी है. उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड, यह तीनों राज्य भी गहरे जन-आन्दोलनों के ही गर्भ से उपजे हैं. लेकिन आज तीनों राज्यों का जो दृष्टांत हमारे सामने फैला हुआ है उससे आन्दोलनों से इनकी पैदाइश का कोई रिश्ता समझ नहीं आता. चाहे जिस भी पवित्र एजेंडे के साथ राज्य आंदोलन चले हों लेकिन राज्य प्राप्ति के बाद राज्यों का नेतृत्व जिन हाथों में आया है उन्होंने तकरीबन उन सारे एजेंडों को पराभव की तरफ धकेला है. और आज का परिदृश्य तो कुछ और ही कहता लगता है, जैसे इन तीनों ही प्राकृतिक संपदाओं से संपन्न राज्यों का अस्तित्व इसलिए सामने आया कि यहाँ के प्राकृतिक संपदा की लूट आसान हो सके. इन राज्यों के अब तक के अनुभव यही कहते हैं. यहाँ सरकारों और कॉरपोरेट्स के गठजोड़ ने प्राकृतिक संसाधनों को बेतहाशा लूटा है. और इस लूट के लिए जनता को उसके जल, जंगल, जमीन पर अधिकारों से बेदखल किया है.  

इसी आलोक में यदि हम तेलंगाना को देखें, तो भारत का 20 फीसदी कोयला खदान तेलंगाना में हैं. वर्तमान आंध्रप्रदेश का 50 फीसद से अधिक जंगल तेलंगाना में फैला है. और भी प्राकृतिक संपदाओं के लिहाज से भविष्य का तेलंगाना एक समृद्ध राज्य होगा. ऐसे में, 2000 में अस्तित्व में आये हमारे तीन राज्यों के अनुभवों के बाद हम तेलंगाना की इस प्राकृतिक संपदा को कैसे देखें?

चलिए नए तेलंगाना राज्य के चुनावी राजनीतिक समीकरणों पर एक नजर डालें. आंध्र की 42 लोकसभा सीटों में से 17 तेलंगाना क्षेत्र की हैं. जिनमें से 12 पर कांग्रेस का कब्जा है. इसी तरह विधानसभा की 294 सीटों में से 119 सीटें तेलंगाना से आती हैं और 50 से ज्यादा अभी कांग्रेस के पास हैं. यानी मोटे तौर पर यह तय है कि नए तेलंगाना की पहली सरकार कांग्रेस के पाले में ही गिरनी है. यही समीकरण है कि कांग्रेस पृथक तेलंगाना राज्य के लिए तैयार नजर आती है.

अब सवाल यह है कि पूरे देश भर में कांग्रेस/सरकारों का जो व्यवहार प्राकृतिक संसाधनों के प्रति कॉरपोरेट लूट के लिए इन्हें प्रस्तुत करने का है, क्या वह तेलंगाना में बदल जाएगा? बेशक किसी भी राष्ट्र/राज्य के पास खुद के विकास के लिए उसके प्राकृतिक संसाधन ही उसकी सबसे प्रतिनिधि पूँजी है. तेलंगाना भी इसी पूंजी के निवेश (प्राकृतिक संसाधनों के विदोहन) से अपने राज्य की आर्थिक पृष्ठभूमि बनाएगा. लेकिन यहाँ सवाल है कि यह प्राकृतिक संसाधन कैसे उपयोग किये जायेंगे? इन संसाधनों के संबंध में जनता का अधिकार और भागीदारी क्या होगी?

उत्तराखंड का एक उदहारण लें जिसका रिश्ता आंध्रप्रदेश से भी है. उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों में नदियों में बहता पानी प्रमुख है. नए राज्य के गठन के बाद सरकारों ने पानी से जुड़े उद्योग, उत्तराखंड में स्थापित कर प्रदेश को ‘ऊर्जा प्रदेश’ बनाने की कवायद शुरू की. इसके लिए 558 जल विद्युत परियोजनाओं का रोड मैप तैयार किया गया ताकि प्रदेश में ‘हाइड्रो डॉलर’ की बरसात हो. इन्हीं परियोजनाओं में से एक का उदहारण यहाँ मौजू है.

टिहरी जिले के ‘फलिंडा’ गाँव में भी इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत एक 11.5 मेगावाट की  परियोजना शुरू की गई. यह परियोजना जिस कंपनी ने शुरू हुई इसका रिश्ता आंध्रप्रदेश से है. यह कंपनी आंध्रा के पूर्व मुख्यमंत्री राजशेखर रेड्डी के परिवार की है. ‘स्वास्ति पावर इंजीनियरिंग लिमिटेड’ नाम की इस कंपनी के एम.डी. राजशेखर रेड्डी के छोटे भाई रविन्द्रनाथ रेड्डी हैं. यह परियोजना जब प्रस्तावित हुई तो 11.5 मेगावाट की परियोजना के हिसाब से इसकी पर्यावरण आंकलन रिपोर्ट बनाई गई थी. शुरू से ही परियोजना के खिलाफ गाँव वाले प्रतिरोध करते रहे. प्रतिरोध और प्रदर्शनों के दौरान फलिंडा गाँव के तकरीबन प्रत्येक ग्रामीण को दो-दो बार जेल जाना पड़ा.

लेकिन कई तिकडमों के बाद कंपनी ने शासन-प्रसाशन से कई स्तर पर दबाव डलवा गाँव वालों को एक समझौते पर विवश कर दिया. जिसके तहत फलिंडा में बाँध बनना शुरू हुआ. कंपनी ने जिस परियोजना को 11.5 मेगावाट के साथ शुरू किया था, अचानक उसे पर्यावरण आंकलन रिपोर्ट और पर्यावरणीय क्लीयरेंस के बगैर ही 22 मेगावाट का कर दिया गया. इससे गाँव वालों के नदी के अपस्ट्रीम के डूबने वाले उपजाऊ खेतों की संख्या और बढ़ गई और डाउन स्ट्रीम के खेत टनल में डाईवर्ट कर दी गई नदी के चलते सूख गए.

बांधों के बारे में अति प्रचारित लेकिन फर्जी तथ्य है कि बाँध क्षेत्रीय लोगों के लिए रोजगार भी लाते हैं. फलिंडा का उदाहरण है कि आज फलिंडा के महज 5 ग्रामीणों को 5000 से लेकर 9000 के बीच में तनख्वाह पर, कंपनी ने रोजगार दिया है. औसतन कंपनी ने ग्रामीणों को मासिक 35,000 रूपये का रोजगार दिया है. इसके अलावा समझौते के आधार पर, कंपनी सालाना तौर पर डेढ़ लाख रुपया गाँव को देती है. यानी मासिक तौर पर कंपनी द्वारा कुल गांव को हुई आय 47500 रूपये है. और कंपनी का मासिक मुनाफा एक अनुमान के अनुसार 4 करोड़ ४० लाख रूपये है. यानी पहाड़ के गांवों के प्राकृतिक संसाधनों में इतनी क्षमता है कि वे महीने के 4 करोड़ से ऊपर मुनाफा कमा सकते हैं. क्योंकि पृथक राज्य के साथ स्वावलंबी विकास का सपना था तो जाहिरा तौर पर इस परियोजना के मालिक स्थानीय ग्रामीण भी हो सकते थे. इसका मुनाफा उस गाँव की तस्वीर बदल देता. और ऐसी ही परियोजनाएं स्वाभाविक ही पूरे राज्य की भी तस्वीर बदल देतीं. सरकार को ऐसे अवसर मुहैया कराने थे. लेकिन इसके आभाव में ग्रामीणों के पास पलायन के सिवा कोई विकल्प नहीं बच रहा है.

फलिंडा में ग्रामीणों से उनकी खेती छीन ली गई, उनकी नदी छीन ली गई प्रतिरोध करने पर प्रशासन ने उन्हें जेलों में ठूसा. और इसके एवज में उन्हें क्या मिला और कंपनी को क्या, यह सामने है. समूचे उत्तराखंड के पास यही उदाहरण हैं. सरकारों ने उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों को निजी कंपनियों के मुनाफे और लूट के लिए खुली छूट दी हुई है. यह अकेले उत्तराखंड का नहीं बल्कि दोनों अन्य नए राज्यों, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ का भी यही हाल है. और समूचा देश ही दरअसल सरकार और कॉरपोरेट के इस गठजोड़ और लूट का शिकार है.

ऐसे में राज्य गठन को मुक्ति मान, संघर्ष में अपना सर्वस्व झोंक चुकी जनता के पास इस अपने उद्देश्य को पा लेने के बाद भी निराशा ही हाथ लगती है. बहुत संभव है कि तेलंगाना भी इन्हीं अनुभवों से गुजरेगा.  

तेलंगाना का अन्य सभी राज्य आन्दोलनों के इतर एक खास इतिहास भी रहा है. तेलंगाना के राज्य आंदोलन उभार के साथ देश के माओवादी आंदोलन का भी गहरा रिश्ता रहा है. भारत के वर्तमान माओवादी आंदोलन के अधिकतर प्रतिनिधि नेताओं की शुरूआती ट्रेनिंग पृथक तेलंगाना राज्य आंदोलन के दौरान हुई है और माओवादियों के समर्थक कई राजनीतिक/सांस्कृतिक समूहों ने तेलंगाना राज्य आन्दोलनों को उसके चरम पर पहुंचाया. और आज पूरे देश में कॉरपोरेट और सरकारी गठजोड़ के लूटतंत्र के खिलाफ जिस आंदोलन ने अपनी मजबूत स्थिति दर्ज कराई है वह यही माओवादी आंदोलन है.

लेकिन क्योंकि माओवादी पार्टी चुनावी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी से परहेज करती है. तो स्वाभाविक ही तेलंगाना के नए राज्य के बन जाने से वह उन राजनीतिक लाभों से वंचित ही रहेगी जिसकी संविधान में व्यवस्था है. यानि सीपीआई माओवादी के लिए पृथक राज्य बन जाने के बाद भी समूचे परिदृश्य में कोई भारी बदलाव नहीं आएगा. उसका संघर्ष अपनी मूल दिशा में ही स्थाई रहेगा. संभवतः नए राज्य की मांग के दौर में बना उसका जनाधार नए राज्य में भी स्थितियों में परिवर्तन न देख निराश हो, और गहरी निराशा की ओर न धंसता चला जाय. एक लंबे संघर्ष से राज्य पा लेने की परिणिति भी यदि दूसरे लंबे संघर्ष की ओर बढ़ना ही हुई तो जनता से कितने लंबे धैर्य और त्याग की उम्मींद की जाय?

लोकतंत्र में जनता की चेतना ही एक मात्र पैरामीटर हो सकती है कि वे लोकतांत्रिक संस्थाओं का कितना लाभ ले सके. चेतना के अभाव की स्थिति में चाहे कितने भी छोटे-छोटे राज्यों का निर्माण किया जाय, समाज में पूर्ववत मौजूद वर्चस्व की विभिन्न श्रेणियाँ/संस्थाएं ही असल लाभ पाएंगी. उदाहरण के लिए भाषा के आधार पर पृथक कर दिए जाने पर संभवतः नए राज्य में जातीय आधार पर एक नया वर्चस्व इसका लाभ उठाये. और माना जाति के आधार पर ही पृथक राज्य का गठन हुआ हो तो पूंजीवादी लोकतंत्र में तयशुदा तौर पर एक खास वर्ग ही वर्चस्व पर कब्ज़ा कर लेगा. ना सिर्फ पृथक राज्यों के अपितु पूरे देश भर के हमारे पास यही अनुभव हैं. यहाँ यह समझना बेहद अनिवार्य है कि समाज में स्थापित ढेरों वर्चस्व की इन श्रेणियों को अगर इसी क्रम में तोड़ना हुआ तो इसकी अंतिम सीमा क्या होगी? या कोई ऐसा आंदोलन संभव है जो इन विविध श्रेणियों पर एक साथ चोट करे? बहरहाल, अगर ‘वर्ग संघर्ष’ में इसे देखा जाय तो उसमें यह संभावनाएं नजर आती हैं.  

इसलिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण सवाल है कि पृथक राज्यों की जायज मांग कर रही आंदोलनकारी ताकतें अपने समाज में असल जनतांत्रिक चेतना के प्रसार और मूल्यों को स्थापित करने के लिए कितनी प्रयासरत हैं? एक और महत्वपूर्ण मसला है कि वर्गीय चेतना की इस आंदोलन और उसके नेतृत्व की समझदारी क्या है, और इसके प्रसार के लिए उनके पास क्या एजेंडा है? जबकि उन्हें इसके लिए सिर्फ प्रयासरत नहीं रहना बल्कि इन्हें स्थापित करना है. पृथक राज्य के वास्तविक लाभ के लिए इसके इतर कोई विकल्प नहीं है.