विज्ञापनों की राजनीति

भूपेन सिंह
-भूपेन सिंह

"...शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि पूरा कॉरपोरेट मीडिया ट्राइ के निर्देशों का विरोध कर रहा है लेकिन उदय शंकर का ट्राइ के पक्ष में बयान आने के बाद यह बात साफ़ हो जाती है कि बड़े मीडिया मालिक उदय की बात को लेकर एक राय हैं. बड़े मालिकों की प्रभाव वाली संस्था इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन (आइबीएफ़) ने भी ट्राइ के निर्देशों के ख़िलाफ़ पहले दर्ज अपने आपत्ति वापस ले ली है. इसका मतलब साफ़ है कि बारह मिनट की समयसीमा निर्धारित हो जाने से विज्ञापनों की क़ीमत बढ़ जाएगी और बड़े खिलाड़ियों को फ़ायदा होगा, इसीलिए वे अब यूटर्न ले रहे हैं..."

कार्टून साभार- http://www.thehindu.com
दुनिया भर में कुख्यात मीडिया सम्राट रुपर्ट मर्डाक के भारतीय साम्राज्य स्टार इंडिया के सीईओ उदय शंकर देश में मीडिया की दशा को लेकर काफ़ी चिंतित हैं! चौदह सितंबर को उन्होंने अंग्रेजी दैनिक बिजनेस स्टैंडर्ड को दिए एक इंटरव्यू में कुछ ऐसी बातें कही हैं जो टेलीविजन विज्ञापनों को लेकर अब तक दिए गए भारतीय मीडिया मालिकों और मैनेजरों के बयानों से बिल्कुल ही उलट है. उदय शंकर ने टेलीविजन पर एक घंटे में सिर्फ़ बारह मिनट के विज्ञापन दिखाए जाने के भारत के दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राइ) के निर्देशों का समर्थन किया है. उक्त इंटरव्यू में उदय शंकर ने कहा है कि मीडिया में असीमित विज्ञापन उसे कम क़ीमत में विज्ञापन छापने या दिखाने को बाध्य करते हैं ऐसी स्थिति विज्ञापनदाताओं को फ़ायदा पहुंचाती है (अनलिमिटेड एडवर्टाइजिंग इन्वेंटरी हैज लैड टु प्राइसिंग प्रेशर, बैनेफिंटिंग ऑनली एडवर्टाइजर्स). उदय का यह बयान भारतीय कॉरपोरेट मीडिया के अंतरर्विरोधों को सामने लाने के साथ ही उसके मुनाफ़ोखोर चरित्र की भी पोल खोलता है, साथ ही यह छोटे मीडिया उपक्रमों के अस्तित्व को ख़त्म करने को उकसाने वाला और मीडिया संकेंद्रण की प्रवृत्तियों की ओर इशारा करने वाला भी है. इस मामले में सरकारी नीति की नाकामी की वजह से आने वाले दिनों में भारतीय मीडिया परिदृश्य और भी अराजक और पूरी तरह बड़े कॉरपोरेट के पूरी तरह नियंत्रण में आ सकता है.

उदय शंकर के उपरोक्त बयान की आलोचना करने का मतलब टेलीविजन चैनलों में बारह मिनट से ज़्यादा विज्ञापन दिखाने का समर्थन करना नहीं है बल्कि उस ख़तरे को सामने लाना है जिसमें बड़ी पूंजी पर टिकी मीडिया कंपनियां, छोटी मीडिया कंपनियों को बाज़ार से बाहर का रास्ता दिखाने पर आमादा हैं. फिलहाल स्टार इंडिया देश का सबसे बड़ा कॉरपोरेट मीडिया प्रसारक है. इसके आठ भारतीय भाषाओं में तैंतीस चैनल चलते हैं. एक तरह से यह भारतीय मीडिया के संकेंद्रण की दिशा में जाने की बानगी पेश करता है. यानी फिलहाल भारतीय मीडिया कुछ ही गिनी-चुनी बड़ी कंपनियों के नियंत्रण में आ चुका है और  आने वाले दिनों में यह ख़तर बढ़कर एकाधिकार की शक्ल भी ले सकता है. मीडिया संकेंद्रण का सबसे बड़ा ख़तरा यह होता है कि मीडिया के बड़े हिस्से के बड़े कॉरपोरेट के नियंत्रण में आ जाने से आम जनता के जीवन संघर्षों का सामने आना और भी मुश्किल होता चला जाता है. बड़ी कंपनियां अपने हितों के हिसाब से जनता तक अपने कार्यक्रम या संदेश पहुंचाती हैं जिस वजह से दर्शकों या पाठकों के बीज एक ख़ास तरह का जनमत तैयार होता है. कॉरपोरेट मीडिया में भले ही कभी-कभी कुछ कॉरपोरेट अंतरविरोध सामने आ जाएं लेकिन कोई भी बात सही मायनों में बड़े कॉरपोरेट के ख़िलाफ़ नहीं जा सकती. उदय शं कर का बयान भी कॉरपोरेट मीडिया के इसी अंतरविरोध का उदाहरण है. अगर वे यह कहते हैं कि बारह मिनट से ज़्यादा विज्ञापन दिखाने में प्रसारकों का नुक़सान और विज्ञापनदाताओं का फ़ायदा  है तो यहां पर वह सारे प्रसारकों को एक ही तराजू पर तौलने की चालाकी करते हैं. उनके इस बयान से छोटी मीडिया कंपनियां उनसे नाराज़ हैं.

यह बात सही है कि छोटे प्रसारकों में से ज़्यादातर तरह-तरह के धंधों में जुटी छोटी-मोटी कंपनियां सामने आई हैं जिनका पहला लक्ष्य मीडिया का सहारा लेकर अपने बाक़ी धंधों को चमकाना और मुनाफ़ा कमाना ही है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि बड़ी-बड़ी भ्रष्ट कंपनियों के हवाले सबकुछ कर दिया जाए. कॉरपोरेट परस्त मीडिया नीति की वजह से जन पक्षधर शक्तियों के लिए टेलीविजन चैनल शुरू करना और बाज़ार में टिक पाना पहले से ही मुश्किल है. अब अगर सिर्फ़ बड़ी-बड़ी मीडिया कंपनियों का एकाधिकार स्थापित हो गया तो इससे जनपक्षीय टेलीविजन प्रसारण की बचीखुची संभावना भी पूरी तरह से ख़त्म हो जाएगी. उदय शंकर जिस बात की तरफ़ इशारा कर रहे हैं उसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि विज्ञापनों के लिए बारह मिनट की समयसीमा का पालन करने पर विज्ञापनदाताओं को ज़्यादा भुगतान करने पर मज़बूर होना पड़ेगा और इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा बड़ी मीडिया कंपनियों को ही मिलेगा. विज्ञापनों की कम क़ीमत के भरोसे चलने वाली मीडिया कंपनियां धीरे-धीरे बंद होने के कगार पर पहुंच जाएंगी. यह बात और है कि दूसरे धंधों का पैसा मीडिया में लगाने वाली कंपनियों के छोटे-मोटे चैनल चलते  रहेंगे लेकिन वे सिर्फ़ अपने बाक़ी के धंधों को चमकाने के लिए अपनी पूंजी का इस्तेमाल मीडिया में करेंगे. ऐसी स्थिति में मीडिया में सुधार होने के बजाय यह और ज्यादा अराजक होता जाएगा.

भारतीय मीडिया के विज्ञापनों पर निर्भर होने की वजह से ही यह कभी सही मायने में वॉचडॉग या लोकतंत्र के प्रहरी की भूमिका नहीं निभा पाया. आज़ादी के बाद से ही विज्ञापनों का मामला विवाद का विषय रहा  है. जब सरकारी और निजी टेलीविजन चैनलों का इस तरह से विस्फोट नहीं हुआ था तब भी पहले और दूसरे प्रेस आयोग ने अख़बारों के लिए विज्ञापनों की सीमा निर्धारित करने की बात कही थी. लेकिन अख़बारों में अधिकतम साठ फ़ीसदी ख़बरों और चालीस फ़ीसदी विज्ञापनों देने का मामला कभी तय नहीं हो पाया. भले ही सरकार ने इसे लागू करने की इच्छाशक्ति न दिखाई हो लेकिन तब सरकार की तरफ़ से छोटे और मझौले अख़बारों को सरकारी विज्ञापन दिलवाने की कुछ सुविधाएं थी, हालांकि इस व्यवस्था की भी हज़ार गड़बड़ियां थी लेकिन अब टेलीविजन चैनलों को विज्ञापन मिलने के मामले में तो वे सुविधाएं भी नहीं काम करती हैं. वैसी भी बड़ी पूंजी की सेवा में लगी सरकार छोटे मीडिया को फ़लते-फूलते नहीं देखना चाहती. वरना सरकार ने एक ही मीडिया कंपनी के अनगिनत चैनल खोलने पर रोक लगा दी होती जिससे छोटी-छोटी मीडिया कंपनियां भी टिक पाती कॉरपोरेट हितों को छोड़कर मीडिया का एक हिस्सा जनहित में भी काम करता. 

दस सितंबर को दिल्ली में भारतीय उद्योग संघ (सीआइआइ) ने दिल्ली में बिग पिक्चर नाम से एक मीडिया सम्मिट किया जिसमें बड़े-बड़े उद्योगपतियों के साथ नेताओं और सेलीब्रिटीज ने भी बड़ी संख्या में शिरकत की. उदय शंकर के अलावा उनके जैसे और भी कई कॉरपोरेट मीडिया के प्रतिनिधि इस सम्मिट की शोभा बढ़ा रहे थे.भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग पर  जारी उद्योग पर वहां बड़ी-बड़ी बातें की गई. बार-बार दोहराया गया कि भारतीय मीडिया दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है. इस मौक़े पर सीआइआइ ने इंडिया इंटरटेमेंट एंड मीडिया आउटलुट-2013 नाम से एक रिपोर्ट जारी की जिसमें वर्तमान हालात को देखते हुए अनुमान लगाया गया है कि मीडिया उद्योग में दो हज़ार सत्रह तक अठारह फ़ीसदी की बढ़ातरी हो गी और तब यह कुल दो लाख चौबीस हज़ार पांच सौ करोड़ का व्यापार हो जाएगा. इसका सीधा सा मतलब था कि बड़ी मीडिया कंपनियां धीरे-धीरे पूरे भारतीय मीडिया को नियंत्रण में करती जा रही हैं और उन्हीं की तरक्की हो रही है. वरना ऐसा कैसे होता कि बहुत सारे प्रसारक विज्ञापनों की सीमा कम करने को लेकर दुखी हैं. वे अपने घाटे का  रोना रो रही  हैं फिर भी मीडिया उद्योग फल फूल रहा है और आने वाले सालों में भी उसकी तरक्की के दावे किए जा रहे हैं? इसका मतलब साफ़ है कि बाज़ार में छोटे-बड़े के बीच लड़ाई चल रही है. गौरतलब यह भी है कि उदय शंकर भारतीय व्यापारियों की संस्था फेडरेशन ऑफ़ इंडियन चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (फिक्की) की मीडिया एंड एंटरटेनमेंट कमेटी के भी हेड हैं.   

शुरुआत में ऐसा लग रहा था कि पूरा कॉरपोरेट मीडिया ट्राइ के निर्देशों का विरोध कर रहा है लेकिन उदय शंकर का ट्राइ के पक्ष में बयान आने के बाद यह बात साफ़ हो जाती है कि बड़े मीडिया मालिक उदय की बात को लेकर एक राय हैं. बड़े मालिकों की प्रभाव वाली संस्था इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन (आइबीएफ़) ने भी ट्राइ के निर्देशों के ख़िलाफ़ पहले दर्ज अपने आपत्ति वापस ले ली है. इसका मतलब साफ़ है कि बारह मिनट की समयसीमा निर्धारित हो जाने से विज्ञापनों की क़ीमत बढ़ जाएगी और बड़े खिलाड़ियों को फ़ायदा होगा, इसीलिए वे अब यूटर्न ले रहे हैं. विज्ञापन कंपनियां और छोटे प्रसारक अब भी ट्राइ का विरोध कर रहे हैं क्योंकि इसमें इन दोनों ही छोटे धंधेबाज़ घटकों का घाटा तय है. न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) अब भी ट्राइ का विरोध कर रहा है. ट्राइ ने अपने निर्दोशों का पालन करने के लिए एक अक्टूबर की तारीख़ तय कर रखी है इन पंक्तियों के लिखे जाने तक यह साफ़ नहीं हो पाया है कि ट्राइ के निर्देशों का पालन होगा या नहीं.


इस हालात को देखकर भले ही कुछ लोग इसे छोटे और बड़े मालिकों के  हितों के टकराव तक ही सीमित दे ख रहे हों लेकिन भारतीय मीडिया की हालत को ठीक देखने की तमन्ना रखने वाले जानते हैं कि इस बहस में उलझकर किसी एक का पक्ष लेना बिल्कुल निरर्थक है. टेलीविजन विज्ञापनों की अवधि तो कम से कम होनी ही चाहिए लेकिन यह सिर्फ़ मीडिया मालिकाने की बीमारी का एक लक्षण है इसका इलाज कर मीडिया के हालात नहीं सुधारे जा सकते. इसलिए असली बीमारी का इलाज़ ज़रूरी है. ट्राइ की इस एक पहल के लागू हो जाने से भी कुछ नहीं होने वाला. असली बात तो यह है कि हाल ही संसद की सूचना तकनीक पर बनी स्टैंडिंग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में भारतीय मीडिया की विरूपित स्थिति को लेकर काफ़ी प्रभावशाली रिपोर्ट तैयार की है जिसमें गड़बड़ियों को रोकने के लिए मीडिया मालिकाने के नियमन की वकालत की गई है. इस रिपोर्ट के लागू होने पर भारत में मीडिया एकाधिकार के ख़तरों से बचा जा सकता है. लेकिन हैरत की बात  यह है कि सरकार इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाली हुई है और प्रसारकों के बीच चल रही इस बहस का मज़ा ले रही है. 

भूपेन पत्रकार और विश्लेषक हैं। कई न्यूज चैनलों में काम। 
अभी आईआईएमसी में अध्यापन कर रहे हैं। 
इनसे bhupens@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।