लेखिका सुष्मिता बनर्जी की हत्‍या की निंदा

प्रेस विज्ञप्ति

सांप्रदायिकता और धार्मिक कठमुल्लापन की संरक्षक राजनीति के खिलाफ जनचेतना संगठित करना वक्‍त की जरूरत है : जसम

नई दिल्‍ली, 7 सितंबर 13
http://timesofindia.indiatimes.com/thumb/msid-22341485,width-300,resizemode-4/Indian-author-Sushmita-Banerjee-shot-dead-in-Afghanistan.jpgम अफगानिस्तान में हुई भारतीय लेखिका सुष्मिता बनर्जी की हत्या की सख्त शब्दों में निंदा करते हैं। यह पूरे एशिया में मानवाधिकार, लोकतंत्र और आजादी पर बढ़ रहे हमले का ही एक उदाहरण है। इस हत्या ने सांप्रदायिक ताकतों और उनको शह देने वाले अमरीकन साम्राज्यवाद तथा नागरिकों की सुरक्षा और मानवाधिकार के लिहाज से विफल सरकारों के खिलाफ एशिया के देशों में व्यापक जनउभार की जरूरत को फिर से एक बार सामने ला दिया है। हालांकि तालिबान ने इस हत्या में अपना हाथ होने से इनकार किया है, पर इस धार्मिक कठमुल्लावादी संगठन, जिसे अमरीकन साम्राज्यवाद ने ही पाला-पोसा, का महिलाओं की आजादी और उनके मानवाधिकार को लेकर बहुत खराब रिकार्ड रहा है। इसने अतीत में भी अपने फरमान न मानने वाली महिलाओं की हत्या की है। यह हत्या अफगानिस्तान में काम कर रही भारतीय कंपनियों और भारतीय दूतावास पर होने वाले तालिबानी हमलों से इसी मामले में भिन्न है। 


सुष्मिता बनर्जी एक साहसी महिला थीं। उन्होंने अफगानिस्तान के व्‍यवसायी जाबांज खान से शादी की थी और 1989 में उनके साथ अफगानिस्तान गई थीं। उन्होंने खुद ही लिखा था कि तालिबान के अफगानिस्तान में प्रभावी होने से पहले तक उनकी जिंदगी ठीकठाक चल रही थी, लेकिन उसके बाद जिंदगी मुश्किल हो गई। वे जो दवाखाना चलाती थीं, तालिबान ने उसे बंद कर देने का फरमान सुनाया था और उन पर कमजोर नैतिकता की महिला होने की तोहमत लगाई थी। सुष्मिता ने अफगानिस्तान में क्या महसूस किया और किस तरह वहां से भारत पहुंची, इसकी दास्तान उन्होंने 1995में प्रकाशित अपनी किताब ' काबुलीवालार बंगाली बोऊ ' यानी काबुलीवाला की बंगाली पत्नी में लिखा। इस किताब पर एक फिल्म भी बनी। हालांकि अभी हाल वे फिर अफगानिस्तान लौटीं और स्वास्थ्य कार्यकर्ता के रूप में अपना काम जारी रखा। अफगानिस्तान में सैयदा कमाला के नाम से जानी जाने वाली सुष्मिता बनर्जी स्थानीय महिलाओं की जिंदगी की हकीकतों का अपने कैमरे के जरिए दस्तावेजीकरण का काम भी कर रही थीं। अफगानिस्तानी पुलिस के अनुसार पिछले बुधवार की रात उनके परिजनों को बंधक बनाकर कुछ नकाबपोश बंदूकधारियों ने उन्हें घर से बाहर निकाला और गोलियों से छलनी कर दिया।

हम इसे अफगानिस्तान की परिघटना मानकर चुप नहीं रह सकते, मध्यपूर्व के कई देशों में जहां सरकारों के खिलाफ बड़े-बड़े जनांदोलन उभर रहे हैं, वहां भी कट्टर सांप्रदायिक-धार्मिक शक्तियां और उनके साम्राज्यवादी आका अपनी सत्ता कायम रखने की कोशिशें कर रहे हैं। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप या दक्षिण एशिया में भी इस तरह की ताकतों ने सर उठा रखा है। तस्लीमा नसरीन को लगातार मौत की धमकियों के बीच जीना पड़ रहा है। आस्‍ट्रेलियन ईसाई मिशनरी के फादर स्‍टेंस की निर्मम हत्‍या भी भारत में ही हुई है।  विगत 20 अगस्‍त को अंधविश्‍वास विरोधी आंदोलन के जाने माने नेतृत्‍वकर्ता डॉ.  नरेंद्र दाभोलकर की हत्‍या कर दी गई और दो हफ्ते से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अभी तक उनके हत्‍यारे गिरफ्त में नहीं आए हैं। बांग्लादेश में 71 के युद्ध के दौरान कत्लेआम करने वाले धार्मिक कट्टरपंथियों के खिलाफ उभरे जनांदोलन में साथ देने वाले नौजवान ब्‍लागर्स की हत्या हो चुकी है। बाल ठाकरे की मौत के बाद बंद को लेकर फेसबुक पर टिप्पणी करने वाली लड़की और उसे लाइक करने वाली उसकी दोस्त की गिरफ्तारी भी कोई अलग किस्म की परिघटना नहीं हैं। महज अफगानिस्तान में ही सरकार नागरिकों के जानमाल की सुरक्षा देने में विफल नहीं है, बल्कि भारत में भी यही हाल है। 

खासकर कई हिंदुत्ववादी संगठन देश के विभिन्‍न हिस्सों में सांप्रदायिक-अंधराष्ट्रवादी दुराग्रहों के तहत लोगों पर हमले कर रहे हैं, अपराधी बलात्कारी बाबाओं की तरफदारी में आतंक मचा रहे हैं और सरकारें उनके खिलाफ कुछ नहीं कर रही हैं। संप्रदाय विशेष से नफरत के आधार पर भारत में भी राजनीति और धर्म की सत्ताएं सामूहिक अंतरात्मा के तुष्टिकरण के खेल में रमी हुई हैं। इसका विरोध करने के बजाए तमाम शासकवर्गीय राजनीतिक पार्टियां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की हरसंभव कोशिशों में लगी हैं। दलित मुक्ति के प्रति प्रतिबद्ध लेखक कंवल भारती पर समाजवादी पार्टी के एक मंत्री के इशारे पर सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने का आरोप भी इसी तरह का एक उदाहरण है। 

इसलिए सुष्मिता बनर्जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि सांप्रदायिकता, पितृसत्‍ता और धार्मिक कठमुल्लापन की प्रवृत्ति को संरक्षण देने वाली राजनीति और उसकी साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ साठगांठ के खिलाफ व्यापक जनचेतना संगठित की जाए। यह कठिन काम है, पर यह आज के वक्त में किसी भी समय से ज्यादा जरूरी काम है। 
सुधीर सुमन, राष्‍ट्रीय सह‍सचिव, 
जन संस्‍कृति मंच द्वारा जारी, 
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