पूर्वाग्रहों का 'सत्याग्रह'

विनय सुल्तान

-विनय सुल्तान

"...वैसे तो पूरी कहानी ही बड़ी बेहूदगी से बुनी हुई है। कहानी की असल शुरुवात होती है एक सेवानिवृत्त स्कूल टीचर द्वारा लालफ़ीताशाही के विरोध में डीएम को थप्पड़ जड़े जाने के से। इसके बाद उस शिक्षक को जेल में ठूंस दिया जाता है। इसके विरोध में वर्चुअल मीडिया पर एक आंदोलन खड़ा होता है। यह मीडिया का उपयोग करते हुए जमीनी स्तर पर एक क्रिटिकल मास पा लेता है। इसके बाद यह पूरी तरह अन्ना आंदोलन की शक्ल ले लेता है।..."

प्रकाश झा समसामयिक राजनीति पर सिनेमा बनाने के लिए जाने जाते हैं। इसे इस तरह से भी कहा जा सकता है की वो समसामयिक राजनीति पर कबाड़ा सिनेमा बनाने के लिए जाने जाते हैं। चक्रव्यूह में माओवादी आंदोलन को हिंसा और सिर्फ प्रतिहिंसा के आयामों में खोल कर पूरे आंदोलन की बुनियादी राजनीति को जिस तरह से किनारे लगाया था वो कम प्रतिभा वाला काम नहीं था। समकालीन राजनीतिक मुद्दो का कैमरे से कत्ल करना इनसे सीखा जा सकता है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की पर्दे पर हत्या देखनी हो तो आप सत्याग्रह जरूर देखें।

पूरी फिल्म का राजनीतिक विमर्श तब उघड़ जाता है, जब भारत के भविष्य के बारे मे बात करते हुए अजय देवगन कहते हैं “ये आज के भारत का नौजवान है, बीपीओ मे नौकरी करता है, चालीस हजार महीने कमाता है, टैक्स भरता है। ये सरकार का क्लाइंट है। इसे अच्छी सेवा पाने का हक़ है।” लोकतन्त्र पर इस तरह की बाजारू समझ हैरान कर देने वाली है। साथ ही ये उन बुद्धिजीवियों के लिए बड़ा सवाल है जो अन्ना-आंदोलन को लोकतांत्रिकरण की प्रक्रिया की दिशा मे अहम घटना-विकास के तौर पर देख रहे थे। प्रकाश झा की राजनीतिक समझ कितनी उथली है इसे बार-बार उदाहरण के साथ समझना-समझाना अब गैरजरूरी लगता है।

इस फिल्म पर बात करते हुए अन्ना आंदोलन पर बात करना बेहद जरूरी है। अपनी तमाम आलोचनाओं से इतर इस आंदोलन के कुछ ऐसे पहलू हैं जिन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए। इस आंदोलन ने उत्तर भारत की जनता में एक राजनीतिक चेतना को उभारा जबकि इसके पास कोई संगठन या कार्यकर्ता नहीं थे। और यदि थे भी तो इतने बड़े आंदोलन को खड़ा करने मे सक्षम तो कतई नहीं थे। मुझे याद है जब अन्ना हज़ारे को तिहाड़ ले जया गया तो मेरे गाँव (पश्चिमी राजस्थान) के लोग चार बसों में भर कर इस आंदोलन मे शिरकत करने आए थे। दूसरा इस आंदोलन ने उस नौजवान पीढ़ी का कुछ हद तक राजनीतिकरण किया जिसका हमारी शिक्षा व्यवस्था के जरिये बड़ी तरतीब से अराजनीतिकरण और भगवाकारण हुआ था। भगवाकरण से मेरा मतलब शिशु मंदिर द्वारा सींची गई खरपतवार से है जो हिन्दू राष्ट्र के बंजर सपने पर उगी हुई है। हालांकि इस आंदोलन के राजनीतिक संस्करण के परिणाम अभी देखने बाकी हैं, पर मेरा इतिहासबोध इसके ‘सम्पूर्ण क्रांति’ की तरह ही भरभरा जाने की तरफ इशारा करता है। इस आंदोलन के पास पर्याप्त विचारधारत्मक आलंबन का अभाव है जिससे यह लंबी लड़ाई के लिए तैयार नहीं दिखता।

प्रकाश झा की फिल्म ने राजनीतिकरण की इस प्रक्रिया को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया। सिर्फ एक दो दृश्यों में समाने के प्रयास ने इसे वीभत्स अन्याय का शिकार बना दिया। सिर्फ एक दृश्य ऐसा था जो इसे सतही रूप से छूता है, वो भी छात्रों और शिक्षक का चंद सैकंड का संवाद। जिस कारण यह आंदोलन तमाम बुद्धिजीवी हलकों में विमर्श का कारण बना उसे आपने चंद सैकंडो में कब्र मे सुला दिया।

वैसे तो पूरी कहानी ही बड़ी बेहूदगी से बुनी हुई है। कहानी की असल शुरुवात होती है एक सेवानिवृत्त स्कूल टीचर द्वारा लालफ़ीताशाही के विरोध मे डीएम को थप्पड़ जड़े जाने के से। इसके बाद उस शिक्षक को जेल मे ठूंस दिया जाता है। इसके विरोध में वर्चुअल मीडिया पर एक आंदोलन खड़ा होता है। यह मीडिया का उपयोग करते हुए जमीनी स्तर पर एक क्रिटिकल मास पा लेता है। इसके बाद यह पूरी तरह अन्ना आंदोलन की शक्ल ले लेता है। ठीक उसी तरीके से अनशन, तिरंगा लहराया जाना, और सरकार के लिए जनता के दिशा निर्देश आदि-आदि। यहाँ तक ये ठीक था। अन्ना आंदोलन का कुछ-कुछ यथार्थवादी चित्रण एक बार पचाया भी जा सकता है।

फिल्म की कहानी अपने अंतिम भाग में जा कर बेहूदा हो जाती है जब अचानक ये आंदोलन फिल्मी तरीके से हिंसक हो जाता है। अरे ये क्या हुआ अचानक अन्ना आंदोलन पर बनी इस फिल्म मे लालगढ़ जैसा कुछ टपक पड़ता है। अंबिकापुर को सीआरपी चारों ओर से घेरे हुए है। अचानक अम्बिकापुर के अहिंसक आंदोलनकारी पुलिस के खिलाफ हथियारबंद मोर्चा खोल देते हैं। अर्जुन रामपाल जो इस फिल्म मे आंदोलन के जननेता कि तरह चित्रित हुए हैं, हाथ मे एके-56 ले कर इस हथियारबंद मोर्चे का नेतृत्व करते दिखाये जाते हैं। पूरा अम्बिकापुर अराजकता और आगजनी का शिकार हो जाता है। इसी घटाघोप  के बीच अमिताभ बच्चन नौवाखली के गांधी की तरह हिंसा न करने की अपील करते हुए अर्धविक्षिप्त हालत मे भटकते नज़र आते हैं। और उसके बाद बिरला हाउस के गांधी की स्टाइल मे शहीद हो जाते हैं। तभी आपके मुंह से बरबस ही निकलता है “लानत है”।

फिल्म के आखरी शॉट का सौंदर्य आपको प्रभावित कर सकता है जहां अमिताभ की तस्वीर के सामने शोकसंतप्त अजय देवगन का प्रतिबिंब आधी तस्वीर पर दिखाता है। देखने पर ऐसा लगता है जैसे दोनों एकाकार हो रहे हैं। पर इसके राजनीतिक निहतार्थ समझने बहुत जरूरी हैं। इस फिल्म मे अमिताभ बच्चन के शहीद होने से पहली चीज ये हुई कि, फिल्म के अंत को गांधीवादी रूप दे दिया गया। दूसरा और गंभीर अर्थ अन्ना हज़ारे की राजनैतिक हत्या के संदर्भ में समझना होगा। इस फिल्म ने अन्ना हज़ारे(दूसरा गांधी) को अंत में शहीद बना कर अप्रासंगिक करने कि चालाक कोशिश की है जबकि अन्ना अभी अलग राजनैतिक मोर्चे पर अपनी जमीन तलाश रहे हैं। यहाँ अरविंद और अन्ना के बीच राजनीति में आने के विकल्प पर हुई बहस पर पूरी तरह से पर्दा डाल कर अरविंद केजरीवाल को अन्ना के अक्ष के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। इस जगह ये सिर्फ सिनेमाई कहानी है वाला तर्क देने से काम नहीं चलाने वाला। एक सीनियर साथी से मिली जानकारी के अनुसार आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता रीगल सिनेमा के बाहर खड़े हो कर लोगों को यह फिल्म देखने की अपील कर रहे थे। गौरतलब है की 30 अगस्त को आम आदमी पार्टी के लिए इस फिल्म का विशेष प्रदर्शन किया गया था। अफवाह तो ये भी है कि,ये फिल्म आम आदमी पार्टी से आर्थिक सहायता प्राप्त है। ये महज़ अटकलबाजी हो सकती है पर आप कि तरफ इसके अत्यधिक झुकाव से इंकार नहीं किया जा सकता।  

इसके अलावा प्रकाश झा ने अपनी इस फिल्म में भी एक आइटम सोंग (शब्द से गंभीर आपत्ति है) फिल्माया है। गंगाजल, अपहरण, चक्रव्युह, आदि सभी फिल्मों में प्रकाश झा ने इसका खूब प्रयोग किया है। ये प्रवृत्ति समकालीन मुख्य धारा मे कैंसर के माफिक फैली हैं। आज जब एक के बाद एक धर्म गुरु यौन शोषण के आरोप मे घेरे जा रहे हैं। दिल्ली के बाद मुंबई में एक फोटो पत्रकार सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई है। पितृसत्ता को झकझोर देने वाले प्रदर्शन हो रहे हैं। हम सिनेमा मे पुरुष कुंठा को संतृप्त करने वाली इस बेहूदा प्रवृति से निजात पाने के लिए कब तक इंतज़ार करेंगे। यह और अधिक खीज पैदा करता है जब मुंबई मे पितृसत्ता के खिलाफ चल रहे प्रदर्शन में बॉलीवुड सितारे भीड़ बढ़ाने पहुँच जाते हैं, टीवी बाइट देते हैं, फोटो खिंचवाते हैं। क्या उनके पास इस तरह के विरोध प्रदर्शन में शिरकत करने का कोई नैतिक आधार हैं जो अपने सिनेमा से बलत्कार जैसी घटना को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दे रहे हैं। आप हाल मे ही प्रसारित होने वाली फिल्म ग्रेंड मस्ती का प्रोमो देख लीजिये। आपको घिन्न आ जाएगी। 

इस फिल्म की समीक्षा लिखने कि जरूरत तब महसूस हुई जब कई समीक्षाओं में बच्चन के लिए “सदी के महानायक” जैसे अलंकारो का प्रयोग होते देखा। कम से कम एक समीक्षक के रूप में आपको इस तरह के मिथकों से बचना चाहिए। व्यसायिक सफलता किसी अदाकार के उम्दा होने कि गारंटी नहीं है। वैसे भी जिस सिनेमा ने अमिताभ को व्यावसायिक सफलता दी वो राजनीतिक तौर पर पूरी तरह से इंकरेक्ट थीं।  

विनय स्वतंत्र पत्रकार हैं. praxis में नियमित लेखन. 
इनसे vinaysultan88@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.