गैर-बराबरी पर गौर कीजिए

सत्येंद्र रंजन

-सत्येंद्र रंजन
"...यह रुझान नव-उदारवादी बुद्धिजीवियों के इस दावे को अविश्वसनीय बनाता है कि जब जलस्तर चढ़ता है तो सबकी नाव ऊंची होती है। ऐसा शायद हो सकता है, बशर्ते सबके पास नाव हो। अऩुभव यह है कि भारत में जब अर्थव्यवस्था की जलधारा निर्बाध हुई तो जिनके पास नाव थी वे तेजी से ऊपर चढ़ते गए, जबकि किनारे छूट गए लोग आज भी प्यासे हैं, हालांकि यह हो सकता है कि उनसे पास पहले से कुछ ज्यादा पानी पहुंच रहा हो।..."


हाल में योजना आयोग ने जब उपभोग आंकड़ों के आधार पर देश में गरीबी घटने का दावा किया तो उस पर एक अजीब तरह की विवेकहीन प्रतिक्रिया देखने को मिली। विपक्ष और हमेशा नकारात्मक एवं जज्बाती मामलों की तलाश में रहने वाले मीडिया की बात यहां छोड़ देते हैं, क्योंकि उनसे किसी जटिल मुद्दे पर गंभीर विमर्श की उम्मीद रखना निरर्थक है। लेकिन अनेक बुद्धिजीवी, जो खुद को वामपंथी धारा में मानते हों, अगर वास्तविक रुझानों की पूरी अनदेखी करें तो वह जरूर निराशा की बात है, क्योंकि उससे समाज में सार्थक बहस एवं विमर्श की गुंजाइश संकुचित हो जाती है। 

बेशक योजना आयोग ने गरीबी मापने का जो पैमाना अपना रखा है, वह आपत्तिजनक है। अगर इसे कुछ लोग कंगाल रेखा कहना पसंद करते हैं, तो उसे सहज स्वीकार किया जा सकता है। मगर रेखा चाहे मौजूदा हो या भविष्य में कोई अपनाई जाए, असल सवाल यह है कि भारत में क्रमिक रूप से अधिकांश वर्गों की आमदनी बढ़ रही है या नहीं? क्या यह कहना तथ्यात्मक है कि देश में गरीबी बढ़ रही है? इस संदर्भ में ऐसे तर्क सुनना दिलचस्प है कि विश्व स्तर पर गरीबी रेखा को इसलिए जानबूझ कर न्यूनतम स्तर पर तय किया गया है, ताकि गरीब उससे ऊपर उठते दिख सकें और विश्व बैंक-अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यह दावा कर सकें कि नव-उदारवादी नीतियां गरीबी घटाने में सहायक हैं।

लेकिन अगर ऐसा है, तब भी क्या इससे आंख मूंद ली जानी चाहिए कि उसी न्यूनतम कसौटी पर रुझान आखिर क्या है? अगर नेशनल सैंपल सर्वे के उपभोग आंकड़ों से यह रुझान सामने आया कि गरीब तबके भी उत्तरोत्तर अधिक खर्च कर रहे हैं, उनके व्यय में बुनियादी भोजन पर खर्च का हिस्सा घटा है, जबकि बेहतर भोजन, शिक्षा, चिकित्सा आदि पर खर्च बढ़ा है, तो इसे स्वीकार कर लेने में आखिर दिक्कत क्यों होनी चाहिए?

क्या इसलिए कि अगर वे इसे स्वीकार लेंगे कि गरीब तबके आज अधिक खर्च करने की स्थिति में हैं तो आर्थिक नीतियों के मामले में उनकी अपनी धारणाएं या विचारधारा से प्रेरित समझ गलत साबित होने लगेगी? फिर उनसे एक प्रश्न यह है कि क्या ऐसे बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि अर्थव्यवस्था की उच्च विकास दर और सामाजिक क्षेत्र में सरकारी खर्च बढ़ने का कोई लाभ नहीं होता? अगर ऐसा है तो क्या वे यह कहने का साहस जुटाएंगे कि मनरेगा, मिड-डे मील, वृद्धावस्था पेंशन सहित सामाजिक क्षेत्र की तमाम योजनाएं सरकार को बंद कर देनी चाहिए? अगर इनसे वंचित तबकों की आमदनी बढ़ाने में कोई मदद नहीं मिलती तो आखिर इन्हें क्यों चलाया जाना चाहिए?

बहरहाल, वास्तविकता ऐसी नहीं है कि ऐसे तर्कों को सही ठहाया जा सके। ना ही यह मान लेने से कि उच्च आर्थिक वृद्धि दर और सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं से देश में बड़ी संख्या में लोग आज पहले से बेहतर स्थिति में हैं, नव-उदारवादी नीतियां कठघरे से बाहर हो जाती हैं। यह सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या देश में सभी लोगों की स्थिति समान रूप से सुधर रही है? या विकास के जिस रास्ते पर देश चल रहा है, उससे सबको बराबर फायदा हो रहा है? उच्च आर्थिक वृद्धि दर से जो धन पैदा हुआ है, आखिर उसका बंटवारा कैसे हो रहा है? 

दरअसल, नेशनल सैंपल सर्वे संगठन (एनएसएसओ) के जिस सर्वे के आधार पर योजना आयोग ने 2004-05 से 2011-12 के बीच गरीबी में लगभग 15 प्रतिशत कमी आने का दावा किया, अगर उसी के दूसरे आंकड़ों पर ध्यान दें तो देश में बढ़ती गैर-बराबरी की भयावह तस्वीर सामने आती है। ये आंकड़ों बताते हैं कि आर्थिक विकास का अधिकांश लाभ सबसे धनी तबकों ने हड़प लिया है। मसलन, एनएसएसओ के 2009-10 के सर्वे से अगर 68वें दौर के सर्वे तुलना करें, तो साफ होता है कि उन दो वर्षों के दौरान ग्रामीण इलाकों में सबसे गरीब 10 प्रतिशत आबादी की आमदनी में जहां 11.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, वहीं सबसे धनी 10 फीसदी लोगों की आय 38 प्रतिशत बढ़ी। शहरी क्षेत्रों में सबसे गरीब 10 प्रतिशत लोगों की आमदनी 17.2 प्रतिशत बढ़ी तो सबसे धनी 10 प्रतिशत आबादी की आय 30.5 प्रतिशत बढ़ गई।

दरअसल, विषमता बढ़ने के इस रुझान को साबित करने वाले अनगिनत स्रोत हैं। दुनिया भर में गैर-बराबरी मापने के लिए जिनी को-इफिशिएंट का पैमाना अपनाया जाता है। 1993 में भारत इस पैमाने में 0.32 अंक पर था, जो 2008 में 0.38 हो गया। (0 का मतलब होता है आमदनी का समान बंटवारा और 1 का अर्थ होता है कि सारी आमदनी एक वर्ग के पास जा रही है)। फॉर्ब्स पत्रिका के मुताबिक 2013 में भारत में 55 अरबपति थे, जिनमें सबसे अधिक धनी दस के पास 102.1 अरब डॉलर की संपत्ति थी- जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद के 5.5 प्रतिशत के बराबर है। दूसरी तरफ एक तिहाई आबादी (42 प्रतिशत बच्चे) कुपोषण का शिकार थी। 2011 में विश्व भूख सूचकांक पर 88 देशों की सूची में भारत 73वें नंबर पर था। संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक पर 2011 में भारत 134वें स्थान पर था, जबकि 2013 में गिर कर 136वें नंबर पर चला गया। 2010 में तैयार हुए बहु-आयामी गरीबी सूचकांक से सामने आया कि भारत के सिर्फ आठ राज्यों में गरीबों की संख्या सबसे गरीब 26 अफ्रीकी देशों से अधिक थी।   

क्या ये आंकड़े यह साबित करने के लिए काफी नहीं हैं कि नव-उदारवादी नीतियों पर अमल के 20 वर्षों के दौरान देश में धन पैदा होने की रफ्तार तो तेज हुई और आर्थिक अवसर बढ़े, लेकिन उनके अधिकांश हिस्से आबादी के एक छोटे से तबके के पास चले गए। यह रुझान नव-उदारवादी बुद्धिजीवियों के इस दावे को अविश्वसनीय बनाता है कि जब जलस्तर चढ़ता है तो सबकी नाव ऊंची होती है। ऐसा शायद हो सकता है, बशर्ते सबके पास नाव हो। अऩुभव यह है कि भारत में जब अर्थव्यवस्था की जलधारा निर्बाध हुई तो जिनके पास नाव थी वे तेजी से ऊपर चढ़ते गए, जबकि किनारे छूट गए लोग आज भी प्यासे हैं, हालांकि यह हो सकता है कि उनसे पास पहले से कुछ ज्यादा पानी पहुंच रहा हो।


भारत में इस परिघटना को बारीकी से समझना आज सबसे बड़ी जरूरत है। चालू नीतियों की साख एवं औचित्य को चुनौती देने के लिए बढ़ती विषमता सबसे बड़ा तर्क है। लेकिन यह विमर्श जज्बाती या हवाई बातों से आगे नहीं बढ़ सकता। जब वामपंथ अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्षरत तो, उस समय समाजवाद का बड़ा वैचारिक विमर्श सामने रख देने से कोई ठोस राजनीति नहीं निकल सकती। उस वक्त वास्तविक रुझानों को समझना और उनके मुताबिक मुद्दों का चयन प्राथमिक राजनीतिक तकाजा है। इस क्रम में सरकारी सामाजिक योजनाओं के लाभ को अस्वीकार करने से कुछ हासिल नहीं होगा। बल्कि फिलहाल, मुद्दा यह है कि सबके लिए पोषण, शिक्षा, चिकित्सा, स्वच्छता और ऊर्जा की उपलब्धता को कैसे राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाया जाए। यह काम हर हाल में नकारात्मक और निराशाजनक नजरिया अपनाते हुए नहीं किया जा सकता। मगर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज एक बड़े दायरे में ऐसे ही नजरिए को क्रांतिकारिता का पर्याय समझा जाता है। 
सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं. 
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.