धारचुला-मुनस्यारी पर भी पड़ी है आपदा की गहरी मार : चौथी किस्त

जगत मर्तोलिया
-जगत मर्तोलिया

आपदा प्रभावित धारचूला से मदकोट तक 107 किमी की पैदल यात्रा के दौरान पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता जगत मर्तोलिया की रिपोर्टो की तीन किस्त praxis में प्रकाशित की गई थी. इस यात्रा की रिपोर्ट की चौथी और अंतिम किश्त उन्होंने भेजी है. पढ़ें...

-संपादक


खेती, जंगल नहीं रहे तो हम क्यों रहे यहां !

तीलादेवी देवी परिहार गुमसुम सी बैठी हुई है। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि तीला अपना सबकुछ गंवा कर किसी को कोस रही है। उसके सामने कुछ बचे हुए खेत और खतरों से घिरे घर थे। एक बार वह इनकी ओर नजर फेरती फिर गोरी नदी की ओर देखते हुए नदी को अपनी इस बर्बादी के लिए जिम्मेदार मानते हुए उसकी आंख भर आती। 

हमारे कदमों की आहट भी उसकी टकटकी को तोड़ नहीं पाई। पिथौरागढ़ में बनी आपदा समिति के साथियों के द्वारा इस गांव के पीडि़त परिवारों को राशन भेजा गया था। इसलिए इस गांव में कुछ लोग हमें ज्यादा जानने लग गए थे। उप-प्रधान पदम सिंह परिहार और रूद्र सिंह कोरंगा ने हमें देखते ही आवाज लगानी शुरू कर दी। तब जाकर इस तीला देवी ने हमारी और देखा। हम भी तीला के पास ही बैठ गए। 

ग्राम तल्लामोरी के 14 परिवारों के लोग भी वहीं पर जमने लगे। तीला देवी ने फिर हमारी और नजर लगाई और बोली कि रोज कोई न कोई आ रहा है। सभी मीटिंग करते है। पटवारी के चपरासी से लेकर सभी अफसर बन बैठे है। हमें तो हमारी जमीन चाहिए। क्या कोई हमें वापस दिला पाएगा। तीला की बात अभी खत्म नहीं होती वह कहती है कि तल्लामोरी कोई दिल्ली, हल्द्वानी और पिथौरागढ़ जो यहां बाहर से बसने को कोई आएगा। हम तो यहां इसलिए बसे हैं कि खेत और जंगलों के लालच के कारण। न खेत बचे है। और न हीं जंगल अब पहले जैसे है। अब यहां क्या करेंगे। 

आपदा की इस त्रासदी में अभी केवल घर खोने वाले के बारे में ही बातचीत हो रही है। जिन परिवारों ने खेती के दम पर इस बीहड़ों में रहने का लंबा इतिहास रचा है। आज उनके सामने इस इतिहास को आगे ले जाने की चुनौती सामने खड़ी है। तल्लामोरी की तीला देवी जैसी सैकड़ों महिलाऐं गोरी, काली और धौली गंगा के द्वारा जमीन छीन लिये जाने के बाद अब बेसहारा बैठकर सरकार की ओर टकटकी लगाये बैठी हैं। स्थिति यह है कि अभी तक सरकार ने जमीन खोने वाले परिवारों के बारे में कुछ बोलना भी मुनासिब नहीं समझा है। 

दारमा घाटी के गांवों से लेकर मुनस्यारी के जिमिघाट तक 10 हजार नाली जमीन नदियों में समा गयी है। नदी किनारे जमीन का महत्व समझना भी जरूरी है। नदी के किनारे सिंचित उपजाऊ भूमि होती है। और इस भूमि में धान की रोपाई, गेहूं की पैदावार सहित साग-सब्जी, अन्य जगहों से अधिक होती है। इसलिये यह कहना लाजमी होगा कि पहाड़ों में नदी के आसपास की जमीन के किसान ही वर्षभर खेती की पैदावार से अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं। 

पहाड़ों में नदी घाटी को छोड़कर अन्य जमीनें रोखड़, ईजर होती हैं। इन जमीनों में केवल घास और पेड पौंधे ही किसानों की धरोहर होती हैं। धारचूला और मुनस्यारी के घाटी क्षेत्र इस बार तबाह हुए हैं। सोबला, न्यू, सुवा, कंज्योती, खिम, खेत, झिमिरगांव, खोतिला, गोठी, बलुवाकोट, घट्टाबगड़, बन्दरखेत, चामी, लुमती, मोरी, बांसबगड़, घरूड़ी, मनकोट, बंगापानी, छोरीबगड़, उमरगड़ा, देवीबगड़, मदकोट, भदेली, बसंतकोट, दुम्मर, जिमीघाट के गांवों में आज किसान परिवारों के पास जमीन के नाम पर कुछ मुट्ठी भूमि ही बची है। 

आवासीय भवन तो बचे हैं, लेकिन खेती की भूमि नहीं। उत्तराखंड शासन एक नाली भूमि का फसली मुआवजा मात्र 300 रूपये देता है। सरकार अपनी पीठ खुद थपथपाते हुए कह रही है कि उसने इस मुआवजे को दुगुना कर दिया है। नदी घाटी की जमीन में वर्ष में दो बार भरपूर खेती होती है। मोरी गांव में एक किसान परिवार वर्षभर में मात्र मूंगफली की खेती से ही 30 हजार रूपये अपने गांव में ही कमा लेता था। इसके अलावा धान, गेहूं की पैदावार भी साल भर के खाने के लिये पूरी हो जाती थी। 

यह बात हर घर की है। जो नदी किनारे अपने गांवो को छोड़कर तीन सौ साल पहले आ गये थे, उसने कभी सोचा भी नहीं था कि गर्मियों में ठंडी हवा, पानी की प्यास बुझाने वाले और खेतों में हरियाली देने वाले नदी उसके साथ इस तरह का सलूक करेगी। लुमती गांव की बसंती देवी का कहना था कि हम बहुत खुश थे कि हम सड़क किनारे रहते हैं, लेकिन आज हमारी वर्षों की पूंजी खेती हमारे पास नहीं रही। अब हमारे सामने यह संकट खड़ा हो गया है कि हम कैसे अपने जीवन की गाड़ी को आगे ले जायें। 

इस बार तो हम पिछले वर्ष के अनाज से काम चला रहे हैं, अगले वर्ष कहां से अनाज का इंतजाम होगा। चामी गांव की इंदिरा बोलती है कि गांव में एक भी नौकरी वाला परिवार नहीं है। खेती से ही सब कुछ चल रहा था। सरकार जमीन नहीं देगी तो कम से कम नौकरी तो दे दे। बाहर जाकर अपना परिवार पाल लेंगे। बन्दरखेत निवासी केशव चन्द का कहना है  कि इस खेती से कई पुश्तों का जीवन चला आज खेती नहीं है तो लग रहा है कि हमारा कुछ भी नहीं है। उनका कहना है खेती के बदले उन्हें खेत ही चाहिए। ऐसी जमीन या तो नदी किनारे मिलेगी या फिर तराई भावर में। अब नदी किनारे जाने की हिम्मत नहीं है। उत्तराखंड सरकार हमें तराई भावर में दो एकड़ जमीन के साथ सामूहिक रूप से बसाये। 

नदी घाटी इलाके के दलित परिवारों के कहानी कुछ और है। इनके नाम से जमीन नहीं है। समाज में उपेक्षित रहने वाले दलित समुदाय को ऐसा ठौर रहने के लिये दिया गया जो किसी को पसंद नहीं था। आज वह भी नहीं रहा। अभी तक बेनाप भूमि में बसे दलितों को आवासीय भवन के नदी में बह जाने पर मुआवजा तक नहीं मिला है। इनकी लड़ाई तो और भी कठिन है। कैसे जमीन का मामला मुद्दा बने और भूमिहीन बन चुके इन किसान परिवारों को पुनः उपजाऊ भूमि मिल सके ताकि ये फिर हल चलाकर, गाय, भैस पालकर अपनी आजीविका चला सकें। 

जगत मर्तोलिया, भाकपा माले पिथौरागढ़ के जिला सचिव हैं.

jagat.pth@gmail.com पर इनसे संपर्क करें.