धारचुला-मुनस्यारी पर भी पड़ी है आपदा की गहरी मार

जगत मर्तोलिया
-जगत मर्तोलिया

उत्तराखंड में 16 व 17 जून को आयी भीषण त्रासदी के कारण पिथौरागढ़ जिले के धारचूला व मुनस्यारी में गोरीगंगा, धौलीगंगा तथा काली गंगा ने जो तबाही मचाई उसकी जमीनी रिपोर्ट धारचूला से मदकोट तक 107 किमी की पैदल यात्रा कर तैयार की गयी है। 3 जुलाई से 13 जुलाई तक की स्थितियों पर फोकस किया गया है। जो अभी भी प्रासंगिक है। यह रिपोर्ट अभी तीन किस्तों में प्रेषित है। रिपोर्ट यात्रा के चार दिन के अंतराल में तैयार की गयी है। सुविधाओं के अभाव में एक साथ प्रेषित की जा रही है। जो आगे भी जारी रहेगी।...
-लेखक

दिनांक 6 जुलाई 2013

आपदा के बीस दिन, सरकार का आपदा प्रबन्धन फेल 

धारचूला के बाजार में आज से चाय मिलनी बन्द हो गयी, दो-चार दिन में खाना भी मिलना शायद बन्द हो जायेगा। आपदा की त्रासदी से कराह रहा पिथौरागढ़ जिले का धारचूला व मुनस्यारी का इलाका सबसे न्याय की उम्मीद कर रहा है। आपदा की त्रासदी आज बीसवां दिन है। मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत का दौरा हो चुका है। सांसद व विधायक कई बार इलाके का दौरा कर चुके हैं। आज पता चला कि आपदा मंत्री धारचूला में हैं।

1977 में तवाघाट में आयी भीषण आपदा की त्रासदी के दौरान भी धारचूला का इलाका पिथौरागढ़ से केवल एक दिन सड़क मार्ग से कटा रहा। धारचूला में अस्सी साल से अधिक उम्र के वृद्धों की जुबान पर यह बात है कि पहली बार बीस दिन से सड़क बन्द होने के बाद उपजी स्थितियों का वह सामना कर रहे हैं। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद यहां की सरकारें अपनी पीठ थपथपा रही थी कि वह पहला राज्य है जिसने आपदा के लिए अलग मंत्रालय का गठन किया। 

आपदा प्रबन्धन के नाम पर होने वाली लूट खसौट की लम्बी फेहरिस्त है। यूनेस्को से लेकर तमाम विदेशी वित्तीय ऐजेन्सीज द्वारा मिलने वाली करोड़ों की राशि आपदा प्रबन्धन के नाम पर उत्तराखण्ड में खपाई जा रही है। उत्तराखण्ड में कार्यशाला, प्रशिक्षण, आपदा से पूर्व तथा आपदा के बाद निपटने की बात पर खर्च तो करोड़ों होते हैं लेकिन उनसे क्या निकल रहा है। यह इस बार जमीन पर धारचूला व मुनस्यारी में दिखा है। 

बात यहां से शुरू करते हैं हैलीकाप्टरों से जो राशन के पैकेट भेजे गये उनकी पैंकिंग तक यहां के कर्मचारियों को नहीं आती है। जिस कारण हैली से फेंके गये राशन के पैकेट आसमान में ही फट गये और आपदा पीडि़तों को चावल-आटा केवल चाटने को मिला। इससे स्पष्ट हो जाता है कि आपका सरकारी प्रबन्धन कितना कुशल है। 

इस बीच हम धारचूला में हैं आपदा के बाद जब 21 जून को यहां पहली बार आये थे तो निगालपानी, गोठी के निकट मोटर मार्ग में पैदल रास्ता बचा था। इस बार फिर 3 जुलाई को जब फिर धारचूला पहुंचे तो इन दोनों जगहों पर पैदल चलने के लिए रास्ता मात्र तक नहीं था। सीमा सड़क संगठन के इंजीनियर मोटर मार्ग नहीं खोल पाये। इस पर तो बात होनी चाहिए लेकिन पैदल रास्ता भी बचा नहीं पाये यह बात तो शर्म की है। आज 20 दिन बीत रहे हैं केवल दो स्थानों में सड़क खोली गयी है। 

कहने को तो यह राष्ट्रीय राजमार्ग है। इस सड़क के बन्द होने से धारचूला बाजार का नजारा कुछ इस तरह है कि राशन की दुकानों के बारदाने जो सामानों से भरे थे, खाली हो चुके हैं। गोदाम सूने हो गये हैं। एक राशन के दुकानदार ने बाताया कि आज तक जो माल नहीं बिका था वह भी इस बार बिक गया। सब्जी खाना तो यहां के लोगों के लिए अब एक स्वप्न हो गया है। 19 रूपये किलो चावल 100 रूपये में भी नहीं मिल रहा है। यहां से बलुवाकोट कुछ पैदल-कुछ जीप में जाकर राशनों के कट्ठे अपने पीठ में लादकर ला रहे हैं और सरकार को आईना दिखा रहे हैं कि इस आपदा से उपजी भूख से निपटने के लिए उसके पास कोई प्रबन्धन नहीं है। जो जनता कर रही है, वह भी सरकार नहीं कर सकती है। 

जौलजीबी से धारचूला के राष्ट्रीय राजमार्ग में कालिका से आगे मार्ग बन्द है। यहां से आगे के पैंतीस से अधिक ग्राम पंचायतें और तीस हजार की आबादी चावल के दाने के लिए तरस रही है। धारचूला बाजार से आगे व्यांस, चैंदास, दारमा घाटी, तल्ला दारमा घाटी, खुमती क्षेत्र, गलाती क्षेत्र, रांथी से लेकर खेत तक का इलाका राशन के एक-एक दाने के लिए मोहताज है। धारचूला व मुनस्यारी के आपदा पीडि़त ही नहीं बल्कि अब साठ हजार की जनसंख्या को दाल, आटा, चावल की आवश्यकता है। इस पर सरकार का ध्यान अभी तक तो कतई नहीं है। 

धारचूला से आगे के और धारचूला तक जोड़ने वाले मोटर मार्ग कब खुलेंगे इसका जवाब सीमा सड़क संगठन दे नहीं पा रहा है। चीन तथा नेपाल सीमा के बार्डर का यह हाल है, यहां सुरक्षा तो एक सवाल है ही, क्या इस सिस्टम पर हम कोई भरोसा कर सकते हैं यह चिन्ता भी एक बात है। लेकिन हम उन हजारों लोगों की बात कर रहे हैं, जिनके घर में आटा चावल अब खतम होने को है। इस पूरे प्रक्रिया में कहीं भी सरकार तथा प्रशासन के कामकाज में यह बात नहीं है कि वह राशन आम लोगों तक पहुंचाने का कोई विकल्प दे पाया है। सोई हुई सरकार, जन प्रतिनिधियों के पीछे भाग रही नौकरशाही क्या इस इलाके के लोगों को एकमात्र राशन दे पायेगी। 
आज अखबार में खबर है कि जौलजीबी से मदकोट का मोटरमार्ग दो माह में खुलेगा। गोरीछाल घाटी के सैकड़ों गांवों की बीस हजार की आबादी का भी राशन खत्म होने को है। इनके बारे में क्या बहुगुणा सरकार ने कुछ सोचा है? यही उत्तर मिलेगा कि -नहीं। मुनस्यारी के जोहार तथा रालम घाटी में लोग आज भी फंसे हुए हैं। कन्ज्योति के 35 आपदा पीडि़तों को आज तक नहीं निकाला गया है। 

यही हाल दारमा घाटी का भी है। यहां अधिकारी कर्मचारी बहुत हैं लेकिन उनके पास इस आपदा से निपटने का कोई सरकारी दिशा तक नहीं है। धौलीगंगा जल विद्युत परियोजना के छिरकिला बांध पर भी लोगों के सवाल हैं, नेपाल ने तो भारत पर यह आरोप भी लगा दिया है कि बांध का पानी एकसाथ खुलने से नेपाल को भारी नुकसान हो गया है। भारतीय राजदूत के ना-नुकुर के बाद यह सवाल लोगों की जुबां पर है कि 15 जून की रात्री से ही बारिश शुरू हो गयी थी तो क्यों 17 जून को क्यों बारिश का पानी एक साथ खोला गया। 

ऐलागाड़ का कस्बा इसलिए बह गया कि टनल से जो अतिरिक्त पानी छोड़ा गया उसे ऐलागाड़ गधेरे के पानी ने पूरे वेग से रोक दिया और उसने ऐलागाड़ के कस्बे का नामोनिशान मिटा दिया। एनएचपीसी यह कह चुकी है कब उसकी परियोजना शुरू होगी वह कह नहीं सकती। करोड़ों का नुकसान अलग से है। पहाड़ों में परियोजना तथा बांध के समर्थक इस सवाल पर भी जवाब देंगें। 

मुख्यमंत्री ने सोबला, न्यू, कन्च्यौति, खिम के 171 परिवारों को यहां राजकीय इण्टर कॉलेज धारचूला में बुलाकर ठहराया है। एक सप्ताह के बाद भी प्रभावित परिवार सिमेन्ट के फर्श में बिना चटाई दरी के लेट रहे हैं। उन्हें देखने वाला कोई नहीं है। इन परिवारों की सुध क्यों नहीं ली गयी, क्योंकि हमारे आपदा प्रबन्धन महकमें के पास कार्य करने के लिए कोई रूटमैप है ही नहीं। आज इतना ही फिर कल से और क्षेत्र की स्थिति पर पर हकीकत बयां करते रहेंगे। 


रिपोर्ट का दूसरा भाग

दिनांक- 10 जुलाई 2013

घर-बार बर्बाद हो गया, आंखों में आँसू है और सामने अंधेरा। रोज कोई नेता आता है, सपने दिखाने के लिए। बारिश से रात को नींद भी नहीं आ रही है। 15 जून के बाद की रातों की याद ने नींद भी छीन ली है। हर बारिश की बूँद की आवाज से खौफनाक अंदेशा इनके चैन को छीन कर ले गया। सोबला, न्यू, कन्च्यौती, खिम के 175 से अधिक परिवारों को जान बच जाने की थोड़ी खुशी तो है। कन्च्यौती में दो लोगों की जान इस आपदा से गयी। उनकी यादें अपने जीवन के बच जाने के बीच इन परिवारों के चेहरों पर यह परेशानी साफ तौर पर देखी जा रही है कि अब कैसे उनका कुनबा बसेगा। 

धारचूला व  मुनस्यारी क्षेत्र में आयी आपदा में ये चार गाँव हैं, जो अब इतिहास में दफन हो चुके हैं। इन गाँवों की वो खुशहाली अब बीते दिनों की याद बनकर रह गयी है। राजकीय इण्टर काॅलेज धारचूला के उन कक्षों में जहाँ कभी बच्चे पढ़ते थे आज इनकी शरण स्थली बन गयी है। इन लोगों को इस बात का डर है कि डीडीहाट के हुड़की, धारचूला के बरम तथा मुनस्यारी के ला, झेकला, सैणराँथी के आपदा पीडि़तों के साथ सरकार ने जो अन्याय किया है, कहीं उनके साथ भी ऐसा न हो। आज उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वह कैसे सितम्बर तक का समय गुजरे। 

भाकपा (माले) की एक टीम इन दिनों धारचूला क्षेत्र में है। टीम धारचूला के सामाजिक कार्यकर्ता केशर सिंह धामी के साथ जैसे ही आज राजकीय इण्टर कॉलेज में पहुँचे तो वहाँ ठहरे आपदा पीडि़त एक-एक करके बाहर निकलने लगे। उनकी आँखें अब इन्तजार करते-करते थक चुकी हैं। पैरों में अब खड़े होने की ताकत भी नहीं बची है। एक सप्ताह से इस शरण स्थल में रहने वाले इन 175 परिवारों के सैकड़ों आपदा पीडि़त 15 दिनों से कपड़े तक नहीं बदल पाये हैं। 

इन गाँवों से इन्हें हैली में लाया गया। घर के साथ ही इनके तन के कपड़े भी धौलीगंगा में समा चुके हैं। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने इन परिवारों को इनके गाँवों से यहां आमन्त्रण देकर बुला तो लिया लेकिन इन्हें किस बात की आवश्यकता होगी, इसका कोई ध्यान नहीं दिया गया। इस टीम के सदस्य किसान महासभा के नेता सुरेन्द्र बृजवाल, पिथौरागढ़ छात्र संघ के अध्यक्ष हेमन्त खाती और भाकपा (माले) के जिला सचिव जगत मर्तोलिया ने इन परिवारों से अलग-अलग वार्तायें की। 

बात करते-करते इनकी आवाज रूक जा रही है। गला भर आ रहा है। आँखों में आँसुओं की बूँदें और आँसू से चपचपाती पलकें इनके दर्दों को स्वयं ही बता दे रही हैं। धारचूला क्षेत्र में कीड़ा जड़ी को जमा करना भी एवरेस्ट चढ़ने से अधिक चुनौती भरा है। अपनी जान पर खेल कर इन्होंने धन इकट्ठा किया और उससे घर बनाया। जो अब धौली का निवाला बन गया है। इनके घर अब दुबारा बिछड़े गाँव में नहीं बन सकते। अब इन्हें एक नया गाँव और नया आशियाना चाहिए। तन में केवल एक कपड़ा लेकर धारचूला पहुँचने के बाद इस शहर में पहुँच गये हैं। 

शहर वालों के साथ चलने की हिम्मत इनके पास नहीं है। जिनके पास खाने के लिए अपने बर्तन न हों, चटाई में लेटने के लिए इन्हें यहाँ छोड़ दिया गया है। इनके बचे खुचे जानवर अभी गाँव में हैं, जो इन्हें ढूँढ रहे होंगे। यह चिन्ता भी इनके जुबाँ पर है। धारचूला की गर्मी और मच्छरों को प्रकोप इन्हें धौलीगंगा के द्वारा दिये गये गम की तरह लग रहा है। अभी तक तो ये मात्र एक चटाई के सहारे सीलन भरे कमरे में लेटे हुए थे। बाहर हो रही बारिश की बूँदें छतों से टपक कर इनके कमरों में इनकी शान्ति को भंग कर रही है और साथ ही इनके चैन को इनसे छीनती जा रही है। 

एक सप्ताह बाद भाकपा (माले) के हस्तक्षेप के चलते तहसील प्रशासन ने 50 गद्दे यहाँ बांटे हैं। बताया गया कि 150 गद्दे और बन रहे हैं। इससे इनके बिस्तरों की समस्या तो पूरी नहीं होगी लेकिन कुछ आराम तो मिलेगा। इण्टर कॉलेज के कमरे 15 दिनों से बन्द थे। कमरों में सीलन की बदबू अलग है और पानी रिसने के कारण पूरा कमरा निमोनिया और टाइफाइड जैसी कई बिमारियों को न्यौता दे रहा है। खिड़कियों में जालियां नहीं हैं। मच्छरों के अलावा कई प्रकार के कीट कमरों में घुस कर इन परिवारों को परेशान कर रहे हैं। 

पहले से ही घर और गाँव खोने से परेशान इन परिवारों को कीट मच्छर तो नहीं पहचानते लेकिन सरकार को जानती थी, उसके बाद भी उसने क्यों बन्दोबस्त नहीं किया। आपदा राहत शिविर का नाम इसे दिया गया। सीधे तौर पर कह सकते हैं यह राहत नहीं आफत शिविर है। एक आफत से बचकर यहाँ पहुँचे इन पीडि़तों को इन आफतों से गुजरना पड़ रहा है। एक कमरे में चार से छः परिवारों को जानवरों की तरह ठूँसा गया है। स्कूल के कुर्सी व टेबल ही इनके सहारे हैं। 

धारचूला के कई स्कूली बच्चों ने इस सवाल को भी उठाना शुरू कर दिया है कि अब वे कहाँ पढ़ेंगे। इन गाँवों के नेता और प्रशासनिक अधिकारी आपदा पीडि़तों के जख्मों पर मरहम लगाने की जगह उनका डांटते फिर रहे हैं।‘‘अरे हमने कमरा तो दे दिया, अब हम क्या करें? इतना बहुत है’’ इन बातों से नाराज आपदा पीडि़त परिवारों के सदस्यों का कहना है कि हमें हमारे गाँवों से क्यों यहाँ लाया गया। स्कूल जाने वाले बच्चे इस स्कूल के आंगन में खेल रहे हैं। उनका बस्ता धौली गंगा में बह गया है। उन्हें आज भी पहाड़े व गिनती और कुछ कवितायें याद हैं। गणित के सवाल भी उनके दिमाग में हैं लेकिन उनको उकरने के लिए उनके पास काॅपी पेन्सिल नहीं है। बच्चों का कहना था कि हमारा स्कूल भी तो बह गया है। अब हम कहाँ पढ़ने को जायेंगे। 

इन बच्चों की तोतली आवाज से दिल को चीरने वाली जो पुकार निकल रही है। उसे यहाँ बार-बार आने वाले विधायक, सांसद, मंत्री और प्रशासनिक अमले के अधिकारी सुन तक नहीं पा रहे हैं। कन्च्यौती के मोहन सिंह का कहना है कि तीन महिने कैसे गुजरें? यह हमारी पहली समस्या है। स्कूल में ज्यादा समय नहीं रह सकते। आपदा मंत्री टिन शैड बनाने की बात कह गये हैं। इसे बनने में तो महिने बीत जायेंगे। जब गद्दे व कम्बल देने में इतने दिन बीत गये। खिम की सरस्वती बिष्ट का कहना है कि हमारे खेत बह गये। जानवर भी साथ में धौली में बह गये। हम हम क्या करें। कैसे अपनी जिन्दगी गुजारें। इस जिन्दगी को गुजारने के लिए कौन हमारी मदद करेगा। 

न्यू ग्राम की नीरू देवी तो काफी दुःखी है। कहती है कि ‘‘कभी न सोचा था कि कभी अपना गाँव छोड़ेगे। अब हमें कैसे एक गाँव मिलेगा। जहाँ हम सब महिलायें इस त्रासदी को आपस में एक दूसरे में बांट सकेंगी।’’ सोबला के नेत्र सिंह का कहना है कि गाँव तो गया। अब नहीं लगता है कि दुबारा हमारा कोई गाँव होगा। सरकारें तो झूठ बोलती हैं। झूठ से कुछ दिनों तक सन्तोष मिल सकता है लेकिन आगे नहीं। यह बात तो केवल चार उन गाँवों की है। जो अपना सब कुछ धौलीगंगा को सौंपकर खाली हाथ इण्टर काॅलेज के शरण स्थली में बैठकर टकटकी लगा बैठे हैं कि अब क्या होगा?

रिपोर्ट का तीसरा भाग

दिनांक - 14 जुलाई 2013

उत्तराखंड में आपदा की त्रासदी को 25 दिन बीत गये, अभी तक राहत एवं बचाव की तस्वीर साफ नहीं हो पायी है। धारचूला और मुनस्यारी के इन दुर्गम इलाकों तक देहरादून में किये गये दावे कुछ अभी तक नहीं पहुचे हैं और कुछ अव्यवहारिक नजर आने लगे हैं। उत्तराखंड की सरकारें अभी तक यह नहीं समझ पायी हैं कि आपदा की घटनाओं के बाद राज्य सरकार को किस तरह से जनपक्षीय सरकार बनने की ओर बढ़ना चाहिए। 

धारचूला और मुनस्यारी दोनों तहसीलों में अभी तक सरकार के मंत्री और नौकरशाह दौरा कर लौट चुके हैं। आपदा पीडि़तों के जो सवाल हैं उनका हल न होना और उनको आपदा की आफत से राहत न मिलना सरकार के हर दावे को झुठला रहा है। मुनस्यारी के जिमीघाट से लेकर जौलजीवी तथा धारचूला के दारमा से जौलजीवी तक सैकड़ों परिवार ऐसे हैं जिनके आवासीय भवन बेनाप जमीन पर बने थे और उनका घर-बार आपदा की भेंट चढ़ चुका हैं। 

सरकार के पुराने नियमों को देखें तो इन परिवारों को राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली राहत नहीं मिल सकती। हो भी यही रहा है। अभी तक इस तरह के सैकड़ों परिवार राहत के लिये राज्य सरकार की ओर टकटकी लगाये बैठे हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में एक घर में पिता सहित पुत्रों का अलग-अलग चूल्हा जलता है। राशन कार्ड और भाग दो रजिस्टर में भी नाम अलग-अलग हैं, लेकिन पिता के जीवत होने के कारण जमीन का मालिक मुखिया होने के कारण पिता है, इन स्थितियों में केवल पिता को ही मुआवजे का हकदार बनाया जा रहा है। 

गृह नुकसान के लिये मिलने वाली दो लाख रूपये की राशि में भी यही स्थिति है। चूल्हे के हिसाब से हकदारी का मामला यहां की सरकार की समझ में नहीं आ रहा है। अभी हाल में ही सरकार ने एक और अव्यवहारिक घोषणा कर डाली कि जिन परिवारों के आवासीय मकान टूट गये उन्हें रहने की व्यवस्था के लिये सरकार 6 महीने तक दो हजार रूपये किराया देगी। उसके पीछे सरकार का षड्यंत्र  भी है। सरकार चाहती है कि आपदा पीडि़तों को एक जगह पर न रहने दिया जाय ताकि वे पुनर्वास के सवाल पर राज्य सरकार को घेर न सकें। 

यह तो एक बात है लेकिन धारचूला, बलुवाकोट, मदकोट, जौलजीवी जैसे कस्बों की बात करें तो यहां किराये के लिये कमरे नहीं हैं। धारचूला में अचानक दो सौ से अधिक परिवारों के लिये किराये के कमरे कहां से पैदा हो जायेंगे। इस बात को देहरादून में बैठी सरकार नहीं समझ पा रही है। एक और उदाहरण है कि घट्टाबगड़ में 55 दलितों के परिवार सड़क में आ गये हैं। इन परिवारों को किराये में घर कहां मिलेगा। क्योंकि घट्टाबगड़ जैसे गांव के आसपास के गांवों को देखें तो बंदरखेत, तोली गांव में एक दो घर ही ऐसे हैं जो एक दो कमरों को किराये पर लगा सकते हैं ऐसे में किराये का यह फरमान राज्य सरकार की हवाई सोच को दिखाता है। 

धारचूला तहसील में खेत, छिरकिला, तीजम, सुमदुम, धारचूला नगर, गोठी, नयाबस्ती सीपू, बलुवाकोट, घाटीबगड़, गो, जौलजीवी, घट्टाबगड़, लुमती, मोरी, बांसबगड़, छोरीबगड़, बंगापानी, उमरगड़ा, मदकोट, भदेली, तल्ला दुम्मर, दराती, सेविला, जिमीघाट जैसे कई स्थान हैं जहां गोरी गंगा, काली गांगा तथा धौलीगंगा से भूकटाव हो रहा है। इन स्थानों को बसाया जाना जरूरी है। नहीं तो बेघरबार लोगों की संख्या हजारों में हो जायेगी। अभी सिंचाई विभाग ने धारचूला, बलुवाकोट, जौलजीवी और मदकोट के लिये सुरक्षा हेतु प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा हैं आज 25 दिन बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार ने इन कस्बों की सुरक्षा के लिये एक ढेला भी स्वीकृत नहीं किया है। 

विधायक और सांसदों के पास करोड़ों रूपये की निधियां हैं, लेकिन इन कस्बों को बचाने के लिये उन्होंने एक रूपये भी नहीं दिया है। बलुवाकोट में भूकटाव को रोकने के लिये संबंधित विभाग ने 62 लाख रूपये का प्रस्ताव भेजा था। इसकी स्वीकृति नहीं मिलने से बलुवाकोट वासियों ने ‘बलुवाकोट बचाओ संघर्श समिति’ बनाकर सरकार के खिलाफ आर-पार की लड़ाई छेड़ दी है। धारचूला विधायक हरीश धामी और सांसद प्रदीप टम्टा पट्टी पटवारी की तरह इधर-उधर दौड़ लगाने में हैं। उनका न प्रशासनिक अधिकारियों में नियंत्रण है और न ही वह राज्य सरकार से कोई बजट ला पा रहे हैं। इससे इस क्षेत्र को बचाने और राहत कार्यों में तेजी लाने के प्रयास ठंडे बस्ते में हैं। 

अभी भी आपदा की दृश्टि से खतरनाक जगहों में आपदा पीडि़त टैण्टों में रह रहे हैं। मौसम विभाग एक दो दिन खतरे का बता रहा है लेकिन यहां तो लोगों का हर पल खतरे में बीत रहा है। आज तक किसी भी परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने की जहमत नहीं उठायी। इस क्षेत्र के सरकारी और गैर सरकारी विद्यालयों को आज से खोलने जा रही है। लेकिन जिन विद्यालयों में आपदा पीडि़त रह रहे हैं उन्हें सरकार कहां रखेगी इसका विकल्प सरकार के पास नहीं है। 

पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी और आपदा मंत्री जौलजीवी से आगे को बड़े कि घट्टाबगड़ में आपदा पीडि़तों से मिलेंगे लेकिन पैदल चलन से बचने के लिये दोनों आधे रास्ते से लौट गये। यह हमारी सरकार और प्रशाशन का चेहरा है। धारचूला से मुनस्यारी तक कई आईएएस और पीसीएस अधिकारी बिठाये गये हैं जो आपदा राहत कार्यों में हाथ बढ़ाने का दावा कर रहे है, लेकिन हकीकत यह है कि यह अधिकारीगण सड़कों में गाड़ी से दौड़ रहे हैं। किसी को भी किसी गांव में जाते अभी तक नहीं देखा गया है। 

धारचूला में तो हाल यह है कि सरकार की ओर से नियुक्त नोडल अधिकारी आईएएस दीपक रावत सुबह कुमाउ मंडल विकास मंडल के आवास गृह से हैलीपैड जाते है और सायं हैलीपैड से लौटकर आवासगृह लौट आते हैं। उनसे मिलने के लिये उन्ही से अनुमति लेनी होती है जो मिल नही रही है। नोडल अधिकारी के रूप में तैनात दीपक रावत न जन प्रतिनधियों की सुन रहे हैं और न ही आपदा पीडि़तों को राहत देने में कोई भूमिका निभा रहे हैं। बड़ी बात यह है कि मुख्यमंत्री तक धारचूला आते हैं लेकिन मुख्यमंत्री के पास न कोई लाल बत्ती थी और मुख्यमंत्री का बोर्ड लेकिन दीपक रावत अपने साथ नैनीताल से आते समय एक एमडी केएमवीएन तथा एक नीली बत्ती लेकर आये थे। जिसे एक प्राइवेट वाहन में लगाकर घूम रहे हैं और उत्तराखंड की नौकरशाही की सत्ता में पकड़ को जाहिर भी कर रहे हैं। स्कार्पिओ जैसे लक्जरी वाहन में उन्होंने एक कुर्सी भी डाल रखी है ताकि उनकी शान-ओ-शौकत में किसी भी प्रकार की कोई कमी न रह जाये। 

उत्तराखंड में नौकरशाही आपदा के समय सत्ताधारियों में अपनी दाल गला रहे हैं इससे बडा उदाहरण दूसरा नहीं हो सकता। उत्तराखंड में सभी जानते हैं कि सस्ते गल्ले के दुकान से मिलने वाले राशन से दस दिन भी परिवारों का निवाला नहीं चल पाता है। बीस दिन निजी दुकानों से राशन खरीदकर यहां के चूल्हे जलते हैं। पटवारी से लेकर मुख्य सचिव तक यही अलाप रहे हैं कि हमारे गोदाम राशन से भरे हैं। लेकिन इन गोदामों से मिलने वाला राशन एक माह के लिये पर्याप्त नहीं होता। इस बात को कोई समझने को तैयार नहीं है। सस्ता गल्ले की दुकानों को डिपार्टमेंट स्टोर में तब्दील करते हुए इनको राशन का बिक्री केन्द्र बनाया जाना चाहिए था, लेकिन इस पर कोई भी बात करने को तैयार नहीं है। एक सप्ताह के बाद धारचूला और मुनस्यारी की पचास हजार से अधिक की आबादी राशन को लेकर सड़क में उतरने वाली है। क्या तभी जाकर यह सरकार चेतेगी। 
---------------------------------

जगत मर्तोलिया, भाकपा माले पिथौरागढ़ के जिला सचिव हैं.
jagat.pth@gmail.com पर इनसे संपर्क करें.