तबाह गाँवों की तरफ एक यात्रा

Indresh Maikhuri

इन्द्रेश मैखुरी

-इन्द्रेश मैखुरी

"...इस सब के बीच जो नहीं है तो वो है सरकार और प्रशासन नाम की चीज.मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सामन्य दिनों की ही तरह दिल्ली में नजर आ रहे हैं.फर्क सिर्फ इतना है कि आपदा के दौर में वे केंद्रीय मंत्रियों को गुलदस्ते भेंट करते नहीं बल्कि टी.वी.स्टूडियो और अखबारों में साक्षात्कारों में ऐसे दावे करते देखे जा रहे हैं,जिनकी सच्चाई के सबूत कम से कम उत्तराखंड में तो ढूँढना मुश्किल है.स्थानीय प्रशासनिक है तो वह सुबह से शाम तक हैलीपैड पर खड़े हैं..."



हाड़ में चालीस किलोमीटर का फासला कितना होता है? इतना कि आदमी अधिकतम दो घंटे में पहुँच जाए.लेकिन 23 जून को यही चालीस किलोमीटर का फासला हमारे लिए इतना हो गया कि सुबह साढ़े सात बजे से रात आठ बजे तक लगातार चलते रहने के बावजूद हम, यह दूरी तय नहीं कर सके.अंततः लगभग बारह घंटे चलने के बाद हम केवल अठाईस किलोमीटर ही पहुँच पाए,जिसमें दस किलोमीटर से अधिक हमने वाहन से तय किया.आपदा के बाद पहाड़ कितना दुर्गम हो गया है,यह उसकी बानगी भर है.


आठ-नौ दिन पहले हुई भारी बरसात के बाद बदरीनाथ का सड़क संपर्क पूरी तरह ध्वस्त हो गया है.बद्रीनाथ और रास्ते में पड़ने वाले अन्य गावों और कस्बों में भारी बरसात के बाद के हालात का जायजा लेने भाकपा(माले)की गढ़वाल कमेटी के सदस्य कामरेड अतुल सती,मैं और देहरादून से आये दो पत्रकार मित्र-अमर उजाला के सुधाकर भट्ट और अभ्युदय कोटनाला निकले.इन पत्रकार मित्रों का जज्बा काबिले तारीफ है क्यूंकि जहां बाकी सारे मीडिया वाले सरकारी हेलिकॉप्टर में उड़ कर,नदियों में आये पानी से ज्यादा एक्सक्लूसिव की बाढ़ लाने पर उतारू हैं,वहीँ इन दो पत्रकार साथियों ने दुर्गम पहाड़ी रास्ते को पैदल तय कर असली तस्वीर को जानने-समझने की कोशिश की.


जोशीमठ से लगभग पच्चीस किलोमीटर पर गोविन्दघाट है,जहां से अलकनंदा नदी पार कर सिखों के प्रसिद्द तीर्थ हेमकुंड को रास्ता जाता है.भारी बरसात के बाद गोविन्दघाट में अधिकाँश दुकाने-होटल तबाह हो चुके हैं.चूँकि गोविन्दघाट से पहले सड़क दो जगह टूटी हुई है,इसलिए दो सौ से अधिक छोटे-बड़े वाहन यहाँ फंसे हुए हैं.वाहनों की सुरक्षा को लेकर चिंतित इन वाहनों के ड्राईवर भी यहीं जमे हुए हैं.हर आने वाले से सड़क कितने दिन में बनेगी,यह वे जरूर पूछते हैं.वे कहते हैं कि यदि पुलिस उनके वाहनों की सुरक्षा की गारंटी ले तो वे वाहनों को छोड़ कर पंजाब लौटने को तैयार
हैं.पर पुलिस का तो यहाँ नामो-निशान् ही नहीं है.पुलिस चौकी में रेत भरी है और पुलिस नदारद है.उनमें से कुछ यह चिंता भी जाहिर करते हैं कि ये वाहन ही उनकी आजीविका का साधन हैं,तो इन्हें यहाँ छोड़ कर,पंजाब जाकर भी वो क्या करेंगे?



गोविन्दघाट से आगे का नजारा तो और भी भयावह है.जगह-जगह नदी में समा चुकी सड़क एक ऐसे आम दृश्य है जो बदरीनाथ यात्रा के शुरू होने के चंद रोज बाद ही, प्रकृति द्वारा यात्रा सीजन के समापन के घोषणा प्रतीत होती हैं.जोशीमठ से लामबगड तक जहां भी सड़क टूटी है,वहाँ एक खड़ी चढाई,चनौती दे रही है कि मंजिल तक पहुंचना हो तो मुझे पार करके दिखाओ. गोविन्दघाट से थोड़ा ही आगे एक भयानक भूस्खलन हुआ है.नदी में पानी बढ़ा और लगभग आधा पहाड़ सड़क अपने साथ लेकर नदी में समा गया.फिर एक ऊंची और खड़ी चढाई पार करके और बची हुई सुनसान सड़क पर पैदल चल कर हम पान्डुकेश्वर पहुंचे.यात्रा सीजन में यात्रियों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाले पान्डुकेश्वर बाज़ार में सन्नाटा पसरा हुआ है.लगभग सौ से अधिक दुकानों में से केवल दो ही दुकाने ही खुली नजर आती हैं.इन्ही में से एक दुकान पर बैठा युवाओं का एक ग्रुप 16 जून और उसके बाद के तमाम वाकयात तफसील से बताता है.वे बताते हैं कि 16 जून की रात को जब नदी में तेज गडगडाहट के साथ पानी बढ़ा तो लोग अपने घरों से भाग कर सुरक्षित स्थानों को चले गए.नदी से सड़क लगभग पांच सौ मीटर की दूरी पर होगी.ये युवा बताते हैं कि उस रात पानी में इतना वेग था कि सड़क भी इस तरह हिल रही थी मानों भूकंप आ रहा हो.पांडुकेश्वर में बीस मकान,होटल,स्कूल,सरकारी अस्पताल,आदि ध्वस्त हो गए.जगदीश लाल का मकान हवा में झूल रहा है तो संदीप मेहता का तीन मंजिला होटल बह गया.अरविन्द शर्मा बताते हैं कि उनका बारह कमरे का होटल,उसी में 6 आवासीय कमरे,पार्किंग बीस नाली भूमि सब बह गया.वे रुवांसे स्वर में कहते थे कि उन्होंने बेहद मेहनत करके इतना सब बनाया था,अब उनके पास एक सुई भी नहीं बची है.


पांडुकेश्वर में आपदा का खौफ लोगों पर इस कदर है कि वे रात में घरों में नहीं सो रहे हैं.वे कहते हैं कि कुछ तिरपालों का इंतजाम हो जाए तो उनके लिए रात बिताना थोड़ा आसान हो जाएगा.जहां सब जगह से यात्रियों को लूटे जाने की ख़बरें आ रही हैं वहाँ पांडुकेश्वर के लोग इसका अपवाद हैं.हालांकि इस लूट में कुछ भी नया नहीं है,हमारे सभी धार्मिक पर्यटन के स्थानों पर सामान्य समयों में भी पंडों से लेकर व्यवसायियों तक एक लुटेरा गैंग सक्रीय रहता ही है,जो लोगों को मूंडने में कोई कसर नहीं छोडता.आज यह इसलिए अखर रहा है क्यूंकि आपदा के समय भी वे ऐसे कर रहे हैं.लेकिन आपदा के समय जब सरकार-सत्ता के चरित्र में कोई अंतर नहीं है तो इन्ही के चरित्र में चमत्कारिक परिवर्तन की अपेक्षा क्यूँ?बहरहाल पांडुकेश्वर में संकट के समय में भी लोगों ने यात्रियों की मदद की और अपने बचे-खुचे राशन में भी यहाँ पहुंचे यात्रियों को भूखा नहीं रहने दिया.लेकिन अब इनका खाने-पीने का सामान भी खत्म हो रहा है.यहाँ ना बिजली है और ना ही मोमबत्ती.बेहद आक्रोशित स्वर में युवाओं ने बताया कि प्रशासन अब तक उदासीन बना हुआ है.इनका आरोप है कि भारी बरसात के अगले दिन तहसीलदार आये जरूर,लेकिन खा-पीकर डाक बंगले में सो गए.आपदा के लगभग हफ्ते भर बाद बाद कानूनगो आया और प्रभावित परिवारों को 2700 रूपया देकर चला गया.युवाओं का ग्रुप बताता है कि हेलिकॉप्टर से स्थानीय विधायक राजेंद्र भंडारी भी यहाँ पहुंचे थे और सब हो जाएगा का जुमला थमा कर उड़ चले.कैसे होगा पता नहीं,कब
होगा,कौन जाने!



फिर पैदल और खड़ी चढाई का रास्ता तय करके हम जिस ऊँचाई पर पहुँचते हैं,वहाँ खेत हैं.फिर एक बार विनाश का एक नया नजारा हमारे सामने है.जहां पर हम खड़े हैं,उससे कुछ कदम आगे से ही जमीन नीचे की ओर लुढ़क कर नदी में चली गयी है और यह भूस्खलन सड़क के बड़े हिस्से को भी अपने साथ नदी में ले गया है.ऊँचाई से देखने पर दो भूस्खलन और नजर आते हैं.सीमा सड़क संगठन(बी.आर.ओ) के काम करने की जो गति है,उससे तो अगले एक वर्ष से पहलेइस सड़क का बनाना मुमकिन नजर नहीं आता. बड़गासी गांव तो अभी सुरक्षित है,लेकिन उसके नीचे दरार है,जो आने वाले खतरे का संकेत है.लामबगड गांव है और बद्रीनाथ यात्रा मार्ग में पड़ने वाला छोटा सा बाजार भी.सड़क किनारे बाजार था और पहाड़ी पर थोड़ा ऊपर चढ कर गांव.आज के हालात यह हैं कि बाजार पूरी तरह से गायब हो चुका है.गांव में दस मकान बह गए हैं जिसमें से 6 अनुसूचित जाति के लोगों के थे और सवर्णों के.आपदा में अपना घर गवां चुके विक्रम लाल बताते हैं कि भारी बारिश के चलते बेघर हुए लोग सरकारी प्राइमरी स्कूल में शरण लिए हुए हैं.अभी स्कूल की छुट्टियाँ हैं,लेकिन जब छुट्टियाँ खत्म हो जायेगी तो ये लोग कहाँ जायेंगे,ये चिंता उन्हें साल रही है.जिस समय हम इस गांव में पहुंचे लगभग उसी समय हेलिकॉप्टर तिरपाल और कुछ खाद्य सामग्री यहाँ गिरा रहा था.लेकिन जहां यह सामान हेलिकॉप्टर से गिरा वह इतनी दूर था कि बेघर लोगों के लिए इसे असहाय नजरों से देखने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.पूरा गांव ही खतरे की जद में है.इसलिए लोग चाहते हैं कि सब को कम से कम एक तिरपाल तो मिल जाए.लेकिन गांव में परिवार हैं 80 और तिरपाल आये 20. 

हमने कोशिश की कि यहाँ से बदरीनाथ के लिए बढ़ लिया जाए.सो ऊपर गांव से हम नीचे सड़क पर उतरे.सड़क का अधिकाँश हिस्सा गायब हो चुका है.नदी पार करके बदरीनाथ तेरह-चौदह किलोमीटर पैदल टूटे-फूटे रास्तों से जाना ही एकमात्र विकल्प है.बदरीनाथ से सैकड़ों यात्री पैदल चल कर नदी के दूसरे निर्जन छोर पर खड़े हैं.यहाँ से सेना और आई.टी.बी.पी. रस्सों के सहारे लोगों को नदी के इस पार उतार रही है.सेना के लोगों से हमने कहा कि वे हमें दूसरी तरफ यानि उस छोर पर जहां लोग बदरीनाथ से आकर खड़े हैं,उस तरफ उतार दें.थोड़ी ना-नुकुर के बाद वे तैयार तो हुए लेकिन फिर वे दो पेड़ों को जोड़ कर एक बनाये गए लंबे से डंडे से पुल बनाने का पुराना तरीका अजमा रहे हैं.अलकनंदा की तेज धार के आगे फौजी जोर नहीं चला.सब जगह सिर्फ जोर ही जोर से तो काम नहीं बनता.



जो लोग पार हुए उन्हें तो फौजी जे.पी.कंपनी के कैम्प में ले गए,लेकिन नदी के दूसरी तरफ जहां सिर्फ नदी है,पत्थर हैं और जंगल है,वहाँ सैकड़ों लोग इस इन्तजार में खड़े हैं कि रस्सी लगे और वे पार हों.अन्धेरा गहराने से पहले हेलिकॉप्टर इन लोगों के लिए खाने के पैकेट फेंक कर चला जाता है.आपदा के मारे सैकड़ों लोग नदी किनारे और जंगल में रात बिता रहे हैं,सिर्फ इस आस में कि सुबह फिर रस्सी लगे तो वे पार हों. यह उस आपदा प्रबंधन और रेस्क्यू आपरेशन का असली चेहरा है जिसके कसीदे टी.वी.स्टूडियो में बैठे एंकर चीख-चीख कर पढ़ रहे हैं.बद्रीनाथ से लेकर पिनौला(जोशीमठ से दस किलोमीटर पहले जहां से जोशीमठ पहुँचने को वाहन मिल रहे हैं) तक सैकड़ों यात्री हैं, जो जंगलों,दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर लगातार दिन-रात,भूख-प्यास की परवाह किये लगातार चल रहे हैं कि आपदा की त्रासदी से वे मुक्ति पा सकें.हर व्यक्ति का अपना दर्द है,हर मिलने वाले की अपनी व्यथा है.

इस सब के बीच जो नहीं है तो वो है सरकार और प्रशासन नाम की चीज.मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सामन्य दिनों की ही तरह दिल्ली में नजर आ रहे हैं.फर्क सिर्फ इतना है कि आपदा के दौर में वे केंद्रीय मंत्रियों को गुलदस्ते भेंट करते नहीं बल्कि टी.वी.स्टूडियो और अखबारों में साक्षात्कारों में ऐसे दावे करते देखे जा रहे हैं,जिनकी सच्चाई के सबूत कम से कम उत्तराखंड में तो ढूँढना मुश्किल है.स्थानीय प्रशासनिक है तो वह सुबह से शाम तक हैलीपैड पर खड़े हैं.सेना और अर्द्ध सैनिक बल जिनपर तारीफों की जमकर पुष्पवर्षा हो रही है,दरअसल आपदा के अनुपात में उनकी रफ़्तार को देखें तो वह नाकाफी है.लेकिन चूँकि बाकी पुलिस-प्रशासन के दर्शन भी आपदाग्रस्त क्षेत्रों में दुर्लभ हैं,इसलिए लगता है कि चलो कम से कम सेना वाले दिख तो रहे हैं,पहाड़ चढ़ने-उतरने में लोगों की मदद तो कर रहे हैं.इतना ही क्या कम है?अन्यथा की स्थिति में देखें तो ना तो कहीं कोई पुल सैन्य बलों ने लगाया है,ना ही कोई रास्ता खोला है. 

लामबगड में हमारे पत्रकार मित्रों से जे.पी.कंपनी के लोग कहते हैं कि उनका बहुत नुक्सान हो गया है,इसकी भी खबर वे छापें.पिनौला में एन.टी.पी.सी वाले कह रहे हैं कि वे आपदा पीड़ितों को निशुल्क खाना खिला रहे हैं,पानी पिला रहे हैं,यह भी अखबारों में आये.सच है कि जे.पी .कंपनी का नुक्सान हुआ है और सही है कि एन.टी.पी.सी वालों ने लंगर लगाया है.ये आपदा के बाद उनकी भूमिका है,लेकिन आपदा के पहले उनकी भूमिका पर चर्चा क्यूँ ना हो?पांडुकेश्वर में लोग आरोप लगा रहे हैं कि जे.पी.कंपनी के बैराज से आये पानी से ही उनका नुक्सान हुआ है और जे.पी.कंपनी को इस नुक्सान की जिम्मेदारी लेकर भरपाई करनी चाहिए.जे.पी.कम्पनी के इंजीनियर पंकज रावत इस बात से सहमत नहीं होते कि कम्पनी के कारण आपदा की तीव्रता बढ़ गयी. लेकिन पांडुकेश्वर के लोगों का आरोप है कि जे.पी.कम्पनी के बैराज में पहले क्षमता से अधिक जमा हुआ और फिर जब अत्याधिक पानी के दबाव को बैराज सह न सका तो वह टूट गया और यह बैराज का पानी, लामबगड के आगे सारे इलाके को तहस-नहस करता चला गया.यह कोई पहली बार नहीं है कि जे.पी कंपनी पर इस क्षेत्र में तबाही लाने का आरोप लगा है.इससे पहले भी 2004 में भी लामबगड क्षेत्र में बाढ़ जैसे हालात पैदा करने और इस गांव को नुक्सान पहुँचाने के लिए जे.पी.कम्पनी को उत्तरदाई ठहराया गया था.

2007 में जे.पी.कम्पनी की कारस्तानी से जोशीमठ की ठीक सामने की पहाड़ी पर स्थित चांई गांव में जमीन धंसने लगी.लोगों के घर-खेत सब जगह बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गयी और बिना किसी आपदा के ही यह गांव आपदा ग्रस्त हो गया. चांई गांव की ही तलहटी में ही जे.पी.कम्पनी की विष्णुप्रयाग परियोजना का पावर हॉउस है और लामबगड से बारह किलोमीटर लंबी सुरंग से नदी का पानी यहाँ लाकर विद्युत उत्पादन होता है.आधिकारिक तौर पर 400 मेगावाट की बताये जाने वाली इस परियोजना में नान-मानसून सीजन में मात्र 100-150 मेगावाट ही विद्युत उत्पादन होता है.मानसून सीजन में यह अपने घोषित उत्पादन लक्ष्य के करीब तब पहुँचती है जबकि नदी में सिल्ट ना हो और बरसात में नदी में सिल्ट ना हो यह कैसे संभव है,भला !.इसी तरह इस बरसात में एन.टी.पी.सी द्वारा बनायी जा रही तपोवन-विष्णुगाड परियोजना का बैराज भी बह गया.जम कर खनन भी जे.पी कंपनी ने किया और नदी के एक हिस्से पर अतिक्रमण कर मंदिर भी बनाया जो अब तहस-नहस हो चुका है. बैराज बहने के बाद इस परियोजना में विद्युत उत्पादन ठप्प हो गया है .530 मेगवाट की एन.टी.पी.सी.द्वारा बनायीं जा रही तपोवन-विष्णुगाड परियोजना का काफर डैम पिछली बरसात में भी बहा.सुरंग खोदने के दौरान इस परियोजना की सुरंग में दिसंबर 2009 में अचानक पानी निकालना शुरू हुआ और बीते चार सालों से यह पानी निकल ही रहा है.जोशीमठ क्षेत्र में बनने वाली इन दो परियोजनाओं का क्षेत्र को नुक्सान पहुंचाने का पुराना इतिहास और हाल की बरसात में इनके बैराजों का बहना साफ़ दिखाता है कि आपदा की तीव्रता को बढाने में इन्होने भरपूर योगदान दिया.मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और परियोजनाओं के अंध समर्थकों को यह ना दिखाई दे तो कोई क्या कर सकता है?


इस विभीषिका की मार को बढाने वाले महकमों ने इससे कोई सबक सीखा हो,ऐसा कतई दिखाई नहीं देता. उदाहरण के लिए सीमा सड़क संगठन(बी.आर.ओ) की कार्यप्रणाली को ही देख लीजिए.बी.आर.ओ.की जिम्मेदारी उत्तराखंड में सीमाओं तक जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण,रखरखाव और उन्हें चौड़ा करने की है.राष्ट्रीय राजमार्गों को चौड़ा करने का यह काम केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार के दौरान शुरू हुआ था.तत्कालीन केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री भुवन चंद्र खंडूडी ने सड़कों के चौड़े करवाने का श्रेय लेते हुए वाहवाही और वोट,दोनों ही खूब बटोरे.केंद्र के सत्ता से भारतीय जनता पार्टी और खंडूडी साहब को रुखसत हुए दस साल होने को हैं.लेकिन जिन सड़कों को चौड़ा करने के नाम पर वोट पाये गए,अव्वल तो वे अभी तक भी पूरी तरह चौड़ी नहीं हो पायी और दूसरा अंधाधुन्द डाइनामाइट के विस्फोटों ने इन सड़कों को स्थायी भूस्खलन स्थलों में तब्दील कर दिया है.बी.आर.ओ. सड़क निर्माण और उसे चौड़ा करने में न केवल बेहिसाब विस्फोटकों का प्रयोग करता है बल्कि मलबा भी नदी में ही डालता है.यह दोनों ही काम आपदा की विभीषिका को बढाने वाले ही सिद्ध होते हैं. लेकिन भारी आपदा के बाद जगह-जगह सड़कों के नदी में समाने के बाद भी बी.आर.ओ.की कार्यप्रणाली जस की तस है.

बदरीनाथ राजमार्ग पर, गोविन्दघाट से कुछ ही आगे भयानक भूस्खलन हुआ है.सड़क का काफी हिस्सा नदी में चला गया है और बाकी अंश पर मौजूद दरारें संकेत हैं कि यह हिस्सा भी जल्द ही टूटने वाला है.भूस्खलन की चपेट में आये हिस्से से बड़े-बड़े बोल्डरों को हटाने के लिए बी.आर.ओ. वालों ने हमारे वहाँ पर से गुजरने के दौरान ही तीन बड़े विस्फोट किये और हर विस्फोट से पूरा पहाड़ और आसपास का इलाका थर्राता हुआ महसूस हो रहा था.इन विस्फोटों के बाद भूस्खलन के ही ढाल पर एक पतला सा रास्ता तो बी.आर.ओ. ने बना दिया.लेकिन यहीं पर और बड़े भूस्खलन की पटकथा भी साथ ही लिख दी गयी है.

आपदा के बचाव और राहत कार्यों की जानकारी देने में केंद्र से लेकर राज्य सरकार जितनी तत्परता दिखा रही है,उतनी सतह पर भी दिखाई देती तो शायद अभी भी हज़ारों लोग बद्रीनाथ में नहीं फंसे होते और ना ही भूखे-प्यासे जंगलों,नदी,पहाड़ों में भटक रहे होते.स्लो-मोशन में चल रहे बचाव एवं राहत अभियान में भी शासन-प्रशासन का जोर इस बात पर ही है किसी तरह यात्रियों को यहाँ से रवाना किया जा सके.जो होटल बह गए,उन में काम करने वाले नौकरों का क्या हुआ,वे ज़िंदा हैं या कि होटलों के साथ ही नदी में समा गए,इसकी ना कोई चर्चा है,ना किसी को फ़िक्र.इसी तरह जिन लोगों की आजीविका का साधन घोड़े-खच्चर हैं,उनका क्या होगा है,यह प्रश्न भी अनुत्तरित है.गोविन्दघाट से हेमकुंड को जाने वाला अलकनंदा नदी पर लगा पुल बह गया है.वहाँ फंसे लगभग सभी लोगों को निकाला जा चुका है.घोड़े-खच्चर चलाने वाले भी इस पार आ गये हैं और सामने पहाड़ी ढाल पर खच्चरों के झुण्ड के झुण्ड चरते हुए देखे जा सकते हैं.खच्चरों का पेट तो घास से भर जाएगा पर इनपर अपनी आजीविका के लिए निर्भर लोगों का पेट कैसे भरेगा,यह दीगर सवाल है.

इस पूरे क्षेत्र को देखने पर समझ आता है कि चाहे किसी का आपदा में नुक्सान हुआ हो या ना हुआ हो,लेकिन आपदा की यंत्रणा से पूरा पहाड़ गुजर रहा है. मकान,दूकान,खेती सब आपदा में गंवा चुके लोगों का जीवन फिर पटरी पर कैसे आएगा,यह भी पहाड़ जैसा ही विकट सवाल है.पर हवाई जाहजों और राहत के हवाई दावों पर सवार सत्ताधीशों से इन सवालों पर संवेदनशील चिंतन की
अपेक्षा करना क्या कुछ ज्यादा नहीं हो जाएगा ?



इन्द्रेश आइसा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं और अब भाकपा-माले के नेता हैं. 
इनसे इंटरनेट पर indresh.aisa@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.