विकास के मॉडल की आपदा


कृष्ण सिंह

-कृष्ण सिंह

"...उत्तराखंड में विकास का जो मॉडल चल रहा है उसने यहां के पर्यावरण, जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र पर व्यापक प्रतिकूल असर तो डाला ही है, साथ ही पहाड़ की समूची भौगोलिक संरचना के साथ-साथ जल, जंगल, जमीन और स्थानीय आबादी के अस्तित्व को भी खतरे में डाल दिया है। विकास और आर्थिक तरक्की के नाम पर छप्परफाड़ मुनाफा कमाने के लिए लूट मची है।..." 




बारिश, बादल फटने, बाढ़ और भूस्खलन के कारण उत्तराखंड में भारी तबाही मची हुई है। पहाड़ टूट रहे हैं। गांव के गांव मलबे में दफन हो रहे हैं। शहर के शहर तबाह हो रहे हैं। समुद्र तल से 3553 मीटर (11657 फीट) ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ धाम तबाह हो गया है। बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई है। भीषण तबाही से उत्तराखंड के लोग दहशत में हैं। लेकिन हर वर्ष की तरह इस बार भी इस भीषण तबाही को प्राकृतिक आपदा कहा जा रहा है। हर बार पहले से ज्यादा विनाशकारी साबित हो रही ये आपदाएं-हादसे क्या सचमुच प्राकृतिक हैं? या फिर विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों के असंतुलित, बेरोकटोक और अंधाधुंध दोहन के चलते ऐसा हो रहा है?
उत्तराखंड में विकास का जो मॉडल चल रहा है उसने यहां के पर्यावरण, जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र पर व्यापक प्रतिकूल असर तो डाला ही है, साथ ही पहाड़ की समूची भौगोलिक संरचना के साथ-साथ जल, जंगल, जमीन और स्थानीय आबादी के अस्तित्व को भी खतरे में डाल दिया है। विकास और आर्थिक तरक्की के नाम पर छप्परफाड़ मुनाफा कमाने के लिए लूट मची है। इसका परिणाम है कि यहां अनियंत्रित एवं गैरकानूनी निर्माण कार्यों तथा बिल्डरों की बड़े पैमाने पर अतिसक्रियता ने इस खतरे को काफी खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है। दरअसल, पहाड़ी शहरों और कस्बों का विस्तार बहुत ही अनियोजित और अनियंत्रित तरीके से हो रहा है और बड़े पैमाने पर होने वाले निर्माणकार्यों ने इन्हें एक नए तरह के स्लम में बदल दिया है। नदियों के एकदम किनारे तक बड़े पैमाने पर बहुमंजिला इमारतें, होटल, लॉज और रिसोर्ट बनाए गए हैं और बनाए जा रहे हैं। साथ ही, नदियों में बड़े पैमाने पर बालू निकालने के लिए अवैध खनन कार्य अलग से चलता रहता है।  
 पर्यटन विकास के नाम पर पहाड़ों को लगातार खोखला किया जा रहा है। वर्तमान तबाही से इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। मीडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे बनाई गई तीस सौ से अधिक बहुमंजिला इमारतें, होटल और अन्य व्यापारिक इमारतें बाढ़ में बह गई या क्षतिग्रस्त हो गई हैं। ये इमारतें नदियों के बहुत करीब पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में गैर कानूनी तरीके से बनाई गई थीं। दरअसल, पहाड़ों में जिस हद तक भी संभव हो सकता है बिल्डरों द्वारा बड़े पैमाने पर बहुमंजिला इमारतों का निर्माण किया जा रहा है। रामनगर से आगे जिम कॉर्बेट अभयारण्य के पास मरचूला में रामगंगा नदी के एकदम किनारे पर दो-तीन किलोमीटर के अंदर कई एकड़ में रिसोर्ट बनाए गए हैं। इनमें स्वीमिंग पुल सहित कई अत्याधुनिक ऐशो आराम के इंतजाम हैं। जबकि यह पूरा इलाका पारिस्थितिक के लिहाज से संवेदनशील है। यह छोटा सा उदाहरण भर है। पहाड़ों में यह अब आम हो चुका है।
इसके अलावा, सबसे खतरनाक पहलू यह है कि बड़ी संख्या में बन रहे हाइड्रो पावर प्रोजेक्टों ने इस खतरे को बहुगुणित कर दिया है। विकास के लिए हाइड्रो पावर प्रोजक्टों को ही एकमात्र अनिवार्य विकल्प मान लिया गया है। उत्तराखंड में साढ़े पांच सौ से छह सौ के करीब बांध बनने हैं। कुछ बन चुके हैं, काफी बन रहे हैं और बहुत सारे प्रस्तावित हैं। इनमें से करीब 1500 किलोमीटर की सुरंगें निकलेंगी। पहाड़ों और उनमें बसे गांवों के नीचे से निकलने वाली ये सुरंगे 27-28 किलोमीटर तक लंबी हैं। इन सुरंगों का आकार दिल्ली के मेट्रो टनलों से भी बड़ा है। कई सुरंगों से काफी समय से पानी रिस रहा है। चमोली जिले के चाई गांव और तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना तथा मनेरी भाली-सेकेंड परियोजना इसका उदाहरण हैं। सुरंगों से पानी रिस कर पहाड़ों के अंदर धीरे-धीरे घुस रहा है और उन्हें अंदर से कच्चा कर रहा है। इसने भूस्खलन और आकस्मिक बाढ़ के खतरे को कई गुना बढ़ा दिया है। पिछले साल उत्तरकाशी में जो हुआ उसे हम देख चुके हैं, जहां अस्सी गंगा घाटी में बिजली कंपनियों ने इलाके में डायनामाइट से विस्फोट किए। बड़े पैमाने पर मलबा पानी में डाला, जिससे नदी का तल ऊंचा उठ गया। बादल फटने के बाद आकस्मिक बाढ़ ने पहले नदी में झील बनाई और फिर झील टूटी तो पानी के वेग ने भारी तबाही मचाई। साथ ही नदी के अतितीव्र वेग ने बांधों के निर्माणस्थल को तोड़ दिया जिससे नुकसान कहीं गुना ज्यादा हुआ। यह सर्वविदित है कि उत्तरकाशी सहित उत्तराखंड का अधिकांश पहाड़ी क्षेत्र भूकंप के लिहाज से अत्यधिक खतरनाक जोन चार और पांच में आता है। वैसे भी हिमालय दुनिया का सबसे नया पहाड़ है और ग्रोइग ऐज में है। फिर भी यहां विशालकाय जल बिजली परियोजनाओं को मंजूरी दी गई। विख्यात भू वैज्ञानिक केएस वल्दिया का कहना है कि आकस्मिक बाढ़ पूरी तरह से मानव निर्मित है।
http://buzztags.in/wp-content/uploads/2013/06/Uttarakhand-Floods.jpgइस पहाड़ी राज्य की सरकार कितनी दूरदर्शी और संवदेनशील है इसकी पोल खुद सीएजी की रिपोर्ट खोल चुकी है। हाइड्रो पावर प्रोजेक्टों के संदर्भ में सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया कि उत्तराखंड सरकार ने पर्यावरणीय चिंताओं को पूरी तरह से अनदेखा किया और प्रोजेक्ट डेवलेपर्स ने सिस्टेमेटिक त्रुटियों का इस्तेमाल अपने हित में किया। मंजूरी मिलने के बाद 85 प्रतिशत प्रोजेक्टों में बिजली उत्पादन क्षमता में 25 प्रतिशत से 329 फीसदी तक फेरबदल किया गया। सीएजी ने यूजेवीएन के प्री फिजबिलइटि स्टडी (पूर्व व्यवहार्यता अध्ययन) की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया। दरअसल, नई पावर पॉलिसी (पीपीपी) में निजी भागीदारी के तहत निजी कंपनियां 85 प्रतिशत बिजली बेच सकती हैं और 12 फीसदी उन्हें राज्य सरकार को देनी होगी। इससे हो यह रहा है निजी कंपनियां बहुत कम समय में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना चाहती हैं और इसके लिए वे नदियों और पहाड़ों का अनाप-शनाप तरीके से दोहन कर ही हैं। असल में, हिलायली क्षेत्र में बांधों के जलाशयों में गाद का भरना एक सामान्य प्रक्रिया है। हिमालयी नदियां अपने चरित्र के मुताबिक अपने साथ भारी मात्रा में गाद लाती हैं जिससे बिजली उत्पादन में कमी आ जाती है और बांध समय से पूर्व अपनी उत्पादकता खो देता है। उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश बनाने की गुलाबी तस्वीर वास्तविक धरातल पर कितनी भयावह है इसका सबसे बड़ा उदाहरण टिहरी बांध है। इससे 2400 मेगावाट बिजली बनने की बात कही गई थी, लेकिन इससे तीन सौ से लेकर चार सौ मेगावाट बिजली का ही उत्पादन हो रहा है।
एक और बात, सरकार इन परियोजनाओं को रन ऑफ द रीवर कह रही है। परन्तु विश्व बांध आयोग के मानकों के पैमाने से उत्तराखंड में बन रहे अधिकांश बांध रन ऑफ द रीवर (यानी छोटे बांध) की श्रेणी में नहीं आते। छोटे बांधों की ऊंचाई 15 मीटर से कम होनी चाहिए। उदाहरण के लिए पाला-मनेरी पोजेक्ट को रन ऑफ द रीवर कहा जा रहा है, पर इसकी ऊंचाई 74 मीटर है। ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं। जल धारण क्षमता और डिस्चार्ड के लिहाज से भी यहां के अधिकतर प्रोजेक्ट बड़े बांधों की श्रेणी में ही आते हैं।
हिमालयी क्षेत्र पहले से ही ग्लोबल वार्मिंग, मौसम के बदलते मिजाज और जैव विविधता तथा पारिस्थितक तंत्र पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव से जूझ रहा है। ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन ने इस खतरे को किस स्तर तक पहुंचा दिया इसे साल-दर-साल पहले से ज्यादा विनाशकारी साबित हो रहे भूस्खलन और आकस्मिक बाढ़ की घटनाओं के जरिए आसानी से समझा जा सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पहाड़ों के विनाश से सिर्फ उत्तराखंड की आबादी ही इसकी चपेट में नहीं आएगी बल्कि इसके साथ-साथ मैदानी इलाकों की एक बड़ी जनसंख्या बुरी तरह से प्रभावित होगी। विकास हो इससे भला किसे एतराज हो सकता है, लेकिन हिमालयी राज्य होने के कारण इसका विकास का मॉडल कैसा हो, यह असल सवाल है।
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 कृष्ण सिंह पत्रकार हैं. लंबे समय तक अखबारों में काम. 
 अभी पत्रकारिता के अध्यापन में.
इनसे संपर्क का पता krishansingh1507@gmail.com है.