भूमि का जबरन अधिग्रहण और कृषि औजारों की मूर्तियाँ

-विनय सुल्तान

विनय सुल्तान

"...इसी बीच नरेन्द्र दामोदर मोदी ने 1800 करोड़ के लागत की वल्लभ भाई पटेल की लोहे की मूर्ति बनाने की घोषणा की है. यह मूर्ति दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा होगी. मोदी इस प्रतिमा को गुजरात के किसानों के स्वाभिमान का प्रतीक बता रहा है. लौह पुरुष की इस मूर्ति को “स्टेच्यु ऑफ़ यूनिटी” नाम दिया गया है और दुनिया भर से इसके लिए निविदा मंगाई गई है. इसके लिए बीस राज्यों के किसान अपने कृषि औजारों का लोहा दान करेंगे. गुजरात समेत पूरे देश में किसानों की जमीनें जिस गति से छिनी जा रही हैं, ये औजार उनके किसी काम के रहेंगे ही नहीं। इन्हें उनसे छीने जाने (दान मांग लेने) की भूमिका पहले ही लिखी जा चुकी है।..."

ह फासीवाद और पूंजीवाद की दुराभिसंधि का दौर है. जब हिंदुत्व के टट्टू पर सवार एक तथाकथित “विकास पुरुष” गोएबल्स की एक दर्जन नाजायज संतानों( जन संपर्क एजेंसी) की फौज के साथ तमाम मंच पर स्व-नियुक्त भाट की तरह से खुद के विकास को बिरदाता घूम रहा है. उसी के सूबे गुजरात की राजधानी गांधीनगर में पिछले मंगलवार को ट्रेक्टरो की घरघराहट से शहरी चिल्ल-पों दब गई. अहमदाबाद, सुरेन्द्र नगर और मेहसाना के किसानो ने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ 'जाग' के नेत्रत्व में सचिवालय पर चढाई कर दी. 

नरेन्द्र मोदी, सेज (SEZ) की तर्ज पर स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन यानि SIR के जरिये अपने विकास के माडल को पूंजीपतियों के लिए और अधिक लुभावना बनाना चाहता था. इसके लिए सुरेन्द्र नगर, मेहसाना और अहमदाबाद के आस-पास के गाँव की 51000 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है. भारत में इतने बड़े पैमाने पर अधिग्रण के उदाहरण बहुत कम हैं. इस विशेष निवेश क्षेत्र को ऑटोमोबाइल हब बनाने की योजना है. बिचाराजी-विरमगाँव हायवे पर हंसलपुर में मारुती सुजुकी की एक फैक्ट्री भी प्रस्तावित है जिसके लिए सरकार ने 700 एकड़ जमीन पिछले साल ही आवंटित कर दी थी. इससे दो साल पहले किसानों ने निरमा को फैक्ट्री लगाने के लिए जमीन देने से इंकार कर दिया था.

यह प्रदर्शन मुझे बरबस ही सिंगुर की याद दिला देता है. वहां पर महज 4 वर्ग किमी के अधिग्रहण के नतीजे में लगभग 4 दशक से सत्ता पर काबिज़ वाम मोर्चे का लोकतान्त्रिक तख्तापलट हो गया था. बुद्धो बाबु 1894 के साम्राज्यवादी भूमि अधिग्रहण कानून के जरिये यह करना चाह रहे थे. आज वही मार्क्सवादी भूमि अधिग्रण बिल के संसोधन में “सार्वजनिक उद्देश्य” शब्द जोड़ने की मांग कर रहे हैं.

इसी बीच नरेन्द्र दामोदर मोदी ने 1800 करोड़ के लागत की वल्लभ भाई पटेल की लोहे की मूर्ति बनाने की घोषणा की है. यह मूर्ति दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा होगी. मोदी इस प्रतिमा को गुजरात के किसानों के स्वाभिमान का प्रतीक बता रहा है. लौह पुरुष की इस मूर्ति को “स्टेच्यु ऑफ़ यूनिटी” नाम दिया गया है और दुनिया भर से इसके लिए निविदा मंगाई गई है. इसके लिए बीस राज्यों के किसान अपने कृषि औजारों का लोहा 'दान' करेंगे. गुजरात समेत पूरे देश में किसानों की जमीनें जिस गति से छिनी जा रही हैं, ये औजार उनके किसी काम के रहेंगे ही नहीं। इन्हें उनसे छीने जाने (दान मांग लेने) की भूमिका पहले ही लिखी जा चुकी है। 

दरअसल किसानों के सामने असल सवाल किसी 'लौह पुरुष' के लोहे का बुत बनाए जाने का नहीं है, उनके सवाल जिस जगह जुड़ते हैं वह विकास का वह मॉडल है जो किसानों से उनकी जमीने छीनता है और पूंजीपतियों को कौड़ी के दाम औद्योगिक विकास का हवाला देकर सौंप देता है। मोदी इस मॉडल के पुरोधा पुरुष हैं। पूंजी निवेश के लिए गुजरात में जिस तेजी से अधिग्रहण हुआ है वो काबिल-ए-गौर है। पिछले 10 सालों में भाव नगर, मेहसाना, भरूच, कच्छ आदि जिलों में गुजरात औद्योगिक विकास कारपोरेशन ने बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण किया है। इससे 182 निजी क्षेत्र की औद्योगिक इकाइयों की स्थापना संभव हो सकी है। 

जमीन की इस बंदरबांट का एक नमूना कच्छ के रन में विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए दस हजार हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण के लिए मछुवारों के  56 गाँव उजाड़ दिए गए। यहाँ पांच करोड़ वर्ग मीटर जमीन अडानी समूह को 32 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से दे दी गई। जबकि इसकी कीमत बाज़ार में 1500 रुपये प्रति वर्ग के हिसाब से थी। महुआ, नासिक के बाद सबसे ज्यादा प्याज पैदा करने वाला क्षेत्र है। निरमा को यहाँ 268 हेक्टेयर जमीन सीमेंट प्लांट के लिए आवंटित की गई। साथ ही भावनगर जिले के तटीय क्षेत्र में 300 हेक्टेयर जमीन चूना पत्थर की खुदाई के लिए भी आवंटित हुई। इसने 15000 लोगो को भूमिहीन और बेरोजगार बना दिया। इसी तरह भावनगर में प्रस्तावित मीठीविर्दी न्यूक्लियर पावर प्रोजेक्ट के लिए 24 गावों के 15000 लोगो को विस्थापित कर लिया गया।

नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पिछले दस सालो में 51 विशेष आर्थिक जोन को मंजूरी दी है जिसमे से 13 को पिछले 2 सालों में पारित किया गया। 51 में से बीस लगभग तैयार हो चुके हैं। इन आर्थिक क्षेत्रों का कुल क्षेत्रफल 20,87 हेक्टेयर है। इसके अलावा यदि हम इसमें विशेष निवेश क्षेत्र को जोड़ दे तो यह आंकड़ा कई गुना बढ़ जाता है। क्या इस अधिग्रहण से विस्थापित लोग मोदी के विकास के माडल की भट्टी में नहीं झोक दिए गए हैं? जिन लोगो के पास अपनी जमीन थी, रोजगार था उन्हें अब भूमिहीन और बेरोजगार बनाने वाला विकास आखिर किसके लिए हो रहा है? पंद्रह हजार लोगो को विस्थापित कर के आप चार सौ लोगो को रोजगार दे रहे हैं तो आपके विकास का तर्क हास्यास्पद है।

जिन क्षेत्रों में कृषि जीवन यापन के पर्याप्त संसाधन मुहैय्या न करवाती हो वहां पशुपालन द्वितीयक व्यवसाय के रूप में रोजमर्रा की जिन्दगी बहुत महत्वपूर्ण होता है। गौचर भूमि का इस प्रकार की ग्रामीण अर्थव्यवथा में महत्वपूर्ण स्थान है। यह जमीन समुदाय या गाँव-समाज की होती है और इस पर किसी का व्यक्तिगत हक नहीं होता है। यह जमीन अकाल जैसे कठिन समय में मवेशियों के चारे की समस्या का अनूठा हल है। गुजरात में भूमि अधिग्रहण की चपेट में यह गौचर सबसे पहले आ रहे हैं. “वेस्ट लेंड” के नाम पर बड़े पैमाने पर गौचर भूमि का अधिग्रहण किया गया। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संतुलन बुरी तरह से प्रभावित होगा। आप अक्सर मोदी के सायबर बंदरों को “गौ-हत्या” के नाम पर वर्चुअल मिडिया पर सांप्रदायिक उन्माद फैलाते हुए देख सकते हैं। गौचर भूमि का अधिग्रहण कर क्या लाखों मवेशियों जिनमे हजारो “गौ माता” भी होंगी को भूखे मारने का अपराधी नहीं है।

गुजरात में जिस बर्बर तरीके से लोगों को अपनी जमीनों से खदेड़ा गया और जा रहा है उसे देखने के बाद नरेन्द्र मोदी की विकास की लफ्फाजी तार-तार हो जाती है। विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर लोगों को भूमिहीनता और बेरोजगारी की ओर धकेला जा रहा है उसके विरोध में विट्ठलपुर से शुरू हुआ ये विरोध बहुत मौजू है। पूंजीपतियों के दलाल, मोदी ने जिस तेजी से लोगो को उनकी जमीनों से वंचित किया है, गुजरात के कई कोनों के सिंगुर बनने की सम्भावनाये उतनी तेजी से बढ़ रही हैं। किसान के लिए अपने खेत जमीन का टुकड़ा नहीं अस्तित्व का सवाल है।


विनय  स्वतंत्र पत्रकार हैं. 
इनसे vinaysultan88@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.