ज़ुबान पर पहरे का निज़ाम


सत्येंद्र रंजन
-सत्येंद्र रंजन

 "...सरकारों और न्यायपालिका के रुख के नतीजा यह होगा कि आशीष नंदी (या कोई बुद्धिजीवी) अब गंभीर और जटिल विषयों पर चर्चा के दौरान भी नाप-तौल कर बोलेंगे। कमल हासन (या कोई फिल्मकार) आगे अपनी किसी फिल्म में कोई सीन या संवाद डालने के पहले सौ बार सोचेंगे। इसका संदेश हर कला और अभिव्यक्ति के माध्यम से जुड़े लोगों तक जाएगा। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल जरूर उठेगा कि क्या यही वो उदार या लोकतांत्रिक भारत है, जिस पर हम गर्व करते हैं? क्या सचमुच यह वही समाज है, जिसके निर्माण की कल्पना भारतीय संविधान में की गई है?..."

 
न्याय एवं समता के सिद्धांतों आधारित विवेकपूर्ण समाज के निर्माण का लक्ष्य तय करने वाले किसी संविधान में नागरिकों के मूल अधिकारों के वर्णन की आवश्यकता इसीलिए होती है, क्योंकि इन अधिकारों को ताकतवर तथा दबंग समूहों एवं विवेकहीन शक्तियों से खतरा लगातार बना रहता है। ऐसे संविधान के तहत निर्मित राज्य-व्यवस्था का यह दायित्व होता है कि वह सामाजिक स्वार्थों तथा ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों से संचालित ताकतों से खतरा आने की स्थिति में व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करे। राज्य-व्यवस्था के अंग अगर इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ने लगें, तो उस स्थिति को न सिर्फ नागिरक स्वतंत्रताओं, बल्कि पूरी संवैधानिक व्यवस्था के लिए भी खतरे की घंटी मानना चाहिए। दुर्भाग्य से भारत में यह खतरा बढ़ता ही जा रहा है।
 
सवाल यह है कि अगर संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारत के नागरिकों का मूल अधिकार है,तो इसके संरक्षण का दायित्व किसका है? स्पष्ट है कि सरकारें लंबे समय से यह जिम्मेदारी नहीं निभा रही हैं। इस बात की मिसाल वैसे तो अनगिनत हैं, लेकिन अगर हम एमएफ हुसेन के मामले पर ही गौर कर लें, तो साफ हो जाता है कि कैसे कुछ कट्टरपंथी-उग्रवादी समूह बेखौफ किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की आजादी का खुलेआम हनन करने में कामयाब हो सकते हैं। कुछ समय पहले तक न्यायपालिका ऐसे मामलों में निर्णायक दखल देती थी, जिससे कम से कम सिद्धांत रूप में सरकारों की जवाबदेही तय होती थी।
 
लेकिन हाल में स्थितियां उलटती नजर आई हैं। कमल हासन की फिल्म विश्वरूपम के मामले में अंततः वही हुआ, जो मुस्लिम संगठन चाहते थे। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड से पास इस फिल्म के कुछ दृश्यों और संवादों को उन्होंने अपने मजहब के खिलाफ माना। उन्होंने धमकियां दीं तो तमिलनाडु सरकार ने कानून-व्यवस्था पर अमल की अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय फिल्म की रिलीज पर रोक लगा दी। कमल हासन हाई कोर्ट गए, तो हाई कोर्ट के जज ने कहा कि वे 26 जनवरी को खुद फिल्म देखेंगे और 28 जनवरी को फैसला देंगे। लेकिन 28 जनवरी को यह आश्चर्यनजक सलाह देते हुए निर्णय एक दिन टाल दिया कि अगर फिल्म निर्माता और मुस्लिम संगठन आपस में समझौता कर लें तो बेहतर होगा। पूछा जा सकता है कि अगर विवाद के ऐसे मामले भी आपसी बातचीत से ही निपटाने हों, तो न्याय-व्यवस्था की आखिर जरूरत क्या है? बहरहाल, एक दिन बाद उन्होंने प्रतिबंध हटाने का आदेश दिया, लेकिन यह राहत क्षणिक साबित हुई, क्योंकि अगले दिन डिवीजन बेंच ने फिर से फिल्म की रिलीज पर रोक लगा दी। कमल हासन के लिए संदेश साफ था। कुछ ही दिन पहले फिल्म डैम 999 पर प्रतिबंध के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टिपप्णी की थी कि तमिलनाडु सरकार की कानून व्यवस्था संबंधी चिंताओं को हलके से नहीं लिया जा सकता। अतः फिल्म बनाने में सौ करोड़ रुपए लगा चुके कमल हासन ने अंततः कट्टरपंथी समूहों से समझौता कर लेने में ही अपनी भलाई समझी और फिल्म के सात दृश्य और कुछ संवाद काटने पर राजी हो गए। यानी सेंसर के सुपर ऑथरिटी भारी पड़े!
 
जयपुर साहित्य उत्सव में एक टिप्पणी के कारण जेल जाने का खतरा झेल रहे मशहूर समाज मनोवैज्ञानिक आशीष नंदी ने सुप्रीम कोर्ट की पनाह ली, तो सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी गिरफ्तारी पर तो रोक लगा दी, लेकिन उसके साथ ही जजों ने उन्हें जो सलाह दी, वह लोकतांत्रिक संवाद में यकीन रखने वाले किसी व्यक्ति को परेशान कर सकती है। नंदी से कहा गया कि वे ऐसी बात नहीं कह सकते जिससे किसी समूह की भावनाएं आहत हों। विवाद भड़कने के तुरंत बाद नंदी ने सफाई दी थी कि अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के नेताओं के भ्रष्ट होने संबंधी उनके बयान को संदर्भ से काटकर देखा जा रहा है। जब अदालत का ध्यान इस तरफ खींचा गया कि नंदी की बात जिस तरह पेश की गई, वो उनका मतलब नहीं था, तो जजों ने कहा कि आखिर वे ऐसी बात क्यों बोलते हैं, जो उनका मतलब नहीं होता? सामाजिक विडंबनाओं पर कोई बुद्धिजीवी कैसे बोले, अगर यह उसे बताया जाने लगे तो किसी समाज में बहस, विमर्श,शास्त्रार्थ का क्या होगा, इसकी कल्पना भी भयावह लगती है। अपनी उलटबासियों के लिए मशहूर कबीर ने खुद को इसी तरह की सलाह के दायरे में घेर लिया होता, तो वे क्या कह पाए होते, इसका हम सहज अंदाजा लगा सकते हैं।
 
सत्ता में बैठे नेताओं द्वारा अपने संवैधानिक कर्त्तव्य पर वोटों के समीकरण को तरजीह देने का परिणाम है कि पिछले वर्ष सलमान रुश्दी को जयपुर साहित्य उत्सव में भाग लेने से रोक दिया गया और इस वर्ष वे कोलकाता नहीं जा सके। चरममंथी समूहों के आगे आत्म-समर्पण की दूसरी मिसाल यह है कि इसी वर्ष शुरू हुई हॉकी इंडिया लीग में शामिल किए गए पाकिस्तान के खिलाड़ी वापस भेज दिए गए। ऐसे संगठनों के ही भय से भारत में हो रहे महिला क्रिकेट विश्व कप का कार्यक्रम बदलना पड़ा। पाकिस्तान के सारे मैचों को कटक में कराने का निर्णय हुआ। यहां मुद्दा यह नहीं है कि जब नियंत्रण रेखा पर तनाव बढ़ रहा हो, तो पाकिस्तानी खिलाड़ियों को भारत में खेलना चाहिए या नहीं? मुद्दा यह है कि यह फैसला कौन करेगा? क्या किसी सांप्रदायिक संगठन, समूह या पार्टी को कानून अपने हाथों में लेकर यह तय करने की इजाजत होनी चाहिए?
 
सरकारों और न्यायपालिका के रुख के नतीजा यह होगा कि आशीष नंदी (या कोई बुद्धिजीवी) अब गंभीर और जटिल विषयों पर चर्चा के दौरान भी नाप-तौल कर बोलेंगे। कमल हासन (या कोई फिल्मकार) आगे अपनी किसी फिल्म में कोई सीन या संवाद डालने के पहले सौ बार सोचेंगे। इसका संदेश हर कला और अभिव्यक्ति के माध्यम से जुड़े लोगों तक जाएगा। लेकिन इसके साथ ही यह सवाल जरूर उठेगा कि क्या यही वो उदार या लोकतांत्रिक भारत है, जिस पर हम गर्व करते हैं? क्या सचमुच यह वही समाज है, जिसके निर्माण की कल्पना भारतीय संविधान में की गई है?
 
गौरतलब है कि अगर भारत जैसे विशाल एवं विभिन्नतापूर्ण समाज में किसी समूह का आहत होना अभिव्यक्ति के मूल अधिकार की सीमा को तय करने की कसौटी बन गया, तो उसका व्यावहारिक मतलब यही होगा कि किसी कुरीति,सामाजिक बुराई, अंधविश्वास, पाखंड, उभरते अवांछित राजनीतिक रुझानों आदि के खिलाफ कुछ भी बोलना कठिन हो जाएगा। सामाजिक गतिविधियों, राजनीतिक रुझानों और सांस्कृतिक धाराओं की समझ पैदा करने अथवा उनमें सुधार के उद्देश्य से कही गई बातों और नफरत फैलाने वाले वक्तव्यों के बीच फर्क करने का विवेक अगर समाज खो देता है, तो यह लोकतंत्र की बुनियाद पर प्रहार होगा। हमें यह बात ध्यान में रखनी चाहिए भारतीय संविधान के लागू होने का मतलब यह नहीं था कि भारतीय समाज अनिवार्य रूप से लोकतांत्रिक है। उसका अर्थ यह था कि देश ने लोकतंत्र, समता एवं न्याय के मूल्यों से संचालित व्यवस्था की तरफ बढ़ने का संकल्प किया। इसके लिए संविधान में आवश्यक प्रावधान किए गए। लेकिन संविधान के प्रावधान एवं भावनाएं व्यवहार में तभी उतर सकते हैं, जब राज्य-व्यवस्था उसके प्रति आस्थावान एवं प्रतिबद्ध हो। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज जातिवादी, सांप्रदायिक एवं कट्टरपंथी ताकतें एजेंडा तय कर रही हैं और राज्य-व्यवस्था के विभिन्न अंग उससे समझौता कर रहे हैं।
 

 
सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.