महिला मुक्ति की मज़बूत 'रिपोर्ट' और उदासीन सरकार

सत्येन्द्र रंजन

-सत्येंद्र रंजन

"...गौरतलब है कि वर्मा समिति ने अपनी रिपोर्ट को सिर्फ कुछ कानूनी प्रावधानों में हेर-फेर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि बलात्कार या महिलाओं की असुरक्षा के प्रश्न को सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य और पितृ-सत्तात्मक संस्कृति के व्यापक दायरे में रखकर देखा है। उसने महिलाओं पर हिंसा के सवाल को संविधान से मिले मूलभूत अधिकारों के उल्लंघन के संदर्भ में रखा है, जिससे ऐसी घटनाओं में सरकारों की जवाबदेही तय होती है।..."


http://www.thehindu.com/multimedia/dynamic/01339/TH24_VERMA_1339760g.jpgस्टिस जेएस वर्मा के बयानों पर गौर करें, तो सिर्फ इसी नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि यूपीए सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा के उपायों पर सुझाव देने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन उसी सोच के साथ किया, जिसके तहत जांच समितियां या आयोग बनाए जाते हैं। अनुभव यही है कि ऐसा तूफान को गुजार देने के मकसद से किया जाता है। जब तक रिपोर्ट आती है, मामला ठंडा पड़ गया होता है और सरकारें सुझावों एवं सिफारिशों समेत उन रपटों को ठंडे बस्ते में डाल देती हैं। दिसंबर में दिल्ली में तेइस वर्षीया फिजियोथेरेपिस्ट छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार की बर्बर घटना के बाद देश भर में सड़कों पर उमड़े आक्रोश से अगर सचमुच सत्ता-प्रतिष्ठान की आत्मा हिली होती, तो वह सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायाधीश जस्टिस वर्मा की अध्यक्षता में बनी समिति के प्रति वैसी बेरुखी नहीं दिखाती, जैसा सामने आया है। चार बातें ध्यान खींचती हैं। सरकार ने समिति को राजधानी के विज्ञान भवन में दो कमरे और एक कार देने के अलावा कोई और सुविधा उपलब्ध नहीं कराई। गृह मंत्री सुशील कुमार शिन्दे ने एक बार भी समिति से संपर्क या संवाद करने की जरूरत महसूस नहीं की। कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने आधी रात को जस्टिस वर्मा के निवास पर जाकर जबरन तभी अपना सुझाव-पत्र संपने की जिद की, जिस पर बाद में सोनिया गांधी ने जस्टिस वर्मा को फोन कर अफसोस जताया। और आखिर में यह कि वर्मा कमेटी ने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपने के लिए वक्त मांगा, जो उसे नहीं दिया गया। अंततः गृह मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव ने सरकार की तरफ से वह रिपोर्ट ग्रहण की।


अगर सरकार सचमुच उस जन आक्रोश की कद्र करती, जिसके कारण इस समिति का गठन हुआ, तो उसके साथ ऐसी उपेक्षा कतई नहीं बरतती। सरकार को संभवतः यही उम्मीद रही होगी कि दूसरी कमेटियों की तरह यह समिति भी समय-दर-समय मांगती जाएगी और आखिर में निकल कर कुछ भी ठोस सामने नहीं आएगा। लेकिन समिति ने इस उम्मीद पर पानी फेर दिया। उसने तय समयसीमा से एक दिन पहले ही एक ऐसी रिपोर्ट सौंप दी, जो महिला अधिकार विमर्श को एक सर्वथा नई मंजिल पर ले गई है। इसके बावजूद वर्मा समिति की सिफारिशों पर अमल आसान नहीं है। दरअसल, समिति के प्रति उपेक्षा का रुख सरकार के सर्वोच्च स्तर से लेकर गृह मंत्रालय और पुलिस प्रशासन तक पर हावी रहा। इसलिए इस आशंका का मजबूत आधार है कि इन सिफारिशों को समिति-दर-समिति में उलझाने और उसके जरिए समय गुजारने की पूरी कोशिश होगी। हमें इस संभावना के प्रति जागरूक रहने की जरूरत है कि इस रिपोर्ट पर अमल ना होने देने के लिए सरकार, राजनीतिक समुदाय के ज्यादातर हिस्सों और अनेक संगठित सामाजिक वर्गों की गोलबंदी हो सकती है। यह खबर पहले ही एक वित्तीय अखबार में छप चुकी है कि कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न रोकने के लिए समिति के सुझावों को लेकर कॉरपोरेट जगत में गहरा विरोध है। कॉरपोरेट अधिकारी यह नहीं चाहते कि यौन उत्पीड़न की शिकायतों की जांच उनके अंदरूनी दायरे से निकलकर किसी बाहरी निष्पक्ष संस्था के हाथ में जाए और आरोप लगाने वाली महिला के साथ आरोपी के मेलमिलाप (समझौता) कराने के प्रावधान को खत्म कर दिया जाए।     

गौरतलब है कि वर्मा समिति ने अपनी रिपोर्ट को सिर्फ कुछ कानूनी प्रावधानों में हेर-फेर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि बलात्कार या महिलाओं की असुरक्षा के प्रश्न को सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य और पितृ-सत्तात्मक संस्कृति के व्यापक दायरे में रखकर देखा है। उसने महिलाओं पर हिंसा के सवाल को संविधान से मिले मूलभूत अधिकारों के उल्लंघन के संदर्भ में रखा है, जिससे ऐसी घटनाओं में सरकारों की जवाबदेही तय होती है। महिला अधिकार आंदोलन जिन मुद्दों को लेकर दशकों से संघर्ष करता रहा, उनमें से अनेक को अपनी रिपोर्ट में शामिल कर वर्मा समिति ने उन्हें आधिकारिक स्वरूप प्रदान किया है। मसलन, उसने बलात्कार की परिभाषा फिर से तय करने, सक्रिय प्रतिरोध ना होने का मतलब यौन संबंध के लिए सहमति समझने की मान्यता खत्म करने और विवाह संबंध के भीतर के बलात्कार को अपराध बनाने की सिफारिश की है। समिति ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वैवाहिक या किसी अन्य रिश्ते को यौन संबंध के लिए महिला की सहमति का सबूत नहीं माना जा सकता। इसलिए अगर महिला यह इल्जाम लगाती है कि संबंध की आड़ में वह यौन हिंसा का शिकार है, तो यह कानून के तहत जुर्म होना चाहिए।

यह तथ्य है कि बलात्कार की अधिकतर घटनाएं ग्रामीण इलाकों में होती हैं, जहां दलित एवं अन्य कमजोर वर्गों की महिलाएं ताकतवर लोगों का शिकार होती हैं। दिहाड़ी और विस्थापित मजदूर स्त्रियां के लिए लगातार खतरा बना रहता है। अशांत क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के हाथों बलात्कार की खबर अक्सर आती है। दिल्ली बलात्कार कांड के बाद ये तमाम मुद्दे उठे। इसलिए यह प्रशंसनीय है कि वर्मा समिति ने इन सब पर गौर किया। चूंकि उसने बलात्कार या यौन हिंसा को संवैधानिक अधिकारों के दायरे में रखा, अतः अगर उसकी सिफारिशों को स्वीकार किया जाए, तो पीड़ित महिलाओं को सुरक्षा देना स्वतः सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है। समिति ने बेलाग कहा है कि संसाधनों की कमी का बहाना बनाकर राज्य मौलिक अधिकारों की अनदेखी नहीं कर सकता। इसी तरह समिति ने बलात्कार के आरोपी सुरक्षाकर्मियों पर से सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) कानून की ढाल हटाने का सुझाव देकर उपेक्षित क्षेत्रों की उत्पीड़ित महिलाओं की तरफ से लंबे समय से उठती मांग को आवाज दी है। दरअसल, समिति ने महिलाओं की सुरक्षा के विमर्श को पुलिस एवं चुनाव सुधारों की बहस तक ले जाकर इस चर्चा को समग्रता दी है। मुमकिन है कि इसके बावजूद समिति की रिपोर्ट से महिला आंदोलन की कुछ अपेक्षाएं पूरी नहीं हुई हों। मसलन, कुछ कार्यकर्ताओं ने ध्यान दिलाया है कि बलात्कार पीड़ितों के पुनर्वास और मुआवजे के मुद्दे पर समिति ने ध्यान नहीं दिया।

इसके बावजूद इस तथ्य को लगभग आम-सहमति से स्वीकार किया गया है कि भारत में पहली बार यौन हिंसा के मुद्दे को “इज्जत” और “यौन शुचिता” की स्त्री विरोधी सोच से निकाल कर इसे आधुनिक, समतावादी और संवैधानिक संदर्भों में देखा गया है। इस तरह वर्मा समिति की रिपोर्ट दिल्ली बलात्कार कांड के बाद हुए प्रतिरोध के दौरान व्यक्त किए गए प्रगतिशील एवं मानवीय मूल्यों का मूर्त रूप बनी है। समिति “फांसी दो”, “बाल अपराधी तय करने की उम्र घटाओ”- जैसी प्रतिगामी मांगों से प्रभावित नहीं हुई। बलात्कार पीड़ित को “जीवित लाश” मानने जैसी स्त्री-विरोधी सोच को उसने अस्वीकार किया। प्रशासनिक कदमों, विधायी पहल, सामाजिक प्रयासों एवं सांस्कृतिक परिवर्तन की जरूरत को उसने स्पष्टता के साथ स्वर दिया। इन रूपों में यह रिपोर्ट हाल के उस आंदोलन की उपलब्धियां हैं, जिसका बखान राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और तमाम राजनीतिक नेताओं ने किया है। लेकिन उनसे ऊंचे शब्दावंडबरों की नहीं, बल्कि आगे बढ़़कर कदम उठाने की अपेक्षा है। दुर्भाग्य से इस बिंदु पर उम्मीद उनसे नहीं, बल्कि उन जन समुदायों- खासकर नौजवानों से है- जिनके प्रतिरोध ने महिलाओं के सवाल को राष्ट्रीय चिंता का प्रमुख मुद्दा बनाया है। अगर वे जाग्रत रहे, तो विचारों में हुई जीत व्यवहार में भी उतर सकेगी।


सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.