सावधान! आजादी के नारों के बीच ही गूँज रहे है सामंती फरमान

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-सरोज कुमार

"...इस तरह की प्रवृति के वाहकों में सामंती और सांप्रदायिक शक्तियां ही काम कर रही हैं। इस प्रवृति के निषेध के बगैर महिला अधिकारों और उनकी सुरक्षा की बात करना बेमानी है। पुरुषवादी धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं से लेकर सामंतवादी संगठनों को विरोध जरुरी है। संघ और बीजेपी जैसे संगठन इसके पोषक रहे हैं।..."


चित्र - भारत माता (एम. एफ. हुसैन) 
मारा समाज सामंती समाज है। पुरुषवादी सत्ता की जड़ें इतनी गहरी हैं कि महिलाओं को अभी भी थोड़ी सी आजादी के पक्ष में नहीं। सामाजिक संस्थाओं में ये जड़ें सदियों से धंसी हुई हैं। अभी महिलाओं के अधिकारों पर हो रही प्रतिक्रियाओं में भी यह नजर आ रहा है। दिल्ली गैंग रेप की वीभत्स घटना के बाद एक ओर जहां महिलाओं पर हो रहे अत्याचार पर जबरदस्त आक्रोश उभरा है। जनवादी लोग महिलाओं की वास्तविक आजादी की बात कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर सामंती पुरुषवादी ताकतें इस आक्रोश को भी महिलाओं के शोषण में इस्तेमाल करने की कोशिशें कर रही हैं। ये चालबाज कोशिशें महिलाओं के खिलाफ हाल में विभिन्न इलाकों, संस्थाओं और ताकतों से आ रही पुरुषवादी प्रतिक्रिया में स्पष्ट देखा जा सकता है। हाल तो ये है कि इसमें महिलाएं भी पुरुषवादी हथियार ही नहीं बन रहीं बल्कि अपने अंदर सदियों से धंसी आ रही पुरुषवादी जड़ों को कुछ महिलाएं खुद भी उगल रही हैं। इस मामले में मोहन भागवत जिसे भारतकह रहे हैं उसकी हालत तो सबसे ज्यादा लिजलिजी और सामंती है। साथ ही इंडियामें बैठी पुरुषवादी ताकतें भी उसे ही पुष्ट कर रही हैं। गांव-कस्बों की पंचायतें हों, पुलिस हो या इंडियाकी संसद में बैठे नेता हों, इनकी ओर से महिलाओं की आजादी का हनन करने वाली कोशिशें और प्रतिक्रियाएं जारी हैं।

दिल्ली की घटना के बाद एकाएक बिहार के कई इलाकों से स्थापित समाजिक संस्थाओं की पुरुषवादी कोशिशें बढ़ी हैं। लगातार सामंती फरमान जारी किए जा रहे हैं। ये ताकतें ना केवल महिलाओं की सुरक्षा का बहाना दे कर उनके अधिकारों को छीनने का प्रयास कर रही हैं बल्कि चालबाजी से महिलाओं को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश में हैं। महिलाओं के कपड़ों के अलावा आजादी की प्रतीक और माध्यम बन चुके मोबाइल फोन पर भी प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। इसमें सरकारी लोग और स्थानीय पंचायतें भी खाप की शक्ल में फरमान जा रही कर रही हैं। ये मूलत:  हमारे धार्मिक और सामाजिक पुरुषवादी संरचना से सालों से हमारे समाज में व्याप्त होती आई हैं।

बिहार के औरंगाबाद जिले के कुटुंबा के मटपा ग्राम पंचायत की बैठक में बीते 31 दिसंबर को स्कूली बच्चों के लिए मोबाइल पर प्रतिबंध लगा दिया गया। साथ ही यह कहते हुए कि लड़कियां भड़काउ कपड़े पहन कर सामाजिक माहौल बिगाड़ती हैं, उनके लिए ड्रेस कोड बना लागू कर दिया गया। इसके लिए बहाना दिया गया लड़कियों की सुरक्षा का। कहा गया इससे दिल्ली जैसी घटनाएं रुकेंगी। देखने वाली बात तो ये है कि पंचायत की मुखिया भी एक महिला सुषमा सिंह हैं।(1) ठीक एक दिन बाद 2 जनवरी को सीवान जिले के सिसवां कला पंचायत ने भी दिल्ली की घटना का हवाला देकर सामंती फरमान जारी कर दिया कि लड़कियों ने अगर मोबाइल रखा और तंग व छोटे कपड़ें पहने तो अभिभावकों पर 5 हजार रुपए जुर्माना वसूला जाएगा।(2) अभी इसपर हंगामा मचा ही था कि दूसरे दिन 3 जनवरी को स्थानीय महिला विधायक कविता देवी ने इसे सही ठहरा कर अन्य पंचायतों को भी इसका अनुसरण करने को कह दिया।(3) वहीं 3 जनवरी को ही राजधानी पटना से करीब 40 किलोमीटर दूर ही पालीगंज प्रखंड के कल्याणपुर पैपुरा पंचायत ने लड़कियों के जींस-स्कर्ट पहनने पर पाबंदी लगा दी। उल्लंघन करने वाली की लड़की पर 5 हजार रुपए जुर्माना ठोंकने की बात कही गई। साथ ही मोबाइल से परहेज करने कहा गया।(4) ऐसे फरमान केवल पंचायतें ही नहीं ले रही थी बल्कि इसमें शिक्षा का पाठ पढ़ाने वाले शिक्षक भी कूद पड़े। 4 जनवरी को सारण जिले के तरैया प्रखंड के प्राथमिक शिक्षक संघ ने बैठक करके प्रखंड के सभी प्राथमिक और मिडिल स्कूलों में विद्यार्थियों के मोबाईल पर रोक लगा दिया।(5) बैठक में कहा गया कि मोबाइल के कारण किशोरावस्था में ही प्रेम प्रसंग की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसी से छेड़छाड़ की घटनाएं भी होती हैं। इस फरमान को सख्ती से लागू करने के लिए सभी हेडमास्टरों को भी प्रस्ताव भेज दिया गया। इतना ही नहीं बल्कि मोबाइल पकड़े जाने पर स्कूल से निकालने के साथ ही विद्यालय में मिलने वाली सभी तरह की सरकारी लाभ से वंचित कर दिए जाने की बात कह दी गई। इस तरह खुलेआम अधिकारों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। और इसका बहाना दिल्ली जैसी घटना और बढ़ रही बालात्कार की घटनाओं को दिया जा रहा है। इधर पटना में 5 जनवरी को खबर आई है कि इस्लामी फाउंडेशन की ओर से एक व्यक्ति ओर से पूछने पर फतवा जारी किया पुरुष लिबास जैसे जींस वगैरह महिलाओं के लिए हराम है। यह इनकी आबरु और जमाने की बदनीयती से हिफाजत का रास्ता है। अगर लड़कियां इन्हें पहनेंगी और बेहयाई पर उतरेंगी तो उनपर जुल्म बढ़ेगा। इस पर अमल न करनेवालों पर सख्त सजाएं भी शरीयत में तय की गई हैं।(6)

ये फरमान लगातार जारी होते रहे। वहीं पुलिस प्रशासन इनसे अनभिज्ञता जताता रहा या इंकार करते रहे। वहीं मीडिया में खबर फैलने और हंगामा मचने पर पालीगंज में पंचायत वाले बाद में अपनी बात से मुकरने लगे। वहीं इन मामलों पर ना प्रशासन गंभीर है ना सरकार पर जूं रेंग रहा है।

उल्टे पुलिस और प्रशासनिक तबका भी इसी सामाजिक पुरुषवादी सोच के साथ काम करता नजर आ रहा है। दिल्ली की घटना के बाद दिसंबर में ही पुलिस ने राजधानी पटना के पार्कों में घूम-घूम कर प्रेमी युगलों को पकड़ती रही। इतना ही नहीं बल्कि उनके अभिभावकों को बुला धमकी और हिदायतें देती रही।

बहरहाल पुलिस-प्रशासन की सामंती फरमानों पर निष्क्रियता और चुप्पी को तो समझा जा सकता है लेकिन महिला अधिकारों की बात करने वाले बिहार के संगठन भी इस मामले में बात या विरोध-प्रदर्शन करते नहीं दीख रहे। दिल्ली में आइसा-एपवा वगैरह जनवादी संगठन इन मुद्दों शुरु से ही सक्रिय हैं और इन जैसे महिला अधिकारों के हनन की बात कर ही रहे हैं। लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन पटना में आइसा, एआईएसएफ, एपवा, माले जैसी जनवादी ताकतें इस ओर ध्यान देती नहीं दीख रही। उन्होंने जरुर यौन हिंसा और बालात्कार, हत्या जैसे मामलों पर प्रदर्शन किया है। लेकिन अब वे इन सामंती फरमान की ओर निष्क्रिय नजर आ रही हैं। इस मामले में दिल्ली में कविता कृष्णन का भाषण याद रखने योग्य है जिसमें वे कहती हैं कि यह केवल महिलाओं के साथ हो रही हिंसा का मामला नहीं बल्कि महिला अधिकारों की लड़ाई है। महिलाओं को अपने अनुसार रहने, पहनने, घूमने और जिंदगी जीने, चुनने की आजादी की लड़ाई है। वे कब कहां निकलें, किसके साथ निकले क्या पहने ये सब तय करने वाली वे खुद हों। दिल्ली में इसी बुनियाद को लेकर ही वाम संगठन लड़ाई लड़ रहे हैं और यह लगातार जारी है। इसकी बनिस्बत पटना में यह लड़ाई कहीं नहीं दीख रही। जबकि बिहार में सामंती फरमान रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं।

ऐसे फरमान तो हरियाणा की खाप पंचायतों के हमेशा सुनाई देते ही हैं। उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश सहित सभी राज्यों में ऐसी ही हाल रहता है। यूपी के बिजनौर में जहां दिल्ली की घटना के पहले 10 दिसंबर को डीएम ने अखिलेश यादव के कार्यक्रम के बाबत लड़कियों के लिए जींस-टॉप और मोबाइल पर प्रतिबंध लगा दिया था। वहीं जुलाई में बागपत में 40 साल से कम उम्र की महिलाओं के बाजार जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

वहीं इस तरह की सामंती प्रवृति के लिए महिलाएं भी हथियार बन रही हैं। पंचायतों में फरमान सुनाने वालों में महिला मुखिया से लेकर महिला विधायक भी शामिल रही। यह सालों से महिलाओं में बोई जा रही पुरुषवादी सोच का ही फल है। पुरुषवादी समाज और धर्म ने जो मर्यादाएं गढ़ी हैं वह ही है। यह यों ही नहीं है कि मध्यप्रदेश में पढ़ी-लिखी महिला कृषि वैज्ञानिक अनीता शुक्ला दिल्ली की पीड़ित लड़की को ही उल्टे दोषी ठहराने लगती है और कहती है कि छह लोगों से घिरने के बाद लड़की ने समर्पण क्यों नहीं कर दिया? कह बैठी कि महिलाएं ही पुरुषों को उकसाती हैं और रात में ब्वॉयफ्रेंड के साथ निकलेंगी तो यहीं होगा ना? संसद में बैठी सुषमा स्वराज कह देती हैं कि ऐसी लड़कियां जिंदा रहकर जिंदा लाश बन जाती हैं।

इस तरह की प्रवृति के वाहकों में सामंती और सांप्रदायिक शक्तियां ही काम कर रही हैं। इस प्रवृति के निषेध के बगैर महिला अधिकारों और उनकी सुरक्षा की बात करना बेमानी है। पुरुषवादी धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं से लेकर सामंतवादी संगठनों को विरोध जरुरी है। संघ और बीजेपी जैसे संगठन इसके पोषक रहे हैं। लगातार इनके नेताओं के सामंती और सांप्रदायिक रवैया दिखता रहा है। संघप्रमुख ने यों ही नहीं नैतिकता और पाश्चात्य संस्कृति की बात कर रहे हैं और कह रहे हैं कि गाय पालने से नैतिकता बढ़ेगी और बालात्कार रुकेंगे। वह यों ही नहीं भारतयानि की गांव-कस्बों को बेदाग बचा रहे हैं। दरसल महिलाओं के शोषण में गांव और कस्बों का समाज ही सबसे अधिक आगे है। उनका सामंतवाद इन्हीं जगहों पर शर्मनाक तरीके से शुरु से मौजूद है। मध्यप्रदेश में कैबिनेट मंत्री भाजपा के कैलाश विजयवर्गीय यों ही नहीं रामायाण का हवाला देकर मर्यादा का पाठ पढ़ा रहे हैं। शर्मनाक तरीके से कह रहे हैं कि महिलाएं मर्यादा लांघेगी तो हरण ही होगा। दरसल ये सामंतवादी लोग और संगठन ही महिलाओं के शोषण के पोषक हैं।

इसलिए महिलाओं के खिलाफ केवल यौन हिंसा और बालात्कार, हत्या का मामला नहीं बल्कि उनकी पूरी आजादी का मामला है। ये तभी संभव है जब इस तरह की सामाजिक संस्थाओं, धार्मिक मान्यताओं और संगठनों का विरोध पुरजोर तरीके से हो। लड़ाई बहुत लंबी है लेकिन इन प्रवृति के निषेध के बगैर महिलाओं की आजादी संभव ही नहीं। केवल कानूनों की बाट जोह रहे लोग निराश ही होंगे।

ऐसे में दिल्ली में महिलाओं की पूरी आजादी की लड़ाई लड़ रहे जनवादी ताकतों को दिल्ली के बाहर भी नजर दौड़ानी चाहिए। अपने स्थानीय ताकत को भी प्रेरित करना चाहिए। वरना जो लोग केवल दिल्ली की भीड़ देख खुश हो ले रहे हैं वे भ्रम में जी रहे हैं। दिल्ली की लड़ाई जरुर महत्वपूर्ण है लेकिन महिला अधिकारों के हनन और शोषण के गढ़ बिहार, हरियाणा, यूपी, एमपी सहित तमाम अन्य राज्यों के शहर, कस्बे और गांव ही हैं। ये जगहें ही सामंतवादी और पुरुषवादी लिजलिजे प्रवृति को सालों से ढोते आ रहे हैं और ऊर्जा दे रहे हैं। इधर नजर दौड़ाए बगैर लड़ाई कुछ नहीं ।

सरोज युवा पत्रकार हैं. पत्रकारिता की पढ़ाई आईआईएमसी से. 
अभी पटना में एक दैनिक अखबार में काम . 
इनसे krsaroj989@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. 


 लेख में उल्लेखित प्रकाशित खबरों के लिए संदर्भ सूची 
(सभी पटना नगर संस्करण)-
  1. हिन्दुस्तान दैनिक, 1 जनवरी, पेज-13   
  2. हिन्दुस्तान दैनिक, 3 जनवरी, पेज-1 
  3. हिन्दुस्तान दैनिक, 4 जनवरी, पेज-13 
  4. दैनिक जागरण, 4 जनवरी, पेज-1   
  5. हिन्दुस्तान दैनिक, 5 जनवरी, पेज- 15
  6. दैनिक जागरण, 5 जनवरी, पेज-1