युद्धोन्माद से क्या हासिल होगा?




-सत्येंद्र रंजन
सत्येन्द्र रंजन

 "...विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने इस समझ से किनारा कर लिया है। उसकी नेता सुषमा स्वराज ने एक भारतीय सैनिक के सिर के बदले दस पाकिस्तानियों के सिर काट लाने जैसा गैर-जिम्मेदार और युद्धोन्मादी बयान दिया। टीवी एंकरों ने तो जैसे युद्ध का एलान ही कर दिया। इसमें कांग्रेस पार्टी को शायद महसूस हुआ होगा कि राष्ट्रवादी जुनून का मुकाबला करना नुकसान का सौदा हो सकता है। संभवतः इसी कारण मनमोहन सिंह ने कहा कि पाक बलों द्वारा भारतीय सैनिक हेमराज का सिर काटकर ले जाने की घटना के बाद अब सब कुछ सामान्य ढंग से नहीं चल सकता।..."

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का पाकिस्तान के खिलाफ सख्त बयान देना सचमुच दुखद था। यह बात निसंदेह कही जा सकती है कि भारतीय जनता पार्टी और मीडिया (खासकर टीवी चैनलों) ने जो दबाव बनाया, यूपीए सरकार उसके प्रभाव में आ गई। वरना, प्रधानमंत्री देश को पूरे तथ्यों की रोशनी में भरोसे में लेते। तथ्य यह है कि नियंत्रण रेखा पर युद्धविराम टूटने के कारण दोनों देशों के सैनिक मारे गए हैं। युद्धविराम टूटने की नौबत क्यों आई, इसे मालूम करने का सबसे उचित तरीका दोनों देशों के बीच संवाद ही है। यह ठीक है कि पाकिस्तान के संदर्भ में यह पहेली हाल में और उलझ गई है कि वहां किससे बात की जाए? वहां की राजनीतिक सत्ता का वैसे भी कभी फौज पर नियंत्रण नहीं रहा। लेकिन हाल में न्यायपालिका और कट्टरपंथी ताकतों ने राजनीतिक नेतृत्व को अप्रसांगिक करने की मुहिम और तेज कर दी है। इसके बावजूद जो नेतृत्व मौजूद है, उससे संवाद के तार जोड़े रखने के अलावा कोई और बेहतर विकल्प नहीं है।

यह बात खुद मनमोहन सिंह कहते रहे हैं। प्रगतिशील जमातों में उनके विरोधी भी पाकिस्तान और चीन के बारे में उनकी सयंम और दूरदृष्टि भरी समझ की तारीफ करते हैं। पाकिस्तान के बारे में डॉ. सिंह की समझ रही है कि हम चूंकि दोस्त चुन सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं- और पाकिस्तान हमारा पड़ोसी है, इसलिए उससे संपर्क और संबंध रखने के अलावा कोई और चारा नहीं है। जिन दिनों भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर मसले पर सहमति बनने के संकेत मिले थे, उस समय उसका आधार डॉ. सिंह की यह मान्यता थी कि दक्षिण एशिया में सीमाएं फिर से नहीं खीची जा सकतीं, लेकिन सीमाओं को अप्रासंगिक जरूर किया जा सकता है। इस समझ के साथ मनमोहन सिंह ने भारत की पाकिस्तान नीति को निश्चित और सही दिशा प्रदान की। उसी का परिणाम है कि दोनों देशों की जनता के बीच रिश्तों को निरंतरता और मजबूती मिली है।     

आज पाकिस्तान के बारे में मनमोहन सिंह की यही लाइन खतरे में है। बल्कि कहा जा सकता है कि रिश्तों में सुधार की प्रक्रिया पटरी से उतर गई है। अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में नियंत्रण रेखा पर लागू हुआ युद्धविराम बार-बार उल्लंघनों के कारण गहरे दबाव में है। जबकि भारत-पाक संबंधों को सुधारने की दिशा में इसको सबसे ठोस उपलब्धि माना जाता है। 2001 में संसद पर हमले के बाद एनडीए सरकार ने ऑपरेशन पराक्रम के दौरान पाकिस्तान पर सैनिक दबाव बढ़ाने की नीति अपनाई थी। लेकिन भारत उससे वांछित परिणाम हासिल नहीं कर पाया। तब अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रहते हुए वाजपेयी को यह बात समझ में आई कि एक परमाणु हथियार संपन्न पड़ोसी के साथ बातचीत के जरिए रिश्तों में यथासंभव सुधार के रास्ते पर चलना ही माकूल नीति है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने इस समझ से किनारा कर लिया है। उसकी नेता सुषमा स्वराज ने एक भारतीय सैनिक के सिर के बदले दस पाकिस्तानियों के सिर काट लाने जैसा गैर-जिम्मेदार और युद्धोन्मादी बयान दिया। टीवी एंकरों ने तो जैसे युद्ध का एलान ही कर दिया। इसमें कांग्रेस पार्टी को शायद महसूस हुआ होगा कि राष्ट्रवादी जुनून का मुकाबला करना नुकसान का सौदा हो सकता है। संभवतः इसी कारण मनमोहन सिंह ने कहा कि पाक बलों द्वारा भारतीय सैनिक हेमराज का सिर काटकर ले जाने की घटना के बाद अब सब कुछ सामान्य ढंग से नहीं चल सकता।

नियंत्रण रेखा पर तनाव के परिणामस्वरूप बुजुर्ग नागरिकों के भारत आने पर तुरंत वीजा देने की योजना रोक दी गई है। हॉकी इंडिया लीग में आए नौ पाकिस्तानी खिलाड़ियों को वापस भेज दिया गया। भारत में होने जा रहे महिला क्रिकेट विश्व कप में पाकिस्तानी टीम के खेलने को लेकर भी असमंजस है। यह सच है कि नियंत्रण रेखा पर बढ़ते तनाव को लेकर विपक्ष, पाक विरोधी संगठनों और मीडिया के एक हिस्से की तरफ से दबाव बढ़ाने के बावजूद भारत सरकार ने पर्याप्त समय तक संयम बरता। लेकिन अंततः यह टूट गया।  

यह अच्छी बात है कि उसके बाद दोनों देशों की सेना ने युद्धविराम पर सख्ती से अमल का इरादा जताया है। पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने भारतीय विदेश मंत्री से बातचीत की इच्छा जताई है। बेहतर कि भारत इस पेशकश को स्वीकार कर ले। मनमोहन सिंह अपनी एक बड़ी उपलब्धि को बेकार जाने दें और अपनी आस्था पर समझौता कर लें, तो उससे युद्धोन्मादी तत्वों को भले खुशी हो, लेकिन भारत की जनता का हित नहीं सधेगा। मनमोहन सिंह को इस बात का श्रेय है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने व्यावहारिक सीख हासिल करने के बाद दोस्ती का जो हाथ पाकिस्तान की तरफ बढ़ाया था, उसे उन्होंने और विस्तार दिया। 26/11 हमले के बाद इसमें रुकावट आई। मगर मनमोहन सिंह इस समझ पर कायम रहे कि पाकिस्तान से बातचीत के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। इसके अच्छे परिणाम व्यापार और जनता के स्तर पर बढ़े संपर्कों के रूप में सामने आए हैं। यह भी सच है उससे पाकिस्तानी सत्ता तंत्र में अंतर्निहित भारत विरोध के भाव को कमजोर करने में मदद नहीं मिली है। संसद पर हमले के बाद वाजपेयी और मुंबई पर हमले के बाद डॉ. सिंह की सरकार को बातचीत के रास्ते पर इसीलिए लौटना पड़ा था कि बाकी विकल्पों से कुछ हासिल नहीं हो सका। आज भी इस ठोस भू-राजनीतिक परिस्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.