कारपोरेट संपादकों की 'चिंताएं' और 'मीडिया विमर्श'


भूपेन सिंह

-भूपेन सिंह

"...स्वनियमन के लिए बनाई गई संस्था एनबीएसए और उसकी जननी बीईए जिस स्वनियमन की बात करती हैं उस स्व में आम पत्रकारों के लिए कोई जगह नहीं है. वह टेलीविजन एडिटर्स की पहलकदमी से बनाई गई संस्था है और एडिटर, कॉरपोरेट मीडिया में मालिक की मर्जी के ख़िलाफ़ कोई नहीं बन सकता. अलग-अलग मीडिया संगठनों में काम करने वाले अनगिनत साधारण पत्रकारों के हितों का इन संपादकों को कोई ध्यान नहीं रहता. उन्हें लाखों-करोड़ों रुपए की अश्लील तनख्वाह मिलती है जबकि आम पत्रकारों के लिए हज़ार किफ़ायत बरतने के बाद भी अपना घर चलाना मुश्किल होता है..."

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) ने दक्षिण दिल्ली के साकेत के अपने शानदार ऑफिस में पत्रकारिता की वर्तमान हालत पर एक बातचीत करवाई थी. जिसमें ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के प्रतिनिधियों के अलावा न जाने किस गल़ती से मुझ जैसे कुछ ऐक्टिविस्ट और पत्रकारों को भी बुला लिया गया था. बहस में बीईए के महासचिव एनके सिंह, हाल ही तक आजतक-टीवी टुडे ग्रुप के संपादक रहे क़मर वहीद नक़वी, टीवी संपादक-सीईओ रहे राहुल देव, गवर्नेंस नॉव के संपादक वीवी राव, मिंट अख़बार में मीडिया पर कॉलम लिखने वाली सीएमएस की मुख्य कर्ता-धर्ता पीएन वासंती, उनके पिता और सीएमएस के अध्यक्ष भास्कर राव के अलावा कुल पच्चीस-तीस पत्रकार जमा थे. उपरोक्त लोगों का नाम लिखने की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि उनमें से कुछ लोग उम्र, पद और प्रतिष्ठा का रुतबा दिखाकर बहस को एक गढ़ी गई आम सहमति में बदलने की कोशिश कर रहे थे. सारी बातें ऐसी थी जिससे कॉरपोरेट मीडिया और भारतीय लोकतंत्र की महानता बार-बार झलके और ऐसा लगे कि मीडिया की वर्तमान विसंगतियों के लिए बीईए से ज़्यादा चिंतित और कोई नहीं है. वहां बार-बार बीईए और सीएमएस के साथ मिलकर भारतीय मीडिया की बेहतरी के लिए एक साझा प्रोजेक्ट पर काम करने की बात भी हो रही थी. मेरी समझ में मीटिंग का मक़सद बड़ी देर से आया! असहमत लोगों की बातें उनके लिए अव्यावहारिक और क्रांतिकारी विचारधारा से प्रेरित थीं.

बातचीत के केंद्र में ज़ी न्यूज़ संपादकों की तरफ़ से कोयला घोटाले से जुड़े उद्योगपति और कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल से सौ करोड़ की वसूली का मामला था. बहस में शामिल नामधारी लोग ज़ी न्यूज़ संपादक सुधीर चौधरी और ज़ी बिजनेस के संपादक समीर अहलुवालिया की आलोचना कर रहे थे. साथ ही वे यह भी बताने की कोशिश कर रहे थे कि मीडिया का स्वनियमन ही सबसे सही रास्ता है. बहस को स्वनियमन बनाम सरकारी नियंत्रण की बहस में बदला जा रहा था. ये महानुभाव चालाकी दिखाते हुए थोड़ी सी आत्मालोचना में इतना ज़रूर स्वीकार कर रहे थे कि आज के समाचार माध्यमों में सुधीर और समीर जैसे लोगों की ही चलती है और आज वे किसी भी मीडिया मालिक के लिए सबसे ज़्यादा काम के आदमी हैं. उनके पास कॉरपोरेट मीडिया की साख बचाने के लिए स्वनियमन की माला जपने वाले बीईए और उसकी तरफ़ से बनाई गई नियामक संस्था न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी (एनबीएसए) की नैतिकता और प्रासंगिकता के पक्ष में अनगिनत दलीलें थीं और वे चाह रहे थे बाक़ी लोग अच्छे बच्चे की तरह उनकी हां में हां मिलाएं.

मैंने कहा कि स्वनियमन के लिए बनाई गई संस्था एनबीएसए और उसकी जननी बीईए जिस स्वनियमन की बात करती हैं उस स्व में आम पत्रकारों के लिए कोई जगह नहीं है. वह टेलीविजन एडिटर्स की पहलकदमी से बनाई गई संस्था है और एडिटर, कॉरपोरेट मीडिया में मालिक की मर्जी के ख़िलाफ़ कोई नहीं बन सकता. अलग-अलग मीडिया संगठनों में काम करने वाले अनगिनत साधारण पत्रकारों के हितों का इन संपादकों को कोई ध्यान नहीं रहता. उन्हें लाखों-करोड़ों रुपए की अश्लील तनख्वाह मिलती है जबकि आम पत्रकारों के लिए हज़ार किफ़ायत बरतने के बाद भी अपना घर चलाना मुश्किल होता है. मैंने सीधे पूछा कि आप लोग संपादक रहे हैं, हैंक्या आप लोगों ने कभी आम पत्रकारों को अपने अख़बार-चैनल में संगठन बनाने की इज़ाजत दीअगर आप बहुसंख्यक पत्रकारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते तो फिर आपको उनकी आड़ में स्वनियमन की बात करने का कोई अधिकार नहीं है.

महान पत्रकारों को ख़ुद के लिए कॉरपोरेट पत्रकार का संबोधन बिल्कुल ही आपत्तिजनक लगा. कोई ज़वाब न होने पर बोलने लगे कि सिर्फ़ आप ही बोल रहे हैं दूसरों को बोलने नहीं दे रहे, जबकि हक़ीक़त यह थी कि वहां संपादक-आयोजक प्रवचन कर रहे थे और हमसे भक्तों की तरह ज्ञान हासिल करने की उम्मीद कर रहे थे. जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो हमने कहा कि अगर आपने हमें बुलाया है तो बात सुननी भी पड़ेगी वरना हम जा रहे हैं. स्थिति असामान्य हो गई. एजेंडा सेटिंग का विरोध करने वाला हमारा दिमाग उनकी शातिर बातों को मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था. जब उनके सामने कहा गया कि पत्रकार-मालिक-सीईओ एक ही इंसान होगा तो क्या इसमें हितों का टकराव नहीं हैसुधीर चौधरी एक साथ ज़ी न्यूज़ का बिजनेस हेड और संपादक कैसे बन गयाराजदीप  सरदेसाई, अरुण पुरी, प्रवण रॉय जैसे कई लोग मालिक हैं कि पत्रकारइस तरह के सवाल उन्हें कल्पनाओं से परे और बहुत ही आपत्तिजनक लगे. मालिकों की दया से बने संपादक, बड़ी पूंजी के मालिकों और पत्रकारीय हितों के बीच टकराव की अनदेखी करते हुए झल्लाकर बोले, क्या आप चाहते हैं कि पत्रकार हमेशा नौकर ही बना रहे वह मालिक नहीं बने?  अरुण पुरी जैसे लोगों ने पत्रकारिता के नए मानदंड खड़े किए हैं, वे कभी संपादक के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करते. अख़बार टीवी शुरू करने में करोड़ों रुपए लगते हैं, क्या कोई मालिक घाटा उठाने लिए पूंजी लगाएगाआप ही बताइए इसका क्या विकल्प हैआप इल इनफॉर्म्ड हैं हमारे एक साथी ने लगे हाथों यह भी पूछ लिया कि सुधीर चौधरी पहले भी दिल्ली की एक स्कूल शिक्षिका उमा खुराना को फर्जी तौर पर वेश्याओं का दलाल बताकर उन्हें बदमाम कर चुका है, जिस वजह से सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उस चैनल न्यूज लाइव को पंद्रह दिनों के लिए बंद करवा दिया था. इतनी जानकारी के बाद भी वह बीईए का कोषाध्यक्ष कैसे बन गया कौन इल इन्फॉर्म्ड है कॉरपोरेट संपादकों ने झल्लाहट के बावजूद पूरे आत्मविश्वास से कॉरपोरेट मीडिया और उसके मालिकों का बचाव किया. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सरकारी नियंत्रण का डर दिखाया और सुधीर चौधरी जैसी घटनाओं के लिए ख़ुद बदलो-जग बदलेगा जैसा दर्शन दिया और इसके लिए स्वनियमन को ज़रूरी बताया. वहां अपेक्षाकृत सीधे और सरल माने जाने वाले संपादक वीवी राव ने कहा कि पत्रकारों और मीडिया संगठनों के ख़िलाफ़ भी मुख्यधारा के मीडिया में आलोचना छपनी चाहिए तो उनकी बात को भी यूं ही उड़ा दिया गया. मीटिंग में मौज़ूद महान विभूतियां हमारी बातों को विचारधारा से प्रेरित और क्रांतिकारी घोषित कर पहले ही अप्रासांगिक ठहराने की कोशिश कर चुकी थीं.

ऊपर हुई घटनाओं का ज़िक्र करने का मक़सद सिर्फ़ इतना है कि इस बहाने पता चल पाए सत्ता तक पहुंच रखने वाले कॉरपोरेट संपादक और नामचीन एनजीओ, पत्रकारिता में नैतिकता की बहस को किस दिशा में मोड़ना चाहते हैं. ऐसा नहीं कि यह बहस सिर्फ़ लगातार बाज़ार के हवाले होते जा रहे भारत जैसे देश में ही हो रही है, भारतीय अभिजात्य के औपनिवेशिक आका रहे ब्रिटेन में भी नियमन को लेकर बहस तेज़ है. वहां लेवसन रिपोर्ट चर्चा का विषय बनी हुई है. भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू लेवसन रिपोर्ट का हवाला देते हुए द हिंदू अख़बार में एक लेख लिखकर किसी अधिकार संपन्न स्वायत्त संस्था से मीडिया नियमन की वक़ालत कर चुके हैं लेकिन कॉरपोरेट मीडिया के कर्ता-धर्ताओं को यह बात बिल्कुल भी क़बूल नहीं है.

मुनाफाखोर मीडिया घराने कितना नीचे गिर सकते हैं, अमेरिका और यूरोप के कई देशों का मीडिया इसका उदाहरण है. ब्रिटेन में कॉरपोरेट मीडिया सरदार रुपर्ट मर्डोक की न्यूज़ कॉर्प की ब्रिटिश कंपनी न्यूज़ इंटरनेशनल का अख़बार न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड का किस्सा इसका एक बड़ा उदाहरण है. अख़बार ने दो हज़ार दो के बाद पत्रकारिता के सारे मानदंड़ों का मखौल उड़ाते हुए ब्रिटेन के कई प्रभावशाली लोगों के फोन हैक कर उऩकी निजी बातचीत को रिकॉर्ड कर लिया था. इनमें ब्रिटेन के राज परिवार समेत कई सेलिब्रिटीज के फोन भी शामिल थे. इस बात का पता चलने पर अख़बार और मर्डोक की आलोचना होती रही है. न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड का पत्रकार क्लाइव गुडमैन 2007 में राज परिवार के सदस्यों के फोन मैसेज हैक करने के मामले में जेल की हवा खा आया है. अख़बार के पत्रकारों और निजी जासूसों की मिलीभगत देखकर आम जनता दंग थी, इसमें पुलिस वालों को घूस देने का मामला भी था. इन तमाम बातों के बावजूद रुपर्ट मर्डोक का कारोबार ब्रिटेन में बढ़ता ही जा रहा था लेकिन जैसे ही जुलाई 2011 में पता चला कि अख़बार ने कत्ल की गई स्कूली छात्रा मिली डॉवलर समेत लंदन बम धमाकों के एक शिकार का भी फोन सनसनीखेज़ ख़बरों के लिए टेप किया था तो लोग भड़क उठे. पूरे ब्रिटेन में हंगामा मच गया. परिणाम स्वरूप मर्डोक को 10 जुलाई 2011 को 168 साल से चला आ रहा अख़बार न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड बंद करना पड़ा. अब रुपर्ट मर्डोक और उसके बेटे पर भी अदालत में मामला चल रहा है.

न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड की घटना के बाद ब्रिटश मीडिया में अनियमितताओं की जांच के लिए प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने जुलाई 2010 में जस्टिस लेवसन के नेतृत्व में एक छह सदस्यीय जांच कमेटी गठित थी. इस कमेंटी ने नवंबर 2012 में अपनी  रिपोर्ट पेश की. 'एन एन्क्वायरी इनटू द कल्चर, प्रैक्टिसेज एंड इथिक्स ऑफ़ द प्रेस' नाम की यह रिपोर्ट दो हिस्सों में है. पहले हिस्से में ब्रिटिश कॉरपोरेट मीडिया के जनविरोधी व्यहार का अध्ययन करते हुए उसे सही तरह से संचालित कराने के लिए ठोस नियम बनाने की वकालत की गई है. दूसरे हिस्से में न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड वाले मामले की विशेष छानबीन की गई है, कोर्ट में मामला चलने की वजह से उसे अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है.

लेवसन रिपोर्ट में मीडिया की नैतिकता को ध्यान में  रखकर एक स्वायत्तशासी और ज़्यादा अधिकार संपन्न आयोग बनाने की सिफ़ारिश की है, साथ ही प्रेस कंप्लेन कमिशन (पीसीसी) की जगह एक नयी नियामक संस्था बनाने पर ज़ोर दिया गया है. पीसीसी को ब्रिटेन में अख़बारों के प्रतिनिधियों ने मिलकर स्वनियमन के नाम पर बनाया हुआ है. लेकिन यह अब तक बिल्कुल भी कारगर साबित नहीं हुई है. इसकी  हालत कुछ-कुछ प्रकाशकों के प्रभाव वाली हमारे प्रेस परिषद जैसी है. भारतीय प्रेस परिषद की तरह इसे भी दंत विहीन संस्था माना जाता है. ब्रिटिश मीडिया में न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड की घटनाओं के बाद सरकार को मजबूर होकर इस बारे में बात करनी पड़ी. अब फिलहाल लेवसन रिपोर्ट पर वहां राजनीति गरमा रही है. विपक्ष जहां सारी सिफ़ारिशों को जस का तस मान लेने की बात कर रहा है वहीं सरकारी पक्ष कुछ बातों पर बहस करवाना चाहता है. लेकिन माना जा रहा है कि 2013 में वहां पर एक स्वायत्तशासी नियामक संस्था अस्तित्व में आ जाएगी जो सरकार और कॉरपोरेट के सीधे दखल से मुक्त होगी.

भारतीय मीडिया की हालत देखकर आज यहां भी एक स्वायत्तशासी नियामक संस्था बनाने का वक़्त आ चुका है. लेकिन इसके लिए पहली शर्त यही है कि कॉरपोरेट की ताक़त के ख़िलाफ़ एक जनमत तैयार हो और सरकार पर ऐसा करने के लिए ब्रिटेन की तरह ही दबाव पड़े. सिर्फ़ पिछले पांच साल की घटनाओं को ही देखें तो यहां कॉरपोरेट, मीडिया और राजनीति के गठजोड़ की पोल खोलता राडिया टेप कांड जैसा भयानक मामला सामने आया है जिसमें बरखा दत्त, वीर सांघवी, प्रभु चावला जैसे कई तथाकथित महान पत्रकारों की संदिग्ध भूमिका का पता चला. लेकिन व्यापक जन दबाव न होने की वजह से इस मामले में अब तक कोई ठोस जांच नहीं करवाई गई. राडिया टेप कांड के तमाम दागी लोग आज भी बड़ी बेशर्मी से पत्रकारिता कर रहे हैं. हैरानी की बात यह है कि हमारे यहां उल्टी गंगा बह रही है, उद्योगपति रतन टाटा ने पोल खुलने पर निजी अधिकारों के हनन के नाम पर बाक़ी राडिया टेप सार्वजनिक होने पर ही कोर्ट से स्टे ले लिया. पेड न्यूज़ को लेकर प्रेस परिषद की सब कमेटी ने रिपोर्ट तैयार की और उसमें कई अख़बारों को दोषी पाया गया लेकिन मालिकों के प्रभुत्व वाली परिषद की कमेटी ने उस रिपोर्ट को पास नही किया. कोयला घोटाले में दैनिक भास्कर, इंडिया टुडे ग्रुप, प्रभात ख़बर और लोकमत जैसी मीडिया कंपनियों का जुड़ाव होने के बाद भी सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी. ज़ी न्यूज़ के संपादकों वाले मामले में भी अब तक कोई आधाकारिक जांच नहीं हो रही है.

उदारीकरण की नीतियां अपनाने के बाद भारत में निजी मीडिया का असीम विकास हुआ है. उद्योगपति पत्रकारिता का इस्तेमाल कर अपने बाक़ी धंधों को चमकाने के लिए मीडिया में पैसा लगा रहे हैं. परिणाम स्वरूप पत्रकारों का एक बड़ा हिस्सा उद्योगपतियों के दलाल या स्टैनोग्राफ़र में बदल गया हैं. इन हालात में यहां भी मीडिया के नियमन के लिए लेवसन आयोग की तरह एक जांच ज़रूरी है. देश के मीडिया की वस्तुस्थिति की जानकारी के लिए एक अधिकार संपन्न तीसरे प्रेस आयोग की स्थापना इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, वशर्ते उसका हश्र पहले और दूसरे प्रेस आयोग की रिपोर्ट की तरह न हो. अगर इस तरह की पहलकदमी का जनदबाव बनता है कि इससे मालिकों की भाषा बोलने वाले बीईए के होश अपने आप ठिकाने आ जाएंगे. 




भूपेन पत्रकार और विश्लेषक हैं। 
कई न्यूज चैनलों में काम। अभी आईआईएमसी में अध्यापन कर रहे हैं। 
इनसे bhupens@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।