डायरक्ट कैश ट्रांसफर यूपीए का चुनावी गेम चेंजर है जयराम!


दैनिक अखबार राष्ट्रीय सहारा के साप्ताहिक सप्लीमेंट 'हस्तक्षेप' में केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश का आलेख छपा जिसमें वे भारत सरकार के पायलट प्रोजेक्ट डायरेक्ट कैश ट्रांसफर को गेम चेंजर और बदलाव का प्रतिमान साबित कर रहे हैं। इस आलेख में उन्होंने जिन महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखाकिंत किया है प्रैक्सिस में हम उनकी थोथी दलीलों को खारिज करते हुए युवा पत्रकार अखिलेश का उन्हें खुला पत्र प्रकाशित कर रहे हैं.....    -मॉडरेटर
Akhilesh Kumar
अखिलेश कुमार


सेवा में, 

   केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री, भारत सरकार
   कृषि भवन, डां राजेन्द्र प्रसाद रोड, नई दिल्ली.110001

महोदय,
   
22 दिसंबर को आपका आलेख पढ़ा। इस आलेख में आप ने डायरेक्ट कैश ट्रांसफर को क्रांतिकारी और बदलाव का प्रतिमान बताया है। इससे एक बार फिर साबित हो चुका है कि सरकार भूखी गरीब जनता को चॉकलेट के सपने देकर वास्तविक समस्याओं से दूर ले जाना चाहती है। सरकार इस योजना को गेम चैंजर बता रही है। दरअसल, ‘गेम चेंजर’ योजना तो खाद्य सुरक्षा कानून हो सकती थी जिसे यू.पी.ए सरकार ने 2008 के आम चुनावों में वायदे के बावजूद ठंडे बस्ते में डाल दिया है और उसे भुलाने के लिए इसे गैम चैंजर कह रही है।

इस पूरे कार्यक्रम का मुख्य मकसद समाज कल्याण कार्यक्रमों में कटौती करना है। कहना नहीं होगा कि सरकार 2014 लोकसभा चुनाव को देखते हुए 20-20 मैच खेलने वाली है। आपने जिन प्रमुख बिंदुओं की तरफ इशारा किया है वह हमारी बुनियादी व्यवस्था से काफी दूर है। आपने राज्य कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मौजूदा तरीकों के बजाय सक्षम तरीके से सही व्यक्ति तक पहुँचाने की बातें कर रहे हैं। आप भली भांति जानते हैं कि अभी गरीबी रेखा को परिभाषित करने में सरकार असफल रही है। यहाँ तक कि राज्य और केन्द्र के बीच गरीबी रेखा को लेकर अभी भी मतभेद बने हुए है राजस्थान में आपके इस पायलट प्रोजेक्ट के क्रियान्यवन में जमीनी स्तर कितनी समस्याए उभर कर सामने आ रही है। आप ये भी जानते हैं कि पिछले साल योजना आयोग ने गरीबी रेखा को परिभाषित किया वह न केवल शर्मनाक है बल्कि पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर जोरदार तमाचा है। इससे साबित होता है कि संवैधानिक रुप से लोक कल्याणकारी राज्य होने की  हमारी व्यवस्था महज एक छलावा है।

बहरहाल आप इस लॉलीपॉप योजना को बहुयामी बताकर इसे आधार से जोड़ने की वकालत कर रहे हैं. बायोमेट्रिक प्रणाली से जुड़े 'आधार' की सच्चाई दुनिया के सामने पहले ही आ चुकी है। उल्लेखनीय है कि 12 अंको वाला इस आधार कार्ड को संसद के आर्थिक मामलों की स्थाई समिति पहले ही गैर कानूनी और गैर लोकतांत्रिक बता चुकी है। इतना ही नहीं युपीए सरकार ने इस फर्जी प्रोजेक्ट का प्रस्ताव 2010 में राज्यसभा में प्रस्तुत किया था। यहाँ तक की यूआईडी के आर्थिक गतिविधि के लिए कमिटी का भी गठन नहीं किया गया। असल में इस लूटतंत्र की पारदर्शिता जगजाहिर हो चुकी है। नंदन नीलकेणी को बिना गोपनीयता के शपथ लिए कैबिनेट स्तर का मंत्री बना दिया गया।

दरअसल आप जिस आधर कार्ड के जरिए डायरेक्ट कैश ट्रांसफर को क्रांतिकारी लोक कल्याणकारी कार्यक्रम का राग अलाप रहे हैं इसके पीछे की सच्चाई कुछ और है। मान भी लें कि आधार कार्ड बन भी जाता है तो इसकी क्या गारंटी हैं कि इस योजना का फायदा सही आदमी तक पहुँच सकता है। इस कारण आधार कार्ड कोई जादू या छू-मंतर नहीं बनने जा रहा है जिससे गरीबों की सही-सही पहचान हो. 

बहरहाल 1 जनवरी 2013 से आधार कार्ड जरिए जिन 51 जिलों को डायरेक्ट कैश ट्रांसफर का लाभ देने की योजना थी उनमें सिर्फ 35 जिलों में 50 फीसदी लोगों का आधार कार्ड बन पाया। बाकि 10 जिला में 25 फीसदी और 8 जिला में 50 फीसदी से भी कम लोगों के पास आधार कार्ड है. इन 51 जिलों के जिलाधिकारी पूरी तैयारी में नहीं थे। इस कारण महज 20 जिलों से शुरुआत करना पड़ा। इसमें कोई राय नहीं हैं कि सरकार के इस योजना का मुख्य मकसद राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए सब्सीडी के बोझ को कम करना, कल्याणकारी योजनाओं से धीरे-धीरे हाथ खींचना और उन्हें दमनकारी नवउदारवादी नीतियों के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर करना  है। हाल ही में यूपीए सरकार ने राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए खाका तैयार किया है। इसमें सरकार अपना लक्ष्य निर्धारित करते हुए कहा है कि चालू वित्त वर्ष के अंत तक राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3 फीसदी तक कर दिया जाएगा। अब कहना नहीं होगा कि सरकार सब्सीडी को पूरी तरह समाप्त करना चाहती है।

सवाल है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लगभग सभी बैठको में विकास दर और जीडीपी की रट लगाते है।जाहिर इस साल के अंत तक प्रधानमंत्री अपने किसी भी लक्ष्य को पाने में असफल साबित हो चुके हैं। केवल  विकास दर और जीडीपी के गुणा भाग करने से असहाय और व्यवस्था से त्रस्त गरीब लोगों पर कोई असर नहीं पड़ता है।  खासकर उत्तर भारतीय किसान परिवार के प्रमुखता की बात कर रहा हूँ। दरअसल विजय केलकर के नेतृत्व 13 वें वित्त आयोग ने राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए खासकर पेट्रोलियम उर्वरक और खादय पदार्थों पर सब्सीडी में कटौती करने सुझाव दिया था। महंगाई में बढ़त्तोरी का प्रमुख कारणों में एक ये भी है कि समिति ने डीजल कीरोसीन, रसोई गैस, उर्वरक और राशन से मिलने वाले गेँहू-चावल की कीमतो में बढ़ोतरी की सिफारिश की. अब मामला पूरी तरह साफ है कि सरकार सब्सीडी के बोझ से किनारा कर कैश ट्रांसफर योजना को ला रही है और इसे गेम चेंजर भी कह रही है। महोदय आपको ख्यालात के लिए मैं बता दूं कि खाद्य सुरक्षा विधेयक के शुरुआती दौर में इसे भी गेम चेंजर कहा जा रहा था लेकिन सी. रंगराजन के नेतृत्व में बनी आर्थिक मामलों की समिति ने इस पर फिर विचार करने के लिए कैबिनेट के पास भेजा था। गौरतलब है कि सरकार एक तरफ विजयकेलकर समिति के इशारे पर राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए सब्सीडी को पूरी तरह समाप्त करने की योजना बना रही है वहीं दूसरी तरफ राईट टू फूड के अंतर्गत 75 फीसदी लोगों को लाना भी चाहती है यह बिल अभी भी संसद में लंबित है। इससे सरकार पर पहले से भी ज्यादा सब्सीडी का अतिरिक्त बोझ बढ़ता दिख रहा है। इस प्रकार सरकार अपने ही जाल में बूरी तरह फँस चुकी है। आनन-फानन में सरकार ने डायरेक्ट कैश ट्रांसफर को लाने की घोषना कर दी ।सवाल ये भी है कि क्या इस वोट चेंजर पालीसी से आम लोगों का भला हो पाएगा? बड़ा सवाल ये भी है कि पैसा मिलने के बाद भी वे इन पैसों का पारिवारिक खर्च पूरा कर सकेंगे क्योंकि खासकर ग्रामीण समाज पितृसातात्मक हैं और अशिक्षित भी है। शराब-दारु पीना आम बात है लेकिन मुद्दा ये भी है कि उनके असहाय बच्चे ठीक से खाना भी खा पाएंगे? स्कूल तो दूर की बात है। बहरहाल शुरुआत में 51 जिलों तक का लक्ष्य था किंतु बाद में 43 फिर 20 जिलों पर आकर सिमट गयी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हमारी बूनियादी ढ़ाचा ही इस व्यवस्था से अभाव ग्रस्त है असल में ये गेम चेंजर नहीं वोट चेंजर पोलिसी है।

बहरहाल वोट चेंजर इस कार्यक्रम का ज्वलंत उदाहरण दिल्ली की लाडली मुख्यमंत्री शीला दीक्षीत के अन्नश्री योजना को कहा जा सकता है जिसके तहत दिल्ली के 2 लाख परिवारों को हर महीने 600 रु. नगद उनके बैंक खाते में पहुंचाने की बात की गयी है। भला दिल्ली जैसे मैट्रोपालिटन शहर में 600 रु0 में ठीक से पानी भी खरीद कर पी सकेंगेए परिवार चलाना तो दूर की बात है क्योंकि दक्षिण दिल्ली में पानी का भी नीजीकरण हो चुका है।

जाहिर है कि  भ्रष्टाचार और घोटालों की दल.दल में डुबी सरकार लोगों के आक्रोश के सामने घबरा गई है। आसमान छूति मंहगाई से लोगों में अविश्वास को माहौल है। इन सभी मुद्दों से भटकाने के लिए कैश ट्रांसफर को गैम चैंजर कह रही है। सरकार बार.बार दावा कर रही है कि इससे फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी और लोगों को बैंक से सीधे उनके हाथों में पैसा मिलेगा. आप ईमानदारी पूर्वक बताए कि पूरे देश में कितने लोगों के पास बैंक एकांउट है। सबसे बड़ा सवाल ये भी है कि आप जिनके लिए योजना बना रहे हैंए क्या उनके पास बैंक एकाउंटस है। आकड़े कहते हैं कि महज 35 फीसदी लोगों के पास बैंक में अपना खाता है। बहरहाल पीडीएस को भी इसके अंतर्गत करने की मुहावरे को दोहराया जा रहा है हलांकि वित्त मंत्री पी०चिदंबरम ने 1 जनवरी को इससे अलग रखने की वकालत की हैं लेकिन सरकार की नियति पर भरोशा नहीं किया जा सकता क्योंकि सरकार केवल चुनावी लालीपाप की घोषना करती है।.

महोदय, उपर्युक्त सभी ज्वलंत समस्याओं को ध्यान मे रखते हुए इसे पूरे प्रोजेक्ट को फिर से विचार करने के लिए कैबिनेट के पास भेजा जाए। बूनियादी व्यवस्था को दुरुस्त किए बिना किसी भी योजना को सही मंजिल तक नहीं पहुंचाया जा सकता है। यह तो तय है यह तिकडम पीड़ित जनता का कोई गेम नहीं चेंज नहीं करने जा रही। दरअसल यह अगले चुनावों में हारती/संकट दिखती कॉंग्रेस/यूपीए का गेम चेंजर ज़रूर हो सकता है। बस इस बात को ऐसे ही स्वीकार लेने की इमानदारी की उम्मींद आपसे ज़रूर है। 

आदर सहित
-अखिलेश कुमार
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अखिलेश युवा पत्रकार हैं.स्वतंत्र रूप से लिखते हैं.
 इनसे संपर्क का पता है - akhileshiimc@gmail.com