बदलाव कई मोर्चों पर चाहिए...


-आदिल रज़ा खान




"...बहरहाल सबसे ज़्यादा चिंता की बात है कि मार्केट ने युवाओं को इसकी ज़द में इस तरह जकड़ रखा है कि उनका इससे बाहर निकल पाना मुश्किल मालूम पड़ता है। प्रोटेस्ट के साथ ही खुद में वास्तविक बदलाव की कोशिश इस सबमे ज्यादा कारगर होगी...जहां हम हर रोज अनायास ही फूटती मां-बहन की भद्दी गालियां ना दें....जहां हम दोस्त एक दूसरे के साथ हंसी-ठिठोली में भी माँ-बहन या महिलाओं को उपभोग का पात्र न बनाएं..."

दिल्ली गैंग रेप के बाद आम लोगों का हुजूम इस जघन्य अपराध के खिलाफ सड़क पर उतर आया है। तकरीबन 15 दिनों से अलग-अलग शहरों में लोग अपनी नाराज़गी का इज़हार भी करते भी दिख रहे हैं। इस तरह के प्रोटेस्ट की एक खास बात, युवा पीढ़ी का अपने प्री-सेट सर्कल से बाहर निकल कर सार्वजनिक हित के लिए मोबिलाइज़ होना। एक तरफ 'आई हेट पॉलिटिक्स' वाली युवा पीढ़ी का एक्टीविज़म और पार्टीसिपेशन कुछ हद तक खुशी भी देता है..वहीं यो यो हनी सिंह की वल्गर बीट पर थिरकते उन युवाओं को देख भ्रम भी पैदा होता है। सवाल सिर्फ हनी सिंह की धुनों का नहीं। हनी सिंह से मेरी कोई ज़ाती दुश्मनी नहीं है। हनी सिंह का जिक्र मैने सिर्फ उदाहरण के लिए पेश किया। ऐसे बहुतेरे साक्ष्य मिलेंगे जिनमें कहीं न कहीं महिलाओं के प्रति आपत्तिजनक ऑडियो-विजुअल कंटेंट परोसे जाते हैं। एफ एम चैनलों पर देर रात आने वाले फोन-इन शो की बात करें या परफ्यूम के एड या फिर कोई भी उत्पाद हो..केंद्र में महिलाओं का सौदर्य आकर्षण ही रखा जाता है। हंसी तो इस बात पर आती है कि डिटर्जेंट के विज्ञापन तक मे स्त्री शरीर को दिखाकर सामान बेचने की कोशिश की जाती है..इस तरह के एड पर आप अगर ग़ौर करें तो पाएंगे कि कपड़े की सफेदी  से ज़्यादा आपने आकर्षक महिला को फोकस किया। इसे कबूलने में कोई दिक्कत नहीं होनी चीहिए...ये सत्य है और इंसानी फितरत भी।

यहां पर मैं एक और उदाहरण  कंडोम या निरोध के विज्ञापन के साथ जोड़कर देना चाहूंगा...ज़्यादातर विज्ञापनों को देखकर ऐसा लगता है मानो इस जन स्वास्थ्य हित वाले ऐड में सुरक्षा को कम और सेक्सुअल फैंटेसी को ज़्यादा प्रदर्शित किया जाता है...जरा सोचें और खुद ही बताएं कि क्या इस तरह के ऐड से आपके अंदर सुरक्षा को लेकर चेतना जागी या आप और ज़्यादा फंतासी के लिए प्रोवोक हुए...हाल के दिनों में टीवी पर छाने वाले डियो के ऐडस् के बारे में मैं अब नहीं कहना चाहता जिसमें बेटा-बहु-ससुर की केमिस्ट्री दिखाई गई है..

थोड़ा बॉलीवुड का रुख करते हैं...आइटम गाना अब किसी भी फिल्म के बॉक्स ऑफिस रिज़ल्ट को निर्धारित करता है...आइटम सॉन्ग में जितने कम कपड़े और चलताऊ लैंग्वेज का सहारा लिया जाएगा...उतनी ही हिट होगी वो फिल्म....अब तो चलताऊ से फूहड़ शब्दों के मेटामॉरफोसिस का दौर है...जहां 'पटाना' काफी सहज लफ्ज़ है। और हर युवा के स्मार्ट फोन में ऐसे कंटेंट का नहीं होना उसे आउटडेटेड कर देता है......जहां स्मार्ट फोन की भी निकल पड़ती है और गाना बनाने वालों की भी...और इन सब के बीच हम महिलाओं के खिलाफ अभद्रता का लुत्फ उठाते हैं.........सवाल ये है कि बदलाव की चाहत रखने वाले हम युवाओं में इन सब उपभोक्तावादी चरित्र से बचने के लिए कितने मज़बूत हैं...एक और बात ये भी कि आखिर युवा ही क्यों.... इस तरह के बाजा़र या इसको चलाने वाले लोग भी समाज का ही हिस्सा हैं...उनके अंदर आखिर इस तरह कि नैतिक चेतना क्यों नहीं होनी चाहिए कि वे स्त्री को परोसना बंद करें....इसके लिए हम क्या कर सकते हैं...कैसे इस फूहड़ता को रोक सकते हैं...सोचने की ज़रूरत है....

नए साल के मौके पर रैप सिगर हनी सिंह का कॉन्सर्ट तय था... बड़ी संख्या में टिकटें भी बिकीं...हालांकि ये औऱ बात है कि मौजूदा दबाव के चलते आयोजकों को ये शो रद्द करना पड़ा। बहुत आनाकानी और अनमने ढंग से शो तो रद्द कर दिया गया...लेकिन क्या युवा पीढ़ी वाकई हनी सिंह की फूहड़ता, अश्लील गानों, मशहूर आइटम नंबर को नकारने का माद्दा रखती है...या फिर ये शांतिपूर्ण मार्च महज़ दिखावा है.....

बहरहाल सबसे ज़्यादा चिंता की बात है कि मार्केट ने युवाओं को इसकी ज़द में इस तरह जकड़ रखा है कि उनका इससे बाहर निकल पाना मुश्किल मालूम पड़ता है। प्रोटेस्ट के साथ ही खुद में वास्तविक बदलाव की कोशिश इस सबमे ज्यादा कारगर होगी...जहां हम हर रोज अनायास ही फूटती मां-बहन की भद्दी गालियां ना दें....जहां हम दोस्त एक दूसरे के साथ हंसी-ठिठोली में भी माँ-बहन या महिलाओं को उपभोग का पात्र न बनाएं..बदलाव इसलिए भी कि फूहड़ कॉन्सर्ट के लिए हम 25 हज़ार रुपये खर्च करने के बजाए किसी ज़रूरतमंद के सुपूर्द करें और यहां सैटिस्फैक्शन तलाशें....बदलाव इस तरह का कि आधी रात बीच सड़क पर शराब पीकर हुल्लड़ मचाने को ही हम अपनी अल्टीमेट आज़ादी ना मानें...बदलाव इसलिए भी क्योंकि हम इंसान हैं...हममें साकारात्मक बदलाव की सलाहियत है...जो किसी अन्य प्राणी में शायद नहीं.....

आदिल युवा पत्रकार हैं. 
अभी राज्यसभा में काम कर रहे हैं. 
इनसे adilraza88@gmail.comपर संपर्क किया जा सकता है.