एक रूमानी 'पोस्टर बाबा'

-विनीता यशस्वी

अवस्थी मास्साब

‘रुमानियत’ शब्द को शब्दकोशों से बेदखल कर दिया जाय. क़ानून बना दिए जाएँ कि अब यह शब्द वर्जित है. जितने ‘रूमानी’ दिखें सब को अंधियारी जेलों में धकेल दिया जाय ताकि वे बाहरी दुनियाँ में न दिखें और संक्रमण ना फैलाएं. पूरी दुनियाँ से रुमानियत का नामो-निशाँ मिट जाय. तो बताइये दुनिया कैसी लगेगी? और क्या यहाँ जीने के कोई माने रह जायेंगे? इसलिए, यदि आप आस्तिक हैं तो अपने भगवान से ‘रुमानियत’ की लंबी उम्र की दुवा करें और नास्तिक हैं तो थोडा सा रूमानी हो जाएँ.

यहाँ एक रूमानी शख्स का जिक्र करने के लिए कोई भी खास तारीख क्यों ढूंढी जाय? और जबकि आपको पूरा यकीन हो कि इस शख्स ने हर तारीख को जी भर जिया होगा तो ऐसे में ये बात और भी बेमाने हो जाती है कि हम एक ‘खास तारीख’ ढूँढेंगे और उस दिन फलां आदमी की बात करेंगे.

अवस्थी मास्साब का न तो आज जन्मदिन है ना ही आज के दिन उन्होंने अपने प्राण तजे थे. लेकिन क्योंकि हमें आज ही उनके बारे में बात करने का दिल है तो हमने आज ही बात छेड दी.

अवस्थी मास्साब! शायद आप इस नाम को ना जानते हों. आप शायद उन्हें इसलिए भी न जानते हों क्योंकि उन्हें कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला. अगर उन्हें पुरस्कार मिला होता तो उन्हें जानना ‘जीके’ तंदुरुस्त करने या अन्य कारणों से शायद आपकी मजबूरी होती. लेकिन यकीनन, उन्हें जो जानते होंगे पूरा जानते होंगे. वे आदमी ही इतने रोचक थे. और उन्होंने जो काम किये हैं वो किसी के जाने बगैर भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने कि उन्हें कोई जान लेता, तो होते.

 2 अगस्त 1925 को नेपाल के एक छोटे से गावं सिलगढ़ी के गरीब परिवार में जन्मे शरत चन्द्र अवस्थी’ ने एम.. अंग्रेजी से किया था और नैनीताल के सी.आर.एस.टी. स्कूल में शिक्षक हो गए नैनीताल में हर कोई उन्हें अवस्थी मास्साब’ के नाम से ही जानता था। अवस्थी मास्साब यूं तो अंग्रेजी के शिक्षक थे पर अंग्रेजी के अलावा भी हर विषय में उनका बहुत अच्छा अधिकार था। उनके छात्र रह चुके बलवीर सिंह कहते हैं,  जब भी किसी और विषय के शिक्षक नहीं आते, तो अवस्थी मास्साब उनकी जगह हमें पढ़ाने आ जाते. वो इस अंदाज में पढ़ाते थे कि लगता ये तो उन्हीं का विषय है. ये लगता ही नहीं कि मास्साब तो अंग्रेजी के मास्साब हैं.” अवस्थी मास्साब अंग्रेजी के तो मास्साब थे ही पर उनका हिन्दी और उर्दू में भी बराबर का दखल था।

अवस्थी मास्साब द्वारा बनाया गया पोस्टर
अवस्थी मास्साब को जो बात सबसे अलग करती है वो थी उनका स्वयं को अभिव्यक्त करने का अंदाज़ जिसमें तो उन्हें खासे पैसों की जरूरत पड़ती थी, ही बड़े-बड़े अखबार के संपादकों की खुशामद करने की और ही बहुत ज्यादा समय की। उनका यह माध्यम था पोस्टर। वो तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर स्वयं ही पोस्टर बनाते थे और उसे अपने गले में लटका कर सड़क में निकल जाते। जिसे भी पोस्टर पड़ना होता वो उनके सामने चले जाता। अवस्थी मास्साब वहां पर तब तक खड़े रहते थे जब तक की सामने वाला पूरा पोस्टर पढ़ ले। कभी-कभी वो आगे-पीछे दोनों तरफ पोस्टर लटका के चलते थे। जब कोई सामने की तरफ वाला पोस्टर पढ़ लेता तो उसे घूम कर पीछे का पोस्टर भी पढ़ने देते। अवस्थी मास्साब के पोस्टरों की एक और खासियत यह थी कि उन्होंने कोई भी पोस्टर नये कागज में नहीं बनाया। इसके लिये उन्होंने हमेशा इस्तेमाल किये जा चुके कागज को ही फिर से इस्तेमाल किया। वो अपने दिल की हर बात, अपनी नाराजगी, गुस्सा और प्यार, सब कुछ अपने पोस्टर के द्वारा आम जनता तक पहुंचा देते थे। जिसका जनता के ऊपर गहरा प्रभाव भी पड़ता था।

अवस्थी मास्साब मशहूर नाट्य संस्थायुगमंच के संस्थापक सदस्य भी थे। युगमंच के पूर्व अध्यक्ष ज़हूर आलम की मल्लीताल स्थित छोटी सी कपड़े की दुकानइंतखाब’ उनके बैठने का अड्डा हुआ करता. यहीं से वो अपने सभी रचनात्मक कार्यों को दिशा दिया करते थे। ज़हूर आलम बताते हैं, अवस्थी मास्साब ज्ञान का भंडार थे। हर विषय में उनका ज्ञान इतना गहरा था कि कभी-कभी लोग उसे समझ भी नहीं पाते थे। असल में अवस्थी मास्साब अपने समय से बहुत आगे के थे इसलिये शायद लोग उन्हें उस तरीके से समझ नहीं पाये जिस तरह से उन्हें समझा जाना चाहिये था।”

अवस्थी मास्साब आंदोलनकारी भी थे और उन्होंनेनशा नही रोजगार दो, प्राधीकरण हटाओ नैनीताल बनाओ, मण्डल-कमण्डल के विरुद्ध छात्र आंदोलन, 1994 का मुजफ्फरनगर कांड तथा उत्तराखंड आंदोलन  में सक्रिय भूमिका अदा की। अवस्थी मास्साब खेलों के भी बेहद शौकिन थे और हर तरह के खेलों जैसे क्रिकेट, हॉकी, फुटबाल, बॉक्सिंग आदि की बारिकियों से भी भली भाँति परिचित थे। अरूण रौतेला कहते हैं, अवस्थी मास्साब विद्वान और ईमानदार तो थे ही साथ ही उन्होंने खुद को अभिव्यक्त करने का जो माध्यम चुना वो निराला था। उनके बगैर नैनीताल आज अधूरा लगता है। उनसे हमें काफी कुछ सीखने को मिला। ऐसे विद्वान दुनिया में कम ही होते हैं जिनमें से एक हमारे अवस्थी मास्साब भी थे।”

आंखिरी पोस्टर

जीवन की सर्दियों में से बसंत के 76 मौसमों को बहार निकाल लाने के बाद, 2002 की सर्दियाँ अभी लदी भी नहीं थी कि फ़रवरी की 12 तारीख को मास्साब को हुये ब्रेन हैम्ब्रेज ने उन्हें इस बसंत से आगे नहीं बढ़ने दिया. यह ब्रेन हेम्ब्रेज प्राणघातक साबित हुआ. कुछ दिनों से अस्पताल में भरती अवस्थी मास्साब की मृत देह को जब बिस्तर से उठाया गया तो सिरहाने से मुस्कराहट फूट पड़ी, उनका बनाया एक आंखरी पोस्टर झाँक रहा था. उसमे लिखा था, “हैप्पी बर्फ डे!”. एक दिन पहले ही नैनीताल बर्फ में नहाया था. यह पोस्टर उसी का जश्न था और दुनिया को अवस्थी मास्साब का ‘अलविदा’ भी...

(अवस्थी मास्साब की तस्वीर और उनके पोस्टर, ज़हूर आलम, पूर्व अध्यक्ष युगमंच द्वारा साभार)






विनीता पेशे से पत्रकार हैं और मिज़ाज से यात्री. 
उत्तराखंड के प्रतिनिधि अखबार 'नैनीताल समाचार' की मुहीम का अहम हिस्सा हैं. 
इनसे संपर्क का पता है- yashswi07@gmail.com