विशाल भारद्वाज! क्या तुम हिजडों को इंसान नहीं समझते?


विनय सुल्तान 






-विनय सुल्तान 

किसानो का गेहूं जब स्थानीय मंडी में नहीं बिकता है तो मटरू गेहूं, “शक्तिभोग” को बेच कर बैंक की किस्त चुकाने का प्रयास करता है. "शक्तिभोग" इस फिल्म की प्रायोजक है. लेकिन फिल्म की कहानी में गेहूं को शक्तिभोग को बेचे जाने को किस संदर्भ में देखा जाना चाहिए? क्या बिचोलियों से बचने के लिए किसानो को “वॉलमोर्ट” की शरण में चला जाना चाहिए. फिल्म का दृष्टिकोण तो यही है.

“मटरू की बिज़ली का मंडोला” बनाने से पहले विशाल भरद्वाज को SEZ के खिलाफ चल रहे जनसंघर्ष का थोडा अध्ययन जरुर करना चाहिए था. ऐसा करने से शायद  SEZ जैसे मसले को मसाला बनाने से बाज़ आ जाते. जमीन पर हो रहे संघर्ष “अमरचित्र कथा” नहीं है. फिल्म बुनियादी तौर पर वामपंथी राजनीती का मखौल उड़ाती है. बेशक, फिल्म में माओ के नाम का कीर्तन ना हुआ होता, लाल झंडे और चे गवारा का पोस्टर ना दिखाया जाता पर  SEZ जैसा मुद्दा किसी भी फ़िल्मकार से गहरी संवेदनशीलता की मांग करता है.       

फिल्म की कहानी में मंडोला एक पूंजीपति है जो कि गाँव की जमीन का कब्ज़ा कर वहां कई करोड़ की लागत वाली फेक्टरी लगाना चाहता है. मंडोला का किरदार चार्ली चेपलिन की फिल्म “सिटी लाइट्स” के पूंजीपति की याद दिलाता है जो शराब पीने से पहले खुर्राट बुर्जुआ और शराब के नशे में एक मानवीय चरित्र को पेश करता है. मटरू जे.एन.यू. से पढ़ा हुआ वामपंथी रुझानो वाला नौजवान है जो की भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चल रहे संघर्ष का नेतृत्व करता है. अपनी पहचान छुपाने के लिए वो अपना छद्म नाम “माओ” रख लेता. मटरू, मंडोला के यहाँ पर ड्राइवर की नौकरी करता है. मंडोला की बेटी बिज़ली की शादी सत्ताधारी पार्टी की मुखिया के बेटे से होने वाली है. फिल्म के अंत में मंडोला का नाटकीय रूप से ह्रदय परिवर्तन हो जाता है और वो किसानो को उनकी ज़मीने लौटा देता है. और मटरू की शादी बिज़ली से हो जाती है.

शक्ति के भोग के खिलाफ “शक्तिभोग”

किसानो का गेहूं जब स्थानीय मंडी में नहीं बिकता है तो मटरू गेहूं, “शक्तिभोग” को बेच कर बैंक की किस्त चुकाने का प्रयास करता है. "शक्तिभोग" इस फिल्म की प्रायोजक है. लेकिन फिल्म की कहानी में गेहूं को शक्तिभोग को बेचे जाने को किस संदर्भ में देखा जाना चाहिए? क्या बिचोलियों से बचने के लिए किसानो को “वॉलमोर्ट” की शरण में चला जाना चाहिए. फिल्म का दृष्टिकोण तो यही है. पूरा पूंजीवाद श्रम और संसाधनों के बलात्कार पर खड़ी व्यवस्था है. पूंजीवाद का जवाब पूंजीवाद कैसे हो सकता है? शक्तिभोग और उसके जैसी दूसरी कंपनियों को मुनाफा से मतलब है. किसानों की बदहाली के प्रति उनकी संवेदनशीलता शून्य है.

संघर्ष है सर्कस नहीं

सत्ता द्वारा यज्ञ करवाने के दो दिन बाद बारिश आ जाती है. किसानों की कटी-कटाई फसल बारिश में भीग कर चौपट हो जाती है. मटरू गाँव के लोगों को दिल्ली मोर्चा ले कर चलने की बात कहता है. पर गाँव के सब लोग अलसुबह जा कर अपनी जमीनों पर अधिग्रहण स्वीकार कर लेते हैं. कहानी का यह हिस्सा नीरवत की स्थिति पैदा कर देता है और आगे का संघर्ष सर्कस में बदल जाता है.

देश के तमाम भागो में जल, जंगल और ज़मीन को ले कर हो रहे संघर्ष इतने समझौतापरस्त नहीं हैं. इस देश की मेहनतकश जनता ने ज़मीन की कीमत जान दे कर चुकाई है और चुका रहे हैं. जमीन के लिए लड़ने वाले बहादुर लड़ाके इतनी आसानी से सत्ता के सामने घुटने टेकने वालों में से नहीं. फिल्म जमीन पर हो रहे संघर्ष का इतना असंवेदनशील मूल्यांकन कैसे कर सकती है? गले तक पानी में खड़े रह कर अपनी खाल सदने वाले, सीने पर गोलिया खाने वाले, पुलिस के अमानवीय अत्याचार सहन करने वाले लोग समझौते नहीं करते. क्योंकि ज़मीन उनके अस्तित्व का सवाल है. ऐसा लगता है कि निर्देशक यह नहीं समझ पाता है. 

एक और हास्यास्पद बात ये है कि सत्ता जब किसानों को बर्बाद करने के लिए यज्ञ करवाती है उसके दो दिन बात बारिश हो जाती है! ये किस तरह की समझदारी है? सत्ता जब चाहे धरम की पूंछ पकड़ कर बारिश करवा सकती है और रिंग मास्टर की तरह किसानों के संघर्ष को शांत करवा सकती है. हाँ, अगर आप को अपनी कहानी को बढ़ाना ही था तो आप सत्ता के गुंडों के द्वारा खलिहान में आग लगवा सकते थे पर यहाँ तो बारिश यज्ञ पर निर्भर थी.

माओ हिजड़ा है?

फिल्म में एक किन्नर माओ और जनता के बीच संवाद का माध्यम बनता है. वो जनता की तरफ मुखातिब हो कर कर कहता है “माओ की तरफ से लाल सलाम”. इस पर उस किन्नर से पूछा जाता है कि माओ सामने क्यों नहीं आता, क्या वो भी “हिजड़ा” है? इसके बाद ठहाके गूंजने लगते हैं.

मैं व्यक्ति पूजा के सख्त खिलाफ हूँ. आप माओ को कुछ भी कहिये. मुझे कोई इनकार नहीं! बलराज सहनी ने अपनी फिल्म “इंसाफ” में लेनिन को जानवर कहा था. ये आपका नजरिया है. पर क्या किन्नर होना किसी इन्सान को दोयम दर्जे का बना देता है? ये एक बड़ा सवाल है. किन्नरों को हीन समझने की जो ग्रंथि सक्रिय है जिसकी जड़ें दरअसल उसी पित्रसत्ता और सामन्ती मानसिकता में है, जो स्त्रियों और दलितों को दोयम दर्जे से देखता है.

और अंत में प्रार्थना...!

फिल्म का अंत बड़ा ही नाटकीय है. मंडोला जैसे वहशी पूंजीपति का “हृदय परिवर्तन” हो जाता है. वो अपने कई करोड़ की परवाह किये बिना किसानों को उनकी ज़मीन लौटा देता है और खुद सत्ता के खिलाफ हो कर उसका प्रतिरोध करने लगता है. वाह! ये कितना मनमोहक गांधीवादी अंत है. संघर्ष के नाम पर जो सर्कस इस फिल्म में शुरू हुआ था, उसमे इसी तरह के अंत की गुंजाइश बची थी. इसके अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता था. 

ये फिल्म पुरे मुद्दे का क्या हल सामने रखती है? इसी तरह एक दिन टाटा,बिरला, अम्बानी और उनके बापों और बेटे-बेटियों का “हृदय परिवर्तन” हो जायेगा?

तमाम आलोचनाओं के बावजूद इस फिल्म का संगीत सराहनीय है. हरियाणा के बारे में ये मजाक किया जाता था कि “यहाँ 'कल्चर' के नाम पर 'एग्रीकल्चर' है!” इस फिल्म में हरियाणा के लोक संगीत का इस्तेमाल बेहतरीन तरीके से हुआ है. हरियाणा में रागिणी और स्वांग का लम्बा इतिहास है. वर्तमान में ये लोककला या तो फूहड़ता का शिकार हो चुकी है, या फिर आधुनिकता के बियाबान में अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है. मुख्यधारा के संगीत में इनके इस्तेमाल की सराहना होनी ही चाहिए.

विनय युवा पत्रकार हैं. पत्रकारिता की पढ़ाई आईआईएमसी से. 
vnyiover4u@gmail.com पर इनसे संपर्क कर सकते हैं.