क्या असल दोषी को सजा दे पायेंगे हम?


"...गौर किया जाय तो उस लड़की का बलात्कार तो अब शुरू हुआ है। उसे उन दरिंदों ने उतना दुःख और यातना नहीं दी होंगीजिसे देने के लिए हम सब तड़प रहे हैं। आने वाले दिनों में हम उन 95 हजार स्त्रियों का जीना दूभर कर देंगे। उनका खामोश बलात्कार करेंगे। और उसकी पड़ताल कोई नहीं करेगा।..."
-अंकित फ्रांसिस

कितना आश्चर्यजनक है कि लगभग 560 बलात्कार झेलने के बाद एक दिन अचानक राजधानी में सब जाग जाते हैं। रैलियां होती हैं, विरोध भी होते हैं, ‘फांसी दो, ‘मार दो, ‘काट दो-जला दो जैसी बातें हर मुंह से अनायास ही फूटने लगती हैं। अखबारों के पेज रंगे जाते हैंबड़ी-बड़ी इबारतें और विषय संबधित कविताएं खोजी जाती हैं, फेसबुक वाल को सुशोभित करने के लिए। ऐसा लगने लगता है कि साल में 95 हजार की दर से बलात्कार झेलने वाला समाज बदल रहा है। और पिछले दिनों में हमारा 'अति क्रांतिकारी' हो चला मध्यवर्ग फेसबुकट्विटरन्यूज चैनलों और अखबारों के जरिए किसी अनिश्चित बदलाव की कसमें खाने लगता है। लेकिन एक दृश्य और भी है जिसकी तरफ आज भी किसी की नजर नहीं है और असहमति तो क्या ही होगी। इस समाज का पुरुष जब काम से घर लौट रहा है तो बसोंमैट्रो और सभी सार्वजनिक स्थलों पर लड़कियों को उसी टेड़ी नजरों से देख रहा हैमौके-बेमौके तंज कस दे रहा है घर पहुंचकर तैयार खाने की उम्मीद का दंभ उसके जेहन में है। खाना खाकर प्लेट उठा देना उसकी शान के खिलाफ है। पानी से भरा गिलासलगा हुआ बिस्तर और चैन से सोये बच्चे सभी पत्नी की जिम्मेदारी में आज भी अनंत सालों से दर्ज हैं, जिसे लेकर किसी चेतन-अवचेतन में कोई सवाल नहीं है। औरत की जिम्मेदारियां अनंत काल से डिफाइंड हैं। अब क्योंकि ये मर्द 'आधुनिक' भी हो गया है सो इस 'आधुनिक' मर्द के सामने सवाल है तो बस सामाजिक स्थलों और बहसों-मुबाहिसों में खुद को लिबरलस्त्री की इज्जत करने वाला और वक्त पड़ने पर क्रांतिकारिता दिखाकर वाहवाही लूटने का। तो ये जारी है। 

जरा गौर फरमाइए कि फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल साइटों पर मौजूद ज्यादातर मर्दों की प्रोफाइल और स्टेटसों के आधार पर उनका चरित्र चित्रण कैसा होगाक्या असल में वे सब वही हैं जो वहां पर दिखाई दे रहे हैं? या कुछ ऐसा है जिसे छुपा लिया जाता है. और अगर कुछ छुपा लिया जा रहा है तो आखिर वो है क्या..

दिल्ली में कुछ दरिंदों ने एक लड़की का निर्ममता से बलात्कार कर उसे और उसके दोस्त को सड़क के किनारे फेंक दिया। आप अगले दिन के अखबारों के रवैये पर नजर डालें। सभी में महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाले अग्रदूत बनने की होड़ लगी है। दो-तीन पेज रंग दिए गए। बड़े-बड़े ग्राफिक्स और आंकड़े इकट्ठे किए गए। ‘मिटा देंगे’इस बार सजा देंगे’, टाइप वाले हीरोइया स्लोगन्स। लेकिन अंदर के पेजों और उनके सप्लीमेंट्स पर नज़र दौड़ाईये. इनमें उसी डेडीकेशन के साथ औरत के शरीर को उचित दरों पर बेचा जा रहा है। थोड़ा दिमाग पर जोर डालकर सोचिये कि आखिर क्या बेचा जा रहा हैकौन सी आम राय बना रहे हैं औरत के बारे में?

चलिए एक महत्वपूर्ण सवाल की ओर बढ़ा जाय कि बलात्कार करने वाले इन वहशियों के भीतर जो भरा था क्या वह सब ये लेकर पैदा हुए थेइस पर गंभीर चर्चा नदारद है और ‘फंसी दो- फांसी दो’ के नारे सबसे प्रबल हैं। इस मसले को बड़ा ही सामान्य और सिर्फ ‘ला एंड ऑडर’ की समस्या बताकर जिस तरीके से इसे ये मीडिया संस्थान बेच रहे हैं उसका अल्टीमेट क्या है?  और अगर हमारे समाज को वाकई इस पर गुस्सा है और यह गुस्सा वाजिब है तो पिछले 560 बलात्कारों के वक्त यह कहां था? और दिल्ली के इस बलात्कार पर तो यह फूटता है लेकिन ठीक अगले दिन बिहार के सहरसा में हुए 8 साल कि बच्ची के बलात्कार का इसे पता भी नहीं चलता दरअसल हमारा गुस्सा भी हमें ही को बेच दिया जा रहा है और हम सब मोमबत्तियां जला रहे हैं।

हम हमारे समाज के असल ढांचे पर आज भी कोई बात क्यों नहीं करना चाह रहे हैं? मर्दवादी सोच से ग्रसित हम लोग इस विरोध के लिए आखिर कितने उपयुक्त हैं? इन घटनाओं के पीछे जो सोच काम कर रही है क्या हम वाकई खुद उससे मुक्त हैं? देखा जाये तो हमारे अधकचरे पढ़े-लिखे समाज के भीतर महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर कुंठा और भी ज्यादा शातिर हुई है। जो किस वक्त बाहर आना है उसके लिए बाकायदा स्ट्रेटिजिकली तैयार है। यह एक आवरण के भीतर पनप रही है। यह आवरण ही तमाम सोशल वेब साइट्स पर परदे का काम कर रहा है। हमारी मैथ्ससांइस और सोशल सांइस की रटंत विद्या इस कुंठा पर कोई असर नहीं डाल सकती। चूंकि पढ़ तो हम सिर्फ ज्यादा से ज्यादा कमाने और ज्यादा से ज्यादा उपभोग के लिए रहे हैं। दरअसल कोई लड़की या औरत घरों से बाहर आ जाय यह हमें आज भी मंजूर नहीं है। या जब आये भी तो उसकी सारी सीमाएं हम पहले से ही स्पष्ट कर दें। इसलिए हम ऐसे मुद्दों को भी शोर मचा कर डायवर्ट कर देना चाहते हैं। हम कहते हैं उसे ‘फांसी दे दो’ जो भी ऐसा कुछ करे। लेकिन महिलाओं के प्रति हमारे समाज की उस मानसिकता को कोई फांसी देने के लिए कोई तैयार नहीं है जो ऐसे जघन्य बलात्कारों की असली वजह है।

कानून क्या करने वाला है, जब सब जगह तो हम उसी मानसिकता के साथ मौजूद हैं। जब वह सजा देने वाले जजपकड़ने वाली पुलिस और तो और समाज की औरतों में भी कहीं न कहीं मौजूद है। कितने चौराहों पर पुलिस लगाई जायेगीकितनों को फांसी पर लटका दिया जाएगा? शराब पीकर रोज़ अपनी बीवी का कानूनन बलात्कार करने वालों का कोई क्या कर लेगा? हम अपने महान देश की सामाजिक संरचना पर ध्यान देने से बचते रहे हैं. इसी के चलते यह अंदर से सड़ रहा है और यह घटनाएं इसमें पड़ी दरारों से ही रिस कर बाहर रही हैं। हम इसे उघाड़ेंगे नहींक्योंकि उसके बाद कौन किसको दोषी कहेगाहम सभी में तो कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में वह मौजूद है। सभी तो औरतों को उसी तरह देखना और इस्तेमाल करना चाहते हैं। किसी भी बात के जनरलाइजेशन को बुरा माना जाता है लेकिन इस मुद्दे पर जनरलाइजेशन से ही पूरी तस्वीर उभर कर सामने आ पाती है। ऐसे में हम शोर मचाने लगते हैं, मिलकर अपनी सड़ांध को छुपा लेना चाहते हैं, चूंकि उसका बचना हमारी लंबी-लंबी रवायतों और महान संस्कृति के लिए भी जरूरी है। या कहें तो वही रवायतें तो इस सत्ता को बनाये रखने में मददगार है। अगर यह सड़ांध सामने आई तो जिस आधार पर हम और यह समाज खड़ा है वह लिजलिजा होकर डोलने लगता है। यह डरा हुआ समाज हैखासकर बोलने से डरने वाला। चुप को समझदार और बोलने वाले को बेफकूफ बताने वाला समाज।

बलात्कार के उत्तरजीवी जिंदा लाश नहीं हैं! 
यहाँ एक सबसे ज़रूरी सवाल पर बात करना ज़रूरी है। हमारे देश में विपक्ष की मुखिया सुषमा स्वराज का यह बयान तकरीबन पूरे देश की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है। सुषमा एक महिला हैं और अभी विपक्ष का नेतृत्व उन्हें मिला हुआ है। लेकिन इतने महत्वपूर्ण पद पर वह जिस पुरुषवादी मानसिकता के साथ हैं यह बयान उसकी ही एक बानगी है. “..अगर ये लड़की बच जाती है तो पूरी जिंदगी एक जिंदा लाश की तरह गुजारेगी..” उन्हें लगता है कि बलात्कार के बाद लड़की की जिंदगी खत्म हो गई है, कुछ ऐसा है जो चला गया है अब कभी वापिस नहीं आएगा। अगर उसे वेंटिलेटर से जिला कर लाया भी जा सका तो अब उसका जीवन निरर्थक हैइतने सब के बाद तो वह मर ही जाय तो अच्छा है। दरअसल यह बयान सुषमा की ओर से आया भर है लेकिन यह हमारे समाज की बृहत्तर मानसिकता का रिफ्लेक्शन है. यह मर्दवादी समाज बलात्कार को भी अपने हिसाब से एक्सप्लेन कर देता है. इसमें लड़की का तो सबकुछ गया लेकिन वे छह वहशी कल अगर छूट जाय तो समाज में थोड़ी छीः छीः के बाद आराम से स्वीकार कर लिए जायेंगे। कोई आज भी यह नहीं पूछने के लिए तैयार है कि आखिर लड़की का क्या ऐसा चला गया है जो कभी किसी लड़के का जा ही नहीं सकता। इन सवालों को हम फांसी की आंधी से क्यों ढंकना चाह रहे हैं?

गौर किया जाय तो उस लड़की का बलात्कार तो अब शुरू हुआ है। उसे उन दरिंदों ने उतना दुःख और यातना नहीं दी होंगी, जिसे देने के लिए हम सब तड़प रहे हैं। आने वाले दिनों में हम उन 95 हजार स्त्रियों का जीना दूभर कर देंगे। उनका खामोश बलात्कार करेंगे। और उसकी पड़ताल कोई नहीं करेगा। खुद औरतें उन पर तंज कसेंगी। संभवतः कहा जाय कि इनकी भी कोई गलती रही ही होगी नहीं तो हमारे साथ तो ऐसा किसी ने कुछ न किया। जजपुलिस और वकील सभी कानून के नाम पर वासनाओं से भरे सवाल पूछेंगे और अपने भीतर छुपे मर्द को टॉनिक देंगे।

इस घटना पर एक प्रतिक्रिया आधुनिकता से आहात धुर-पुरातनपंथी दक्षिणपंथ की ओर से भी आ रही है. उसका मानना है कि मिनी स्कर्ट, जींस-टॉप पहनने वाली इस पीढ़ी की महिलाओं के साथ और क्या होगा? पुरुषवादी घमंड में चूर ये मानसिक तौर पर दरिद्र लोग महिलाओं को उनके किसी भी किस्म के निर्णय खुद लेते नहीं देख सकते। वस्त्रों के चुनाव भर से हमारे समाज के दम्भी पुरुष को ये इन लड़कियों के बलात्कार करने का लाइसेंस दे देते हैं। पिछले समय में पुरुषवादी मानसिकता को चुनौती देती आवाजों ने भी मजबूती से हमारे समाज में दस्तख दि है. मर्द सत्ता की चूलें हिल रही हैं और वह पलटवार में फतवे जारी कर रही है, श्रीराम सेना जैसे गुंडों की फ़ौज तैयार कर रही है और ऐसे वहशियों को महिलाओं की स्वतंत्रता के खिलाफ इस्तेमाल कर रही है।

परिवार के स्तर पर पुरुषवादी मानसिकता की चपेट में हमारी बीवीबेटीबहन तो हमेशा से ही रही हैं लेकिन अब इसका निशाना वे व्हिसलब्लोअर औरतें हैं जो संभवतः न जानते हुए भी पुरुषवादी सत्ता को चैलेंज कर रही हैं। वे नहीं जानती कि सूट-सलवार से जींस का जो ये ट्रांजेक्शन हैवह हमारे इस मर्दवादी समाज के लिए कितना दर्दनाक है। जब यह ट्रांजेक्शन जींस से माइक्रोमिनी की तरफ जाता है तो हम फट पड़ते हैं। स्कर्ट से बाहर झांकती पतली टांगें हमें चुभती हैं और हम जब कुछ नहीं कर पाते तो पहले धर्म-संस्कृति का सहारा लेते हैं और अंत में ऐसी ही किसी रात में मौका देखकर हमारे भीतर का हमलावर बाहर आ जाता है. कभी उसे बसों में छूकर निकल जाता है, कभी उसपर तंज कसता है और कभी बलात्कार कर सबक सिखाता है. इन सबकों के बाद भी खुद ही इसकी व्याख्या कर औरत को बराबर दोषी ठहरा न्याय का स्वांग रचता है.

‘असल न्याय क्या है’ क्या इसकी पड़ताल का वक्त नहीं आ पहुंचा है? हम ‘खुद से’ ना बचते हुए इस पर बात क्यों न करें...


अंकित फ्रांसिस





अंकित युवा पत्रकार हैं। थिएटर में भी दखल। 
अभी एक साप्ताहिक अखबार में काम कर रहे हैं।
इनसे संपर्क का पता francisankit@gmail.com है।