हाशिए पर फिलिस्तीनी आजादी का मुद्दा


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 अभिनव श्रीवास्तव

 "...दरअसल इजरायल-फिलिस्तीन विवाद के संदर्भ में तात्कालिक रूप से हमास की भूमिका को उसके कट्टरपंथी इतिहास के बावजूद ठीक वैसे नहीं देखा जा सकता जैसे अलकायदा या किसी और मुस्लिम चरमपंथी संगठन को। इस तथ्य की अनदेखी करना मुश्किल है कि फिलिस्तीन में इजरायल की बर्बर कार्रवाई और उसका प्रतिरोध तब भी मौजूद था जब हमास जैसे संगठन अस्तित्व में ही नहीं थे।..."

गाजा पट्टी एक बार फिर इजरायल और फिलिस्तीन के संघर्ष के चलते लुहलुहान हुई और हमेशा की तरह इजरायल ने दोनों पक्षों के बीच मिस्र और अमेरिका द्वारा कराये गये युद्ध विराम से पहले गाजा के नागरिक समाज और संपत्ति को अपनी बर्बरता और अमानवीयता के चलते भारी नुकसान पहुंचाया। चूंकि इजरायल को बसाये जाने और फिलिस्तीनियों को उसकी जमीन से खदेड़े जाने का मुद्दा आधुनिक इतिहास के सबसे विवादास्पद मुद्दों में से एक है और  दोनों पक्षों के बीच छिड़ने वाला संघर्ष मध्य-पूर्व के साथ-साथ वैश्विक राजनीति को भी दीर्घकाल तक प्रभावित करता हैइसलिए दोनों पक्षों के बीच ताजा संघर्ष की वजहों और उसके परिणामों को व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना जरूरी हो जाता है। निश्चित तौर पर दोनों पक्षों के बीच संघर्ष छिड़ने की कुछ तात्कालिक वजहें रही हैंलेकिन सिर्फ उन वजहों को आधार बनाकर हमास या इजरायल में से किसी एक को दोषी मान लेने का नजरिया उन दूरगामी वजहों और मंशा को भांपने से रोक देता है जिसमें इस तरह की कार्रवाइयों की असल वजहें छिपी होती हैं। 

अमेरिकी, यूरोपीय और दुनिया भर की मीडिया का एक बड़ा हिस्सा इन तात्कालिक वजहों से जुड़े कई तथ्यों को छिपाकर अमेरिका के रणनीतिक साझीदार इजरायल की कार्रवाई को वैध और जायज ठहराता है। वर्तमान घटनाक्रम के सम्बन्ध में भी यह कहा गया कि हमास की ओर से अपने सैन्य प्रमुख अहमद अल जब्बारी की मौत के बाद इजरायल पर राकेट दागे गये और उसके बाद प्रतिक्रियास्वरूप इजरायल ने गाजा पट्टी और पश्चिमी किनारे पर हमला किया।ये तथ्य सामने नहीं लाये गए कि इजरायली रक्षा बलों (आईडीऍफ ) द्वारा बीते चार नवम्बर को एक विक्षिप्त फिलिस्तीनी नागरिक की हत्या की गयी थी और ठीक तीन बाद रक्षा बलों ने एक तेरह वर्षीय बच्चे को भी मार गिराया था। हालांकि अगर फिलिस्तीन और इजरायल के बीच इस संघर्ष को मध्य-पूर्व की राजनीति में आ रहे बदलावोंसीरिया में राष्ट्रपति बशर-अल असद और विद्रोहियों के बीच जारी संघर्ष की रोशनी में देखें तो तस्वीर बहुत हद तक साफ़ हो जाती है। 

सीरिया में राष्ट्रपति बशर-उल-असद के खिलाफ सक्रिय विद्रोहियों को अमेरिकापश्चिमी यूरोपीय देशों और खाड़ी देशों का खुला समर्थन हासिल है और सीरिया इन देशों के अंतर्विरोधों की जमीन बना हुआ है। सीरिया में बड़े स्तर पर ठहरे हुए फिलिस्तीनी शरणार्थियों को अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय देशों द्वारा समर्थित इन विद्रोहियों ने बीते कुछ महीनों में लगातार निशाना बनाया है। अमेरिकाखाड़ी देशों और यूरोपीय देशों के सीरिया में सत्ता परिवर्तन के इन सामूहिक प्रयासों की आहट से फिलिस्तीनी समर्थकों की स्थिति बहुत कमजोर हुई। इस कमजोर स्थिति और अमेरिका समर्थित विद्रोहियों द्वारा फिलिस्तीनी समर्थकों के खिलाफ की गयी कार्रवाई को  इजरायली नेतृत्व ने गाजा पट्टी पर आक्रमण करने और पश्चिमी किनारे पर अपना विस्तार करने के लिए सबसे मुफीद मौके और अमेरिका द्वारा हासिल मौन सहमति के रूप में देखा। सीरिया के ओर इजरायल के गोलन हाइक पर हुए हमले ने जैसे इजरायल को हरी झंडी दे डाली और उसने पूरी तैयारी के साथ गाजा पट्टी पर हमला कर दिया। यह महज संयोग नहीं था कि इजरायल के कैबिनेट ने गाजा पट्टी पर तैनात रिजर्व सैनिकों की संख्या तीस हजार से बढाकर 75 हजार कर दी थी।  

वर्तमान संकट की एक अहम वजह इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतानयाहू का चुनावी एजेंडा भी था। इजरायल का नेतृत्व अक्सर जियनवादी लहर और जनता के बीच अस्तित्व की असुरक्षा को बढ़ाकर सत्ता में बने रहने के लिए युद्धोन्मादआत्मरक्षा और अस्तित्व के अधिकार की लहर पैदा करता है।  इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतानयाहू ने भी इस आजमाए नुस्खे का इस्तेमाल किया है। यह महज संयोग नहीं है कि साल 1996 में लेबनान और 2008-09 में गाजा पर आक्रमण करने का निर्णय इजरायली नेतृत्व द्वारा आम चुनावों से ठीक पहले लिया गया था। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहू ने एक हद तक गाजा और हमास के प्रति अपना अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों पर बढ़त हासिल कर ली है। नेतनयाहू ने फिलिस्तीन के अस्तित्व को जड़ से उखाड़ फेंकने की अपनी प्रतिबद्धता दिखाकर  मध्य वर्ग के मतदाताओं को अपने पक्ष में कर लिया है। नेतनयाहू के लिए यह ध्रुवीकरण करना इसलिए भी जरूरी था क्योंकि कालांतर में इजरायल का शासक वर्ग और वहां की जनता के बीच एक ऐसा वर्ग भी उभरा है जो लम्बे वक्त से फिलिस्तीन के मुद्दे पर अनिश्चितता और असुरक्षा की भावना में जी रहा है और फिलिस्तीन के साथ संघर्ष से थक चुका है। 

साल 2005 में इजरायल द्वारा गाजा पट्टी से अपनी सेना पीछे खींचने की एक वजह यह आंतरिक दबाव भी रहा था।  दरअसल नेतानयाहू ईरान के बहाने राष्ट्रीय सुरक्षा के संकट की जो स्थिति पैदा करने चाहते थेवह मिट रोमने के अमेरिका का राष्ट्रपति चुनाव हारने के साथ ही खटाई में पड़ गयी थी। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा के संकट को नए सिरे से पैदा करना जरूरी था। अपनी इस योजना के तहत ही उन्होंने युद्ध विराम समझौते के तुरंत बाद पिलर आफ डिफेन्स को अपनी सरकार की उपलब्धि भी बताया है। अगर इन स्थितियों और वजहों को ध्यान में रखें तो यह कहा जा सकता है कि हालिया संघर्ष और तनाव की प्राथमिक जिम्मेदारी इजरायल की ही है और इसका सम्बन्ध गाजा पट्टी और पश्चिमी किनारे पर उसके द्वारा किये गए हमले की मंशा से अधिक है। उसके हमलों का निशाना हमास और उसके सैन्य ठिकाने कम और फिलिस्तीन की जनता और वहां की जमीन अधिक रही है। गाजा पट्टी में हमास की नेतृत्वकारी भूमिका अक्सर सवालों के घेरे में रही है और कुछ विश्लेषक इजरायल की फिलिस्तीन पर कार्रवाई को हमास, ईरान और हिजबुल्लाह के त्रिकोणीय संबंधों और हमास की कट्टरपंथी पृष्ठभूमि के चलते इजरायल के लिए पैदा हुए खतरे का परिणाम मानते हैं। यह तर्क दिया जाता है कि जिस तरह फिलिस्तीन के लिए इजरायल खतरा है उसी तरह हमास, ईरान और हिजबुल्लाह का त्रिकोण इजरायल के लिए खतरा है। 

दरअसल इजरायल-फिलिस्तीन विवाद के संदर्भ में तात्कालिक रूप से हमास की भूमिका को उसके कट्टरपंथी इतिहास के बावजूद ठीक वैसे नहीं देखा जा सकता जैसे अलकायदा या किसी और मुस्लिम चरमपंथी संगठन को। इस तथ्य की अनदेखी करना मुश्किल है कि फिलिस्तीन में इजरायल की बर्बर कार्रवाई और उसका प्रतिरोध तब भी मौजूद था जब हमास जैसे संगठन अस्तित्व में ही नहीं थे। हमास और उसके ईरान और हिजबुल्लाह के त्रिकोणीय संबंधों और उसकी पक्षधरता बहस का विषय हो सकती हैलेकिन इजरायल मूल रूप से फिलिस्तीन की आजादी का दुश्मन है और 1967 में अरब-इजरायल युद्ध के बाद से लेकर आज तक उसने फिलिस्तीन के अस्तित्व को नकारने की कोशिश की है।  फिलिस्तीन की जनता इजरायल के बर्बर हमलों का निशाना हमास और उसकी गतिविधियों की वजह से नहीं, बल्कि इस वजह से बनती है क्योंकि गाजा पट्टी और पश्चिमी किनारे पर आक्रमण कर उसे अपने अधिकार क्षेत्र में लेना लंबे समय से इजरायल के  व्यापक साम्राज्यवादी एजेंडे का हिस्सा रहा है और इसके लिए उसे खुले तौर अमेरिका और पश्चिमी यूरोपीय राष्ट्रों का समर्थन हासिल रहा है। इसलिए इस पूरे मामले को सीधे तौर पर इजरायल बनाम हमास के संघर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मुख्य मुद्दा फिलिस्तीन की आजादी है और अगर हमास के स्थान पर कोई और संगठन भी नेतृत्वकारी भूमिका में होता तो भी इजरायल फिलिस्तीन के प्रति ऐसा ही बर्बर रुख अपनाता।

निश्चित तौर पर इजरायल ने जिस अंदाज में गाजा पट्टी में नागरिक आबादी को अपना निशाना बनाया उसे इजरायल की आत्मरक्षा के अधिकार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अमेरिका का नेतृत्व इसी तरह के तर्क देकर इजरायल के हमले को वैधता देने की कोशिश करता है। पिछले कुछ दिनों के भीतर मिस्र, ट्यूनीशिया और अरब लीग ने हमास के पक्ष में सार्वजनिक मंचों पर समर्थन व्यक्त किया है। इसे अरब वसंत के बाद के दौर में हमास के लिए क्षेत्रीय समर्थन बढ़ने के रूप में देखा जा रहा है। खासकर से सीरिया के मुद्दे पर पश्चिमी देशों के रुख का समर्थन करने वाली अरब लीग का हमास को समर्थन एक विसंगति लगता है। गौर करने वाली बात है कि अरब वसंत के दौर में अरब देशों के जनता के बीच राष्ट्रप्रेम की भावना का लगतार क्षय हुआ है। इसलिए अरब लीग और अरब वसंत के चलते सत्ता परिवर्तन देख चुके देश अब मध्य-पूर्व में सत्ता धुरी नहीं रह गए हैं। इस पूरे विकास क्रम का परिणाम है कि मध्य-पूर्व में सत्ता की धुरी अब खिसककर खाड़ी देशों के पास चली गयी है और इस क्षेत्र में अब खाड़ी देश नेतृत्वकारी भूमिका में आ गये हैं। इसलिए अरब वसंत के बाद के दौर में सत्ता में आयी मुस्लिम ब्रदरहुड के नेतृत्व वाली सरकारें हमास का साथ देने का वायदा कर रही होंलेकिन उनमें इजरायल के हमले का क्रांतिकारी प्रतिरोध करने की ताकत नहीं बची है। 

यह सच है कि इजरायल और हमास के बीच चल रहें संघर्ष में हमास के साथ यह एकता दिखाये बिना युद्ध विराम संभव नहीं था, लेकिन इस एकता प्रदर्शन के पीछे मिस्र, ट्यूनीशिया बहुत से अरब राष्ट्रों के रणनीतिक मजबूरियां अधिक और फिलीस्तीनी नागरिकों के शोषण और उनकी आजादी की चिंता कम थी । उदाहरण के तौर पर मिस्र हमास का समर्थन करने के बावजूद अमेरिका से हर साल 1.3 अरब की सैन्य सहायता हासिल करता है। युद्ध विराम समझौते के संदर्भ में यह बात सामने आ रही है कि अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ही इजरायली नेतृत्व पर मिस्र द्वारा तैयार किये गये समझौते पर सकारात्मक जवाब देने का दबाव बनाया। ओबामा के इस कदम का अर्थ हडबडाहट में यह नहीं लगाया जाना चाहिए की वह विचारधारात्मक तौर पर फिलिस्तीन को मान्यता देना स्वीकार कर चुके हैं या फिलिस्तीन-इजरायल समस्या पर उनका नजरिया बदल गया है। ओबामा प्रशासन द्वारा इजरायली नेतृत्व पर मिस्र द्वारा सुझाए गए युद्ध विराम के समझौते को मान लेने के लिए दबाव बनाने का कदम रणनीतिक मजबूरी और रणनीतिक अंतर्विरोधों की वजह से अधिक लिया गया है।। खाड़ी देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे  हैं और अरब लीग से भी उसके हित बहुत करीब से नत्थी हैं। अरब देश यह भी जानते हैं कि अमेरिका वर्तमान में उनके लिए तेल का मुख्य ग्राहक नहीं है क्योंकि अब अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार धीरे-धीरे एशिया क्षेत्र में विस्थापित हो रहा है। 

अभिनव पत्रकार हैं. पत्रकारिता की शिक्षा आईआईएमसी से. 
राजस्थान पत्रिका (जयपुर) में कुछ समय काम. अभी स्वतंत्र लेखन. 
इन्टरनेट में इनका पता  abhinavas30@gmail.com है.