ओबामा का अमेरिका


सत्येंद्र रंजन


"...क्या इसे इस बात की पुष्टि माना जाए कि सचमुच मुकाबला दो दृष्टिकोणों में था? क्या इसी वजह से ओबामा के समर्थकों ने राष्ट्रपति के रूप में उनके रिकॉर्ड पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया? सवाल है कि आखिर वो नजरिया क्या है, जिसका प्रतिनिधि होने का दावा ओबामा ने किया? और क्या ओबामा उस नजरिए के विश्वसनीय प्रतिनिधि हैं या नहीं, लोगों ने इस प्रश्न पर बिना ज्यादा माथापच्ची किए, उनके नजरिए को विजयी बनाने को अपनी प्राथमिकता बना ली?..."



राष्ट्रपति के रूप में दूसरे कार्यकाल के लिए जनादेश पाने के बाद बराक ओबामा ने अपने विजय उद्बोधन में अपने सपनों के अमेरिका को दुनिया के सामने रखा। इसके पहले चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने बार-बार कहा कि मुकाबला दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि अमेरिका के बारे में दो नजरियों के बीच है। इन भाषणों में जो दृष्टि उभरी, उसमें कितना सारतत्व है, इस पर बहस की गुंजाइश है। दरअसल, उच्च कोटि के वक्ता ओबामा पर यह इल्जाम गहरा है कि उनके भाषणों में शब्दजाल अधिक, और ठोस तत्व कम होते हैं। उनके पहले कार्यकाल में ऐसी धारणा रखने वाले लोगों की संख्या बढ़ती ही गई। उन चार वर्षों में उनसे निराश होने की अनेक वजहें थीं- खासकर उन लोगों के लिए जो प्रगतिशील रुझान रखते हैं। इसीलिए इस बार ह्वाइट हाउस तक ओबामा की राह कठिन मानी गई थी। आशंका थी कि पिछली बार उनके ओजस्वी भाषणों और एक अफ्रीकन-अमेरिकी के देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचने की संभावना से उत्साहित तबकों- खासकर नौजवानों- ने उन्हें जिताने का जो जोश दिखाया था, इस बार शायद ऐसा करने की प्रेरणा उनमें ना हो। असल में ऑक्यूपाई वॉलस्ट्रीट आंदोलन के कारणों में ओबामा से नौजवानों की निराशा को भी गिना गया था। ऐसा लोगों की संख्या कम नहीं थी, जो मानते थे कि इस बार डेमोक्रेटिक पार्टी के परंपरागत मतदाता मतदान केंद्रों तक पहुंचने का उत्साह नहीं दिखाएंगे और इसकी कीमत ओबामा को चुकानी पड़ सकती है।


लेकिन चुनाव नतीजों से जाहिर है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। बल्कि डेमोक्रेटिक पार्टी के परंपरागत समर्थक तबकों ने ओबामा को जिताने का पूरा संकल्प दिखाया। नौजवानों में ओबामा के लिए समर्थन बाकी उम्र वर्ग के लोगों से बहुत ज्यादा रहा। परिणाम है कि ओबामा एक और कार्यकाल के लिए ह्वाइट हाउस पहुंच गए हैं। क्या इसे इस बात की पुष्टि माना जाए कि सचमुच मुकाबला दो दृष्टिकोणों में था? क्या इसी वजह से ओबामा के समर्थकों ने राष्ट्रपति के रूप में उनके रिकॉर्ड पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया? सवाल है कि आखिर वो नजरिया क्या है, जिसका प्रतिनिधि होने का दावा ओबामा ने किया? और क्या ओबामा उस नजरिए के विश्वसनीय प्रतिनिधि हैं या नहीं, लोगों ने इस प्रश्न पर बिना ज्यादा माथापच्ची किए, उनके नजरिए को विजयी बनाने को अपनी प्राथमिकता बना ली?
    
हर राजनीतिक पार्टी एक खास नजरिए के साथ चुनाव में उतरती है, लेकिन किसी खास संदर्भ या परिस्थिति में उसके दृष्टिकोण से जु़ड़े पक्ष ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। अमेरिका खासकर 2008 में शुरू हुए आर्थिक संकट के समय से, लेकिन आम तौर पर सन् 2000 में जॉर्ज बुश जूनियर के सत्ता में आने के बाद से ही जिन हालात में रहा है, उसमें वहां की दोनों प्रमुख पार्टियों के दृष्टिकोणों का फर्क बेहद अहम हो गया है। असल में आर्थिक संकट बुश प्रशासन में अपनाई गई नीतियों का ही परिणाम था। यह हैरतअंगेज है कि इस बार रिपब्लिकन उम्मीदवार मिट रोमनी ने आर्थिक संकट दूर ना होने को मुद्दा बनाने की कोशिश की। यह कुछ ऐसा ही कहने जैसा था कि हमारी पार्टी ने जो गंदगी फैलाई, ओबामा उसकी पूरी सफाई करने में विफल रहे, इसलिए हमें फिर से सत्ता सौंप दीजिएऐसा नहीं था कि रोमनी पुरानी गलतियों से सीख लेने और आगे कुछ नया करने का वादा कर रहे थे। बल्कि उन्होंने राष्ट्रपति बनने पर सरकार की भूमिका घटाने और बड़ी कंपनियों एवं धनी लोगों के टैक्स में कटौती तथा ओबामा के बनाए स्वास्थ्य बीमा के कानून (जिसे ओबामाकेयर नाम से जाना गया है) को रद्द करने जैसी घोषणाएं करते हुए चुनाव लड़ा। सामाजिक मामलों में गर्भपात पर रोक और विदेश नीति संबंधी मामलों में बुश जमाने जैसी आक्रामकता वापस लाने का इरादा उन्होंने दिखाया। यानी संकेत दिए कि उनके नेतृत्व में रिपब्लिकन पार्टी अधिक दक्षिणपंथी और रूढ़िवादी रुख अपनाएगी। इससे उनके प्रशासन के तहत जैसे देश की कल्पना उभरी, उसने स्वतः ही चुनाव को एक वैचारिक संग्राम का रूप दे दिया।

रोनाल्ड रेगन के जमाने में अमेरिका में नव-उदारवाद का जो वर्चस्व स्थापित हुआ, ओबामा ने उसे तोड़ने की कोशिश की है, ऐसा शायद ही कहा जा सकता है। इसके बावजूद यह हकीकत है कि डेमोक्रेटिक प्रशासन के तहत आज भी सरकार की महत्त्वपूर्ण भूमिका, सामाजिक-सांस्कृतिक मामलों में प्रगतिशील नजरिया और विदेश नीति में अपेक्षाकृत संतुलित एवं संयमित रुख देखने को मिलता है। संभवतः इसकी वजह रिपब्लिकन पार्टी के बरक्स अपनी अलग राजनीतिक वैधता एवं पहचान कायम रखने की उसकी जरूरत भी रहती होगी। मगर इसी कारण शासन के तौर-तरीकों में एक फर्क नजर आता है। जिस वक्त अमेरिका बैंकों, वित्तीय संस्थानों और कॉरपोरेट जगत के बेलगाम व्यवहार के कारण गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा हो और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में खतरे के मनोगत अनुमान के आधार पर एकतरफा ढंग से हमला कर देने की बुश प्रशासन की विदेश नीति की भारी कीमत चुका रहा हो, वैसे मौके पर वो मामूली फर्क भी अति-महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

यह कहना शायद अतिशयोक्ति हो कि महा-मंदी के दौरान राष्ट्रपति रहे फ्रैंकलिन डिलेनो रुजवेल्ट की तरह ओबामा अमेरिका को जॉन मेनार्ड कीन्स के आर्थिक विचारों की तरफ ले गए हैं या न्यू डील जैसे किसी साहसी राजनीतिक कार्यक्रम को अपनाने की क्षमता दिखाई है। इसके बावजूद यह तथ्य है कि उनके प्रशासन ने प्रोत्साहन पैकेज के जरिए अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप किया और ओबामाकेयर जैसे कदमों से सामाजिक कल्याण में सरकार की भूमिका बहाल करने की कोशिश की। ऐसे कदमों से मंदी से एक हद तक अमेरिका को उबारने में मदद मिली। भविष्य में उन्होंने टैक्स बढ़ाने और जन कल्याण के कार्यों को जारी रखने का संकल्प जताया है। यह सोच अनियंत्रित उदारवाद की उन नीतियों एवं कार्यक्रम का प्रतिवाद है, जिसकी वकालत रिपब्लिकन पार्टी करती है।     

ओबामा की यह वाजिब आलोचना हो सकती है कि जिन कार कंपनियों और बैंकों को करदाताओं के धन से सहायता देकर उन्होंने संभाला, उनके प्रबंधन में सरकार की भूमिका बनाने के बने-बनाए अवसर को उन्होंने गंवा दिया। इसी तरह 2010 के मध्यावधि चुनाव के बाद विधायिका में बहुमत ना होने की मजबूरी बताते हुए अति धनी लोगों को टैक्स छूट जारी रखने के मुद्दे पर बिना संघर्ष किए रिपब्लिकन पार्टी से समझौता कर लिया। यानी भले विचारों में वे सरकार की बड़ी भूमिका का पक्ष लेते रहे, लेकिन असल में उन्होंने नव-उदारवाद के मकसदों के मुताबिक ही अपना प्रशासन चलाया। बल्कि विदेशी मामलों में ईरान और रूस से संबंधों के सुधार की जो उम्मीदें उन्होंने जगाईं, उस पर अंततः उन्होंने निराश ही किया। इसी तरह गुआंतोनामो-बे की जेल बंद करने जैसे वादे तोड़ कर और विकीलिक्स के खिलाफ सख्त रुख अपनाकर मलभूत मानवाधिकारों के प्रति अपनी निष्ठा उन्होंने संदिग्ध की।

लेकिन अभी लोकतंत्र के विकासक्रम के जिस मुकाम पर दुनिया है, उसमें कहीं लोगों को पास स्वच्छ और ऊंचे आदर्शों से प्रेरित विकल्प नहीं होते। लोगों के सामने चुनौती उपलब्ध विकल्पों में अपने लिए बेहतर प्रतिनिधि चुनने की होती है। चुनाव करते वक्त उम्मीदवार या पार्टी का नजरिया एक अहम पहलू हो जाता है। खास परिस्थितियों में यह सबसे अहम पहलू भी हो जाता है। अमेरिका आज जिन हालात में है, उनमें रोमनी और ओबामा निश्चित रूप से दो अलग-अलग नजरियों की नुमाइंदे नजर आए। ओबामा ने सर्व-समावेशी, सबसे न्याय, सबके लिए समान अवसर और सबके लिए समान जगह वाले अमेरिका का सपना सामने रखा। महिलाओं, अश्वेत, अल्पसंख्यक, समलैंगिक, आव्रजक आदि समूहों का इस सपने में हित निहित है। इसलिए उनमें से अधिकांश लोगों ने ओबामा को वोट दिए। और अन्य लोग, जो ऐसे उदार एवं प्रगतिशील उसूलों में यकीन करते हैं या ऐसे विचारों से प्रेरित होते हैं, उन्होंने भी ओबामा को फिर से अपनाया, क्योंकि उनके सामने जो विकल्प था- वो ऐसे विचारों को चुनौती दे रहा था। 

सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.