क्या छठ की दर्दनाक घटना को भूल गए आप...


सरोज कुमार

"...माना तो ये भी जा रहा है कि ठीक उसी दौरान सुशासन बाबू को गांधी घाट पर एक छठ के कार्यक्रम में जाना था। अब इसी रास्ते से इन्हें गुजरना था तो भला सिक्योरिटी का ध्यान और कहां रहता। सारा का सारा प्रशासनिक महकमा सुशासन बाबू की आगवानी में भाग खड़ा हुआ। नतीजा ये रहा कि अदालत घाट की ओर निष्क्रियता ही नहीं रही बल्कि इस ओर की आवाजाही भी प्रभावित हो गई। लोगों को जाम कर दिया गया और लोग संकरी गली में फंस कर मारे गए। जी हां इस आधार पर मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री सहित कई उच्च अधिकारियों पर न्यायालय में एक मामला भी दर्ज हुआ।..."


पांच दिन पहले पटना के 'अदालत घाट' पर मरे हुए कम से कम 19 लोगों को आप भूल गए होंगे। ऐसी घटनाएं होती रहती हैं जो महज हादसा होतें है, क्या किया जा सकता है। जी हां बिहार के मुख्यमंत्री उर्फ सुशासन बाबू भी यही कह रहे हैं कि यह एक हादसा था जो कभी भी कहीं भी हो सकता है। तो ईश्वर का प्रकोप या भीड़ का कॉमन सेंस ना होना बता या भीड़ अनियंत्रित हो ही जाती है कभी-कभी, ये कहकर इसे भूल जाना चाहिए। अमूमन ऐसी घटनाएं दुर्घटनाएं घोषित हो ही जाती हैं और साथ ही सबसे आसान होता है अफवाहों को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा देना।

जी हां तो इस छठ में अदालत घाट में मारे गए 19 लोगों को हमें भूल जाना चाहिए। कल फिर कहीं भी कभी भी ऐसे हादसे हो ही जाएंगे। कमबख्त भीड़ का किया भी क्या जा सकता है। ऐसी घटनाएं फिर होंगी और हम फिर इन्हें भूल जाएंगे जब तक कि कोई और ऐसे हादसे न हो जाएं। हमें भूल जाना चाहिए कि अदालत घाट पर हजारों लोगों की सुरक्षा के लिए केवल सात सरकारी बाबू तैनात थे। एक दंडाधिकारी, एक पुलिस अधिकारी और पांच लाठीधारी सिपाही। हमें ये भी भूल जाना चाहिए कि जब घायल मासूम बच्चों को लेकर लोग मात्र पांच मिनट की दूरी पर स्थित बिहार के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल पीएमसीएच में दौड़ पड़े थे तो वहां के सारे डॉक्टर नदारद थे। हमें भूल जाना चाहिए कि कुछ बच्चों के शव को शवगृह में बंद कर गार्ड फरार हो गया था। हमें भूल जाना चाहिए कि जिनकी सांस चल रही थी उन्हें भी मृत घोषित कर दिया जा रहा था। और हमें ये भी भूल जाना चाहिए कि जिस चचरी के पुल के धंसने की बात सामने आई है वह सैंकड़ों लोगों को एक साथ आने-जाने के लिए कमजोर थी। हमें भूल जाना चाहिए कि प्रशासिनक अधिकारियों को पहले से बांस के बने चचरी पूलों के कमजोर होने का अहसास था और इनके निरीक्षण के आदेश भी दिए गए थे फिर भी चचरी के पुलों को यों ही छोड़ दिया गया। हमें ये भी भूल जाना चाहिए कि कई दिनों से राज्य के उपमुख्यमंत्री से लेकर विधायक, बड़े से लेकर छोटे स्तर के प्रशासनिक अधिकारियों की मीडिया में बयान और तस्वीरें आ रही थी घाटों के निरीक्षण की कि सब दुरुस्त है और किसी भी अधिकारी का ध्यान ना तो पुलों पर गया ना ही संकरी गलियों पर जिससे की हजारों लोगों को लगातार आना-जाना था। तो हमें एक हादसा समझ कर भूल जाना चाहिए इन सारी चीजों को। भूल जाइए। वैसे भी एक दिन बाद ही कसाब की फांसी की खबर ने तो सत्ता से लेकर मीडिया तक को मौका दिया ही कि आप भूल जाएं छठ की घटना। 

तथाकथित राष्ट्रवादी लोग जो ठाकरे के मरने का मातम मना रहे थे और छठ की घटना पर शोक में थे, कसाब की फांसी पर जश्न मनाने ही लगे। तो आप कसाब-कसाब खेलते रहिए। इधर सुशासन बाबू भी सब भूल कर अपने शासन(?) की उपलब्धियां गिनाने लगे हैं। बिक चुके अखबार अपने पन्ने सुशासन बाबू के इंटरव्यू से भर रहे हैं कि देखिए क्या-क्या महान काम कर के बैठे हैं नीतीश कुमार। दलाल पत्रकार गला चीख-चीख कर विकास-विकास चिल्ला रहे हैं और आप भी सब भूल कर देखिए विकास में बिहार उड़ा जा रहा है। विकास बाबू फारबिसगंज भूल गए हैं, इंसेफेलाइटिस से मरते बच्चे भूल गए हैं, महिलाओं के धोखे से गर्भाशय निकाला जाना उन्हें बड़ी घटना क्यों लगेगी। लड़कियों के साथ रोजना हो रही हिंसा और बालात्कार से उपर उठ गए हैं। दलितों-आदिवासियों के मारे जाने, उनकी बेटियों को तेजाब से जलाया जाना उन्हें देखने की फुर्सत है क्या। उन्हें तो बस विकास चाहिए वे भला ये क्यों याद रखें। रिपोर्ट कार्ड जारी हो रहा है। तो आप भी भूल जाइए छठ हादसा जैसी घटनाएं। खैर भूलने से पहले मैं आपके भूलने में खलल डालना चाहता हूं।

अफवाहें हैं अफवाहों का क्या

सरकार और प्रशासन छठ की घटना के लिए अफवाहों को जिम्मेदार बता रही है। इनका कहना है कि बिजली के करंट दौड़ने की अफवाह इसके लिए ही जिम्मेदार है। न यह अफवाह फैलता न भगदड़ मचती न लोग बदहवास होते न कोई संकरी गली में दम घुटने से मरता। अफवाह होते ही एक फोन कॉल स्थानीय बिजली सब स्टेशन में गया करंट दौड़ने का जिसके बाद तुरंत वहां की बिजली काटी गई और अंधेरे के कारण इतना बड़ा हादसा हो गया। जिस पीपा पुल की बात बार-बार आ रही है उस पर बिजली विभाग का कोई कनेक्शन है ही नहीं, ना ही चचरी के पुल की ओर है। तो बिजली कटने का असर केवल गली में होना चाहिए। जबकि करंट फैलने की अफवाह पीपा पुल की कही जा रही है। ठीक माना भी जाए कि बिजली चली जाने से अंधेरा कायम हुआ तो इसका असर केवल गली में होगा। खैर एक बात और कि घाट और पीपा पुल, चचरी के पुल से लेकर बालू की ओर जनरेटर सप्लाई से बिजली दी गई थी। तो फिर केवल बिजली विभाग की लाइट जाने का मामला नहीं बनता। अफवाह ये भी फैलाई गई कि पीपा पुल पर ही किसी महिला से छेड़खानी होने पर भगदड़ मची। कोई महिला पुल से नीचे गिरी और उसे बचाने में कोई युवक जेनरेटर के तारों के बीट फंस गया, इसी के बाद करंट फैलने की अफवाह मची। चचरी पुल के धंसने को भी सरकार साइड में कर रही है लेकिन ये सबको मालूम है कि चचरी का पुल धंसा जरुर था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार चचरी का पुल धंसने के बाद ही भगदड़ मची थी।

खैर अगर सरकार अफवाहों को ही जिम्मेदार मान रही है तो कुछ बातें और भी लोगों के बीच मौजूद हैं क्या इनकी ओर ध्यान डाला जाना चाहिए। ये केवल अफवाह हैं या और कुछ भी। वैसे इन्हें अफवाह ना कह कर लोगों की प्रत्यक्षानुभूति भी कहा जा सकता है। माना तो ये भी जा रहा है कि ठीक उसी दौरान सुशासन बाबू को गांधी घाट पर एक छठ के कार्यक्रम में जाना था। अब इसी रास्ते से इन्हें गुजरना था तो भला सिक्योरिटी का ध्यान और कहां रहता। सारा का सारा प्रशासनिक महकमा सुशासन बाबू की आगवानी में भाग खड़ा हुआ। नतीजा ये रहा कि अदालत घाट की ओर निष्क्रियता ही नहीं रही बल्कि इस ओर की आवाजाही भी प्रभावित हो गई। लोगों को जाम कर दिया गया और लोग संकरी गली में फंस कर मारे गए। जी हां इस आधार पर मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री सहित कई उच्च अधिकारियों पर न्यायालय में एक मामला भी दर्ज हुआ। अब जब अफवाहों पर बात सरकार कर ही रही है तो फिर इस बात को भी जरुर ध्यान में लिया जाना चाहिए। है कि नहीं। भले ही न्यायलय मामला रिजेक्ट कर दे, इससे इंकार करने का भी तर्क होना चाहिए जब आप अफवाहों को जिम्मेदार ठहरा रहे ही हैं।

दूसरी बात ये कही जा रही है कि अदालत घाट पर ही हादसे के कुछ ही घंटे पहले वहां व्यवस्था (बैनर वगैरह को लेकर) पर धौंस जमाने के लिए जदयू मंत्री श्याम रजक और भाजपा विधायक नीतीन नवीन के बीच झगड़ा भी हुआ था। वहां भाजपा विधायक अरुण कुमार सिन्हा और भाजपा समर्थक पूर्व महापौर संजय कुमार भी मौजूद थे। संजय कुमार से भी बहस हुई थी। यहां तक कि दोनों ओर के कार्यकर्ताओं के बीच हाथापाई की बात भी कही जा रही है। अब क्या इन चीजों पर भी जांच होनी चाहिए। वैसे भाजपा विधायकों पर सुशासन बाबू के कृपापात्र पत्रकारों ने सवाल जरुर उठाया है कि ये स्थानीय विधायक घटना के समय अपने इलाके के अदालत घाट से क्यों गायब रहे। अब जदयू के श्याम रजक पर सवाल क्यों नहीं होना चाहिए जबकि यह सर्वविदित है कि अदालत घाट और इस इलाके के आयोजनों का काम श्याम रजक के समर्थक ही करते हैं। यह इलाका श्याम रजक का ही माना जाता है। जब आयोजन का जिम्मा इनके समर्थक ही देखते हैं तो फिर जांच या उत्तरदायित्व के घेरे में इन्हें क्यों ना रखा जाए। और रही बात जनता के बीच तैर रही और बातों का तो कहा ये जा रहा है कि श्याम रजक समर्थक इलाके के लोग (समर्थक) ही पीएमसीएच में पीड़ितों के हंगामा में शामिल हो उन्हें तितर-बितर करने में प्रशासन का सहयोग करते रहे। और ये ही लोग अदालत घाट पर महिलाओं से छेड़खानी में भी व्यस्त रहे थे। तो फिर अफवाहें हैं अफवाहों का क्या।


और क्या-क्या नहीं भूला जा सकता...क्या-क्या अफवाह नहीं....

यह जरुर हो सकता है कि कुछ मिनट के लिए गली की ओर बिजली गई हो। लेकिन क्या सबकुछ का ठिकरा केवल इसी पर फोड़ा जाना चाहिए। यह पूरी तरह सर्वविदित है कि छठ जैसे पर्व पर बिहार की जनता की आस्था उफान मारती रहती है। भीड़ की क्या कहिए हजारों लोग अपने बच्चों सहित घाटों पर जाते हैं। अदालत घाट पर तो पटना के बड़े इलाके के लोग आते हैं। हजारों की भीड़ का आना-जाना होता है। ऐसे में केवल सात सुरक्षाकर्मियों के जिम्मे हजारों लोगों की भीड़ को कंट्रोल करना या व्यवस्था बनाने के लिए छोड़ना किस सोच के तहत किया गया था। बांस के बने अस्थायी चचरी के पुलों को अधिकारी पहले ही खतरनाक मान कर चल रहे थे, इस बाबत डीएम ने इनके निरीक्षण का लिखित आदेश भी दिया था। फिर इन चचरी के पुलों की ओर किसी का ध्यान क्यों नहीं गया। क्या किसी भी स्तर के प्रशासनिक अधिकारी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि हजारों लोगों का आना-जाना बांस का बना पुल कैसे झेलेगा या कितना झेलेगा।

चचरी के पुल के धंसते ही भीड़ घबरा गई और भगदड़ मच गया। इससे बचने के चक्कर में सारी भीड़ पीपा पुल की ओर दौड़ पड़ी। बहरहाल पीपा पुल की ओर भगदड़ का केंद्र हो गया। इससे होकर बाहर निकलने वाला रास्ता बिलकुल ही संकरी लगी थी जहां बदहवासी में लोग फंसे जा रहे थे। एक तो घाट की ओर से लोग बाहर निकलने वाले लोग थे तो दूसरी ओर बाहर की ओर से घाट आ रहे लोग। आलम ये हुआ कि सैंकड़ों लोग गली में ही अपने बच्चों के साथ फंस गए। इसी बीच अगर करंट की अफवाह और बिजली गई तो हाल और भी भीषण हो गया। तिस पर वहीं स्थित मंदिर का दरवाजा भी बंद कर लिया गया जिससे लोग गली में और पुल की ओर ही फंस कर रह गए। वो तो भला हो स्थानीय मकान वालों के जिन्होंने बच्चों को अपने दरवाजे-खिड़कियों से खिंच कर बचाने की कोशिश की। साथी पीएमसीएच का एक छोटा-सा दरवाजा खोल दिया जिससे कि कई कुछ रास्ता मिला वरना कई और जानें जा सकती थी। केवल एक बात समझ में नहीं आती कि घाट की ओर पीपा पुल और चचरी के पुल के पार गंगा की ओर बहुत बड़ा खाली बालू का क्षेत्र था फिर भी लोग उस ओर न जाने कर संकरी गली की ओर ही क्यों भागे जा रहे थे। संभवत: इसका कारण ये रहा हो कि घाट से तो लोग बदहवासी में अपनी जान पर आफत समझ घबराए हुए बाहर निकलने भागे जा रहे थे वहीं दूसरी ओर बाहर से आ रहे लोग अंदर क्या हुआ से अनजान आए जा रहे थे।

खैर इतना तो साफ था कि इस दौरना प्रशासन मौजूद ही नहीं रही। डीएम ने घाटों की लगातार पेट्रोलिंग का निर्देश दिया था लेकिन इस ओर कोई नहीं था। ये आदेश महज कागजी रहे। दूसरी की संकरी गली की ओर कोई व्यवस्था थी ही नहीं कि हजारों लोग सही से गुजर सकें। प्रशासनिक लापरवाही का आलम ये था कि घटना की सूचना मिलने के एक घंटे बाद तक कोई भी वरीय अधिकारी घटना स्थल पर नहीं पहुंचा। शायद ये अपनी पूरी फोर्स के साथ महानुभाव सीएम साहब सहित मंत्रियों और वरीय अधिकारियों की पत्नियों का छठ करवाने में व्यस्त थे।

इस तरह के हादसों से बचने या नुकसान कम होने के लिए जरुरी होता है कि हमारे पास सही रेस्कयू की व्यवस्था हो या प्रशासन चुस्त रहे। लेकिन यह पूरी तरह से निष्क्रिय था। प्रशासनिक लापरवाही का सबसे बड़ा उदाहरण तो बिहार का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल पीएमसीएच रहा। हादसे के तुरंत बाद लोग बच्चों को गोद में उठाए केवल पांच मिनट की पैदल दूरी पर स्थित पीएमसीएच दौड़ पड़े थे लेकिन निषक्रियता का आलम ये था कि अधीक्षक, वरीय डॉक्टरों के साथ-साथ जूनियर डॉक्टर और कर्मचारी भी नदारद थे। सारे अस्पताल कर्मचारी गायब थे। एक-दो जुनियर डॉक्टर और कर्मचारी थे भी तो डर के मारे थोड़ी ही देर में चुपके से निकल गए। महिलाओं और बच्चों की लाशें फर्श पर लिटा दी गई थी। एक- दो डॉक्टर जो थे उन्होंने सांस चल रहे जीवितों को भी मृत घोषित कर दिया गया। मानती देवी नामक एक महिला की सांस चल रही थी फिर भी उसे मरा कह दिया गया, लेकिन उनकी बहन के हंगामा करने पर दुबारा उसे पंप किया गया और थोड़ी देर में उसकी मृत्यु हो गई। इसी तरह दो बच्चों के शव शवगृह में ताला बंद कर गार्ड भाग गया। परिजनों के हंगामा करने और शीशा तोड़ने का बाद शव दिखलाया गया। इस तरह से लापरवाही पर लापरवाही बरता गया। लाशें छिपाने की कोशिश भी होती रही। इतने देर में डीजीपी अभयानंद. सिटी एसपी वगैरह वरीय अधिकारी आ गए और हंगामा को दबाने के लिए शवों और घायलों को शहर के दूसरे असपतालों में भेजने लगे। पुलिस ने लाठियां चटकाईं और पीएमसीएच के साथ आसपास हंगामा कर रहे परिजनों और लोगों तो तितर-बितर कर दिया।
  

अब शुरु हुआ राजनीतिक खेल...

पहले दिन से ही सुशासन बाबू से लेकर के सरकार के बड़े-बड़े नेता, प्रवक्ता ये कहते रहे कि यह हादसा अफवाह का नतीजा है और विपक्ष इसपर शर्मनाक तरीके से हाय-तौबा मचा रहा है। सरकारी दलाल पत्रकार भी मधुबनी की घटना की तरह इसे भी अफवाह से जोड़ते रहे और छापते रहे कि एक बार फिर अफवाह जीत गई। अब इतनी बड़ी घटना पर विपक्ष सरकार पर उंगली भी न उठाए तो क्या आरती उतारे। शर्मनाक तरीके से तो सरकार औऱ प्रशासन बर्ताव करते रहे।

पहले ही दिन से सरकार की चाल यहीं रही कि मधुबनी की घटना की तर्ज पर अफवाह को जिम्मेदार ठहरा प्रशासनिक योजनाओं की नाकामी को छिपाया जा सके। इसी लिए सबकुछ अफवाह पर ही फोकस किया गया। क्या लापरवाही बरतने को लेकर किसी भी अधिकारी या पीएमसीएच के वरीय पदाधिकारी पर तत्कला कोई कार्यवाई हुई। दरसल सबकुछ सारी नाकामियां और बदइंतजामी को हवा में उड़ाने के लिए गृह विभाग का सचिव के नेतृत्व में जांच टीम बैठा दी गई जो इसकी जांच कर रही है। जांच में जो कुछ सामने आएगा उसके आधार पर कार्यवाई की बात कही जा रही है। लेकिन इस पूरी जांच का मकसद ही है प्रशासनिक लापरवाही को कम फोकस करते हुए अफवाहों को जिम्मेदार ठहरा देना। जांच के नाम पर कुछ प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ितों से बातचीत की बात सामने आ रही है। वहीं पहले दिन ही अदालत घाट के स्थानीय लोगों ने कहा कि उन्हें कुछ बता भी नहीं कि ऐसा कुछ हो रहा है।

वहीं छठ के पहले डीएम-एसपी ने घाटों की वीडियो रिकॉर्डिंग करने का लिखित आदेश जारी किया था। अब सवाल उठता है कि अदालत घाट की वीडियों रिकॉर्डिंग की गई थी या महज यह कागजी आदेश बना दिया गया था। अगर रिकॉर्डिंग हुई तो जांच की दिशा में इसकी बात क्यों नहीं की जा रही है क्योंकि इससे तो पता चल ही जाएगा कि कैसे-कैसे क्या हुआ था। या फिर रिकॉर्डिंग किया ही नहीं गया तो फिर संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

कोशिश बस यहीं हैं कि प्रशासनिक लापरवाहियों निष्क्रियता को छिपाते हुए उच्च अधिकारियों को बचाते हुए सरकार की किरकिरी होने से बचाया जा सके। अगर अधिकारियों पर कार्रवाई होती भी है तो क्या इन चीजों से नहीं पता चलता कि सरकार ने बिहार के सबसे बड़े पर्व की कोई तैयारी न की थी और ना ही लोगों की सुरक्षा के लिए कोई योजना बनाया था। और अगर कुछ तैयारियां थी भी तो विकास की तरह केवल कागजी।

इधर एक दिन बाद ही कसाब की फांसी ने मीडिया के द्वारा जनता का ध्यान भटकाने में थोड़ी सहायता कर ही दी। अब सरकार ने अपने कार्यकाल की उपलब्यधियां गिनाना शुरु कर दिया है। अखबारों के पन्ने रंगे जा रहे हैं। जनता को सबकुछ भूला कर विकास-विकास चिल्लाने कहा जा रहा है। सरकरा चाहती है जनता सबकुछ भूल जाए। यह यों ही नहीं है कि सरकार ने अब रिपोर्ट कार्ड जारी करना शुरु कर दिया है। पिछले महीनों से सरकार की जो किरकिरी हो रही थी जरुरी था कि तथाकथित सुशासन की बातें दुहराई जाए। अखबरों में सुशासन बाबू के इंटरव्यू लिखते दलाल पत्रकारों को लॉ एंड आर्डर की सबसे बड़ी समस्या खगड़िया की घटना लग रही है जब सुशासन बाबू को जनता के गुस्से का शिकार होना पड़ा था। उन्हें मधुबनी की घटना लगी थी जब प्रशासनिक विरोध में बेशक अफवाह के साथ ही आगजनी हुई थी। इन दलालों और सुशासन बाबू को लॉ एंड ऑर्डर की समस्या ना तो रोज दलितों, महिलाओं, आदिवासियों का मारा जाना लग रहा है ना ही राजधानी में रोज होती हत्याएं। इनको प्रशासनिक लापरवाही से छठ जैसे बड़े हादसे भी समस्या नहीं लग रहे। ना ही फारबिसगंज जैसे दमनात्मक कांड। डैमेज कंट्रोल के तहत ही सुशासन की उपलब्धियों के साथ ही कागजी रिपोर्ट कार्ड अखबारों में जारी किया जा रहा है। नीतीश और सरकार की छवि को जो नुकसान हुआ है, उसे बचाने की कोशिश है यह।

बहरहाल सुशासन की सरकार चाहती है कि आप भूल जाएं सब और केवल तथाकथित विकास में डूबे रहें। आप विकास को अखबारों के पन्नों पर छपते देखते रहे। जो इसके विरोध में है वह सही आदमी नहीं है। वह बिहार का विकास नहीं देख पा रहा। अफवाहों से बिहार का भयमुक्त माहौल बिगाड़ने की कोशिश हो रही है। कानून व्यवस्था को अफवाहों से बाधित किया जा रहा है। यहीं सब कहना है सुशासन बाबू का। वाह सुशासन बाबू वाह... क्या खूब कह रहे हैं आप....अफवाहों के जरिए ही महिलाओं पर तेजाब फेंका जा रहा है, बालात्कार की घटनाएं रोज आ रही हैं, राजधानी में हत्याओं का दौर जारी है, अफवाहों से ही छठ जैसे हादसे हो रहे हैं...वाह।

छठ की घटना में सवाल वहीं है कि क्या हजारों की भीड़ को चंद सुरक्षाकर्मियों के भरोसे छोड़ देना लापरवाही नहीं थी। क्या पीएमसीएच में किसी भी डॉक्टर का न होना कर्तव्यहीनता का अपराध नहीं। संकरी गली पर किसी स्तर के अधिकारी की ध्यान न जाना क्या गड़बड़ नहीं। क्या हादसे के बाद भी अधिकारियों का घंटे भर से ज्याद गायब रहना लापरवाही नहीं । बहरहाल सारी कोशिशें छठ की दर्दनाक घटना को महज हादसा करार देते हुए प्रशासन और सरकार को साफ बचाने का है जिसमें सरकार कामयाब भी होती दिखाई पड़  रही है। महज 2-2 लाख रुपए मुआवजा बांट कर खानापूर्ति जारी है।सच तो यह है कि न तो कोई सही योजना बनाई गई थी ना ही कोई व्यवस्था थी, सबको छठी मइया के भरोसे छोड़ दिया गया था और जो योजनाएं थी भी वे केवल काजग पर। ऐस में क्या सबकुछ भूल जाएंगे आप। फिर कहीं इसी तरह का हादसा होगा और होता ही रहता है और महज हादसा समझ कर भूलते रहेंगे आप।

सरोज युवा पत्रकार हैं. पत्रकारिता की पढ़ाई आईआईएमसी से. 
अभी पटना में एक दैनिक अखबार में काम . 
इनसे krsaroj989@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.