चीन की आर्थिक नीतियों के अंतर्विरोध और जिनपिंग की मुश्किलें


कृष्ण सिंह


"...दरअसल, चीन में इस समय आर्थिक नीतियों के कारण सामाजिक स्थितियां ज्यादा जटिल हो रही हैं। जिसके चलते जियांग जेमिन और हू जिंताओ के बजाय जिंगपिंग के लिए अगले दस साल ज्यादा मुश्किलों से भरे होंगे। अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ रही है और आम चीनियों में निराशा लगातार बढ़ रही है। आर्थिक तरक्की के चमत्कार के बावजूद चीन में इस समय असमानता सबसे अधिक है। ..."



चीन में शि जिनपिंग ऐसे समय में सत्ता संभालने जा रहे हैं जब वहां आर्थिक मोर्चे पर संकट दिखाई दे रहा है और सामाजिक स्तर पर बेचैनी तथा तनाव है। चीनी नेतृत्व की कतारों में ऐसे लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो क्रोनी कैपिटलिजम के सहारे अपनी तरह के मार्क्सवाद का दास कैपिटल रच रहे हैं। नेतृत्व के शीर्ष और मध्य स्तर पर भ्रष्टाचार की रफ्तार काफी तीव्र है। असल में बीते तीन दशकों में जिस आर्थिक मॉडल के सहारे चीन ने अभूतपूर्व तरक्की की है उसके अंतर्विरोध भी अब तीखे रूप में सामने आ रहे हैं। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 18वीं कांग्रेस में निवर्तमान राष्ट्रपति हू जिंताओ के भाषण में इसका स्पष्ट संकेत मिलता है। आर्थिक सुधारों को और गहरा करने के साथ ही राजनीतिक सुधारों की बात करते हुए जिंताओ ने भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष को प्रमुख एजेंडे और गंभीर चुनौती के रूप में सामने रखा। हू ने कहा, ``भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई और राजनीतिक ईमानदारी को प्रोत्साहन, जो कि जनता की व्यापक चिंता का प्रमुख राजनीतिक मसला है, पार्टी की स्पष्ट और दीर्घकालीन राजनीतिक प्रतिबद्धता है।... यदि हम इस मसले को ठीक तरीके से सुलझाने में असफल होते हैं तो यह पार्टी के लिए घातक सिद्ध होगा और यहां तक कि यह पार्टी के ढहने और राज्य के पतन का कारण बनेगा।`` हालांकि जिंताओ ने यह भी स्पष्ट किया कि हम पश्चिम की राजनीतिक व्यवस्था की नकल नहीं करेंगे।

दरअसल, चीन में इस समय आर्थिक नीतियों के कारण सामाजिक स्थितियां ज्यादा जटिल हो रही हैं। जिसके चलते जियांग जेमिन और हू जिंताओ के बजाय जिंगपिंग के लिए अगले दस साल ज्यादा मुश्किलों से भरे होंगे। अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ रही है और आम चीनियों में निराशा लगातार बढ़ रही है। आर्थिक तरक्की के चमत्कार के बावजूद चीन में इस समय असमानता सबसे अधिक है। उच्च आय वर्ग और निम्न आय वर्ग समूहों तथा शहरों और ग्रामीण इलाकों के बीच असमानता की खाई लगातार चौड़ी हो रही है। कम मजदूरी भी निराशा बढ़ने का एक प्रमुख कारण है। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि सामान्य चीनी परिवारों के पास खर्च करने के लिए उतना पैसा नहीं है। चाइना डेली के ऑनलाइन संस्करण के एक लेख के अनुसार, ``शहरी परिवारों की आय औसतन ग्रामीण परिवारों की आय से साढ़े तीन गुना ज्यादा है। असमानता भविष्य में विकास में बाधा उत्पन्न करेगी क्योंकि यह उपभोग को कम करेगी, अति गरीब इलाकों में विकास को रोकेगी और सामाजिक तनाव को बढ़ाएगी।`` आर्थिक नीतियों को लेकर तनाव के संकेत मुखर तरीके से दिख भी रहे हैं। कुछ माह पहले ही सिचुआन प्रांत के शीफंग में हजारों लोगों ने तांबे की फैक्टरी के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इसके अलावा शंघाई से काफी करीब क्वीदोंग में सीवेज पाइपलाइन के खिलाफ भी जबरदस्त प्रदर्शन हुआ था। 

देंग श्याओ पिंग ने नब्बे के दशक के शुरुआत में आर्थिक सुधारों का दूसरा चरण शुरू किया था। जिसे जियांग जेमिन और बाद में हू जिंताओ ने असरदार तरीके से आगे बढ़ाया। चीन में कम्युनिस्ट शासन ने वाम राजनीतिक व्यवस्था के साथ-साथ 1980 के बाद से अर्थव्यवस्था का पूंजीवादी मॉडल अपनाया और  इन दोनों के बीच संतुलन बनाते हुए स्थिर राजनीतिक व्यवस्था कायम की। कम्युनिस्ट शासन ने नई पीढ़ी के लिए संपन्नता और उम्मीदों की एक नई इबारत लिखी। जिसे अब आगे बढ़ाने की कठिन चुनौती जिनपिंग के कंधों पर होगी। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 18वीं कांग्रेस में पार्टी के महासचिव का पद संभालने के बाद जिनपिंग अगले साल मार्च में औपचारिक तौर पर राष्ट्रपति का पद संभालेंगे।

जिनपिंग के सामने शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक नीतियों को संतुलित करने की चुनौती ज्यादा मुश्किल भरी है। खासकर निजी पूंजी का जबरदस्त उभार और ग्रामीण इलाकों में भूमि के सामूहिक स्वामित्व की नीतियों के बीच किस तरह का आर्थिक संतुलन बनेगा, यह एक बड़ा सवाल है। क्या भविष्य में ग्रामीण भूमि का निजीकरण करते हुए इसे किसानों को सौंपने के बारे में विचार होगा। पश्चिमी आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि चीन को विकास के संतुलन के लिए शासन की स्थानीय इकाइयों को ज्यादा पारदर्शी बनाना होगा और उन्हें ज्यादा अधिकार देने होंगे। तो क्या हू जिंताओ जिस राजनीतिक सुधार की बात कर रहे हैं वह इस ओर बढ़ेगा?

सवाल हूकू सिस्टम (परिवार संबंधी पंजीकरण व्यवस्था) को लेकर भी है। क्या चीनी कम्युनिस्ट शासन इस व्यवस्था को ज्यादा लचीला बनाएगा। ताकि ग्रामीण प्रवासी परिवारों को शहरों में बेहतर तरीके से व्यवस्थित स्वास्थ्य सुरक्षा और शिक्षा की सुविधाएं मिल सकें। परिवार पंजीकरण व्यवस्था शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करती है। इस व्यवस्था के तहत मौटे तौर पर व्यक्ति को ग्रामीण और शहरी कामगार के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। जिनका पंजीकरण जिस क्षेत्र से होता है उन्हें शहरों में भी उस क्षेत्र के हिसाब से तय सुविधाएं ही मिलती हैं। जिससे ग्रामीण प्रवासियों को उनके शहरों में निवास के दौरान शहरी कामगारों को मिलने वाली सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं। उधर, मध्यवर्ग का विस्तार जिसे चीन की आर्थिक नीतियों का एक सुखद परिणाम माना गया अब चीनी नेतृत्व के सामने नई तरह की चुनौतियां भी पेश कर रहा है। खासकर इस वर्ग की बढ़ती महत्वकांक्षाएं। बीस सालों की जबरदस्त आर्थिक प्रगति के दौरान चीनी मध्यवर्ग बहुत तेजी से संपन्न हुआ है। अब यह समृद्ध अर्थव्यवस्था में अपनी ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी चाहता है। वैश्वीकरण के इस दौर में इस वर्ग का पश्चिमी समाज से संपर्क बढ़ा है। यह वर्ग पश्चिम के प्रभाव में न आए और चीनी समाज की वाम एकता बनी रहे यह सुनिश्चित करना भी चीन के नए शासकों के लिए के एक बड़ा कार्यभार होगा।  

जिनपिंग के आने के बाद चीन में आर्थिक नीतियां किस तरह से आगे बढ़ेंगी, यह देखना दिलचस्प होगा। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। उनके सामने सामाजिक सुरक्षा नीतियों को और मजबूत करते हुए टिकाऊ आर्थिक विकास दर को बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी। क्योंकि चीन की अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2011 के आंकड़े बताते हैं कि चीन के औद्योगिक लाभ के 75 फीसदी से अधिक के हिस्से में निजी उद्यमों की भागीदारी रही है। हालांकि वर्तमान वैश्विक वित्तीय संकट के मद्देनजर चीन में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में चिंताजनक स्थिति बन रही है, विशेषकर निर्यात केंद्रित निजी उद्योग अपना उत्पादन कम करने या उत्पादन को फिलहाल स्थगित करने के लिए विवश हो रहे हैं।

जहां तक चीन में सामाजिक योजनाओं से संबंधित व्यय का सवाल है तो इनमें इजाफा जरूर हुआ है, लेकिन एक ताकतवर और तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के नाते इसे कम माना जा रहा है। अभी सरकारी राजस्व का तीस प्रतिशत धन सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा पर खर्च किया जाता है। हू जिंताओ को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने बीते एक दशक में सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत ही नहीं किया बल्कि उसका दायरा भी काफी व्यापक किया है।

असल में वर्तमान परिदृश्य को देखें तो बढ़ती असमानता, भ्रष्टाचार, क्रॉनी कैपिटलिजम के कारण जो सामाजिक तनाव बढ़ रहा है उससे स्थितियां ज्यादा जटिल होती नजर आ रही हैं। खासकर शासक वर्ग के भीतर तक फैले भ्रष्टाचार के कारण। इसका ताजा उदाहरण चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ का है। उन पर आरोप है कि उनके कार्यकाल (पहले उप प्रधानमंत्री और बाद में प्रधानमंत्री) के दौरान उनके परिवार के सदस्यों की संपत्ति में अकूत इजाफा हुआ है। नब्बे साल की उनकी मां, जो कि एक स्कूल मास्टर थी, के नाम पर एक बड़ी चाइनिज फाइनांशियल सर्विसेज कंपनी में पांच साल पहले 12 करोड़ डॉलर की निवेश राशि थी। इसके अलावा जियाबाओ का बेटा, बेटी, छोटा भाई और साला अप्रत्याशित रूप से धनी हुए हैं। आरोप यह भी है उनकी पत्नी और परिवार के कुछ सदस्यों के पास करीब 2.7 अरब डॉलर की संपत्ति है।

लेकिन नेतृत्व परिवर्तन के इस वर्ष में चीन में जो सबसे बड़ी राजनीतिक घटना घटी है वह है ताकतवर नेता के रूप में पहचान रखने वाले बो शिलाई का चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से निष्कासन। बो शिलाई प्रकरण दरअसल वर्तमान में चीन के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मोर्चों के अंतर्विरोधों की ओर इशारा करता है। वह पार्टी के कोई साधारण सदस्य नहीं थे। वह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की पोलित ब्यूरो के सदस्य और चोंगकिंग क्षेत्र के पार्टी प्रमुख थे। उन्हें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के चलते पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखाया है। उनकी पत्नी काई लाई को एक ब्रितानी उद्योगपति की हत्या के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई है, जिसे फिलहाल स्थगित रखा गया है। हालांकि इस बीच मीडिया रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि यह ब्रितानी व्यवसायी वास्तव में ब्रिटेन का जासूस था।

असल में, चोंगकिंग का मसला उपर से जितना सामान्य दिखाई देता है उतना है नहीं। इसका एक पहलू यह भी बताया जा रहा है कि यह सिर्फ भ्रष्टाचार तक सीमित मामला नहीं है। भ्रष्टाचार के आरोपों के इतर बो शिलाई के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि उनकी जमीनी स्तर तक राजनीतिक पकड़ बहुत मजबूत थी। साथ ही चीन के राजनीतिक और सैन्य विशिष्ट वर्ग में उनका ठीक-ठीक प्रभाव था। वह महत्वाकांक्षी और करिश्माई नेता थे। वह चीन की क्रांतिकारी परम्पराओं के जरिए आम जनता का समर्थन हासिल कर बीजिंग की सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाना चाहते थे। `कम्युनिकेशन इन चाइना : पॉलिटिकल इकॉनोमी, पावर एंड कन्फ्लिकट` पुस्तक की लेखिका और प्रोफेसर युएझी झाओ ने बो प्रकरण की तुलना 1971 में माओ त्से तुंग के नामित उत्तराधिकारी लिन बिआउ के पतन के समय के राजनीतिक भूचाल से की है। उन्होंने इसे विकास के चोंगकिंग मॉडल और गुआंगदोंग मॉडल के अंतर्विरोध के बतौर रेखांकित किया है। गुआंगदोंग अधिक मुक्त बाजार, बढ़ती असमानता और निर्यात अनुकूलन वाली नीतियों का प्रतीक है। वहीं चोंगकिंग को समाजवादी विचारों में नए प्राण भरने वाला और तीव्र तथा संतुलित विकास को बढ़ाने वाले लोकप्रिय दावों की विशेषता वाला बताया जाता रहा है। चोंगकिंग मॉडल के बारे में यह भी कहा जाता है कि इसने पब्लिक सेक्टर का विस्तार करने और सामाजिक कल्याणकारी नीतियों पर खासा जोर देने की आधारशिला रखी। जैसा कि चोंगकिंग मॉडल के बारे में युएझी झाओ कहती हैं कि इस साल आठ अगस्त के `फॉरन पॉलिसी` के एक लेख में इसे एक साहसपूर्ण प्रयोग बताया था जो कि राज्य की नीतियों और संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए आम आदमी के हितों को बढ़ा रहा है। साथ ही पार्टी और राज्य की भूमिका को भी बनाए हुए है। प्रोफेसर झाओ ने मंथली रिव्यू में अपने लेख में कहा कि चोंगकिंग में खस्ताहाल 1160 सरकारी उद्यमों को पुनर्गठित कर उन्हें लाभ वाले उद्योगों में बदला गया। ये सरकारी उद्यम माओ के समय से थे। इसका परिणाम यह हुआ कि चोंगकिंग की सरकारी स्वामित्व वाली परिसंपत्तियों में चमत्कारिक इजाफा हुआ। चोंगकिंग ने शहरी और ग्रामीण के बीच की खाई को पाटने के लिए आक्रामक कदम उठाए।

तो क्या बो शिलाई माओ त्से तुंग की क्रांतिकारी परंपरा को पुन: स्थापित करना चाहते थे ?  क्या इसके लिए चोंगकिंग को उन्होंने प्रयोगशाला बनाया था? क्या वह देंग श्याओं पिंग के आर्थिक विचारधारा पर उस तरह से  विश्वास नहीं करते थे जिस तरह से चीन का शीर्ष नेतृत्व करता है? तो क्या चीन नेतृत्व की उपरी कतारों में आर्थिक नीतियों को लेकर कोई तीखी बहस छिड़ी हुई थी या है ? वास्तविकता क्या है यह शायद ही पता चले, लेकिन इतना जरूर है कि चीनी नेतृत्व के लिए आर्थिक नीतियों से पैदा हो रहे जटिल अंतर्विरोधों और विषमताओं से निपटना अब पहले की तरह आसान नहीं है। जिनपिंग को वर्तमान चीनी अर्थशास्त्र का व्याकरण कुछ ज्यादा ही परेशान करने वाला होगा। वैश्विक वित्तीय संकट अलग से परेशानी का कारण है। बीस सालों के तीव्र विकास के बाद चीन का नया नेतृत्व चीन के आर्थिक विकास के मॉडल को क्या स्वरूप देता है, आने वाले समय में पूरी दुनिया की नजरें इस पर होंगी।




कृष्ण सिंह पत्रकार हैं. लंबे समय तक अखबारों में काम. 
अभी पत्रकारिता के अध्यापन में.
इनसे संपर्क का पता krishansingh1507@gmail.com है.