कसाब का हिसाब और राष्ट्रभक्ति का अंधड़


अंकित फ्रांसिस

 "...सभी जानते हैं कि कसाबआतंकवाद और पाकिस्तान कुछ ऐसे शब्द हैं जिनके जबान से निकलते ही भारतीयों खासकर शहरी मध्यवर्ग के भीतर का राष्ट्रवाद कुछ ही क्षणों में अपने चरम पर पहुंच जाता है। इस चरमसुख की प्राप्ति में भारतीय मीडिया का योगदान भी हमेशा से अभूतपूर्व रहा है। बस फिर क्या था, कांग्रेस को अपनी सभी परेशानियों से उबरने के लिए चाहिए भी यही था। इसी के चलते इसे इतने खुफिया तरीके से अंजाम भी दिया गया था।..."

21 नवंबर सुबह देश ने ठीक से आंखें भी नहीं खोली थी और दरअसल ये कोई ऐसा दिन भी नहीं था जिसका किसी को इंतजार रहा हो। लेकिन मीडिया ने अचानक से एक ऐसा समाचार सुनाना शुरू किया जिससे पूरा दृश्य ही बदल गया। बाल ठाकरे के गुणगान गा-गा कर थके न्यूज चैनल अभी आराम भी न कर सके थे कि खबर मिली कि इस 21/11 को सबेरे-सबेरे 26/11 के दोषी कसाब को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।

26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए हमले में 166 लोग मारे गए थे। बताया गया कि 21 नवंबर की सुबह साढ़े सात बजे मुंबई की यरवदा जेल में अजमल आमिर कसाब को फांसी दे दी गई है। दरअसल पांच नवंबर को ही राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कसाब की दया याचिका को ठुकरा दिया था। इसके बाद इतनी ही त्वरित गति से गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने इस फैसले पर हस्ताक्षर कर दिए। सूत्रों के अनुसार 12 नवंबर को कसाब को भी बता दिया गया था कि उसे फांसी होने वाली है। चूंकि फांसी आर्थर रोड जेल में नहीं दी जा सकती इसके चलते उसे 19 नवंबर को यरवदा जेल में शिफ्ट कर दिया गया। ये सब इतने खुफिया तरीके से हुआ कि भारतीय मीडिया जो गणेश को दूध पिलाने और स्वर्ग की सीढ़ी तक खोजने में माहिर है उसे इसकी भनक तक भी नहीं लगी। इधर फांसी की खबर आम होते ही हर तरफ से बयानों की बौछार शुरू हो गई। शिंदे ने मीडिया से मुखातिब होते हुए बताया कि राष्ट्रपति महोदय की तरफ से कसाब की दया याचिका खारिज करने की सूचना मिलते ही हमने तय समय के अनुसार फांसी की सजा देने की प्रक्रिया पर कार्यवाही की। कसाब के मृत शरीर को अगर पाकिस्तान मांगता तो हम दे देते लेकिन उन्होंने इसकी मांग नहीं की इसलिए उसे यहीं दफना दिया गया है। पाकिस्तान को इसकी इत्तला कर दी गई है। कांग्रेस इस पूरे प्रकरण में बड़ा संभल कर बयान देती हुई नजर आई। ज्यादातर कांग्रेसी नेता इसे सत्संगी अंदाज में न्याय की जीत और बुरे काम का बुरा नतीजा घोषित करते हुए दिखाई पड़े। बेमतलब शोहरती बयान देने के लिए मशहूर  कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह तक ने इस पर बड़ा संभल कर प्रतिक्रिया दी और संकेत भी दिया कि जल्द ही अफजल गुरू को भी नंबर पर लिया जाएगा।

दूसरी तरफ हिन्दुत्व भावनाओं की वाहक भाजपा एक बार फिर इस घटना के बाद कांग्रेस के दांव में फंसी हुई नजर आई। चूंकि एक कांग्रेसी राष्ट्रपति की त्वरित कार्यवाही से कसाब को जल्द से जल्द लटकाया गया तो भाजपा इसकी खुलकर तारीफ भी नहीं कर सकती थी और अपने वोट बैंक के चलते चुप रहने का तो सवाल ही नहीं उठता। ऐसे में भाजपा का अल्पसंख्यक चेहरे मुख्तार अब्बास नकवी को मैदान में उतारा गया। उन्होंने कहा कि यह उन लोगों के लिए चेतावनी है जिन्होंने भारत में आतंक फैलाने की साजिश की है। इसके अलावा यह उन लोगों लिए अच्छी खबर है जो 26/11 के हमले से पीडि़त हुए। ये एक ऐसा बयान था जिसमें किसी को क्रेडिट देने से साफ बचा गया जो कि भाजपा के लिए बहुत जरूरी भी था। लेकिन इसी के बाद शुरू हुआ असली खेल जिसके लिए इस फैसले को इस तरह से अंजाम दिया गया था। सभी जानते हैं कि कसाब, आतंकवाद और पाकिस्तान कुछ ऐसे शब्द हैं जिनके जबान से निकलते ही भारतीयों खासकर शहरी मध्यवर्ग के भीतर का राष्ट्रवाद कुछ ही क्षणों में अपने चरम पर पहुंच जाता है। इस चरमसुख की प्राप्ति में भारतीय मीडिया का योगदान भी हमेशा से अभूतपूर्व रहा है। बस फिर क्या था, कांग्रेस को अपनी सभी परेशानियों से उबरने के लिए चाहिए भी यही था। इसी के चलते इसे इतने खुफिया तरीके से अंजाम भी दिया गया था।

चूंकि भारतीय मीडिया का खबर देने और रेवेन्यू हासिल करने के माँडल के तहत, खबर को सबसे पहले दिखाना जरूरी हो जाता है तो इस बार कांग्रेस ने साजिशन इस पर चर्चा करने या सवाल उठाने का मौका ही नहीं दिया। इतनी बड़ी खबर से बौराये सभी चैनल आनन-फानन में दिनभर खुद को सबसे बड़ा देशभक्त डिक्लियर करने में लगे रहे। दरअसल मुनाफा आधारित मीडिया की सीमाओं को इस पूरे प्रकरण से भी समझा जा सकता है। पहले खबर देना जरूरी था क्योंकि ज्यादा मुनाफा वही चैनल जनरेट कर रहा है जो सबसे तेज की कैटेगरी में हैं। उनकी टीअरारपी ही ज्यादा है और उन्हें ही विज्ञापन मिलेंगे। ऐसे में सरकार जानती थी की एक नीतिगत तरीके से मीडिया को बड़ी आसानी से दबाव में लिया जा सकता है। दरअसल पहले दिखाने के चक्कर में चैनल या पत्रकार जब तक पूरी बात को समझ पाते, तब तक फरेबी देशभक्ति के चक्कर में काफी कुछ प्रसारित कर चुके होते हैं और बाद में समझ आने पर भी इस पर से पलटा नहीं जा सकता। दूसरी बात ये कि कम्युनिकेशन की बुलेट थ्योरी को ध्यान में रखकर रचित ऐसी घटनाओं के समाचार तत्काल रूप से लोगों को इतना उत्तेजित कर देते हैं कि फिर कोई टिपण्णी भी आपको देशद्रोही साबित करने के लिए काफी साबित होती है। यह लोगों में एक स्पष्ट विभाजन की पैदाइश करते हैं जहां आप गर कसाब को चैराहे पर लटकाने की बात करते हैं तो आप देशभक्त हैं और किसी भी तरह के सवाल पर आप देशद्रोही साबित कर दिए जाते हैं।

कसाब की इस फांसी से कांग्रेस ने एक ही चाल में राष्ट्रावद की भावना को अपने पक्ष में झुका लिया। इसके साथ ही उसके खिलाफ देश के मध्यवर्ग में व्याप्त नेगेटिव भावना को काफी हद तक काबू में कर लिया। ऐसा भी नहीं है की कांग्रेस ने कोई पहली बार सांप्रदायिक कार्ड चला है। इतिहास में दर्ज है कि 1986 में अयोध्या में लटके ताले को खोलकर राजीव गांधी ने ही उग्र हिन्दुत्व को हवा दी थी। आंदोलन के चरम पर पहुंचने तक कैसे कांग्रेस खामोश रहकर सब देखती रही और विवादित ढांचा गिराकर भाजपा सत्ता में तो आ गई लेकिन अगले चुनावों में उसके पास चुनाव लड़ने का कोई मुद्दा ही नहीं बचा। अभी जल्दी ही 26 नवंबर को भाजपा फिर कसाब का नाम लेकर कांग्रेस को कोसने के लिए जी-जान से तैयार थी लेकिन एक बार फिर कांग्रेस ने मुद्दा तो खत्म किया ही इस पूरे कैओस और भावनात्मक उफान से कुछ नंबर भी हासिल कर लिए। वैसे कसाब के डेंगू से मरने की अफवाह फैलाकर विपक्षियों ने थोड़े डैमेज कंट्रोल की कोशिश तो की मगर साफ़ है की तब तक देर हो चुकी थी. गौर किया जाये तो कांग्रेस के संकटमोचक से राष्ट्रपति बने प्रणव मुखर्जी ने एक बार फिर अपने इस फैसले से कांग्रेस के संकटमोचक की भूमिका का ही निर्वहन किया है। लेकिन उनसे ये पूछना बनता ही है कि क्यों अचानक कई दया यचिकाओं को होल्ड पर रख उन्होंने कसाब पर ही फैसला सुनाने की जहमत उठाई। अगर सब कुछ प्रक्रियागत ही था तो सरकार इतनी आसानी से मीडिया से सब छुपा कैसे ले गई या इसी फैसले को इतना स्पेशल ट्रीटमेंट क्यों दिया गया। हालाँकि कुछ सवालों के जवाब 21 नवंबर को न्यूज चैनलों की कवरेज और 22 नवंबर की सुबह अखबारों के फ्रंट पेज देखने पर भी मिल सकते हैं। 

अंकित युवा पत्रकार हैं। थिएटर में भी दखल। 
अभी एक साप्ताहिक अखबार में काम कर रहे हैं।
इनसे संपर्क का पता francisankit@gmail.com है।