रॉबर्ट वाड्रा प्रकरण : क्रॉनी पूंजीवाद का संरचनात्मक संकट




-कृष्ण सिंह
`` हेगेल ने कहीं कहा था कि दुनिया के तमाम महान ऐतिहासिक तथ्य और व्यक्तित्व अपने को दोहराते हैंलेकिन वह यह कहना भूल गए कि पहली बार त्रासदी के रुप में और दूसरी बार प्रहसन के रूप में।``  
-कार्ल मार्क्स,  ``द एटीन्थ ब्रूमायर ऑफ लुई बोनापार्ट ``


भारत में वर्ष 2004 के आम चुनाव के बाद राजनीतिक परिदृश्य में `महान त्यागका एक जादुई चरित्र गढ़ा गया। इसकी शिल्पकार खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी थी। उन्होंने प्रधानमंत्री की कुर्सी पर खुद विराजने के बजाय मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनवाया। इस `त्यागने उन्हें भारतीय राजनीति में एक महान शख्सियत के बतौर स्थापित किया। मनमोहन सिंह की छवि उस समय एक ईमानदार व्यक्ति की थी और अपने अर्थशास्त्र के कारण वह भारतीय मध्यवर्ग के सबसे अधिक दुलारे थे। नब्बे के दशक के शुरुआत में एक वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने उदारीकरण और आर्थिक सुधारों की शुरुआत की थी , जिसे भारत की तरक्की में अहम माना गया था। लेकिन 2012 तक आते-आते सोनिया गांधी का `महान त्यागऔर मनमोहन सिंह का अर्थशास्त्र एक प्रहसन में बदल गया है। कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा अब रॉबर्ट वाड्रामंत्रियों-नेताओं और कॉरपोरेट घरानों को अकूत लाभ पहुंचाने में तब्दील हो गया है। इसका नवनीतम उदाहरण जयपाल रेड्डी को पेट्रोलियम मंत्रालय से रिलायंस के दबाव में हटाना है।

आर्थिक उदारीकरणनवउदारवादी नीतियों और वैश्वीकरण के इस दौर में विकास का पहिया इस तरह घूम रहा है कि भारत में शहरी और ग्रामीण गरीबों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ रही है। कुपोषण के मामले में भारत की स्थिति अफ्रीका के सबसे अधिक गरीब देशों के समान है। असमानता का दायरा लगातार बढ़ रहा है। किसानों की आत्महत्या करने की घटनाएं कम होने के बजाय बढ़ रही हैं। बढ़ती बेरोजगारी के कारण युवाओं का एक बड़ा हिस्सा हताश और निराश है। एक कल्याणकारी राज्य की भूमिका लगभग समाप्त हो चुकी है। सरकार की भूमिका अब बड़ी पूंजी के हितों की रक्षा करने में बदल गयी है। पहले बड़ी संख्या में सार्वजनिक निगमों और उनकी संपत्तियों को कौड़ियों के भाव में कॉरपोरेट घरानों को बेचा गया। इसके बाद अन्य राष्ट्रीय संपदाओं और संसाधनों को निजी पूंजी के हवाले किया गया और जो बच गए हैं उनका निजीकरण तीव्र गति से चालू है। यहां तक ग्रामीण भारत के उन करोड़ों लोगों को उन प्राकृतिक संसाधनों से वंचित किया जा रहा है जिनके सहारे वे अपना जीवन-यापन करते थे। जंगलोंपशुओं के चरने की भूमिबंजर भूमिसमुद्र तटों और नदियों तक को तेजी के साथ कॉरपोरेट घरानों के हवाले किया जा रहा है।

दरअसल, सोनिया गांधी को अपने `महान त्यागका प्रदर्शन करने का मौका इसलिए मिला था क्योंकि जनता ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के इंडिया शाइनिंग के विकास मॉडल को नकार दिया था। लेकिन 2004 में कांग्रेस की यह वापसी त्रासदी और तमाशे में बदल गयी है। महान अर्थशास्त्री और `ईमानदारप्रधानमंत्री के नेतृत्व और `महान त्यागकी देवी के मार्ग निर्देशन में चलने वाली कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार आजाद भारत की सबसे भ्रष्ट सरकार साबित हुई है। इसने भ्रष्टाचार और कॉरपोरेट लूट को संस्थागत कर दिया है। शासक वर्ग का बहुत बड़ा हिस्सा (करीब-करीब सभी राजनीतिक दल) इसमें शामिल हैं। सत्ताधारियों की मदद से राष्ट्रीय संपदाओं और संसाधनों की इतनी बड़े पैमाने पर लूट खसोट कभी नहीं हुई। आर्थिक सुधारों का पूरा अर्थशास्त्र क्रॉनी कैपिटलिजम (अपने अंतरंग मित्रोंकरीबियों और खास लोगों को फायदा पहुंचाने का पूंजीवाद) को मजबूत करने में लगा है। इस राजनीतिक और आर्थिक ऑलिगार्की (सीमित लोगों में निहित सत्ता वाला शासन) ने लूट-खसोट की एक ऐसी व्यवस्था कायम कर दी है जिसमें हर कोई अपनी हैसियत के अनुसार अपना हिस्सा कब्जा रहा है। भारत में महाराष्ट्रकर्नाटकगोवातमिलनाडुओडिशाझारखंडउत्तराखंडछत्तीसगढ़ और बहुत सारे अन्य स्थानों में राष्ट्रीय संपदाओं और प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट तथा जमीनों को कब्जाने की खबरें अब रोजमर्रा की बात हो गई है। शासक और धनिक वर्ग द्वारा इसे किसी न किसी रूप में जायज ठहराया जा रहा है। अब कहना मुश्किल है कि कौन सा राजनीतिक दल दूसरे से भ्रष्टाचार में थोड़ा कम लिप्त है। भारत के दो बड़े राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और भाजपा में तो एक तरह से भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड बनाने की होड़ सी लगी है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और व्यवसायी नितिन गडकरी घोटालों में फंसे हैं। गडकरी को भाजपा अध्यक्ष बनवाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

सोनिया के `महान त्याग ` का तिलिस्म टूटा

भारत में इस राजनीतिक और आर्थिक ऑलिगार्की तथा क्रॉनी (बेईमान) कैपिटलिजम के सबसे नए नायक रॉबर्ट वाड्रा हैं। वाड्रा न तो सक्रिय राजनीति में हैं और न ही कांग्रेस के पदाधिकारी। उनकी सबसे बड़ी खासियत और उपलब्धि यही है कि वह भारत की सबसे ताकतवर राजनीतिक महिला और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद हैं। यूपीए सरकार में हो रहे बड़े-बड़े घोटालों के बावजूद सोनिया गांधी और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार का सीधा आरोप नहीं लगा था। उनकी छवि एक तरह से बेदाग बनी हुई थी। कांग्रेस समय-समय पर अपनी साख बचाने के लिए सोनिया के त्याग को ब्रह्मास्त्र की तरह इस्तेमाल करती रही है। यह प्रचारित किया जाता रहा है कि जिस महिला ने प्रधानमंत्री की कुर्सी को ठुकरा दिया हो वह किसी तरह के भ्रष्टाचार में कैसे शामिल हो सकती है। भारतीय मीडिया और किसी भी राजनीतिक दल में इतना साहस कभी नहीं रहा कि वे नेहरु-गांधी परिवार पर सीधे अंगुली उठाएं। यह मान लिया गया था कि कोई भी भ्रष्ट हो सकता हैलेकिन दस जनपथ (सोनिया गांधी का निवास स्थान) की छवि हमेशा बेदाग रहेगी। इसके अलावा राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष के बतौर भी सोनिया गांधी अपनी जनपक्षधर छवि को करीने से गढ़ती रही हैं।

लेकिन इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के कर्ताधर्ता और एक्टिविस्ट से राजनीतिज्ञ बने अरंविद केजरीवाल और प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण ने रॉबर्ट वाड्रा के जमीन जायदाद के गोरखधंधे को बेकनाब करके सोनिया गांधी की महान त्याग की छवि को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। यह पहली बार है जब किसी ने नेहरू-गांधी परिवार पर भ्रष्टाचार का सीधा आरोप लगाया है। वह भी पूरे सबूतों के साथ। वाड्रा प्रकरण से भविष्य में कांग्रेस को कितना अधिक राजनीतिक नुकसान होगा यह कहना अभी मुश्किल हैलेकिन इतना जरूर है कि सोनिया गांधी की छवि के धूमिल होने से कांग्रेस बुरी तरह से हिल गयी है। बोफोर्स कांड में राजीव गांधी पर लगे कमीशनखोरी के आरोपों के बावजूद कांग्रेस आक्रामक बनी रही थी। बोफोर्स तौप सौदे में दलाली का आरोप राजीव गांधी पर साबित नहीं हो पाया था। लेकिन इस बार तो रॉबर्ट वाड्रा पर लगे आरोप आइने की तरह साफ हैं। वाड्रा प्रकरण से कांग्रेस और उसका नेतृत्व इतना घबराया हुआ है कि पूरी पार्टी और उसके मंत्री वाड्रा के बचाव में कूद पड़े। कांग्रेसियों को मालूम है कि उनकी नेता की त्याग की महान छवि जो धूमिल हुई है और आभामंडल निस्तेज हुआ है उसका भविष्य में बड़ा राजनीतिक खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल में लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस की जो हालत हुई है यह उसका संकेत मात्र है। उत्तराखंड की टिहरी लोकसभा सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा 22,694 मतों से हार गए। इस सीट से 2009 में विजय बहुगुणा जीते थे। विजय बहुगुणा को जब मुख्यमंत्री बनाया गया था तो वहां इस तरह की बातें लोगों की जुबान पर थी कि उन्हें बांध लॉबी ने मुख्यमंत्री बनवाया है और कांग्रेस आलाकमान ने इसमें अहम भूमिका निभाई है। पश्चिम बंगाल की जांगीपुर लोकसभा सीट से राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे अभिजित मुखर्जी बड़ी मुश्किल से 2536 मतों से जीते। जबकि इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था। प्रणव मुखर्जी इस सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में 1.28 लाख मतों से चुनाव जीते थे।

चुनावी राजनीति में छवि और व्यक्ति का आभामंडल एक शक्तिशाली हथियार होता है। त्याग का सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र कांग्रेस की नेता चल चुकी हैं। अब उनके पास क्या है ?  

रॉबर्ट वाड्रा का गोरखधंधा

रीयल एस्सेट (संपत्ति के धंधे) की सबसे बड़ी कंपनी डीएलएफ के साथ रॉबर्ट वाड्रा का नापाक गठजोड़ केवल क्रॉनी कैपिटलिजम तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह सत्ता की दलाली के बड़े खेल का हिस्सा है। वैसे भी भारत में रीयल एस्टेट सेक्टर को सबसे अधिक भ्रष्ट माना जाता है। रीयल एस्टेट सेक्टर तो व्यापक स्तर पर `कालेलेन-देन और नेताओं तथा रीयल एस्टेट के कारोबारियों के संबंधों के लिए कुख्यात है। इन्फ्रास्ट्रकचर ऐसा क्षेत्र है जिसका सबसे ज्यादा विस्तार हो रहा है और इसमें निवेश भी बड़े पैमाने पर होगा। शासक वर्ग इसका फायदा खुद को अधिक से अधिक लाभ पहुंचाने के लिए उठा रहा है। इसके लिए जगह-जगह (चाहे शहरी क्षेत्र हो या ग्रामीण) कॉरपोरेट घरानोंउद्योगपतियोंनेताओंमंत्रियों और उनके रिश्तेदारों द्वारा जमीनों को कब्जाया जा रहा है। जमीन जायदाद के इस खेल में सरकारें पूरा सहयोग कर रही हैं।

भारत के 46 अरबपतियों में से 43 फीसदी की धन-संपत्ति का मुख्य स्रोत रीयल एस्टेटकन्स्ट्रक्शनइंफ्रास्ट्रकचर या पोर्ट सेक्टरमीडियासीमेंटटेलीकॉम और खनन क्षेत्र है। यह हिस्सा भारत के कुल अरबपतियों की धन-दौलत का साठ प्रतिशत है। सन् 1990 के बाद से भारत के विकास में सबसे हैरतअंगेज एक बात यह भी रही कि अपार संपत्ति में तेजी से बहुत ज्यादा बढ़ोतरी हुई। नब्बे के दशक के शुरुआती सालों में भारत की अपने विकास और दूसरे देशों की तुलना में भारत के अरबपतियों की संपत्ति नाटकीय तरीके से बढ़ी। धन-दौलत का यह विस्तार भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति को लेकर कई सवाल खड़े करता है। ( ईपीडब्ल्यू 6 अक्टूबर 2012)।  

यह `अजब संयोगहै कि  रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ दोनों के लिए 2007 `कारोबारी चमत्कारका साल रहा। डीएलएफ के चेयरमैन केपी सिंह ने 17 जनवरी 2008 को कहा था- ``इसमें कोई शक नहीं है कि वर्ष 2007 डीएलएफ के कॉरपोरेट इतिहास में टर्निगं प्वाइंट था।`` वहीं वाड्रा की कारोबारी गतिविधियों में भी 2007 में अत्यधिक तेजी आई। एक साल के भीतर ही उन्होंने पांच अन्य उपक्रम शुरू किए। जो रीयल एस्टेटहॉस्पिटलिटी और ट्रेडिंग सेक्टर से जुड़े थे। इस `चमत्कारकी वास्तविक कहानी के खुलासे से पहले वाड्रा के बारे में ज्यादातर लोग इतना ही जानते थे कि वह ब्रास (पीतल) से निर्मित एंटिक सामान और फैशन से संबंधित साम्रगियों का कारोबार करते हैं। यह कारोबार अपनी कंपनी आर्टेक्स के जरिए करते थे।

इंडिया अगेनस्ट करप्शन और उसके बाद द हिंदू अखबार ने दस्तावेजों (जो वाड्रा की छह कंपनियों से जुड़े हैं) के हवाले से जो तथ्य सामने रखे उससे यह पूरी तरह से साफ है कि वाड्रा का यह कारोबारी उत्थान बहुत ही त्वरित था। वर्ष 2007 और 2008 के बीच उनकी कंपनियां मात्र 50 लाख प्रमोटर फंड के साथ शुरु हुई थी। हालांकि ये कंपनियां वर्ष 2010 तक 29 बहुत ही ऊंची लागत वाली संपत्तियां (प्रोपर्टीज) हासिल करने में कामयाब हो गई। यह सब कुछ डीएलएफ के साथ-साथ बेदारवाल्स इंफ्रा प्रोजेक्ट्सनिखिल इंटरनेशनल और वीआरएस इंफ्रास्ट्रक्चर से उधार और अग्रिम राशि (ब्याज रहित) के रूप में मिले 80 करोड़ रुपए से हुआ।

सबसे बड़ा सवाल तो यह उठता है कि डीएलएफ और दूसरी रीयल एस्टेट कंपनियों ने रॉबर्ट वाड्रा को इतनी अधिक तरजीह के साथ इतनी बड़ी राशि उधार में क्यों दी ? जबकि वाड्रा की कंपनियों का पूर्व में रीयल एस्टेट के कारोबार में कोई विशेषज्ञता नहीं थी। इससे साफ होता है कि गुड़गांव को ``रीयल एस्टेट का हॉटस्पॉट`` बनाने के लिए डीएलएफ के साथ रॉबर्ट वाड्रा की `खास तरह की भूमिका` थी। जैसा कि द हिंदू अखबार ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है-  ``वाड्रा की कंपनियों (स्काई लाइट हॉस्पिटलिटीस्काई लाइट रीयलटीब्लू ब्रीज ट्रेडिंगआर्टेक्सरीयल अर्थ एस्टेट और नार्थ इंडिया आईटी पार्क्स) की बेलेंस शीट और निदेशकों की रिपोर्टों से जो वित्तीय जानकारी मिलती है उससे सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि वास्तव में ये कंपनियां क्या कारोबार करती हैं और यह कारोबार किस तरह से किया जाता है। हर कंपनी का एक  ही पता है- 268सुखदेव विहार। वह और उनकी मां मॉरिन वाड्रा इनके निदेशक हैं। दस्तावेज यह दर्शाते हैं कि केवल एक कंपनी- स्काई लाइट रीयलटीसे उन्हें साठ लाख प्रतिवर्ष का मानदेय प्राप्त होता है।``

जैसा कि अरविंद केजरीवाल का कहना है कि वाड्रा और डीएलएफ में परस्पर रूप से लाभप्रद साझेदारी है। वाड्रा बहुत ही कम दरों पर ऋण और प्रॉपर्टी हासिल करते हैं और इसके बदले डीएलएफ को हरियाणाराजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस की सरकारों की कृपादृष्टि मिलती है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वाड्रा के रीयल एस्टेट के साम्राज्य चमत्कारिक रूप से विस्तार हुआ। तीन साल में ही वाड्रा ने दो सौ करोड़ रुपए मूल्य की प्रॉपर्टी बना ली। मानेसर में 3.5 एकड़ के जमीन के सौदे में वाड्रा ने एक साल के भीतर 42.61 करोड़ का फायदा कमाया। एक साल में इस जमीन की कीमत में आश्चर्यजनक रूप से तीन सौ गुना बढ़ोतरी हुई। वाड्रा और डीएलएफ के नापाक गठजोड़ में हरियाणा की कांग्रेस सरकार की मिलीभगत को लेकर केजरीवाल ने जो सवाल उठाए हैं उनका संतोषजनक जवाब डीएलएफरॉबर्ट वाड्राकांग्रेस पार्टी और हरियाणा सरकार नहीं दे पाए हैं। डीएलएफ और वाड्रा के बीच गठजोड़ को लेकर केजरीवाल और उनके साथियों का कहना है कि हरियाणा सरकार ने विशेष आर्थिक जोन (सेज) बनाने के लिए यूनिटेक और कंट्री हाइट्स की बोलियों को खारिज करके डीएलएफ को 350 एकड़ भूमि ( जिसमें हॉस्पिटल की जमीन और वन भूमि भी शामिल थी) दे दी गई। डीएलएफ सेज होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड फरवरी 2007 में निगमित की गई थी। अक्टूबर 2008 में वाड्रा की नॉर्थ इंडिया आईटी पार्क्स प्राइवेट लिमिटेड ने इसके तकरीबन 50 प्रतिशत शेयर अर्जित किए और अगले साल ही इन्हें वापस डीएलएफ समूह को बेच दिया गया। आखिर क्यों ? राज्य सरकार और डीएलएफ के बीच गठजोड़ के चलते मानेसर में बहुत ही कम दामों में जमीन बेचने के लिए किसानों की आंखों में धूल झोंकी गई। अंततयह जमीन भी डीएलएफ के पास चली गई। केजरीवाल का यह कहना सही है कि एक कंपनी किसी एक व्यक्ति को हजारों करोड़ रुपए का लाभ आखिर क्यों होने देगी जब वो उससे बदले में किसी प्रकार की अपेक्षा न रखती हो। डीएलएफ ने वास्तव में वाड्रा की कंपनियों को प्रतिभूतिरहित ऋण दिए थे। डीएलएफ से वर्ष 2008 में वाड्रा की कंपनी द्वारा एरालियस कॉम्पेलक्स में खरीदे गए दस हजार स्क्वेयर फीट के पेंट हाउस की कीमत 89.41 लाख ( 2009-10) से सीधा 10.4 करोड़ रुपए की छंलाग ( वर्ष 2010-11) कैसे लगा सकती है। असल में वाड्रा और डीएलएफ का यह सारा धंधा एक-दूसरे को हर तरीके से त्वरित लाभ पहुंचाने के खेल का हिस्सा था। तमाम तथ्यों के आधार पर केजरीवाल का यह आरोप काफी दमदार है कि डीएलएफ को हरियाणाराजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस सरकारों से जो लाभ हासिल हुआ उसके बदले उसने वाड्रा को पांच सौ करोड़ की प्रॉपर्टी बहुत ही सस्ते दामों में दी। दस जनपथ के दामाद होने के कारण वाड्रा का यह सारा गोरखधंधा आसानी से चलता रहा।


वाड्रा प्रकरण से एक बात याद आती है। पाकिस्तान में जब बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री थीं तो वहां इस बात की चर्चा आम रहती थी कि हर सौदे में उनके पति जरदारी साहब का दस प्रतिशत कमीशन तय होता था। यह सच था या झूठयह तो पता नहींलेकिन जरदारी साहब का आर्थिक साम्राज्य उन दिनों काफी फला-फूला था। यहां तो वाड्रा साहब की सास ही पूरा देश चला रही हैं। वैसे भी भारतीय परिवारों में यह मजाक आम है कि एक मां अपनी बेटी से ज्यादा अपने दामाद को स्नेह करती है। तो क्या रॉबर्ट वाड्रा मिस्टर टेन पर्सेंट के भारतीय अवतार हैं। वैसे भी भारत अवतारों का देश है। 

पूंजीवाद का दूसरा स्वभाव लूट-खसोट और धोखेबाजी

असल में पूंजीवाद ने पांच सौ साल से अधिक के अपने विकास क्रम में तमाम गुण और दोष के साथ जो एक चीज नहीं छोड़ी वह है लूट-खसोट और धोखेबाजी। यह  आधुनिक वैश्वीकरण के रूप में आर्थिक उपनिवेशवाद के साथ विभिन्न देशों (अमेरिका सहित) में अलग-अलग रूप में हमारे सामने आता रहा है। आर्थिक तौर पर शक्तिशाली राष्ट्र कमजोर राष्ट्रों की नीतियों को अपनी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में बदलवाते और बनवाते हैं। इसके लिए लॉबिंग सहित हर गैरबाजिब तरीका भी अपनाया जाता है। राष्ट्रों के भीतर भी देसी कॉरपोरेट-औद्योगिक घराने अल्प समय में किसी भी प्रकार से बेशुमार धन-संपत्ति अर्जित करने के लिए राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित ही नहीं करते बल्कि उन्हें अपने मन-माफिक बदलवाते हैं। राष्ट्रीय संपदाओं और संसाधनों पर किसी भी तरह से अपना प्रभुत्व कायम करने की नीतियों के सहारे ही पूंजीवाद ने अपनी गाथा लिखी है। समय के साथ-साथ यह अपने चरम की ओर बढ़ती जा रही है।

आज से 520 वर्ष पहले...,  ``जब क्रिस्टोफर कोलंबस सन् 1492 में अमेरिका की खोज करके लौटा तो उसके पास एक ऐसी दुनिया की जानकारी थी जहां सोना बहुतायात मात्रा में था। धन-संपत्ति की इस तलाश के बाद व्यापार और लूट-खसोट का एक नया दौर शुरू हुआ। यह पूंजीवाद के शुरुआती चरण की महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक थी। स्पेन की राजशाही ने उस जमीन को कब्जाने का संकल्प किया जिसकी हिमाजत उसके वाशिंदे नहीं कर सकते थे। जैसा कि एडम स्मिथ का कहना था- `` उन्हें ईसाई बनाने के पवित्र उद्देश्य ने इस परियोजना के अन्याय को पावन कर दिया। वहां सोने के खजाने पाने की उम्मीद ही वह मुख्य कारण था जिसने उन्हें यह सब करने के लिए प्रेरित किया।... नए संसार मेंस्पेनवासियों के बाकी सब व्यवसाय कोलंबस के अनुवर्ती थेजो कि एक ही उद्देश्य से प्रेरित थे। यह सोने की पवित्र प्यास थी...।`` मैक्सिको को पराजित करने वाले हर्नान कोर्ते ने स्वीकार किया था- ``हम स्पनेवासी दिल की एक ऐसी बीमारी से ग्रसित हैं जिसे सोना ही ठीक कर सकता है।`` क्रिस्टोफर कोलंबस के शब्दों में- ``  जिसके पास स्वर्ण होता वह दुनिया में जो चाहे वह कर सकता है। और आत्माओं को जन्नत में भी भेज सकता है।`` सन् 1503 में अंटिल्स से बहुमूल्य धातुओं से लदा हुआ पहला जहाज आया। सन् 1519 में मैक्सिको में एजटेकवासियों (14 वीं से 16वीं शताब्दी के मध्य मैक्सिको में एक साम्राज्य था) के खजाने और 1534 में पेरु में इन्का की लूट-खसोट शुरू हुई। स्पेन के साम्राज्य की सेवा करने वाले सिपाहियोंखोजियों और साहसिक अभियान में जुटे लोग 1,300,000 ऑन्स सोना एक ही लदान में ले गए थे।`` (माइकल बोए हिस्ट्री ऑफ कैपिटलिज्म)।

बारतोलोमीयु डियास (जिसने सन् 1487 में केप ऑफ गुड होप से होते हुए समुद्र मार्ग से पूर्व की ओर यात्रा की थी)वास्को द गामा (सन् 1498 में अफ्रीका के किनारे से हुआ भारत पहुंचा था) और कोलंबस की इन `महान खोजों(पश्चिमी इतिहास की नजर में) ने लूटशोषणगुलामी  उपनिवेशवादसाम्राज्यवाद के विस्तार और युद्धों की नींव भी रखी। इनके सहारे पूंजीवाद ने अपने विकास की गाथा लिखी। इन 520 सालों में हर्नान कोर्ते नए-नए रूप में हमारे सामने आता रहा है। वह अब अकेला नहीं है। उसके पास अब बड़ी पूंजी का साम्राज्य है और लोकतंत्र की ढाल है। बहुराष्ट्रीय कंपनियोंताकतवर देशों के शासकोंशक्तिशाली कॉरपोरेट घरानों और राजनेताओं तथा उनके रिश्तेदारों के वेष में हर्नान कोर्ते के क्लोन पूरी दुनिया में मौजूद हैं। सत्ता की मदद से ये हर उस संपदा और संसाधन पर कब्जा कर रहे हैं जिनकी हिफाजत उस पर आश्रित स्थानीय लोग नहीं कर सकते हैं। भारत में हर्नान कोर्ते के अवतार हैं जो खनिजलौह अयस्कजंगलजमीन और नदियों आदि सब कुछ पर कब्जा कर रहे हैं।  

(यह लेख समयांतर पत्रिका के नवंबर-2012 अंक में प्रकाशित हो चुका है) 

कृष्ण सिंह पत्रकार हैं. लंबे समय तक अखबारों में काम. 
अभी पत्रकारिता के अध्यापन में. इनसे संपर्क का पता krishansingh1507@gmail.com है.