टाइम्स ग्रुप : सिटीजन जैन की कहानी


भूपेन सिंह



"...टाइम्स ग्रुप पर लिखा केन ऑलेटा का लेख पूंजीवादी जोड़तोड़ पर टिके हिंदुस्तानी समाज और मीडिया की बेहतरीन बानगी पेश करता है. जिस तरह सिटीजन केन फिल्म में केन के निजी और सामाजिक व्यक्तित्व के आसपास कहानी बुनी गई है वैसे ही ऑलेटा, जैन परिवार के इतिहास को परत दर परत खोलकर यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि अध्यात्म की माला जपने वाला जैन परिवार किस तरह भारतीय मीडिया के नैतिक पतन के लिए ज़िम्मेदार है..."


"तुमसे मुझे सहानुभूति है. तुम समझते हो कि मैं एक बदमाश हूं, मेरे अख़बार को तुरंत बंद कर दिया जाना चाहिए, मेरी जांच के लिए कमेटी गठित की जानी चाहिए. तुम चाहो तो ऐसी कमेटी गठित कर सकते हो. लेकिन मुझसे कमेटी के लिए चंदा लेना मत भूलना." 
-चार्ल्स फॉस्टर केन, अमेरिकन फिल्म सिटीजन केन का प्रमुख पात्र 
"हम समाचारपत्र उद्योग में नहीं हैं, विज्ञापन उद्योग में हैं. अगर आपके मुनाफ़े का नब्बे फ़ीसदी हिस्सा विज्ञापन से आता है तो मतलब साफ़ है कि आप विज्ञापन के धंधे में हैं." 
-विनीत जैन, मैनेजिंग डायरेक्टर, टाइस्म ऑफ़ इंडिया
 

सिटिजन केन फिल्म का एक दृश्य
त्रकारिता के पेशे का कितना ही गुणगान क्यों न किया जाए, मुनाफ़ाखोर मीडिया मालिक उसे एक धंधे से ज़्यादा कुछ नहीं समझते. पूंजीवादी तर्क प्रणाली पर चलने वाले मालिक इतने निरंकुश हो जाते हैं कि वे अपने विरोधियों को जीतने के प्रति हमेशा आश्वस्त रहते हैं. वे बेलगाम होकर काम करते हैं और साम, दाम, दंड, भेद अपनाकर हर तरह के विरोध को खारिज करने की कुव्वत रखते हैं. ऊपर दिए गए केन और जैन के बयानों का मतलब ही यही है कि उन्हें अपने जनविरोधी कामों के लिए किसी का डर नहीं, जिसे जो करना हो कर ले. अमेरिकन साप्ताहिक न्यू यॉर्कर (6 अक्टूबर 2012) ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मालिकाने पर नौ पन्ने का एक विस्तृत लेख छापा है. केन ऑलेटा के इस लेख का शीर्षक है- सिटीजंस जैन: भारत का समाचारपत्र उद्योग क्यों फल-फूल रहा है? (सिटीजंस जैन: व्हाई इंडियाज न्यूज़पेपर इंडस्ट्री इस थ्राइविंग?). लेख में उन्नीस सौ इकतालीस में बनी मशहूर अमेरिकन फिल्म सिटीजन केन का खुलकर जिक्र नहीं है लेकिन शीर्षक ही साफ़ कर देता है कि सिटीजन केन का ही भारतीय संस्करण सिटीजंस जैन है. 

ऑर्सन वेल्स निर्देशित फिल्म सिटीजन केन को अब तक बनी दुनिया की महानतम फिल्मों में से एक माना जाता है. इसमें चार्ल्स फॉस्टर केन नाम के एक ऐसे अरबपति अख़बार मालिक की कहानी है जो मुनाफ़ा कमाने के लिए हर हथकंडा अपनाता है. अमेरिकन अभिजात्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले केन का चरित्र एक धंधेबाज़ की चालाकियों से भरा है. कहा जाता है कि फिल्म की कहानी तत्कालीन मीडिया मुगल विलियम रैन्डोल्फ़ हर्स्ट (1863-1951) के जीवन पर आधारित है. जब फिल्म बनकर तैयार हो गई तो हर्स्ट ने इस फिल्म का प्रदर्शन रोकने के लिए हर संभव कोशिश की लेकिन उसे क़ामयाबी नहीं मिली. हर्स्ट और जोजफ़ पुलित्ज़र (1847 -1911) को पीत पत्रकारिता के जनक के तौर पर याद किया जाता है. भले ही पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में पुलित्जर पुरस्कार को बहुत महान बनाकर पेश किया जाता हो लेकिन एक दौर में यही पुलित्जर महाशय थे जिनके अख़बार न्यू यॉर्क वर्ल्ड और हर्स्ट के अख़बार न्यू यॉर्क जर्नल में प्रसार बढ़ाने के लिए पीत पत्रकारिता की होड़ लगी रहती थी. सिटीजन केन फिल्म एक ख़ास दौर के अमेरिकी मीडिया के अंतर्विरोधों को बहुत अच्छी तरह सामने लाती है. केन का चरित्र सिर्फ़ हर्स्ट पर ही केंद्रित नहीं है उस दौर के कई पूंजीपतियों की जिंदगी उसमें झलकती है. इस लिहाज़ से फिल्म में मीडिया के साथ पूंजीवादी छल-छद्मों के साथ आगे बढ़ रहा उस दौर का अमेरिकी समाज भी अभिव्यक्ति पाता है. 

आज़ादी के बाद से ही भारतीय निजी मीडिया लोकतंत्र के चौथे स्तंभ होने के ढकोसला कर कई तरह की छूट और विशेषाधिकार हासिल करता रहा है. लेकिन नब्बे के दशक में उदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू करने के बाद यह जिस तरह मुनाफ़े की खुली होड़ में शामिल हुआ उसने भारतीय पत्रकारिता के चेहरे को और ज़्यादा विरूपित किया है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की बेईमानियां इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. अमेरिकी समाज में मुनाफ़े पर टिके निजी मीडिया की पोल काफ़ी पहले से ही खुलने लगी थी लेकिन मीडिया आलोचना के पिछड़ेपन और जागरूकता की कमी की वजह से भारत में यह काम अच्छी तरह नहीं हो पाया. केन अमेरिकी पूंजीवति वर्ग का एक प्रतिनिधित्व है. दौलत का अश्लील प्रदर्शन करता उसका महल जैनाडू (जिसके गेट पर हमेशा नो ट्रैस पासिंग का बोर्ड लगा रहता है) भारतीय पूंजीपति मुकेश अंबानी की सत्ताईस मंजिला इमारत अंटालिया की याद दिलाता है (मुकेश अंबानी भी अब टीवी 18 और इनाडु टीवी के चैनलों को हथियाकर भारतीय मीडिया के बड़े हिस्से को नियंत्रित कर रहे हैं). टाइम्स ग्रुप पर लिखा केन ऑलेटा का लेख पूंजीवादी जोड़तोड़ पर टिके हिंदुस्तानी समाज और मीडिया की बेहतरीन बानगी पेश करता है. जिस तरह सिटीजन केन फिल्म में केन के निजी और सामाजिक व्यक्तित्व के आसपास कहानी बुनी गई है वैसे ही ऑलेटा, जैन परिवार के इतिहास को परत दर परत खोलकर यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि अध्यात्म की माला जपने वाला जैन परिवार किस तरह भारतीय मीडिया के नैतिक पतन के लिए ज़िम्मेदार है. 

जिस तरह की पीत पत्रकारिता हर्स्ट और पुलित्ज़र ने की थी या सिटीजन केन के मुख्य पात्र केन ने की थी, ठीक उसी तरह की पत्रकारिता आज हिंदुस्तान में भी चल रही है. टाइस्म ग्रुप इसका सिरमौर है. टाइम्स ग्रुप यानी बैनट, कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड (बीसीसीएल) हिंदुस्तान के सबसे बड़े मीडिया कॉन्गलोमरेट में से एक है. इसके पास दुनिया के सबसे ज़्यादा प्रसार वाला अंग्रेजी दैनिक अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया है. ऑडिट ब्यूरो ऑफ़ सर्कुलेशन के मुताबिक़ जिसकी प्रसार संख्या तैंतालीस लाख से ज़्यादा है और इंडियन रीडरशिप सर्वे के आधार पर जिसकी पाठक संख्या क़रीब अस्सी लाख पहुंच चुकी है. यह अख़बार देश के इक्कीस बड़े शहरों से प्रकाशित होता है. इस ग्रुप के पास हिंदी के नवभारत टाइम्स समेत क़रीब एक दर्जन  दैनिक प्रकाशन हैं. अक्टूबर महीने से इसने पश्चिम बंगाल में बांग्ला अख़बार आनंद बाज़ार पत्रिका से टक्कर लेने के लिए एई समय अख़बार शुरू किया है. तीस कामयाब पत्रिकाएं, बत्तीस एफएम रेडियो स्टेशन, दो न्यूज़ चैनल, एक लाइफ़ स्टाइल चैनल, एक फिल्मी चैनल के अलावा इंटरनेट के बाज़ार के बड़े हिस्से पर भी इसका कब्ज़ा है. देखा जाए तो भारतीय मीडिया के एक बड़े हिस्से को टाइम्स ग्रुप नियंत्रित करता है. इस तरह यह समूह मीडिया का संकेद्रण अपने पास कर देश में सूचनाओं और विचारों की विविधता को भी ख़त्म करने का काम भी कर रहा है. 

केन ऑलेटा टाइम्स ग्रुप की कामयाबी के राज से पर्दा हटाते हैं. आम तौर पर कभी मीडिया के सामने न आने वाले जैन परिवार से सदस्यों से संपर्क कर वह शैतानी दीमागों का नक्शा बाहर ले आते हैं. विनीत जैन उन्हें मीडियानेट नाम की करतूत का आइडिया बताते हैं. मीडियानेट का मतलब सीधे-सीधे पेडन्यूज़ है जिसे टाइम्स ग्रुप दिल्ली टाइम्स या मुंबई टाइम्स के नाम से खुलेआम छापता है और उसे रोकने वाला कोई नहीं है. आम तौर पर पेजथ्री नाम से पहचाने जाने वाले इस अख़बार में ग्लैमर की दुनिया के जाने-माने लोगों की मौजूदगी वाली पार्टियों की तस्वीरें छापी जाती है बदले में आयोजकों से पैसा वसूला जाता है. विनीत जैन, ऑलेटा को बताते हैं कि वर्जिन ग्रुप चलाने वाले अंग्रेज अरबपति रिचर्ड ब्रैनसन के इंटरव्यू को पढ़ने के बाद उनको यह आइडिया आया. जिसमें ब्रेनसन की कंपनी ऐसे कार्यक्रम आयोजित करवाती है जिसको कवर करवाना बाज़ारू मीडिया को ज़रूरी लगे,  इस बहाने आयोजक कंपनी का मुफ़्त में प्रचार हो जाता है. उसे करोड़ों रुपए के विज्ञापन देने की ज़रूरत नहीं पड़ती. आयोजकों की तरफ़ से ब्रांड प्रमोशन का हथकंडा समझ में आने के बाद 2003 से जैन बंधुओं ने इस तरह के कार्यक्रमों को कवर करने पर पैसा वसूलना शुरू कर दिया यानी अगर विल्स फ़ैशन वीक चल रहा है तो कंपनी आयोजकों से उसे प्रकाशित करने के लिए पैसा वसूलेगी. आम पाठकों को मुनाफ़े के इस खेल की कोई भी जानकारी नहीं रहती है. बहुत सारी आलोचनाओं के बाद अब अख़बार ने छोटे से अक्षरों में दिल्ली टाइम्स या मुंबई टाइम्स के नीचे एडवर्टोरियल शब्द लिखना शुरू किया है. 

मीडियानेट के अलावा विनीत के बड़े भाई समीर जैन के दीमाग की उपज मीडिया ट्रीटी या ब्रांड कैपिटल ने भी भारतीय पत्रकारिता का मज़ाक बनाया है, ऑलेटा इस बात का ज़िक्र करते हैं. इस चालाकी के तहत टाइम्स ऑफ़ इंडिया कई छोटी कंपनियों से विज्ञापन लेकर बदले में उनकी कंपनी में हिस्सेदारी ख़रीद लेते हैं. इस तरह क़रीब तीन सौ पचास कंपनियों के साथ टाइम्स ऑफ़ इंडिया की प्राइवेट ट्रीटी है यानी अख़बार की उनमें हिस्सेदारी है. अख़बार के इस क़दम की भी आलोचना होती  रही है लेकिन बिना किसी ठोस कानून के अभाव में अख़बार पत्रकारीय नैतिकता को ठेंगा दिखाता रहता है. अगर किसी अख़बार की दूसरी कंपनी में भी हिस्सेदारी हो तो क्या वह उस कंपनी से संबंधित विवादास्पद ख़बरों को तटस्थ होकर प्रसारित कर सकेगा? अख़बार का तर्क है कि इसका कोई असर नहीं पड़ता लेकिन मीडिया आलोचक सेवंती नैनन की साइट द हूट ने सबूतों के साथ इस बात पर से पर्दा हटाया कि कैसे टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने प्राइवेट ट्रीटी वाली बैंगलूरू की एक कंसट्रक्शन कंपनी शोभा डेवेलपर्स की ख़बर में बेईमानी की. इस कंपनी में हुई दुर्घटना में दो मजदूरों की मौत हुई थी और सात लोग घायल हो गए थे. अख़बार ने कंस्ट्रक्शन कंपनी का नाम छिपा दिया. टाइम्स का कहना है कि उनके विजनेस विभाग का संपादकीय कामों में कोई दखल नही है लेकिन अख़बार में विज्ञापनों की मौजूदगी देखकर कोई भी अनुमान लगा सकता है कि वहां बिजनेस विभाग का हस्तक्षेप कितना ज़्यादा है. कई बार तो अख़बार ने विज्ञापन का जैकेट पहना होता है जिसकी क़ीमत  करीब तीन करोड़ तक होती है. विज्ञापन के लिए अख़बार कुछ भी दांव पर लगा सकता है. ग्रुप के पुराने और भरोसेमंद मैनेजरों में से एक भास्कर दास कहते हैं कि “जब विज्ञापनदाताओं की सफ़लता ही हमारी सफ़लता है, विज्ञापनदाता चाहते हैं कि हम उनके उत्पादों का उपभोग बढ़ाने में मददगार साबित हों ” केन ऑलेटा का लेख भारतीय मीडिया और ख़ासतौर पर टाइम्स ग्रुप के बारे में इस तरह के चौंकाने वाले कथनों और जानकारियों से भरा पड़ा है. दास  का उपरोक्त कथन मीडिया विशेषज्ञ डैलस स्माइथ की याद दिलाता है कि जहां वे कॉरपोरेट बाध्यताओं के बारे में कहते हैं कि अख़बारों का काम पाठकों को विज्ञापनदाताओं के हवाले कर देना है. इस तरह के हथकंडे टाइम्स ऑफ़ इंडिया की आर्थिक सफ़लता का राज हैं.

दो हज़ार नौ में लोकसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक पेड न्यूज़ का मामला ज़ोर-शोर से उठा था. आम चुनाव के साथ ही हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव थे. इन चुनावों में कई अख़बारों ने बड़ी बेशर्मी से पार्टियों और उम्मीदवारों के पक्ष में ख़बर छापने के लिए उनसे पैसे मांगे थे. द हिंदू के पत्रकार पी साईनाथ ने उदाहरणों के साथ यह बात साबित करने की कोशिश की कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया और महाराष्ट्र में उसके सहयोगी मराठी प्रकाशन महाराष्ट्र टाइम्स पेड न्यूज़ छापने में सबसे आगे थे. अख़बार ने पत्रकारिता की  सारी नैतिकता को किनारे लगाकर महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के पक्ष में पेड न्यूज़ छापी थी. बाद में प्रेस परिषद की परंजॉय गुहा ठकुरता और के श्रीनिवास रेड्डी वाली रिपोर्ट में भी पेड न्यूज़ के लिए टाइम्स समूह को दोषी पाया था. ठोस कानूनों के अभाव में टाइम्स समूह के अख़बारों समेत सभी पेड न्यूज़ छापने वाले सभी दोषी अख़बार मालिक पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वंत्रता के नाम पर सारे लोगों को बेवकूफ़ बना रहे हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की बेईमानियों का कोई अंत नहीं है. आठ अगस्त दो हज़ार ग्यारह को टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने रीपिंग गोल्ट थ्रू बीटी  कॉटन नाम का एक एडवर्टोरियल छापा. रिपोर्टर के नाम से छपी इस रिपोर्ट को किनारे में छोटे अक्षरों में एडर्टोरियल लिख कर बड़ी चालाकी से समाचार की तरह छापा गया था. इस रिपोर्ट में कहा गया था कि बहुराष्ट्रीय कंपनी मॉनसेंटो के बीटी कॉटन बीज अपनाने के बाद विदर्भ इलाक़े के एक गांव की समृद्धि की चर्चा थी. पी साईनाथ ने एक बार फिर टाइम्स ऑफ़ इंडिया और मॉन्सेंटो कंपनी की पोल खोली. उन्होंने बता लगाया कि ठीक तीन साल पहले यही एडवर्टोरियल टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक ख़बर के तौर पर शब्दश: छप चुका था. दो हज़ार तीन से महाराष्ट्र के विदर्भ इलाक़े में क़रीब तैंतीस हज़ार किसान आत्महत्या कर चुके हैं. साईनाथ ने पाया कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया में रिपोर्ट और एडवर्टोरियल के तौर पर छपी बातों में कुछ भी सच्चाई नहीं. गांव की समृद्धि की बात पूरी तरह झूठ है. मतलब साफ़ है कि यहां भी टाइम्स ने बहुराष्ट्रीय कंपनी मॉन्सेंटो से पैसे लेकर झूठी ख़बर छापी थी. हैरत की बात तो यह है कि इस बात के चर्चा में आने के बाद भी टाइम्स ग्रुप पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाई. उसके मालिकों को यह भरोसा ज़रूर मज़बूत हुआ होगा कि जो कुछ भी कर लें उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. 

संपादकीय विवेक को जैन बंधु पत्रकारिता के लिए ठीक नहीं मानते हैं. उनका मानना है कि पढ़े-लिखे लोग व्यापार की ज़रूरतों को नहीं समझते है. यही वजह है कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया के प्रकाशनों में संपादकों को किनारे लगाकर ब्रांड मैनेजरों का चलन बढ़ता जा रहा है. ऑलेटा ब्रांड मैनेजरों का जिक्र नहीं करते लेकिन वे यह ज़रूर बताते हैं कि किस तरह जैन बंधुओं ने अपनी कंपनी के ज़्यादातर मैनेजरों की नियुक्ति मीडिया पृष्ठभूमि वाले लोगों की बजाय पेप्सी-यूनीलीवर या अन्य प्रोडक्ट बेचने वाली कंपनियों के मैनेजरों को रखकर की है ताकि वे ख़बरों को विशुद्ध तौर पर एक उत्पाद समझकर उसे बेच पाएं. इस सिलसिले में टाइम्स ग्रुप के सीईओ रवि धारीवाल आउटलुक पत्रिका के वार्षिकांक (2010) में सार्वजनिक तौर पर भी मान चुके हैं कि ख़बर उनके लिए उत्पाद के अलावा और कुछ नहीं है.  

जिस तरह सिटीजन केन फिल्म अख़बार चलाने वाले केन की कहानी को कई पहलुओं को सामने लाती है वैसे ही सिटीजंस जैन नाम का यह लेख जैन परिवार का बहुत ही गहराई से विश्लेषण करता है. चार्ल्स  केन और जैन बंधुओं के व्यक्तित्व में कुछ फ़र्क भी है लेकिन पत्रकारिता को मुनाफ़े का धंधा बनाने का उनका मक़सद एक है. केन  और जैन दोनों ही असामान्य व्यक्तित्वों के स्वामी भी हैं. केन के विपरीत जैन बंधुओं की सार्वजनिक उपस्थिति बहुत ही कम है. इस सिलसिले में उनके सीईओ रवि धारीवाल का कहना है कि अगर वे सार्वजनिक तौर पर इंटरव्यू देने लगेंगे तो हो सकता है कि लोगों को हमारी बिजनेस की सफ़लता का राज़ समझ में आ जाए. धारीवाल चाहे जो भी कहें भारतीय मीडिया उद्योग टाइम्स ऑफ़ इंडिया से धंधेबाज़ी के अनैतिक रास्ते सीख चुका है और उस पर लगातार तेज़ी से आगे बढ़ रहा है. आज कमोबेश भारतीय कॉपरोरेट मीडिया किसी न किसी मामले में टाइम्स ग्रुप की नकल ज़रूर कर रहा है. इसलिए अगर केन ऑलेटा ने अपने लेख में टाइम्स ग्रुप के बहाने भारतीय मीडिया उद्योग के फलने-फूलने के कारणों को जानना चाहा है तो यह उदाहरण बिल्कुल सटीक बैठता है. 

दिल्ली में टाइम्स ऑफ़ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स के बीच अख़बार की कीमत का युद्ध (प्राइज वॉर) अभी बहुत पुराना नहीं हुआ है. दिल्ली में नंबर एक हिंदुस्तान टाइम्स को पीछे छोड़ने के लिए 1994 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने अख़बार की कीमत कभी डेढ़ तो कभी एक रुपया कर दी. 1998 आते-आते अख़बार पहले नंबर पर आ गया. ऑलेटा इस बात का पता लगाते हैं कि समीर के दीमाग में यह आइडिया कहा से आया. समीर एक सोमवार को अपने जन्म स्थान कोलकाता में थे. वहां वे एक चिड़ियाघर गए तो उन्होंने पाया कि सोमवार के कामकाज़ी दिन को ध्यान में रखकर चिड़ियाघर वालों टिकट के दाम में कुछ छूट दी हुई है वहीं से समीर ने यह आइडिया उड़ाया और फिर दिल्ली में अपने अख़बार का आमंत्रण मूल्य रख कर हिंदुस्तान टाइम्स को पीछे छोड़ दिया. लेकिन इस घटना के निहितार्थों को सिर्फ़ आइडिया के लिहाज़ से नहीं समझा जा सकता है, इससे यह भी पता चलता है कि धंधे में प्रतिद्वंद्वी कंपनियां किस तरह  कीमत घटा कर बाज़ार से छोटी कंपनियों को बाहर कर देती हैं. प्रतिस्पर्धा के बाद जब एक या दो ही मुख्य कंपनियां बची रह जाती हैं तो वह अपने  हिसाब से मनमानी पर उतारू हो जाती है.  जैन बंधुओं ने अपने अख़बार को आगे बढ़ाने के लिए और भी कई हथकंडे अपनाए. जो कई बार चार्ल्स फॉस्टर केन की पहलकदमियों से मिलते-जुलते से लगते हैं. समीर जैन अपने मैनेजरों से कहते हैं कि उनका अख़बार युवा दिखना चाहिए. विनीत जैन इस बात की खुलकर तारीफ़ करते हैं और कहते हैं कि अख़बार को पढ़कर हमेशा लोगों में जोश और उमंग का बातारण बनना चाहिए. नकारात्मक और दुखी करने वाली ख़बरें उसमें कम से कम होनी चाहिए. समीर का कहना है कि हम गिलास आधा खाली है कहने के बजाय गिलास आधा भरा कहने में भरोसा रखते हैं. यही वजह है कि टाइम्स ऑफ इंडिया में हमें देश की ग़रीबी, भुखमरी और बदहाली से जूझते लोगों के संघर्ष के बजाय सिर्फ़ चमकता और खुशी से नाचता-गाता हुआ इंडिया दिखाई देता है. वैसे भी इस अख़बार का इतिहास आम जनता के सवालों से कन्नी  काटने का ही रहा है. 

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की शुरुआत अंग्रेजों ने 1838 में ही कर दी थी. बाद में लंबे अरसे तक यह अंग्रेजी हितों के लिए ही चलता रहा. 1948 में रामकृष्ण डालमिया ने इसे ख़रीद लिया और इसकी ज़िम्मेदारी अपने दामाद शांतिप्रसाद जैन को सौंप दी. साठ के दशक की शुरुआत में धोखेबाज़ी के एक केस में डालमिया जेल चला गया और जब जेल से बापस लौटा तो बेटी और दामाद ने कंपनी को हड़प चुके थे. साठ के दशक में ही शांतिप्रसाद जैन के बेटे अशोक जैन ने कंपनी का कार्यभार अपने हाथ में ले लिया. अशोक जैन के बेटे समीर ने 1975 में कंपनी में काम करना शुरू किया. तब कंपनी जूट, सीमेंट और टैक्सटाइल के धंधे में भी थी. समीर ने सिर्फ़ अख़बार पर फोकस किया. नब्बे के दशक में अपने नाना की तरह ही अशोक जैन पर भी धोखाधड़ी के आरोप लगे. 1998 में उसे विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम (फेरा) के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार किया गाया. अशोक ने हार्टसर्जरी के बहाने अमेरिका में शरण ली, एक साल बाद उसकी मौत हो गई. इस पूरी घटना में एचके दुआ को संपादक पद से हाथ धोना पड़ा था. दुआ का कहना था कि अशोक जैन ने उनसे फेरा के आरोपों से मुक्त करवाने के लिए राजनीतिक दबाव बनाने के लिए कहा था. उनके मना करने पर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. 

अब जैन परिवार के समीर और विनीत ही धंधे को संभालते हैं. उनकी मां इंदु जैन कंपनी की अध्यक्ष हैं, समीर जैन उपाध्यक्ष हैं तो विनीत जैन मैनेजिंग डायरेक्टर. अस्सी की होने जा रहीं इंदु जैन कविताएं भी लिखती रही हैं. हिंदी फिल्म चश्मे बद्दूर के अलावा कुछ और फिल्मों के गाने भी उन्होंने लिखे हैं. वह भारतीय ज्ञानपीठ ट्रस्ट की भी अध्यक्ष हैं. देश का तथाकथित सबसे बड़ा साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ, यही घराना देता है. परिवार में हुई कुछ मौतों के बाद अठावन साल के विनीत अब काफ़ी अध्यात्मिक हो चुके हैं. उनका ज़्यादातर वक़्त या तो काम में या फिर अपने अध्यात्मिक गुरु के पास हरिद्वार में बीतता है. उनके सीईओ रविधारीवाल बताते हैं कि समीर हर काम करने से पहले यह ज़रूर पूछते हैं कि काम (स्प्रिचुअली) अध्यात्म के हिसाब से ठीक होगा कि नहीं? जिस तरह सिटीजन केन में मुख्य पात्र केन के जीवन के कई पहलू सामने आते हैं वैसे ही केन ऑलेटा के लेख में समीर जैन मुख्य पात्र हैं. बाक़ी सब सहायक कलाकार हैं. अंग्रेजी लेखिका नमिता गोखले को उद्धृत करते हुए ऑलेटा कहते है कि एक बार किसी मीटिंग में समीर ने नमिता से कहा कि मैं सोचता हूं इतिहास का कोई अस्तित्व नहीं है, अगर मैं प्रधानमंत्री होता तो इतिहास के अध्ययन को प्रतिबंधित कर देता. इसके जवाब में गोखले ने कहा कि मैं तुम्हें दो झन्नाटेदार थप्पड़ और एक लात मारती हूं और तुम्हें कुछ याद नहीं रहेगा तो मैं मान जाऊंगी कि इतिहास नहीं होता है. समीर मुस्कराते हुए निकल गया और उस शाम फिर नमिता से नज़र बचाने की कोशिश करता रहा. 

ऑलेटा ने समीर जैन की ज़िंदगी की त्रासदियों और उसकी सनकों को भी समझने की कोशिश की है. जहां एक तरह वह चरित्र हर काम को स्प्रिचुअली ठीक करना चाहता है वहीं मुनाफ़े की  होड़ में अनैतिकता की हर हद पार करता जाता है. तथाकथित अध्यात्मिक लोगों का दोगलापन भी इस चरित्र में देखने को मिलता है. ऑलेटा जैन बंधुओं के व्यक्तिगत संसार का खाका खींचते हुए बताते हैं कि बूढ़े होते जा रहे समीर को जहां साधुओं की संगति के लिए जाना जाता है वहीं अधेड़ और तलाकशुदा विनीत को कमसिन लड़कियों की संगति के लिए जाना जाता है. इसमें समीर जैन की बेटी त्रिश्ला का भी ज़िक्र है. जो अमेरिका में पढ़ाई के दौरान भारतीय मूल के एक अमेरिकी युवक से शादी कर चुकी है और फिलहाल समीर अपने दामाद को भी कंपनी का काम संभालने में लगा चुके हैं. इन सबसे बढ़कर इस लेख का महत्व यह है कि इसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय मीडिया में चल रही अनियमितताओं की तरफ़ दुनियाभर का ध्यान खींचने का काम किया है. इससे यह भी साबित होता है कि टाइम्स ग्रुप ने भारतीय समाचार माध्यमों के लिए पतनशीलता का जो मॉडल पेश किया है वह सिटीजन केन के चार्ल्स फॉस्टर केन की करतूतों को भी पीछे छोड़ने वाला है. देश की सरकार पत्रकारिता के नाम पर चल रही इस बेईमानी और लूट पर कुछ भी बोलने को तैयार नहीं. जैन बंधु केन की तरह चुनौती दे रहे हैं जिसे जो करना हो कर ले! 

भूपेन पत्रकार और विश्लेषक हैं। 
कई न्यूज चैनलों में काम। अभी आईआईएमसी में अध्यापन कर रहे हैं। 
इनसे bhupens@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।