काँग्रेस राज : जहां लकवा लाइलाज है

सत्येंद्र रंजन

"...गौरतलब यह है कि सरकार के लकवाग्रस्त होने की टूटी छवि सिर्फ एकांगी रूप से टूटी है। अगर खुद सरकार द्वारा घोषित तीन प्रस्तावित कदमों को कसौटी बनाएं, तो यह साफ होगा कि सरकार का वह पूरा अंग, पक्षाघात से निरंतर अधिक निष्क्रिय होता जा रहा है, जिसका रुख आम आदमी की तरफ है।..." 

देश के शेयर बाजारों में समय से पहले दिवाली आ गई है, क्योंकि सरकार की नीति संबंधी निर्णय लेने की क्षमता को लकवा मार जाने (पॉलिसी पैरालिसिस) की धारणा टूट गई है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह में फिर से वही संकल्प दिख रहा है, जो 2005-08 के बीच अमेरिका से असैनिक परमाणु सहयोग समझौते के मुद्दे पर दिखा था। तब उन्होंने वाम मोर्चे के सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा की परवाह न करते हुए उस समझौते को उसके अंजाम तक पहुंचाया था। इस बार ममता बनर्जी के समर्थन को दांव पर लगा कर उनकी सरकार ने खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी और डीजल एवं रसोई गैस पर सब्सिडी घटाकर राजकोषीय सेहत बहाल करने का कदम उठाया। उसके बाद से आर्थिक सुधार संबंधी घोषणाओं का ऐसा सिलसिला चला है, जिसे देख कर सचमुच ये हैरत होती है कि आखिर गठबंधन की सीमाएं अचानक कहां गायब हो गईं?  
ममता बनर्जी के समर्थन वापस लेने के बाद प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि यूपीए सरकार ने जो कदम उठाए, वे देश की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए जरूरी हैं। उससे पहले खुदरा कारोबार में एफडीआई की इजाजत देने के बाद उन्होंने कहा कि अगर उनकी सरकार इस मुद्दे पर गिरती है, तो वे लड़ते हुए इसे गंवाना पसंद करेंगे। यह नजरिया सचमुच उल्लेखनीय है। सरकार ने वैसे कदम उठाए हैं, जिन पर कांग्रेस नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबंधन के कई बड़े घटक एवं समर्थक दल सहमत नहीं हैं। यह नजरिया उठाए गए कदमों के प्रति वास्तविक आस्था और उसके लिए सत्ता कुर्बान करने के इरादे की झलक देता है। डॉ. सिंह और उनके वित्त मंत्री पी चिदंबरम के इसी संकल्प ने कॉरपोरेट जगत में उत्साह का माहौल बनाया है। इस अर्थ में डॉ. सिंह सचमुच निवेशकों की “एनिमल स्पीरिट” को जगाने में कामयाब रहे हैं।

लेकिन विडंबना यह है कि अगर उस आम आदमी के नजरिए से इस सारे घटनाक्रम को देखा जाए, कांग्रेस जिसके साथ होने का दावा करती है, तो कई आशंकाएं पैदा होती हैं। मसलन, सरकार राष्ट्रीय निवेश बोर्ड (एनआईबी) बनाने जा रही है, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होंगे। इस बोर्ड की कल्पना सिंगल विंडो के रूप में की गई है, जहां से सभी निवेश परियोजनाओं को मंजूरी मिल सकेगी। चर्चा है कि जो परियोजनाएं पर्यावरण और वन संरक्षण एवं वनाधिकार जैसे कानूनों के विपरीत जाने के कारण अटक गई हैं, उन्हें यह बोर्ड मंजूरी देगा। अगर ऐसा सचमुच होता है, तो उसके निहितार्थों को समझा जा सकता है। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि जिस समय “एनिमल स्पीरिट” अपने उफान पर है, देश की एक प्रमुख अंग्रेजी पत्रिका ने पर्यावरण संबंधी चिंताओं को “ग्रीन टेरर” यानी हरित आतंकवाद करार दिया है। उसने पर्यावरण एवं ग्रामीण विकास मंत्रालयों को गुजरे जमाने के नियमों से चिपका हुआ बताया है। अगर सचमुच एनआईबी का वही मतलब है, जैसा मीडिया में बताया गया है, सचमुच यह वंचित तबकों के लिए सतर्क हो जाने का वक्त है।

गौरतलब यह है कि सरकार के लकवाग्रस्त होने की टूटी छवि सिर्फ एकांगी रूप से टूटी है। अगर खुद सरकार द्वारा घोषित तीन प्रस्तावित कदमों को कसौटी बनाएं, तो यह साफ होगा कि सरकार का वह पूरा अंग पक्षाघात से निरंतर अधिक निष्क्रिय होता जा रहा है, जिसका रुख आम आदमी की तरफ है। मसलन, प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून पर गौर करें। इसे कांग्रेस के सामाजिक एजेंडे के रूप में प्रचारित किया गया। इसका जो खाका सामने आया, उससे उम्मीद बंधी कि अंततः विस्थापित होने वाले भूमि निर्भर समुदायों का अपेक्षाकृत बेहतर एवं न्यायपूर्ण पुनर्वास हो सकेगा। लेकिन यूपीए सरकार के उद्योग, व्यापार एवं बुनियादी ढांचे से संबंधित मंत्रियों ने इसे कैबिनेट की मंजूरी नहीं मिलने दी। तब ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि जैसे भारतीय संविधान का एक बुनियादी ढांचा है, वैसे ही इस कानून का भी एक मूल स्वरूप है, जिस पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। लेकिन चूंकि उद्योग जगत में प्रस्तावित कानून को “एनिमल स्पीरिट” के खिलाफ माना गया है, इसलिए अब खबर है कि उसके किसान समर्थक प्रावधानों को नरम बनाया जा रहा है। फिर भी यह तय नहीं है कि यह कानून पास हो सकेगा। बहरहाल यह जरूर तय है कि अगर हुआ तो कानून उन उम्मीदों के मुताबिक नहीं होगा, जो पिछले पांच साल के राय-मशविरे और कांग्रेस के वादों से पैदा हुई थीं।

पिछले आम चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी ने खाद्य सुरक्षा कानून बनाने का वादा जोरशोर से किया था। इसके लिए सरकार ने जो विधेयक बनाया, वह सिविल सोसायटी तो दूर, खुद सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार समिति की अपेक्षाओं को भी पूरा नहीं करता है। लेकिन वह विधेयक भी किस अवस्था में है और उसे कब संसद में पेश किया जाएगा, इसका कोई खाका देश के सामने नहीं है। कृषि मंत्री शरद पवार इसे राजकोष की सेहत पर प्रहार बता चुके हैं। दरअसल, उन्होंने राजकोषीय अनुशासन की कॉरपोरेट जगत की धारणा को ही व्यक्त किया है, जिसके मुताबिक चलना इस सरकार की प्राथमिकता है। ऐसे में खाद्य सुरक्षा का सवाल अगर अंधेरी सुरंग में ही सफर करता रहे, तो कोई हैरत नहीं होगी।   

अब उन हजारों भूमिहीनों और आदिवासियों की पदयात्रा पर ध्यान दीजिए, जिन्होंने गांधी जयंती को ग्वालियर से दिल्ली के लिए कूच किया। यात्रा रोकने पर आयोजकों को राजी करने के मकसद से दो केंद्रीय मंत्री -जयराम रमेश और जोतिरादित्य सिंधिया- उस रोज ग्वालियर गए। लेकिन भूमिहीनों ने अगर मंत्रियों के वादों पर यकीन नहीं किया, तो उसकी वाजिब वजहें हैं। पांच साल पहले जब गैर-सरकारी संगठन एकता परिषद के बैनर तले ऐसी ही यात्रा दिल्ली आई थी, तब केंद्र सरकार ने उनकी समस्याएं सुलझाने का वादा किया था। उसके बाद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय भूमि-सुधार परिषद का गठन हुआ। लेकिन उसके बाद आज तक उसकी एक भी बैठक नहीं हुई। इसीलिए पदयात्रा पर निकले लोग अब समयबद्ध समझौता चाहते हैं। लेकिन केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों ने यह कहते हुए इससे इनकार कर दिया कि जमीन राज्यों के अधिकार क्षेत्र का मामला है, इसलिए वे ऐसा समझौता नहीं कर सकते, जिसे लागू करना केंद्र के लिए संभव नहीं हो। यह याद रखने की बात है कि दिल्ली को लक्ष्य कर 26 दिन की ये यात्रा अपने अंतिम दौर में भले मध्य प्रदेश से निकली हो, लेकिन इसका संदर्भ राष्ट्रीय है। यात्रा के आयोजक चाहते हैं कि देश भर में अतिरिक्त जमीन को इकट्ठा कर उसका बंटवारा भूमिहीनों में किया जाए, हर भूमिहीन को आवास के लिए जमीन मिले, पेसा यानी पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र तक विस्तार) कानून और वन अधिकार कानूनों में ऐसे संशोधन हों, जिसके तहत आदिवासियों से बिना सहमति के उनकी जमीन अधिग्रहीत न की जा सके, और भूमि संबंधी विवादों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनें। इन मांगों का संबंध कानून पर प्रभावी अमल एवं संविधान की मूल भावना के मुताबिक न्याय से है। लेकिन अगर ये मांगें मानी गईं, तो “एनिमल स्पीरिट” में फिर से उतार आ सकता है, क्योंकि तब प्राकृतिक संसाधनों का पूंजी के हित में दोहन कठिन हो जाएगा। इससे आर्थिक विकास की दर प्रभावित होगी, जो नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था का केंद्रीय बिंदु है। नव-उदारवाद में निवेशकों को लगभग ईश्वर का दर्जा है, ऐसे में ऐसी बातें सोचना, जिनसे उनकी भावनाएं आहत होती हों, ईशनिंदा जैसी बात है!
 
बहरहाल, राष्ट्रीय निवेश बोर्ड के लिए उत्साह और राष्ट्रीय भूमि-सुधार परिषद की दुखद परिणति सरकारी प्राथमिकताओं की वास्तविक कथा है। इसीलिए अगर रोमन देवता जेनस के रूप में सरकार को देखें, तो उसका एक तरफ का चेहरा आज दमकता लगता है, जबकि दूसरी तरफ वह क्षत-विक्षत है।


सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.