प्रकाश झा का चक्रव्यूह


अंकित फ्रांसिस 

"...दरअसल प्रकाश इस बात को समझ ही नहीं पाते कि उन्होंने जिस विचार को लेकर मुनाफे के लिए फिल्म बनाई है उस विचार के मूल में उसी मुनाफाखोरी का विरोध करना छुपा है. वेदान्त की जगह मेदंता और नंदीग्राम कि जगह नंदीगढ़ को लेकर आडम्बर रचने कि कोशिश तो कि गई है लेकिन उससे सभी कुछ छुप नहीं पाता..." 

बात इसी से शुरू करते हैं की जब आप पहले ही नक्सलवाद को समस्या मानकर शुरुआत करतें हैं तो इससे खुद को अनजाने में एक ‘चक्रव्यूह’ में कैद कर लेते हैं. आप खुद को टेबल के इधर खड़ा कर लेते हैं और फिर सड़कों और अंतर्राष्ट्रीय विश्वविधालय की स्थापना से विकास की इबारतें गड़ने के सुनहरे सपनें देखने और दिखाने में मशगूल भी हो जातें हैं. इसके बाद आप समाधान, डेमोक्रेसी और मीडिया जनित टेबल टाक, एसऍमएस के जरिये अहिंसा का पाठ पढ़ा कर वर्षों से उपेक्षित आदिवासियों-पिछड़ों की उपेक्षा करने वाली कड़ी में जुडी़ एक और कड़ी  बन जातें हैं. जहाँ हम डर से या लालच से सोनी सोरी, कोबाद गाँधी, जीतन मांझी और वारवरा राव का नाम लेने में भी हिचकते हैं. हम नहीं पूछ पाते कि आखिर एक दम्भी लोकतंत्र में अंकित गर्ग जैसे राक्षस एक औरत के साथ किस अधिकार से जानवरों से भी बदतर सलूक कर राष्ट्रपति सम्मान पा जाता है, जीतन मांझी को अदालत फांसी क्यों सुना देती है और एक बूढ़े कवि से क्यों इतना बड़ा लोकतंत्र घबरा रहा है?


प्रकाश झा अक्सर ऐसे ही किसी पांडित्य के चलते कहीं के भी नहीं रह पाते. जब आप हाल ही में प्रदर्शित इनकी फिल्म चक्रव्यूह को देखते है तो पातें हैं की भारतीय पुलिस कितनी बहादुर है, देश के लिए मरने-मारने को तैयार, पुलिस में कुछ भ्रष्ट हैं और कुछ अच्छे भी. यही हाल दूसरी तरफ नक्सलियों का भी हैं. वहां भी कुछ अच्छे हैं और कुछ बुरे हैं. पुलिस को पूंजीपति बिगाड़ रहें हैं और इन्हें (नक्सली) सत्ता हथियाने का सपना. मगर बात जहाँ आकर अटक जाती है जो कि फिल्म में आप नहीं देख पाते कि जिन २०० जिलों का ज़िक्र फिल्म की  शुरुआत में प्रकाश ने किया वहां रहने वाले लोग फिल्म से नदारत क्यों हैं. फिल्म के एक सीन में उन आदिवासियों को दिखाया गया है लेकिन फिल्म का वो सिक्वेंस भी लगभग हास्यास्पद सा बन पड़ा है. इस सीन में फिल्म का पुलिसिया नायक गाँव पहुँचता है उसे देखकर लोग भागने लगते हैं. वो बड़ी मुश्किल से पैर में चोट लगे एक आदिवासी को धर लेता है और उसके घाव पर क्रीम लगा साठ साल से जारी उपेक्षा और दमन की महफ़िल को लूट लेता है. पूरी फिल्म में खुद को समझदार और लगभग रास्ता दिखाने वाले कि भूमिका में प्रकाश खुद को पाते हैं. और इस सीन में पुलिसिया नायक गाँव का विश्वास पाने की स्थिति में भी पहुँच जाता है. यहाँ प्रकाश मानकर चलते हैं कि आदिवासी तो बेफकूफ और जंगलों में रहने वाले पागल हैं जो कि शहर में आने के लिए मरे जा रहें हैं. अगर उन्हें विकास न मिला तो वे ऐसे ही मर जायेंगे. न तो उनके पास खाने को है नहीं उनकी अपनी कोई अस्मिता है. फिल्म उसी एजेंडे को पोषित करती है जहाँ से इस तरह कि फिल्मों की पोलिटिक्स की  शुरुआत होती है. फिल्म लगातार वकालत करती है कि आदिवासी भी विकास चाहते हैं वो भी दिल्ली, मुंबई जैसा. जहाँ उनके बच्चे कॉलसेंटरों में नौकरी करें और मंदी के बहाने जब चाहे उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाये. पुलिसिया नायक भी बार-बार इसी विकास का समर्थन करता दिखाई पड़ता है. बार-बार गांधवादी अंदाज़ में बन्दूक से फैसले नहीं होते बातें दोहराता है लेकिन वक़्त पड़ने पर सबसे ज्यादा गोलियां उसी की बन्दूक से निकलती हैं. अपने खबरी से नक्सली बने दोस्त कबीर को भी वो कुछ ऐसा ही मंत्र देता है लेकिन न मानने पर खुद ही बन्दूक निकाल लेता है. या तो प्रकाश समझ ही नहीं पाते कि वो फिल्म बनाने क्यों निकले हैं या फिल्म में जो दिखाया गया है ये उनकी सोची-समझी रणनीति है. खैर ये तो वो ही बेहतर बता सकतें हैं.

बहरहाल फिल्म शुरुआत से ही मीडिया पंडितों की घिसी-पिटी बातों और निष्कर्षों को ही अंतिम सत्य मानकर रास्ता तलाशने निकलती है और अंत में अपने लिए एक चक्रव्यूह खोज निकालती है. अपने दोस्त से बात करते हुए भी पुलिसिया नायक कहता है कि बन्दूक से शासन नहीं चल सकता लेकिन जाने क्यों जानबूझकर या साजिशन यहाँ प्रकाश कबीर को चुप ही रखते हैं. यही से फिल्म पर सबसे गंभीर सवाल खड़ा होता है कि क्यों कबीर नहीं पूछता कि अगर शासन बन्दूक से नहीं चलता तो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताने वाला भारत हथियारों पर सबसे ज्यादा खर्च कर रहा है. ओपरेशन ग्रीन हंट क्यों चलाया जा रहा है? ग्रेहाउंड, कोबरा, स्कोर्पियन, सीआरपीएफ और बीएसएफ जैसे सुरक्षा बल इस लाल गलियारे में क्यों और किनके लिए तैनात किये गए हैं? आखिर वहां किस युद्ध कि तैय्यारियाँ चल रहीं हैं? फिल्म के कुछ हिस्सों को देखकर लगता है कि प्रकाश की फिल्म बनाने से पहले की गई रिसर्च न्यूज़ चैनल और पुलिस एफआईआर तक ही सीमित रही है.

फिल्म की कहानी में तो कुछ खास ऐसा नहीं कि जिस पर बात की जाये. तकनीक के मामले में भी फिल्म बेहद कमज़ोर है. संगीत में भी जहाँ जनता से जुड़ें और विषय से मेल खाते कई गीत उन्हें मिल सकते थे प्रकाश ने क्यों जानबूझकर फिल्म के इन पक्षों पर कोई मेहनत नहीं की. वैसे फिल्म में ईशा गुप्ता को क्यों लिया गया है ये तो प्रकाश ही बेहतर बता सकते हैं. एक्टिंग में भी मनोज वाजपेयी, किरण करमरकर और अभय देओल ही कुछ प्रभाव डाल पाते हैं. यहाँ भी ओमपुरी को प्रकाश ने वेस्ट किया है. एक संवेदनशील इशू पर बनी कहानी के झोल को छुपाने के लिए फिल्म जबरदस्ती की नाटकीयता थोपती है. फिल्म में कुछ चीज़ों पर ध्यान देना बहुत ही ज़रूरी है. एक तो कबीर के करेक्टर को जिस तरह से सामने रखा गया है वो संदेह के घेरे में है. कबीर को अतिभावुक, हिंसा के प्रति आग्रह रखने वाला, जो लगभग मिसफिट है दिखाया गया है. यही बाद में नक्सलियों से सहानुभूति रखने लगता है. यहाँ उसके चरित्र कि विशेषता में जो बातें बार-बार दोहराई जाती है उन्हें ही उसकी नक्सलियों से सहानुभूति की वजह भी बताया जाता है. इसके अलावा आदिवासियों का सिर्फ बीस तक ही गिनती को जानना और कबीर का इस पर उनका मजाक उड़ाना. सभी से एक स्पष्ट सन्देश देने कि कोशिश कि जाती है कि उनमे शामिल सभी ऐसे ही कम जानकर, बहकाए हुए, अनपढ़ और हद दर्जे के भावुक लोग हैं. जो कि बन्दूक की नोक पर सत्ता हासिल करना चाहते हैं. फिल्म में लगता है कि छत्तीसगढ़ में जैसे नक्सली खरपतवार कि तरह उग आये हैं उनका कोई इतिहास ही नहीं है. उन्हें किसी और दुनिया से आए हुए एलियन कि तरह सामने लाया जाता है. ये बेहद क्रूर हैं और इनका उद्देश्य है सत्ता.

दरअसल प्रकाश इस बात को समझ ही नहीं पाते कि उन्होंने जिस विचार को लेकर मुनाफे के लिए फिल्म बनाई है उस विचार के मूल में उसी मुनाफाखोरी का विरोध करना छुपा है. वेदान्त की जगह मेदंता और नंदीग्राम कि जगह नंदीगढ़ को लेकर आडम्बर रचने कि कोशिश तो कि गई है लेकिन उससे सभी कुछ छुप नहीं पाता. प्रकाश ने थोड़ी सी रिसर्च कि होती तो उन्हें पता होता कि ओडिशा में कैसे नियमगिरि पहाड़ बेचा गया या कैसे छत्तीसगढ़ में एक नदी तक को सरकार ने बेच दिया. यहाँ शक होता है कि ये सब प्रकाश ने क्यों अनदेखा कर दिया कि क्यों आज तक विश्व की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी राजनितिक कैदियों की इज्ज़त करना नहीं सीखी. एक तरफ टेबल टाक तो दूसरी तरफ नई सेनाएं और सलवा जुडूम को क्यों गठित किया जा रहा है. प्रकाश कि फिल्म में छत्तीसगढ़ में पिछले दिनों सबसे ज्यादा कहर बरपाने वाले सलवा जुडूम और जन मिलिशिया का ज़िक्र क्यों नहीं आता. फिल्म इन सब पर बात तक नहीं करती तो सवाल पूछने कि उम्मीद करना तो बेमानी ही है. फिल्म में कहीं नहीं है कि क्यों वन अधिकारी और पुलिस आदिवासी औरतों से बलात्कार को अपना हक़ समझते हैं या फिर क्या सच में आदिवसी चाहते हैं कि उनके जंगलों को हटाकर पक्की सड़क और इमारतें बनाई जाएँ? फिल्म विकास के इस तथाकथित मॉडल पर कोई सवाल क्यों नहीं उठाती? उलटे हर जगह इसकी वकालत क्यों करती है. यहाँ ये समझिये कि फिल्म के प्रायोजकों में दैनिक भास्कर और रिलाइंस जैसे बड़े उद्योग घराने शामिल हैं और फिल्म में भी उनके नाम बराबर सुनाई पड़ते हैं क्यों ये लोग प्रकाश की फिल्मों में पैसा लगाकर अपने खिलाफ ही माहौल क्यों बनाना चाह रहे हैं? क्या इन्हें कोई ज्ञान प्राप्त हो गया है? 

अंकित युवा पत्रकार हैं। थिएटर में भी दखल। 
अभी एक साप्ताहिक अखबार में काम कर रहे हैं।
 इनसे संपर्क का पता francisankit@gmail.com है।