तारिक कासमी का लखनऊ जेल से आया आवाम के नाम पत्र

"...सुप्रिम कोर्ट की बकायदा हिदायत है कि किसी भी अण्टर ट्रायल को कैद कर तनहाई में न रखा जाय। सजायाफ्ता को भी सिर्फ तीन माह तनहाई में रखे जाने की गुंजाइस है। हमारे साथ गैरकानूनी, गैरइंसानी और आपराधिक बर्ताव क्यों रखा जाता है, जबकि हम साजिशन फंसाए गए बेकसूर नागरिक हैं।..." - तारीक कासमी 

तंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों के रिहाई मंच ने लखनऊ जेल में बंद तारिक कासमी के लखनऊ जेल से आए पत्र को जारी करते हुए कहा कि जिस तरह हाई सेक्योरिटी के नाम पर जेलों में यातनाओं का दौर जारी है, ऐसे हालात में अगर किसी कैदी के साथ कोई अनहोनी होती है तो इसकी जिम्मेवार सपा सरकार होगी।
तारिक कासमी के अधिवक्ता मोहम्मद शुएब ने कहा कि जेलों में बंद कैदियोंको जो सरकार हवा-पानी मयस्सर नहीं होने दे रही है वो सपा सरकार बेगुनाहों को छोड़ने का वायदा क्या पूरा करेगी? उन्होंने आगे कहा कि तारिक कासमी को12 दिसम्बर 2007 को आजमगढ़ से खालिद को 16 दिसम्बर 2007 को मडि़याहूंसे उठाकर 22 दिसम्बर को बाराबंकी से उनकी झूठी गिरफ्तारी आतंकी के बतौर की और इनके बयानों के आधार पर कश्मीर के सज्जाद और अख्तर को पकड़ा। तारिक-खालिद की गिरफ्तारी की जांच के लिए गठित आरडी निमेष जांच आयोग ने अपनी रिपोर्ट 31 अगस्त को यूपी सरकार को सौंप दी, जिसे सरकार दबाए हुए है।

रिहाई मंच ने सपा सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार जानती है कि अगर रिपोर्ट सार्वजनिक होगी तो उससे साफ हो जाएगा कि तारिक-खालिद की गिरफ्तारी झूठी है और सवाल उठेगा कि तारिक-खालिद के पास से जो असलहे-विस्फोटक पदार्थ दिखाए गए वो कहां से एसटीएफ के पास पहुंचे थे? इस जांच रिपोर्ट के आने के बाद आईबी, एसटीएफ और आतंकी कारनामों में प्रयोग में लाए जा रहे विस्फोटकों-असलहों के अवैध कारोबारियों के गठजोड़ पर भी सवाल उठेगा कि जब तारिक-खालिद की गिरफ्तारी फर्जी है तो यह असलहा-विस्फोटक कहां से एसटीएफ के पास पहुंचा? साथ ही कश्मीरी युवकों सज्जाद और अख्तर को भी छोड़ना होगा, क्यों इन्हें तारिक-खालिद के नाम पर पकड़ा गया है।

रिहाई मंच ने कहा कि 2007 में हुए कचहरी धमाकों के नाम पर पकड़े गए आफताब अंसारी मात्र 22 दिनों मंें और सज्जाद को पिछले साल लखनऊ केस से बरी कर दिया गया है। ऐसे में यह भी सवाल उठेगा कि आखिर इन घटनाओं को किसने अंजाम दिया? जिन तक एसटीएफ नहीं पहुंच पाई? और बेगुनाहों को पिछले पांच सालों से जेल में सड़ा रही है। यहां गौरतलब है कि फैजाबाद कचहरी धमाकों के बाद 26 दिसम्बर 2007 को तत्कालीन एडीजी कानून व्यवस्था यूपी बृजलाल ने इस बातको कहा था कि फैजाबाद धमाके में प्रयुक्त की गई सामग्री मक्का मस्जिद धमाके में प्रयोग की गई सामग्री से मेल खाती है? अब साफ भी हो गया है कि मक्का मस्जिद साजिश में किन आतंकी गुटों का हाथ था, तो ऐसे बहुतों सवालों को दाबने में लगी है सपा सरकार।

रिहाई मंच के नेताओं ने कहा कि आम-आवाम के लिए जेल से आए तारिक कासमी के पत्र को वह जनता के बीच ले जाएगा और इस सरकार की साम्प्रादायिक जेहनियत का पर्दाफाश करेगा।

तारिक कासमी का लखनऊ जेल से आया आवाम के नाम पत्र


22 सितम्बर 2012
सलाम,

हम भी इंसान हैं और देशभक्त शहरी भी जो नापाक साजिशों के तहत दहशतगर्दी के आरोप में जबरदस्ती फंसाए गए बेकसूर हैं। आज हम लोग बेइन्तहां जुल्म से परेशान होकर आपस में आत्महत्या और उसकी जायज गुंजाइस के बारे में एक दूसरे से पूछने लगे हैं। हमारे खिलाफ होने वाली अमानवीयता जो जेल अधिकारियों की आपराधिक मानसिकता के कारण है, ने हमें इस कदर मायूस कर दिया है कि आत्महत्या ही आखिरी विकल्प लगने लगा है।

हममें से सभी को अपने-अपने घरों, बाजारों, खेतों से, राह चलते हुए गैर कानूनी कैद कर अगवा करके, गैर कानूनी हिरासत में रखकर भयानक हिंसा के जरिए कहानियां गढ़कर लखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव या फिर अन्य दूसरी जगहों से कई-कई दिन बाद गैरकानूनी सामानों के साथ गिरफ्तारियां दिखाकर लंबी-लंबी पुलिस हिरासत में लेकर सुबूत गढ़ने के बाद सलाखों के पीछे ढकेल दिया गया। सुरक्षा के नाम पर हाई सेक्योरिटी के नाम पर बने कमरों में ठंूसकर बेपनाह उत्पीड़न पहले भी किया गया और आज भी इरादतन साम्प्रदायिक तौर पर जारी है।

2008-09 की कुछ तस्वीरें-


सीलन भरी अंधेरी, बेरोशनदान वाली आठ गुणे बारह की छोटी सी सेल में लगातार बंद रखा जाता, एक मिनट के लिए भी खोला जाता। तेरह जून 2008 दिन शुक्रवार को जुल्म का नंगा नाच करते हुए हमें चमड़े के हंटरों और लाठियों से हमारे जिस्मों को फाड़ा और तोड़ा गया। पवित्र कुरान को अपवित्र किया गया, उसके पन्ने फाड़कर शौचालय में फेंका गया।

हमारे सारे कपड़े, चादर, किताबें जप्त कर ली गईं। बल्कि शुरु के ही दिनों में कपड़ों पर पाबन्दी लगा दी गई कि सिर्फ दो जोड़े कपड़े, एक लुंगी, एक तौलिया यहां तक की अण्डरवियर भी दो से ज्यादा रखने की इजाजत दी जाती थी।

तंग होकर हमने लंबी भूख हड़ताल, खाने-पीने का मुकम्मल बाईकाट विरोध के बतौर किया। तब 27 जनवरी 2009 से आधा घंटा के लिए पत्थर की ऊंची दीवारो वाले इतने छोटे से बरामदे में खोला जाने लगा जिसमें से 12 बजे के बाद से ही धूप गायब हो जाती और हरियाली का तो नामों निशान तक नजर नहीं आता।

दिसम्बर 2011 से बहुत दरख्वास्त करने पर एक घंटे के लिए खोला जाने लगा। पता होना चाहिए कि जेल के रजिस्टर में हमें बाकी कैदियों की तरह मैनुवल के लिहाज से खुला ही दिखाया जाता है, जबकि हम यहां लगातार बंद रखे जाते हैं।

लगातार बंद रहने की वजह से यहां लोग बीमार रहने लगे हैं। जबकि कई तो डिप्रेशन के शिकार हो चुके हैं, याददाश्त प्रभावित हो चुकी है। और कईयों की आंखे कमजोर होने लगी हैं।

कई साल से ऊपर हो गए होंगे जेल मुआयना पर आने वाले मजिस्टेª को हाई सेक्योरिटी तसरीफ लाए हुए। बड़े अफसरान और अथाॅरिटीज को हाई सेक्योरिटी नहीं लाया जाता कि हम शिकायत कर दें। हमारी दरख्वास्तें अथारिटीज को नहीं फारवर्ड की जाती कि कहीं हमें इंसानी हुकूक देने को कह दिया जाय।

सुप्रिम कोर्ट की बकायदा हिदायत है कि किसी भी अण्टर ट्रायल को कैद कर तनहाई में रखा जाय। सजायाफ्ता को भी सिर्फ तीन माह तनहाई में रखे जाने की गुंजाइस है। हमारे साथ गैरकानूनी, गैरइंसानी और आपराधिक बर्ताव क्यों रखा जाता है, जबकि हम साजिशन फंसाए गए बेकसूर नागरिक हैं।

साथियों ऐसे में अधिकारियों की तंग नजरी, बड़े अथारिटीज तक पहुंच हो पाने, मुकदमों का जल्द फैसला हो पाने और जरुरत की दवाओं के मिल पाने की वजह ने बहुतों को बहुत मायूस कर दिया है। जिसकी वजह से कुंठा बेचैनी से मजबूर होकर आत्महत्या के जायज होने या गुंजाइस होने का मसला अक्सर होने वाली बातचीत में मुझसे पूछा जाता है। साजिशों में फंसाए गए इन लोगों को कैसे समझाया जा सकता हैै। जबकि ये परेशान कैदी जब थोड़ी देर खुलने ताजा, हवा धूप खाने और बीमारियों के सही इलाज की दरख्वासत करते हैं कि सर ऐसे तो हम मर जाएंगे तो हंसी उड़ाते हुए कहा जाता है कि मर जाओ हमें क्या फर्क पड़ता है, सुसाइट कर लो हम जवब दे लेंगे और जहां चाहे शिकायत कर लो हमें फर्क नहीं पड़ता।

यहां के लोगों और खुद अपनी बेबसी देखकर, प्रशासन का रवैया देखकर दिल हिल जाता है। रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि हम हिन्दोस्तान की जेल में हैं या अंग्रेजों की। हम किसी सेकुलर स्टेट में हैं या कम्यूनल स्टेट में। हम आपसे मदद के प्रार्थी हैं। हुकूमती सतह पर या बड़ी अदालतों और अथारिटीज के जरिए इन्सानी हुकूक के खिलाफ हो रहे कार्यवाइयों पर लगाम लगाया जा सकता है।

मेहरबानी करके नफरत की इस भट्टी में सिसकती, बिलखती इंसानियत को बचाने के खातिर देश की मजबूती तरक्की के खातिर हम बेबसों की तरफ ध्यान दीजिए। क्योंकि इंसाफ से मुल्क हुकूमत को मजबूती मिला करती है।

द्वारा-
मोहम्मद तारिक कासमी
कैदी हाई सेक्योरिटी,
सी ब्लाक जिला जेल
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

 आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों का रिहाई मंच   
की ओर से शाहनवाज आलम, राजीव यादव द्वारा जारी