भारत-चीन संबंध : युद्ध के अतीत में अटका भविष्य

सत्येंद्र रंजन

भारत-चीन युद्ध (1962) के 50 साल

"...जटिलताएं किन्हीं दो देशों के संबंधों में होती हैं। लेकिन अगर वे देश पड़ोसी हों और उनके बीच सीमा जैसा विवाद हो, तो वे कुछ ज्यादा गंभीर रूप ले लेती हैं। और अगर उन दोनों देशों की सरकारें अलग-अलग विचारधाराओं और विश्व-दृष्टि के साथ चल रही हों, तो जटिलताएं गंभीरता के साथ-साथ नाजुक रूप भी लिए रहती हैं। भारत और चीन के संबंधों को इसी गंभीरता और नजाकत के साथ समझा जा सकता है।..." 


   
चीन भारत की, या कहें भारतीय प्रभु वर्ग और राजनीतिक संगठनों की एक बड़ी दुविधा है। चीन की सफलताएं उन्हें आकर्षित करती हैं। विपक्षी अथवा खुद को व्यवस्था विरोधी मानने वाले राजनीतिक संगठनों को जब भारत को पिछड़ा दिखाना हो, तो चीन की प्रगति एवं विकास के आंकड़े उनका सहारा बनते हैं। मगर जब चीन के राजनीतिक प्रतीक और उसका लाल झंडा उन्हें याद आता है, तो फिर उनमें से बहुतों को चीन दैत्य नज़र आने लगता है। जो पार्टियां या संगठन लाल किला पर लाल झंडा फहराना चाहती हैं, उनकी अपनी अलग दुविधाएं हैं। उनकी दुविधाओं के स्रोत पांच से छह दशक पुराने उस राजनीतिक विमर्श में छिपे हुए हैं, जिनकी वजह से दुनिया का कम्युनिस्ट आंदोलन मुख्य रूप से दो खेमों में बंट गया था।

भारतीय प्रभु वर्ग द्वारा नियंत्रित समाचार माध्यमों पर गौर कीजिए, तो उनमें बीजिंग से शंघाई तक के दमकते शहरों, चमकते एक्सप्रेस-वे और तेजी से उठती चीनी अर्थव्यवस्था के प्रति एक गजब किस्म सम्मोहन नजर आएगा। लेकिन हर कुछ दिन के अंतराल पर उन्हीं माध्यमों में चीन के खिलाफ एक जुबानी जंग भी छिड़ी नजर आएगी। इस दुविधा के बीच भी अभी कुछ वर्ष पहले तक भारत और चीन के रिश्ते सुधार की राह पर चलते नजर आ रहे थे। तब सीमा विवाद हल करने के राजनीतिक सिद्धांतों पर सहमति के साथ इस विवाद के सचमुच हल हो जाने की उम्मीद बंधने लगी थी। लेकिन इसी बीच 2008 आ गया। वह साल, जब बीजिंग को ओलिंपिक खेलों की मेजबानी करनी थी। यह हर नजरिए से चीन के लिए बहुत बड़ा अवसर था। मेजबानी की तैयारियों में कोई नुक्स छूटा नहीं दिखता था। दुनिया के लिए एक यादगार खेल आयोजन की पूरी तैयारी थी।

इसी बीच तिब्बत का सवाल ऊफान मारते हुए खड़ा हो गया (या कहें खड़ा कर दिया गया)। ओलंपिक की मशाल पश्चिमी देशों में जिन शहरों से गुजरी, वहां तिब्बत की आजादी के समर्थक सड़कों पर कहीं हिंसक, तो कहीं शोरगुल मचाते हुए उतर आए। कुछ विरोध तिब्बत में भी भड़का। और इसी बीच जब मशाल भारत पहुंची, तो तिब्बत समर्थक गुटों ने चीन के रंग में भंग डालने की जारी मुहिम में अपना योगदान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हालांकि भारत सरकार का रुख सब्र एवं संयम का रहा, लेकिन चीन की पार्टी एवं राज्य-नियंत्रित जो अंदरूनी राजनीतिक संस्कृति है, उसमें वहां की सरकार के लिए यह मानना कठिन था कि भारत सरकार सचमुच निष्पक्ष थी। खासकर मीडिया एवं विभिन्न राजनीतिक संगठनों की प्रतिक्रिया और एशिया में अमेरिका-भारत की बनती नई धुरी को देखते हुए शायद उसके लिए ऐसा मानना और मुश्किल हुआ हो। तो इसके साथ ही रिश्तों की राह में नए गतिरोधक आ गए, जिन्होंने सचमुच एक बार फिर से इसमें कई पेचीदगियां पैदा कर दी हैं।

अगर छह दशक पीछे जाकर देखें तो उस समय भी हिंदी-चीनी भाई-भाई के दौर में तिब्बत का पेच फंस गया था। तिब्बत और चीन के बीच क्या ऐतिहासिक रिश्ता रहा है, यह इतिहासकारों के बीच विवाद का विषय है। समझा जा सकता है कि इस बारे में राय काफी कुछ उनके अपने राजनीतिक एवं विचारधारात्मक रुझानों से तय होती है। और कुछ यही बात विभिन्न राजनीतिक धाराओं के बारे में भी कही जा सकती है।

भारत की आजादी और चीन में कम्युनिस्ट क्रांति से लेकर 1962 के भारत-चीन युद्ध तक भारत में चीन के प्रति और तिब्बत के मुद्दे पर जो रुख तय किए गए, उसके पीछे ऐसे रुझानों की पहचान बड़ी आसानी से की जा सकती है। जवाहर लाल नेहरू समाजवाद के जिस ढांचे में यकीन करते थे, उस पर सोवियत संघ की कम्युनिस्ट क्रांति और उसकी उपलब्धियों का खास प्रभाव था। साम्यवाद की मुक्तिदाता भूमिका से उनका वैसा मोहभंग नहीं हुआ था, जैसा जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया या उनके सहकर्मियों का हुआ था। इसलिए चीन की क्रांति के प्रति नेहरू का सकारात्मक झुकाव था। जाहिर है, उन्होंने कम्युनिस्ट चीन को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मान्यता दिलवाने के लिए अपनी अंतरराष्ट्रीय हैसियत और प्रतिष्ठा का पूरा इस्तेमाल किया। शुरुआती वर्षों में तिब्बत की घटनाओं से भी वे उतने विचलित नहीं थे, जितने दूसरी पार्टियों और राजनीतिक धाराओं के लोग थे। पंडित नेहरू तब तक हिंदी-चीनी भाई-भाई की संभावनाओं में यकीन करते रहे, जब तक चीन के आक्रमण का खतरा भारत के सिर पर घने बादलों तरह मंडराने नहीं लगा।

इसी तरह अगर हम डॉक्टर राम मनोहर लोहिया की चीन (या हिमालय) नीति को समझने की कोशिश करें, तो वैचारिक आग्रहों की ऐसी जमीन की अनदेखी हम नहीं कर सकते। इस संदर्भ में यह प्रश्न प्रासंगिक हो जाता है कि डॉ. लोहिया में चीन के खिलाफ औऱ तिब्बत की आजादी के समर्थन में जो उग्रता या व्यग्रता नजर आती है, क्या उसके पीछे कोई वस्तुगत विश्लेषण था या उनकी प्रतिक्रिया दो बिंदुओं पर उनके खास आग्रहों से तय हुई? ये बिंदु साम्यवाद और जवाहर लाल नेहरू हैं। यह तो साफ है कि 1950 के दशक से पहले ही डॉ. लोहिया की साम्यवाद के आलोचक बन चुके थे। सोवियत संघ, खासकर स्टालिन के जमाने के अनुभवों ने उन्हें साम्यवाद के खिलाफ कर दिया था। दरअसल, लोहिया-जेपी और उनके साथियों ने साम्यवाद से अलग जिस समाजवाद को परिभाषित करने की कोशिश की, वह उनकी ऐसी ही प्रतिक्रिया का परिणाम था। और फिर समाजवाद का एक संस्करण नेहरू के पास भी था, जिसका प्रयोग आजादी के बाद की फौरी चुनौतियों एवं विभाजन के झटकों से कुछ उबरने के बाद उन्होंने शुरू कर दिया। इसके लिए उन्हें कांग्रेस के एक मजबूत राजनीतिक ताकत के रूप में स्थिर होने और कांग्रेस के भीतर अपना नेतृत्व स्थापित होने तक इंतजार करना पड़ा। उसके बाद कहा जा सकता है कि नए भारत का एजेंडा पंडित नेहरू ने ही तय किया।

डॉ. लोहिया के सामने चुनौती साम्यवाद और नेहरूवादी-समाजवाद से अलग अपने सोच के समाजवाद की पहचान स्थापित करने की थी। ऐसी कोशिशों के दौरान चरम रुख अख्तियार करना और जिसके बरक्स वह कोशिश हो रही हो, उसके प्रति आक्रामक बने रहना एक स्वाभाविक मनोवृत्ति होती है। डॉ. लोहिया का अध्ययन करते समय साम्यवाद और नेहरू के प्रति ऐसी मनोवृत्तियों की अभिव्यक्ति होने का हमें अक्सर अहसास होता है। इसलिए चीन की साम्यवादी क्रांति डॉ. लोहिया के मनमाफिक हुई घटना नहीं थी। उस समय तक डॉ. लोहिया साम्यवाद को तीसरी दुनिया के देशों के लिए मुक्तिदाता के बजाय गुलाम बनाने वाले विचार के रूप में देखने लगे थे। और अगर नेहरू उस घटना के प्रति सकारात्मक रवैया रखते थे, तो उसकी कठोर आलोचना लोहियावादी राजनीति का सहज अंग बन जाती थी। नेहरू तो घरेलू मोर्चे पर भी उन्हें अपना वैचारिक प्रतिद्वंद्वी लगते थे, तो नेहरू की साख पर हर कोने से हमला उनकी अपनी राजनीति का स्वाभाविक रूप से खास हिस्सा बना हुआ था। जब तिब्बत में कम्युनिस्ट हस्तक्षेप के खिलाफ विद्रोह हुआ औऱ उसका दमन किया गया, तो चीन एवं तिब्बत के मुद्दों पर साम्यवाद और नेहरू दोनों को घेरने की एक राजनीतिक परिस्थिति पैदा हुई। डॉ. लोहिया से लेकर जनसंघ तक ने इस स्थिति का पूरा फायदा उठाने की कोशिश की। इस संदर्भ को गंभीरता एवं गहराई से समझे जाने की जरूरत है।

तथ्य यह है कि अक्टूबर 1949 में चीन में कम्युनिस्ट क्रांति (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शब्दों में नव-जनवादी क्रांति) के बाद नई सरकार ने एक साल के अंदर तिब्बत पर नियंत्रण कर लिया। 1951 में तिब्बती प्रतिनिधियों और बीजिंग सरकार के बीच 17 सूत्री समझौता हुआ, जिसके तहत तिब्बत पर चीन की संप्रभुता को मान्यता दे दी गई। इस समझौते के तहत बीजिंग सरकार को तिब्बत की अपनी सामाजिक व्यवस्था को चलने देना था। कुछ समय तक ऐसा चला, लेकिन जब कम्युनिस्ट सरकार ने वहां की पुरानी व्यवस्था में हेरफेर शुरू कर दी, तो 1958 में तिब्बती प्रभु वर्ग ने बगावत कर दी। इसे निर्ममता से कुचल दिया गया। मार्च 1959 में दलाई लामा तिब्बत से भागकर भारत आ गए। और इसके साथ ही भारत-चीन रिश्तों में एक लगभग स्थायी किस्म का कांटा फंस गया।

यहां यह प्रश्न प्रासंगिक है कि तिब्बत की घटनाओं के प्रति भारत में तब जो प्रतिक्रिया हुई, उसका आधार क्या था? आज पांच दशक बाद हम भावनाओं, विचाधारात्मक आग्रहों और फ़ौरी राजनीतिक जरूरतों के चश्मों को उतार कर विवेकपूर्ण ढंग से उन घटनाओं का विश्लेषण कर सकने की बेहतर स्थिति में हैं। तब के बारे में जो जानकारियां उपलब्ध हैं, उनके आधार पर आज यह कहा जा सकता है कि तिब्बत की घटनाओं के बहाने चीन के खिलाफ जो माहौल भारत में तब बना, उसके पीछे दो तरह की राजनीतिक शक्तियों की सबसे बड़ी भूमिका थी। एक तो सीधे दक्षिणपंथ की ताकतें थीं, जिनकी निगाह भले तिब्बत पर रही हो, लेकिन निशाना बीजिंग पर था। जिनके बयानों में भले तिब्बत के धर्म-संस्कृति और भारत से उसके पारंपरिक-ऐतिहासिक संबंधों का जिक्र होता हो, लेकिन जिन्हें मुख्य चिंता इस बात की थी कि चीन में कामयाब हुई लाल लहर कहीं भारत तक ना पहुंच जाए। अगर उनकी बातों के पीछे सचमुच कोई सिद्धांत था, तो उनकी वैसी ही कोई चिंता नगालैंड या कश्मीर के संबंध क्यों जाहिर नहीं हुई? सांप्रदायिक फासीवाद की ताकतें क्षेत्रीय अस्मिता और लोगों की बुनियादी आजादी की बात करें, तो इससे दिलचस्प बात और क्या हो सकती है!

दूसरी राजनीतिक ताकतें वो थीं, जो मार्क्सवाद- साम्यवाद के बरक्स या इस विचारधारा के विरोध में खुद को परिभाषित करने की मशक्कत में जुटी थीं। इस धारा के बीच सबसे मुखर शख्सियत डॉ. लोहिया नजर आते हैँ। इस धारा के नेता यह दलील देते थे कि दलाई लामा का राज भले सामंती हो, लेकिन यह अधिकार तो तिब्बत के लोगों को ही है कि अपने लिए वे कैसी सरकार चुनते हैं। चीन उन्हें सामंतवाद से मुक्त कराने के नाम पर तिब्बत को नहीं हड़प सकता। मगर वही नेता (जिनमें डॉ. लोहिया भी शामिल थे) जवाहर लाल नेहरू की सरकार पर नेपाल के संदर्भ में कुछ ना करने के लिए बरसते थे और चाहते थे कि भारत सरकार नेपाल में लोकतंत्र समर्थक आंदोलन को मदद देकर उस पड़ोसी देश को सामंती राणाशाही से मुक्त कराए। इस अंतर्विरोध से वो राजनीतिक ताकतें वाकिफ थीं, या अनजाने में ऐसे विरोधाभासी राजनीतिक अभियान चलाती थीं, यह जानने का आज हमारे पास संभवतः कोई स्रोत नहीं है।

मगर यह तो हम साफ देख सकते हैं कि उनकी इन प्रतिक्रियाओं के पीछे मुख्य प्रेरणा नेहरू पर हमला बोलने की थी। चीन और तिब्बत उसे एक बेहतर परिदृश्य मुहैया कराते थे। डॉ. लोहिया को साम्यवाद से गुरेज था और चीन की नीतियों के वे खिलाफ थे। लेकिन नेहरू सरकार की नीतियों एवं दिशा पर हमला बोलने के लिए चीन की तेजी से हो रही प्रगति को औजार बनाने में उन्हें कोई मुश्किल नहीं होती थी। उनके इस कथन पर गौर करें- मैं चीन का समर्थक हूं, ना ही मैं साम्यवाद को स्वीकार करता हूं। लेकिन मैं तथ्यों से अपनी आंखें मूंद नहीं सकता। मैं साम्यवाद को बिना रत्ती भर पसंद किए चीन के विकास संबंधी तथ्यों को स्वीकार करता हूं। चीन आज हर साल एक करोड़ टन इस्पात का उत्पादन कर रहा है, जबकि भारत में यह उत्पादन 25 लाख टन है। भारत के 5 से 6 करोड़ टन सालाना कोयला उत्पादन की तुलना में चीन का सालाना कोयला उत्पादन 35 करोड़ टन है। कृषि में भारत की पैदावार 5 से 6 करोड़ टन है, तो चीन का 20 करोड़ टन। जबकि चीन की आबादी भारत की डेढ़ गुना, यह संभवतः उससे भी कम है। (इंडिया-चाइना एंड नॉदर्न फ्रंटियर्स, पेज- 139-40)

स्पष्ट है, इन आंकड़े इसलिए दिए गए हैं, ताकि यह बताया जा सके कि नेहरू भारत को गलत राह पर ले चले थे। लेकिन ऐसी राह हमेशा ही सापेक्ष होती है। दुनिया में आज तक सही या गलत की कोई निरपेक्ष समझ, धारणा या राह परिभाषित नहीं की जा सकी है। चीनी नेतृत्व के सामने अपनी परिस्थितियां और उनकी क्रांति का अपना चरित्र था। नेहरू के सामने अलग चुनौतियां, अलग समाज और सत्ता हस्तांतरण की वह अलग प्रक्रिया थी, जिसकी वजह से प्रधानमंत्री बने थे। दुनिया में कही विपक्ष सरकार की आलोचना ऐसी परिस्थितियों और संदर्भ को ख्याल में रखते हुए नहीं करता। अगर नेहरू के विपक्षी ऐसा नहीं कर रहे थे, तो इसके लिए उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। लेकिन एक विचारक औऱ एक मार्गदृष्टा से यह अपेक्षा जरूर की जाती है कि वह अपनी बातों में ऐसा संतुलन दिखाए। अगर किसी राजनीतिक विचारधारा का प्रणेता ऐसी जिम्मेदारी नहीं दिखाता, तो उसका असर उसकी धारा पर पड़े बिना नहीं रहता। डॉ. लोहिया की धारा इसका अपवाद नहीं है।

मसलन तिब्बत का संदर्भ लें। यहां डॉ. लोहिया की यह टिप्पणी गौरतलब है- अपनी निजी पसंद या नापंसद से अलग लामा-व्यवस्था की धार्मिक सत्ता को मैं स्वीकार करता हूं। कुछ लोग यह चाह सकते हैं कि सभी संगठित धर्मों की तरह लामा व्यवस्था भी खत्म हो जानी चाहिए। (लेकिन) इस बारे में फैसला तिब्बती लोगों को करना है। तिब्बत में लामाओं के पास बड़ी मात्रा में जमीन और राजनीतिक सत्ता भी थी। (इसलिए यहां) तिब्बत से सहानुभूति का मतलब अनिवार्य रूप से दलाई लामा के प्रति सहानुभूति नहीं है और दलाई लामा से सहानुभूति का मतलब हर उस बात को स्वीकार कर लेना नहीं है, जिसे वो कहते हैं। (लेकिन) इसमें कोई संदेह नहीं है कि दलाई लामा आज स्वतंत्रता के लिए तिब्बत के संघर्ष, उसकी पीड़ा और उसके जीवट का प्रतीक बन गए हैं। (इंडिया-चाइना एंड नॉदर्न फ्रंटियर्स, पेज 145)। डॉ. लोहिया ने इस क्रम में कहा था- यह बात अवश्य साफ-साफ समझ ली जानी चाहिए कि एक सकारात्मक विदेश नीति सिर्फ तभी बन सकती है, जब हमारे दोस्त और पड़ोसी मजबूत हों। यह बिल्कुल साफ है कि लामाओं की राजनीतिक सत्ता और आर्थिक विशेषाधिकारों के तले गल रहे 40 लाख तिब्बती कभी एक मजबूत राष्ट्र नहीं बन सकते।

तो लामाओं के बारे में डॉ. लोहिया की यह समझ थी। मगर क्या यही समझ उनके राजनीतिक वारिसों में भी नजर आई? गुजरते वक्त के साथ तिब्बत की मजबूती की शर्त उनके विमर्श से गायब हो गई और उनकी शब्दावली में दलाई लामा परम पावन हो गए। धीरे-धीरे तिब्बत का सामाजिक संदर्भ गायब होता गया और इसका भू-राजनीतिक पहलू इस राजनीतिक धारा की सोच पर हावी होता चला गया। यह फर्क करना मुश्किल होता चला गया कि तिब्बत और चीन के सवालों पर दक्षिणपंथी ताकतों से इस खेमे की राय किस रूप में अलग है? नेहरू के प्रति साझा द्रोह का परदा उनकी वैचारिक भिन्नताओं को निरंतर ढकता नजर आने लगा। यह आजाद भारत के इतिहास का एक दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय है।

बहरहाल इस क्रम में स्वतंत्रता के बाद भारत द्वारा अपनाई गई चीन नीति को समझना जरूरी हो जाता है। प्रकारांतर में यह नेहरू की चीन नीति ही है। जवाहर लाल नेहरू पर आरोप है कि उन्होंने अपने वैचारिक आग्रहों की वजह से कम्युनिस्ट चीन को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रतिष्ठा दिलाई और तिब्बत में उसके दखल को नजरअंदाज करते रहे। उपलब्ध जानकारियों से जाहिर होता है कि यह आरोप 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध में एक मुहिम की शक्ल लेने लगा था और गुजरते वक्त के साथ भड़कते राजनीतिक माहौल के बीच पंडित नेहरू बचाव की मुद्रा अपनाने को मजबूर होने लगे थे। 1959 में नेहरू सरकार ने न सिर्फ दलाई लामा को भारत आने औऱ यहां से निर्वासित सरकार चलाने की इजाजत दी, बल्कि खुद पंडित नेहरू ने भी दलाई लामा से भेंटकर उन्हें एक तरह की वैधता प्रदान की। इन सारे घटनाक्रमों की भारत-चीन संबंधों की दिशा तय करने में भूमिका रही, जिसकी परिणति 1962 के युद्ध में हुई।

यहां यह बात ध्यान में रखने की है कि वह दौर ढहते उपनिवेशवाद और नई बनी अस्थिर परिस्थितियों का था। उपनिवेशवाद के बाद के दौर का भूगोल इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। चीन में कम्युनिस्ट क्रांति की सफलता के साथ उस देश का नया चेहरा और नई भूमिका दुनिया के सामने आई थी। उसमें निसंदेह आक्रामकता और असहिष्णुता थी। चीनी कम्युनिस्ट नेता भले अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पंचशील की बात करते थे, लेकिन व्यवहार में उन पर साम्यवाद को पूरी दुनिया में फैलाने के जुनून छाया हुआ था। यह बहुत मुमकिन है कि उनकी शब्दावली में दोस्त और दुश्मन के बीच कुछ और न होता हो। ऐसे में जब हिंदी-चीनी भाई-भाई से बात बिगड़ी तो फिर उसका युद्ध तक पहुंच जाना शायद स्वाभाविक परिणति थी। चीन आज भी उस मानसिकता या राजनीतिक संस्कृति से पूरी तरह उबर गया है, यह नहीं कहा जा सकता। मगर आज भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान में चीनी सत्ता तंत्र के चरित्र की कहीं बेहतर समझ है, यह जरूर कहा जा सकता है। विदेश सचिव निरुपमा राव ने पिछले साल दिसंबर में एक महत्त्वपूर्ण भाषण में दोनों देशों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा की स्थितियों का वर्णन करते हुए यह याद दिलाया था कि यह रिश्ता जटिलताओं से भरा हुआ है।

जटिलताएं किन्हीं दो देशों के संबंधों में होती हैं। लेकिन अगर वे देश पड़ोसी हों और उनके बीच सीमा जैसा विवाद हो, तो वे कुछ ज्यादा गंभीर रूप ले लेती हैं। और अगर उन दोनों देशों की सरकारें अलग-अलग विचारधाराओं और विश्व-दृष्टि के साथ चल रही हों, तो जटिलताएं गंभीरता के साथ-साथ नाजुक रूप भी लिए रहती हैं। भारत और चीन के संबंधों को इसी गंभीरता और नजाकत के साथ समझा जा सकता है। मगर राजनीतिक पार्टियों और विचारधाराओं के सामने चुनौती अपना समर्थन आधार बढ़ाने की होती है और ऐसा समझदारी के बजाय भावनाएं भड़का कर बेहतर ढंग से किया जा सकता है। वरना, इस सवाल का और क्या जवाब हो सकता है कि 1950-60 के दशक में चीन एवं तिब्बत के मुद्दों पर कांग्रेस सरकार और प्रधानमंत्री नेहरू के ऊपर अपनी लच्छेदार भाषणशैली में हमले बोलते हुए अपनी राजनीतिक पहचान बनाने वाले अटल बिहारी वाजपेयी 2003 में जब बतौर प्रधानमंत्री चीन गए, तो पहली बार भारत की तरफ से तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग घोषित कर आए? उस रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस थे, जो डॉ. लोहिया के सबसे तेज-तर्राज शिष्यों में एक गिने जाते हैं।

बहरहाल, आज हम इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के दूसरे वर्ष में हैं। भारत की आजादी और चीन की क्रांति साठ साल पुरानी बातें हो चुकी हैं। तब की भौगोलिक और सियासी अस्थिरता से आज ये दोनों देशों काफी हद तक उबर चुके हैं। आज उनकी सीमाएं ज्यादा सुरक्षित हैं और दुनिया के मंच पर दोनों उठते हुए देश हैं। बल्कि चीन को तो एक हद तक उठ चुका देश भी कहा जा सकता है। अपनी 4.8 खबर डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ अब वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। भारत भी आर्थिक विकास दर के मामले में आज सिर्फ चीन से पीछे है और बहु-राष्ट्रीय पूंजी की वकील द इकॉनोमिस्ट जैसी पत्रिकाओं के अनुमान पर भरोसा करें तो इस मामले में अगले दो साल में भारत चीन को पीछे छोड़ सकता है। इन दोनों देशों के आर्थिक विकास की कहानी आज दुनिया के सबसे चर्चित विषयों में एक है और इनकी ही बदौलत इस सदी को एशिया की सदी होने की घोषणाएं आज आम हैं। खुद इन दोनों देशों के बीच आपसी कारोबार साठ अरब डॉलर तक पहुंचने वाला है, जिसके आधार पर यह कहा जाता है कि अब बेहतर रिश्तों के लिए दोनों ही देशों के भीतर निहित स्वार्थों का एक ठोस समर्थन आधार तैयार हो गया है।

इसके बावजूद कभी तिब्बत तो कभी कश्मीर का पेच फंस जाता है और रिश्तों में सुधार की जारी प्रक्रिया पटरी से उतरती दिखने लगती है। फिलहाल माहौल पटरी से उतरने वाला ही है। चीन से आने वाले बयान और विचार यह जाहिर करते हैं कि चीन के लिए भारत की मजबूती को स्वीकार करना आसान साबित नहीं हो रहा है। उधर भारत ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अमेरिका के साथ धुरी बनाने की जो दिशा तय की है, उससे भी चीन भड़का नजर आता है। हालांकि जब-तब उभरने वाले सामरिक एवं आर्थिक विवादों के बावजूद अमेरिका के साथ खुद चीन के अपने रिश्ते आज घनिष्ठ हैं। लेकिन भारत-अमेरिका रिश्तों को लेकर वह एक संदेह का भाव रखता है। इतिहास का असर चीनी शासकों और वहां के जनमत पर कायम है, इसके संकेत भी आज हम पा सकते हैं।

भारत में कम से कम मौजूदा सरकार ने ज्यादातर मौकों पर चीन के मामले में संयम और समझदारी का परिचय दिया है। लेकिन यही बात पूरे राजनीतिक परिदृश्य में भी है, शायद ऐसा नहीं कहा जा सकता। दलाई लामा आज खुद कहते हैं कि तिब्बत की आजादी उनके एजेंडे पर नहीं है। मगर भारत के कई राजनीतिक संगठन, सिक्युरिटी लॉबी और समाचार माध्यम आज तिब्बत का कोई मामला आते ही जैसा उत्साह दिखाने लगते हैं, उससे यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आखिर उनका एजेंडा क्या है। अगर एजेंडा सचमुच एशिया, बल्कि पूरी दुनिया के लोगों की बेहतरी हो, तो यह बात आज समझने की है कि साठ साल पहले की अस्थिरता का दौर आज गुजर चुका है और अब दुनिया को जरूरत स्वतंत्रता एवं मानवाधिकारों की नई, विकास एवं प्रगति की ठोस जमीन पर आधारित अवधारणाओं की है। इन कसौटियों पर भारत और चीन दोनों की व्यवस्थाएं अपूर्ण हैं, लेकिन दोनों ने पिछले साठ साल में दुनिया के सामने अपने-अपने मॉडल रखे हैं। मानव की बढ़ती चेतना इन्हीं मॉडलों में सिमटी नहीं रहेगी। वह कुछ नए आविष्कार करेगी। लेकिन यह सब हो सके, इसके लिए जरूरी है कि दुनिया युद्ध और अलगाववाद की जुनूनी चर्चाओं से बाहर निकले। साठ साल पहले जो बातें आकर्षक लगती थीं, उनकी प्रासंगिकता आज संदिग्ध है। इसलिए तब जो हुआ, उसे इतिहास का एक अध्याय मानकर सबक लिए जाने की जरूरत तो है, लेकिन उन्हीं शब्दावलियों से चिपके रहना प्रगति की राह में बाधक बनना है। अगर इस बात को हम समझ पाएं, तो चीन की अपनी दुविधा से जरूर मुक्ति पा सकते हैं और मानवता के चालीस फीसदी हिस्से का आशियाना इन देशों के बीच नई समझदारी बनाने में अपना योगदान कर सकते हैं।

मगर यह बात अफसोस के साथ कहनी पड़ती है कि ऐसी समझदारी बनाने में डॉ. लोहिया के विचार या उनकी विरासत मददगार साबित नहीं होती है। हालांकि उनके विमर्श में कई जगह ठोस समझ और दिशा देने वाले तत्व हैं, लेकिन विमर्श का कुल स्वर ऐसा है कि उसमें इन दो बड़े देशों के रिश्तों की जटिलताएं और बारिकियां कहीं गायब हो जाती हैं।

सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं.  
satyendra.ranjan@gmail.com पर इनसे संपर्क किया जा सकता है.