वैज्ञानिकों की भी बड़ी जवाबदेही

अभिनव श्रीवास्तव


"...यह सही है कि रक्षा और अनुसंधान कार्यों में लगे हुए वैज्ञानिक समुदाय को अपनी रचनात्मक और शोधपरक क्षमताओं का इस्तेमाल करने के लिए एक स्वस्थ तंत्र और माहौल की जरूरत होती है लेकिन ऐसा उन्हें उनकी जवाबदेही से मुक्त करने की कीमत पर नहीं किया जा सकता। ..."




हाल में रक्षा मंत्रालय की वित्तीय शाखा ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के आंतरिक ऑडिट में हुई एक गड़बड़ी का पता लगाते हुए रिपोर्ट जारी की जिसमें कहा गया है कि साल 2009 में देहरादून स्थित यंत्र अनुसंधान एवं विकास संस्थान (आईआरडीई) ने जिस विदेशी
  तकनीक को हासिल करने लिए एक इस्रइली कंपनी से करार किया था, वह तकनीक डीआरडीओ के पास 2008 से ही है। इस कदम को संबंधित इस्रइली कंपनी को भारतीय रक्षा बाजार में स्थापित करने का प्रयास माना जा रहा है। हालांकि डीआरडीओ इस रिपोर्ट की वैधता और तथ्यों पर सवाल खड़े कर रहा है लेकिन इस रिपोर्ट के आने के बाद कंट्रोलर ऑडिटर जनरल (कैग) ऑफ इंडिया के कान खड़े हो गए हैं और उसने डीआरडीओ का टेस्ट ऑडिट करना शुरू कर दिया है। 

इससे पहले डीआरडीओ के आंतरिक ऑडिट में हुई संभावित गड़बड़ी को भांपते हुए बीते सितम्बर महीने में रक्षा मंत्रालय ने संगठन प्रमुख वी के सारस्वत के वित्तीय अधिकारों में कटौती करने का फैसला भी किया था। जाहिर तौर पर देश में रक्षा अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास कार्यों में लगे संगठनों के भीतर वित्तीय पारदर्शिता के संदेह के दायरे में आने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान परिषद (इसरो) की शाखा एंट्रिक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड का एक निजी कंपनी देवास मल्टी मीडिया से एस बैंड आवंटन संबंधी बहुचर्चित करार लंबे वक्त तक अपनी प्रक्रियागत खामियों के चलते सुर्खियों में रहा था। यह गौर करने वाली बात है कि ऐसे सभी मामलों पर हुई कार्रवाइयों की चपेट में इन संगठनों के नामी-गिरामी और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक रहे जिन पर हुई कार्रवाई को बहुत से सार्वजनिक मंचों से अनुचित और गलत बताया गया। एंट्रिक्स-देवास मामले में सरकार की कार्रवाई का सामना कर चुके पूर्व इसरो अध्यक्ष माधवन नायर ने तो जैसे इन फैसलों के खिलाफ अभियान छेड़ते हुए देश के वैज्ञानिकों और अनुसंधान कार्यों को नौकरशाही के चंगुल से आजाद कराने संबंधी कई बयान दिए और सरकार की आलोचना की। वास्तव में माधवन ने विज्ञान और अनुसंधान कार्यों में नौकरशाही के बढ़ते दखल की जिस परंपरागत समस्या का जिक्र किया है, उसको कई दफा अलग-अलग संदर्भों में संबोधित किया जाता रहा है और यह लंबे समय से बहस का विषय रहा है। 

गौर करने वाला पहलू यह है कि रक्षा और अनुसंधान कार्यों में संलग्न वैज्ञानिक समुदाय प्राय: अपनी रचनात्मक और शोधपरक क्षमताओं का सही इस्तेमाल करने के लिए आदर्श माहौल और नौकरशाही के दबाव से मुक्त रहने की मांग करता है। वैज्ञानिक समुदाय का अपनी क्षमताओं का इस्तेमाल करने के लिए इस तरह की मांग करना अनुचित नहीं है लेकिन यह भी सच है कि नौकरशाही का हस्तक्षेप हमेशा वैज्ञानिक समुदाय की क्षमताओं पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि उनकी लोकतांत्रिक जवाबदेही तय करने के लिए भी किया जाता है। इसलिए देश के वैज्ञानिक समुदाय का लोकतांत्रिक जवाबदेही तय करने के इन प्रयासों को आवश्यक रूप से अपनी रचनात्मक और वैज्ञानिक क्षमताओं के मार्ग में बाधा मान लेने का नजरिया कई तरह के भ्रामक और गलत निष्कर्षो की ओर भी ले जाता है। हाल में रक्षा और अनुसंधान संस्थानों में वित्तीय अपारदर्शिता के जितने भी मामले सामने आ रहे हैं, उसकी एक वजह प्रशासनिक ओहदों पर बैठे वैज्ञानिक समुदाय के अनेक प्रतिनिधियों का लोकतांत्रिक तौर पर जवाबदेह नहीं होना भी रहा है। एंट्रिक्स-देवास मामले में जब बिना नीलामी के इसरो की शाखा एंट्रिक्स द्वारा एस बैंड एक निजी कंपनी देवास मल्टीमीडिया को बेचा गया, तो इसरो अध्यक्ष जी माधवन नायर थे। इस नाते किसी भी प्रक्रियागत खामी की जवाबदेही जी माधवन नायर की बनती थी। ठीक इसी तरह, डीआरडीओ के आंतरिक ऑडिट में हुई गड़बड़ी का जिम्मा स्वभाविक रूप से संगठन प्रमुख वी के सारस्वत पर आयेगा। भविष्य में अगर आंतरिक ऑडिट में हुई गड़बड़ी से संबंधित सभी तथ्य सही पाये जाते हैं तो उन्हें कड़ी कार्रवाई का सामना करना होगा। यह आश्र्चय की बात है कि रक्षा और अनुसंधान संस्थानों में कार्यरत वैज्ञानिक समुदाय अपने ऊपर की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई का विरोध और उसमें छूट की मांग अपनी विशिष्ट सामाजिक स्थिति और पहचान के आधार पर करता है। अपनी इस विशिष्ट स्थिति और पहचान को बचाये रखने के लिए कई मौकों पर विज्ञान और शोध कार्यों से जुड़ा वैज्ञानिक समुदाय व्यापक जनहित की नीतियों के खिलाफ भी जा खड़ा होता है और सरकार के हस्तक्षेप को अपनी विशिष्टता के लिए खतरा भी मानता है। 

कुछ महीनों पहले मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा के लिए बनाये गये प्रारूप का कुछ आईआईटी संस्थानों और वहां के शिक्षक संकाय ने महज इस आधार पर विरोध किया क्योंकि इससे उन संस्थानों की विशिष्टता खतरे में पड़ रही थी। इसरो के पूर्व अध्यक्ष जी माधवन नायर भी ऐसे ही तर्कों के सहारे देश के वैज्ञानिकों को बिना किसी भय और प्रदत्त अधिकारों के साथ काम करने देने की वकालत करते रहे हैं जबकि शोध और अनुसंधान संस्थानों के भीतर वैज्ञानिक समुदाय को असीमित आजादी देने का परिणाम कई तरह की वित्तीय गड़बड़ियों के रूप में सामने आ रहा है। यह सही है कि रक्षा और अनुसंधान कार्यों में लगे हुए वैज्ञानिक समुदाय को अपनी रचनात्मक और शोधपरक क्षमताओं का इस्तेमाल करने के लिए एक स्वस्थ तंत्र और माहौल की जरूरत होती है लेकिन ऐसा उन्हें उनकी जवाबदेही से मुक्त करने की कीमत पर नहीं किया जा सकता। दुर्भाग्य यह है कि अनुसंधान कार्यों में संलग्न वैज्ञानिक समुदाय को लोकतांत्रिक जवाबदेही तय करने की कोशिशें अपने शोधपरक कार्य में बाधा और अपने ऊपर नियंतण्रस्थापित करने की कोशिशें नजर आती हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास किसी भी देश की आधुनिकीकरण की प्रक्रिया का वाहक होता है और यही वजह है कि इसका जिम्मा लेने वाले संस्थानों और वैज्ञानिकों के योगदान की न तो उपेक्षा की जा सकती है और न उसे कम करके आंका जा सकता है। 

यह डीआरडीओ के वैज्ञानिकों की क्षमताओं का ही परिणाम था कि भारत अग्नि-5 का सफल परीक्षण कर सका। सच तो यह है कि बदलते वक्त के साथ शोध और अनुसंधान के कार्यों में लगे वैज्ञानिक समुदाय और संस्थानों को अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता को नए सिरे से समझना होगा। लगातार सीमित होते संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बीच एक वैज्ञानिक को न सिर्फ एक अच्छे शोधकर्ता बल्कि कुशल और ईमानदार प्रशासक की भूमिका भी निभानी होगी। उसके सामने अपने शोध की गुणवत्ता को बरकरार रखते हुए एक ऐसे प्रशासक की भूमिका निभाने की दोहरी चुनौती है जो उपलब्ध संसाधनों का पारदर्शिता से और प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सके। उन प्रक्रियाओं का भी सम्मान करना भी वैज्ञानिक समुदाय की जिम्मेदारी है जो उनकी जवाबदेही तय करने के लिए बनायी गई हैं। डीआरडीओ और इसरो जैसे संस्थानों में वित्तीय अपारदर्शिता के मामले यह दिखाते हैं कि फिलहाल देश का वैज्ञानिक समुदाय अपनी इस भूमिका को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, लेकिन जैसे-जैसे रक्षा और अनुसंधान कार्यों में लगे हुए संस्थानों की वित्तीय पारदर्शिता सवालों के घेरे में आएगी, वैसे-वैसे शोध कायरे में लगे हुए वैज्ञानिकों के लिए खुद को इस भूमिका में ढालने की चुनौती बढ़ती जायेगी। जब तक ऐसा नहीं हो जाता, रक्षा और अनुसंधान संस्थानों में नौकरशाही के दखल की बहस अलग-अलग रूपों में सामने आती रहेगी और हर बार इस मुद्दे पर देश का वैज्ञानिक समुदाय और सरकार आमने-सामने होंगे।